मनुष्य की विसंगत सोच पर गुदगुदाती व्यंग्य रचनाएं
पुस्तक :_ “ज़ालिम स्त्रियों के मध्य पुरुष”
प्रकाशक :_इंडिया नेटबुक्स,नोएडा
लेखक :’ डॉ.संदीप अवस्थी,7737407061
“जालिम स्त्रियों के मध्य पुरुष ”
एक साहसी, विचारोत्तेजक और समकालीन व्यंग्य संग्रह है। यह पाठक को हँसाता ,चौंकाता है और सोचने पर विवश करता है .. जो किसी भी अच्छे व्यंग्य की असली कसौटी है।
यह संग्रह उन पाठकों के लिए विशेष रूप से पठनीय है जो साहित्य में केवल मनोरंजन नहीं, सामाजिक संवाद और आत्ममंथन भी खोजते हैं।
हिंदी व्यंग्य साहित्य की समृद्ध परंपरा में हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के बाद एक लंबा रिक्त-सा अनुभव होता रहा है। ऐसे में यह व्यंग्य संग्रह उस परंपरा को आगे बढ़ाने का एक सार्थक प्रयास है। “ज़ालिम स्त्रियों के मध्य पुरुष” केवल एक शीर्षक नहीं, बल्कि समकालीन सामाजिक यथार्थ का एक दर्पण है .. जिसमें पाठक को अपना और अपने समाज का चेहरा स्पष्ट दिखाई देता है।
संग्रह का स्वरूप और वैविध्य:
इस संग्रह की सबसे बड़ी विशेषता इसका विषय-वैविध्य है। लेखक ने दाम्पत्य जीवन से लेकर शिक्षा व्यवस्था, साहित्यिक पाखंड, प्रेम के बाज़ारीकरण, राजनीतिक बेवफाई और बाल सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों तक अपनी कलम बेधड़क चलाई है। प्रत्येक रचना अपने आप में स्वतंत्र है, फिर भी सबमें एक साझा सूत्र है .. व्यवस्था और समाज के खोखलेपन पर सीधा प्रहार।
“प्रोफेसर बेवकूफ होते हैं” में शिक्षा जगत की जड़ता पर जो कटाक्ष है, वह “साहित्य और लोकार्पण की दुनिया” में साहित्यिक दिखावे की आलोचना से जुड़कर एक बड़े बौद्धिक पाखंड की तस्वीर बनाता है। “कोई यूँ ही बेवफा नहीं होता” राजनीतिक और व्यक्तिगत ..दोनों स्तरों पर एक साथ बात करती है। “प्रेम दिवस आया” और “गुड टच बैड टच” जैसी रचनाएँ सामाजिक संवेदनशीलता के कम चर्चित कोनों को उजागर करती हैं।
भाषा और शिल्प:
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लेखक की भाषा सहज, बोलचाल की, लोकजीवन से जुड़ी और संवादधर्मी है। मुहावरों, लोकप्रचलित प्रतीकों, अतिशयोक्ति, कटाक्ष और व्यंजनात्मक संकेतों का प्रयोग उनकी रचनाओं को जीवंत बना देता है। कई स्थानों पर उनकी शैली हिंदी व्यंग्य की स्थापित परंपरा की याद दिलाती है, किंतु विषय चयन और प्रस्तुति में उनकी अपनी मौलिक पहचान भी स्पष्ट दिखाई देती है।
यदि उनके कृतित्व का समग्र मूल्यांकन किया जाए तो कहा जा सकता है कि वे समकालीन समाज के उन सचों को सामने लाने वाले लेखक हैं, जिन्हें अक्सर सभ्यता, शिष्टाचार या लोकप्रियता के दबाव में अनदेखा कर दिया जाता है।कहीं कहीं व्यंग्य की तीव्रता आरोपात्मक होती प्रतीत होती है। वे रिश्तों, शिक्षा, राजनीति, साहित्य, सामाजिक अभियानों और मानवीय कमजोरियों..हर क्षेत्र में मौजूद विसंगतियों को बेबाकी से सामने रखते हैं।
लेखक का गूढ़ विषयों पर भी सहजता और व्यंग्य की धार का दुर्लभ संयोग परिलक्षित होता प्रतीत होता है। चुटीले वाक्य, देसी उपमाएँ और संवादात्मक शैली रचनाओं को पाठक के बेहद निकट ले आती है। अतिशयोक्ति, विरोधाभास और कटाक्ष का प्रयोग कुशलता से हुआ है .. कई स्थानों पर हास्य के भीतर से करुणा झाँकती है, जो किसी भी सशक्त व्यंग्य की पहचान होती है।पाठकों द्वारा यह संग्रह बहुत पसंद किया जाएगा ऐसा मुझे विश्वास है ।
~ ज्योत्सना सक्सेना ‘प्रकाश’
10/697, चेतना पथ मानसरोवर,जयपुर 302020
फोन: 9829577660