‘उसके हिस्से का’ कविता संग्रह– समकालीन विसंगतियों को बाॅंचती पोखन लाल जायसवाल की कविताएं
‘रोटी की परिधि आज भी वही है /किंतु /भूख का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है लगातार।’
सुपरिचित कवि,समीक्षक और साहित्यकार पोखन लाल जायसवाल के पहले काव्य संग्रह ‘उसके हिस्से का’ में संकलित ‘वह पढ़ना चाहती है’ शीर्षक कविता से ली गई इन मार्मिक पंक्तियों से इस काव्य संग्रह के तेवर का अनुमान बखूबी लगाया जा सकता है।न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन नई दिल्ली से प्रकाशित इस काव्य संग्रह में लगभग 140 पृष्ठों में बहुत बढ़िया कागज पर सुरूचिपूर्ण ढंग से मुद्रित उनकी 79 नई/समकालीन कविताएं संग्रहित हैं। संग्रह का आवरण पृष्ठ एक नज़र में पुस्तक पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने में सफल है ।
जैसा कि रचनाकार ने भूमिका में स्वयं स्वीकार किया है कि समकालीन कविताएं समाज के एक बड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करने और सामाजिक विसंगतियों, संघर्ष, तथा मानवीय संवेदनाओं को स्वर देने में समर्थ हैं इसके बरअक्स पोखन लाल की कविताओं में समकालीन सामाजिक ताने-बाने, ग्राम्य जीवन, पारिवारिक संबंधों, कोरोना, श्रमिकों की व्यथा,पलायन की पीड़ा, पर्यावरण और प्रकृति, दाम्पत्य जीवन बखूबी प्रकट हुआ है।
यद्यपि यह संग्रह किसी व्यक्ति विशेष को समर्पित नहीं है फिर भी संग्रह का अवलोकन करते हुए स्पष्ट रूप से महसूस कर सकते हैं कि कवि अपनी माताजी से गहरे प्रभावित रहा है। इसीलिए उनकी अधिकांश रचनाएं माॅं पर केन्द्रित हैं। कविता के माध्यम से अपने विभिन्न मनोभावों को अभिव्यक्त करने के लिए कवि बार-बार माॅं के सानिध्य के उन दिनों की ओर लौटता है। इन दिनों में उसका बचपन भी शामिल हैं और उसका यौवन भी। ‘मैं नहीं देखता’ में कवि लिखता है– ‘मैं जानता हूॅं /खाने की चीज़ें/ भले कम ज़्यादा हो सकती हैं/ज़रूरत के हिसाब से/लेकिन/हो ही नहीं सकती कभी/ किसी के लिए कम/और किसी के लिए अधिक/माॅं की ममता।’ ऐसी ही एक कविता ‘माॅं और नदी’ में कवि लिखता है कि-माॅं की ममता जेठ में सूख जाने वाली या सावन में सब कुछ बहा ले जाने को आतुर वेगवती नदी नहीं होती है। माॅं के संदर्भ से रची गई ये पंक्तियां अतिशय भावुकता से लिखी गई प्रतीत हो सकती हैं इसके बावजूद ऐसी पंक्तियां मन को छूती हैं। ”सूरज और माॅं ‘, माॅं की बद्दुआ ‘ , ‘माॅं चुपचाप सह लेती है दु:ख’ इसी श्रेणी की रचनाएं हैं।
‘सूरज डूब चुका है’ (पृष्ठ 39) में उल्लेखित कविता छोटी लेकिन महत्वपूर्ण है हालांकि कवि ने ‘सूरज विदा लेता है’ (पृष्ठ 116) में इस अंश को फिर से शामिल करते हुए कविता को विस्तार दिया है। फिर भी दोनों ही कविताओं में सबसे अच्छा अंश यही है–‘सूरज का/अपनी किरणों को समेटना इसलिए ज़रूरी है/कि हाड़ तोड़ते प्रतीक्षारत मज़दूर कह सकें/ मालिक/ सूरज डूब चुका।’ कविता में मालिक को संबोधित करते हुए -सूरज डूब चुका’ की उद्घोषणा व्यापक अर्थ प्रकट करती है। कुछ प्रसिद्ध काव्य रचनाओं में पत्थर के माध्यम से प्रयुक्त संकेतों को आधार बनाकर बुनी गई रचना ‘मैं पत्थर होना चाहता हूॅं ‘ का काव्यांश -‘मैं पत्थर होना चाहता हूॅं /पत्थर तोड़ती ज़िंदगियों के लिए’- भी व्यापक अर्थ प्रकट करता है और पाठक के मन को छूता है। प्रेम और दाम्पत्य जीवन को लेकर भी कुछ अच्छी रचनाएं संग्रह में संकलित है। ‘प्रेम मिश्रित अदरक वाली चाय ‘ , ‘अपनों का दु:ख बुहारती स्त्री’ , प्यार का सिलसिला ‘ , ‘झुकी हुई ऑंखें शीर्षक रचनाएं इसी तरह रह की हैं। सोशल मीडिया के दौर में मोबाईल प्रेम में आकंठ डूबी पीढ़ी की ओर इंगित करते हुए एक मार्मिक रचना ‘गनीमत है …भूख लगती है ‘ शीर्षक से संग्रह में शामिल है -‘ हथेली के बराबर/चमकते स्क्रीन पर रोज़ होती है/घंटों बात/…घर के भीतर / एक -एक कमरे में सिमट गए हैं/घर के लोग/…बढ़ गई हैं दूरियाॅं अपनों के बीच/ … बैठना हो जाता है घर के लोगों का साथ-साथ/भोजन के वक़्त/..गनीमत है/भूख लगती है/हथेली के बराबर स्क्रीन चलाते हुए।’
आग, अंधविश्वास जैसी कुछ अन्य रचनाएं भी ध्यान खींचती हैं। हालांकि अपनी बुनावट और कहन में ‘बुरे दिन’ , ‘बहुत दिनों के बाद ‘ , ‘पुकार’ ,’ज़िदगी और मौत’ , जैसी बहुत सी रचनाएं अनेक दृश्य तो रचती हैं लेकिन विस्तारित होने पर या तो बिखर जाती हैं या सपाटबयानी का शिकार हो जाती हैं। ऐसी रचनाओं में कवि को थोड़ा और ध्यान देना चाहिए। ‘बढ़ते हर कदम ‘, ‘वह पढ़ना चाहती है’, ‘तीजहारिनें’ , ‘नदी और आदमी ‘, ‘अच्छा लगता है तुम्हें जाते हुए देखन’ , जैसीअनेक रचनाओं में व्याकरण और सर्वनाम संबंधी दोष खटकते हैं ।इस ओर कवि को विशेष ध्यान देना चाहिए। कुछ कविताएं (जैसे ‘तुम’) अस्पष्ट और कुछ अतिरिक्त विस्तार (जैसे-अपनी नज़रों से मत गिरना तुम’) लिए हुई हैं। ऐसी रचनाओं के लिए जायसवाल जी को और मेहनत करना चाहिए। कुल मिलाकर ऐसी छोटी -मोटी बारिकियों को नज़रअंदाज़ करते हुए यह एक पठनीय संग्रह है।इस संग्रह में संकलित कविताओं के माध्यम से यह सहज ही विश्वास होता है कि पोखन लाल जायसवाल एक संभावना शील कवि हैं ।जिनके पास कहने के लिए अनेक विषय भी हैं और अपनी कहन भी है। उम्मीद है कि जायसवाल जी के अन्य आगामी काव्य संग्रह भी शीघ्र आयेंगे।
–अशोक शर्मा, महासमुंद