September 20, 2026

हाथ क्यों ना काँपता है…

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✍️विरेंद्र शर्मा “अनुज”

चौड़ी चौड़ी, सड़क बनाने,
पहाड़ों को, मानव काट रहा है।

हिमालय के, पोषक जड़ों को,
बन के दीमक, चाट रहा है।

कहते हिमालय के, शिखरों में,
ऋषि मुनियों का, वास होता।

उन्हें भी, बेदखल करने का,
मानव कर क्यों,उत्पात रहा है।

लिप्सा इसकी,बढ़ गई है इतनी,
भविष्य की भी, न सोचता है।

प्रकृति से भी, खिलवाड़ करने,
से न खुद को, रोकता है।

प्रकृति माँ का, तिरस्कार कर,
ये सुखी होना, चाहता है।

आग खुद के, घर में लगाते,
क्यों हाथ इसके, ना काँपता है।

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