चन्द्र शेखर आजाद – एक दृढ़ संकल्प क्रांतिकारी
क्रांति का सुलगता गीत थे तुम स्वातंत्र-समरांग के संगीत थे तुम तेजाब बनकर आंख में अंगार के शोले जगाए दुश्मनों...
क्रांति का सुलगता गीत थे तुम स्वातंत्र-समरांग के संगीत थे तुम तेजाब बनकर आंख में अंगार के शोले जगाए दुश्मनों...
हरे को और हरा करती , नम को और नम करती, एकांत को और गाढ़ा करती स्मृतियों की धार को...
अभी-अभी मैंने हरसिंगार को खिलखिलाते देखा अभी-अभी मैंने एक नदी को अठखेलियाँ करते हुए समंदर की ओर बहकर जाते देखा...
सावन के बादल घिर रहे हैं घिर रहे हैं अभी घिर ही रहे हैं और हवा की गति बढ़ गई...
नहीं चाहिए नहीं चाहिए किसी को प्रेम! आज की दुनिया जैसी नहीं है रफ़्तार उसकी अलग-थलग पड़ा रहता है कोने...
अपने भीतर अवसादों को भोगूँ या फिर आह! करूँ। जिस जग ने मुझको ठुकराया उसका क्यों परवाह करूँ।। मेरे होने...
पौधा कोई पतझर में भी सूखा न छोड़िए लौट आएगी बहार, यह आशा न छोड़िए माँगे की रोशनी का भरोसा...
तुम्हारे जन्म की तारीख और जगह नही जानती थी पर तब भी पता था कि इस दुनिया मे तुम हो...
आती और जाती साँसों के संघर्षों में हारकर इक दिन हम भी टंग जायेंगे फोटो बन दीवार पर. अभी पिताजी...
हे शुष्क शाख़ पर बैठे खग! क्या सोच रहे यूँ एकाकी? मेघों की श्यामल घटा घिरी, हर ओर दीखती हरियाली।...