June 21, 2026

आम जनता के कवि थे स्वर्गीय मधु धांधी

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(आलेख – स्वराज करुण )
छत्तीसगढ़ के सुमधुर गीतकार स्वर्गीय मधु धांधी का आज 21 जून को जन्म दिन है। वे हिन्दी और छत्तीसगढ़ी दोनों ही भाषाओं के उभरते हुए कवि थे । आंचलिक कवि सम्मेलनों में उन्हें काफी लोकप्रियता मिल रही थी। लेकिन तभी युवावस्था में ही वह इस भौतिक संसार से अचानक चले गए। उनका जन्म 21 जून 1951 को तत्कालीन रायपुर जिले के ग्राम -पिसीद (विकास खण्ड -कसडोल)में और निधन 3 अप्रैल 1977 को मात्र 26 वर्ष की अल्पायु में तत्कालीन अविभाजित रायपुर जिले में स्थित अपने गृहग्राम -खुटेरी (विकासखण्ड -पिथौरा )में हुआ था। यह गाँव अब महासमुंद जिले में है ।
ग़रीबों को और ज़्यादा ग़रीब और धनवानों को और भी अधिक अमीर बनाने वाली समाज-व्यवस्था में कोई भी सजग और संवेदनशील साहित्यकार आम जनता की पीड़ा को अपने शब्दों की वाणी दिए बिना नहीं रह सकता।मधु धांधी भी आम जनता के कवि थे। इस नाते आम जनों की आँखों से बहता पानी उन्हें भी झकझोरता था। तभी तो आर्थिक विषमताओं से घिरे आज के मेहनतकश मनुष्य की व्यथा से विचलित होकर उन्होंने लिखा था-
“कितना खटना पड़ता है तब
मानव को रोटी मिलती है ।
कितने उघरे देह यहाँ हैं ,
बरसों में धोती मिलती है।।
भूखे को कब रोटी मिलती ,
कब नंगे को वस्त्र मिला है ।
हम बंदी ,धन वाले शासक,
कैदी को कब अस्त्र मिला है ।।”
वास्तव में रोटी से वंचित, धोती से वंचित और कैदियों जैसी ज़िन्दगी जीने वाले इस देश के मेहनतकशों की हालत देखकर भला कौन यकीन करेगा कि हम एक आज़ाद मुल्क के निवासी हैं? तभी तो मधु धांधी ने अपनी इस रचना में आगे लिखा था–

“यहाँ साँस तक रहन रखे हैं ,
धन वालों का ईश्वर साथी ।
इनके ही घी के दियों में
बैठे प्रभु हैं बनकर बाती ।।
मित्र मुझे विश्वास नहीं है
बहुत सुखी यह देश है मेरा ।
कुछ सड़कों में काट रहे हैं,
किया कुछों ने रैनबसेरा ।।”

देश के किसान कभी अनावृष्टि तो कभी अतिवृष्टि से पीड़ित होते रहते हैं। इन प्राकृतिक आपदाओं ने छत्तीसगढ़ के किसानों को भी कई बार तोड़ा है। अकाल का सामना करते किसानों के दर्द को मधु धान्धी ने अपने एक छत्तीसगढ़ी गीत में कुछ इस तरह अभिव्यक्ति दी है-

“फेर परगे संगी अकाल ,कइसे करबो ,
दुकाल एसो फेर परगे ना ।
पानी के दिन भागिस
त आगिस जाड़ ।
बिन घर के कतको ल
कर डारिस बाढ़ ।।
दू बेरा कतको त नइ पावैं भात ।
बिन ओन्हा ,चेंदरा के
काटत हन रात ।।
फेर आगे संगी जंजाल ,
कइसे करबो
ए जाड़ बैरी जर गे हे ना ।।”

मधु धांधी का रचना संसार दरअसल प्रगतिवाद और छायावाद का अदभुत संयोजन है। उनकी कविताओं की दुनिया में जहाँ देश की सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों पर प्रहार करती प्रगतिवादी रचनाएं हैं, वहीं छायावादी काव्य धारा से निकली उनकी कविताएं कहीं प्रकृति प्रेम तो कहीं संयोग और वियोग श्रृंगार के अलग-अलग रंगों में उभरकर कई भावुक दृश्यों का निर्माण करती हैं। प्रयोगधर्मिता भी उनके कला पक्ष की एक बड़ी ख़ूबी है, लेकिन वह कृत्रिम नहीं, बल्कि स्वाभाविक है। उनकी अभिव्यक्ति के रूप, रंग और रस पहाड़ी झरनों की तरह बिल्कुल नैसर्गिक हैं। बानगी देखिए-

“मेरी पीड़ा ने आँसू के
आभूषण हैं त्याग दिए,
और हँसी को अपने आँगन
का मेहमान बना डाला ।
घिरा मेघ से गगन सघन है ,
हुए नयन के रीते कोर ,
पता नहीं ,विश्वास मुझे है
जाने ले जाए किस ओर ।
फिर भी आशाएं वरमाला
लिए खड़ी हैं द्वार पर ,
निर्निमेष हैं भाव लोटते
सपनों के अंगार पर ।”
उनके इकलौते काव्य संग्रह ‘हॄदय का पंछी’ के इसी शीर्षक वाले उनके एक गीत की इन पंक्तियों में उनकी भावनाओं को महसूस कीजिए-

“मेरे मुरझाए फूलों को
मत अपना अपमान समझकर
बहुत दूर से मैं लाया हूँ ,
कसम तुम्हें , ठुकरा न देना ।
बरसों बाद हॄदय का पंछी
पास तुम्हारे ले आया हूँ,
टूटा मन है और न टूटे ,
यह कहकर बहला न देना ।”

उन्होंने छत्तीसगढ़ी में कम लिखा, लेकिन जितना भी लिखा, बेहतरीन लिखा।छत्तीसगढ़ी भाषा में उनके कई भावपूर्ण, सुमधुर गीत हैं । अपने प्रियतम के इंतज़ार में व्याकुल प्रियतमा की भावनाएं मधु के इस गीत में कुछ इन शब्दों में प्रकट होती हैं –

“कहिके गे हावै आहां अषाढ़,
आँखी होगे बदरा ,दिन मोर होगे पहार ।
कछु नई सुहावै रे जर जुड़हा घाम ,
ठोसरा मारै संगी ले -ले तोर नावं।
मन के बारी हा होगे कछार ,
आँखी होगे बदरा ,दिन मोर होगे पहार।”

इसी तरह नायिका के वियोग में बेचैन नायक की अभिव्यक्ति –
“जब सुरता के फाँस पिराही
नइ काहीं जब तोला भाही ,
रोज घठौन्दा जाये बेरा
मन ला पथरा कस कर लेबे ।
जानत हांवव मोर बिना तयं
तन ला कचरा कस कर लेबे ।
मोर सुरता के वृंदावन मा
मन ला बदरा कस कर लेबे ।”
आज स्वर्गीय मधु धांधी के जन्म दिन के अवसर पर उन्हें विनम्र नमन करते हुए वर्ष 2022 में प्रकाशित उनके दो कविता संग्रहों का उल्लेख करना भी प्रासंगिक होगा। इनमें से एक संग्रह ‘मेरा सागर तुम्हारी कश्ती ‘ में उनकी 74 हिन्दी कविताऍं शामिल हैं ,जबकि दूसरा कविता संग्रह ‘मोर सुरता के गाँव’ उनकी 19 छत्तीसगढ़ी कविताओं का संकलन है।इन्हें मिलाकर मित्रों के सहयोग से उनकी हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं के तीन संकलन अब तक प्रकाशित हुए हैं । तीनों का सम्पादन मैंने किया था ।
अफ़सोस है कि वे अपनी कविताओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित नहीं देख पाए। तीनों का प्रकाशन उनके मरणोपरांत हुआ है। प्रथम संग्रह ‘हॄदय का पंछी ‘ अक्टूबर 1977 में प्रकाशित हुआ ,जिसमे उनकी 13 हिन्दी और 12 छत्तीसगढ़ी कविताएँ शामिल हैं, इसका प्रकाशन उनके मित्रों के द्वारा उनकी याद में पिथौरा में गठित साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति के माध्यम से किया गया था ।
उनके दो कविता संग्रह (1)मेरा सागर -तुम्हारी कश्ती और (2) मोर सुरता के गाँव (यानी मेरी यादों का गाँव ) का प्रकाशन उनके प्रथम संग्रह के लगभग 45 वर्ष बाद वर्ष 2022 में हुआ ।हिन्दी कविता संग्रह वैभव प्रकाशन ,रायपुर द्वारा और छत्तीसगढ़ी संग्रह का प्रकाशन शृंखला साहित्य मंच , पिथौरा द्वारा किया गया है। इन दोनों संग्रहों का विमोचन दिवंगत कवि के गृहग्राम -खुटेरी में 19 फरवरी 2023 को सम्पन्न हुआ था। स्वर्गीय मधु धांधी के तीन छत्तीसगढ़ी गीत यूट्यूब चैनल ‘यदा कदा ‘ में भी उपलब्ध हैं ।
– स्वराज करुण

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