स्मृतियों, संवेदनाओं और जीवन-दर्शन का काव्यात्मक दस्तावेज : ‘एक युग का अंत हुआ!’
‘एक युग का अंत हुआ!’ कवयित्री संध्या सिंह का 14वाँ काव्य-संग्रह है। वैभव प्रकाशन, रायपुर से 2026 में प्रकाशित यह संग्रह मूलतः अपने दो दिवंगत भाइयों—स्व. राणा प्रताप सिंह और स्व. डॉ. भानु प्रताप सिंह—को समर्पित एक आत्मीय श्रद्धांजलि है। लगभग 38 कविताओं में विभाजित यह कृति निजी शोक से आरंभ होकर सामाजिक, सांस्कृतिक, राष्ट्रीय, प्राकृतिक और मानवीय सरोकारों तक विस्तृत होती है।
संग्रह का केंद्रीय स्वर स्मृति और वियोग है। ‘मेरे राणा भैया’, ‘छोटे भैया’, ‘मेरे भैया’, ‘एक युग का अंत हुआ’, ‘बार-बार आहत होता है’, ‘उदास हैं राखियाँ’ और ‘यादें’ जैसी कविताएँ भाई-बहन के आत्मीय संबंध को मार्मिक अभिव्यक्ति देती हैं। ‘उदास हैं राखियाँ’ में त्योहार की प्रसन्नता का शोक में बदल जाना विशेष रूप से प्रभावी है। राखी, परिवार, बचपन और पुराने चेहरों के माध्यम से कवयित्री व्यक्तिगत स्मृति को सामूहिक संवेदना में बदल देती हैं।
संग्रह की एक उल्लेखनीय विशेषता यह है कि कवयित्री केवल शोक में ठहरती नहीं हैं। ‘जीवित प्रमाण पत्र’, ‘मेरी सेवा निवृत्ति’, ‘हमसे अच्छे थे’, ‘मनुष्य और प्रकृति’, ‘पशु और मानव’, ‘मेरा भारत बदल रहा है’ आदि रचनाएँ उनके सामाजिक अनुभव और चिंतनशील दृष्टिकोण को सामने लाती हैं। ‘जीवित प्रमाण पत्र’ में सेवानिवृत्त व्यक्ति की बदलती सामाजिक स्थिति और सरकारी व्यवस्था पर व्यंग्य है। इस कविता में निजी अनुभव के साथ व्यवस्था की विडंबना जुड़ जाती है।
प्रकृति और पर्यावरण भी संग्रह के महत्वपूर्ण पक्ष हैं। ‘मनुष्य और प्रकृति’ तथा ‘पशु और मानव’ में मनुष्य के प्रकृति से संबंध, पशु-पक्षियों के प्रति संवेदना और पर्यावरणीय असंतुलन पर विचार मिलता है। कवयित्री मनुष्य को प्रकृति से अलग सत्ता मानने के बजाय उसके अभिन्न अंग के रूप में देखती हैं। यह दृष्टि संग्रह को केवल आत्मकथ्यात्मक काव्य तक सीमित नहीं रहने देती।
‘चार धाम यात्रा’ में यात्रा-वृत्तांत, धार्मिक आस्था और प्राकृतिक सौंदर्य का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के दृश्य कवयित्री की अनुभूति के साथ जुड़ते हैं। यात्रा यहाँ केवल भौगोलिक गमन नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव का माध्यम बन जाती है।
संग्रह में समकालीन राष्ट्रीय चेतना भी मुखर है। ‘पहलगाम के दाग’, ‘ऑपरेशन सिंदूर’, ‘मेरा भारत बदल रहा है’ जैसी कविताओं में देश, समाज, परिवर्तन और सुरक्षा से जुड़े प्रश्न दिखाई देते हैं। वहीं ‘हे भगवान नेता मुझे बना दो’ जैसी रचना व्यंग्य के माध्यम से सामाजिक-राजनीतिक विसंगतियों को सामने लाती है।
भाषा की दृष्टि से संग्रह की प्रमुख विशेषता सरलता, सहजता और संप्रेषणीयता है। भूमिका में भी इसकी भाषा को सरल, सुबोध और बोधगम्य बताया गया है। कवयित्री अलंकारिक जटिलता अथवा छंद के कठोर अनुशासन की अपेक्षा भावों की स्वाभाविक अभिव्यक्ति को प्राथमिकता देती हैं।
समग्रतः ‘एक युग का अंत हुआ!’ निजी क्षति से उपजी संवेदना को जीवन के विविध अनुभवों से जोड़ने वाला काव्य-संग्रह है। इसमें भाई-बहन का प्रेम, स्मृति, वियोग, पारिवारिक संबंध, प्रकृति, सामाजिक विडंबना, राष्ट्रीय चेतना, आस्था और जीवन-दर्शन एक साथ उपस्थित हैं। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि निजी दुःख को कवयित्री व्यापक मानवीय अनुभव में रूपांतरित करती हैं। यह संग्रह पाठक को केवल भावुक नहीं करता, बल्कि स्मृतियों, संबंधों और बदलते जीवन-मूल्यों पर विचार करने के लिए भी प्रेरित करता है।
डॉ सुधीर शर्मा, अध्यक्ष, हिंदी एवं पत्रकारिता विभाग, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई छत्तीसगढ़