April 3, 2025

सुरता : : ललित पटेल के ( अंचल के साहित्यकारों में ललित पटेल का स्थान महत्वपूर्ण)

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“लड़- लड़ के मर जाहूं संग तोरे ,
रोबे झन ते हांस देबे ।
सुरता ला तै छांट देबे ,
ये मरना मोर मरना ये
तोर नोहे।
मर के मेंहा आहूं जब तीर गियां,
झकनाबे झन मया के मारे।।”

उक्त पंक्तियाँ अंचल के प्रसिद्ध साहित्यकार एवं कवि ललित पटेल के हृदय के उदगार हैं l

त्रिवेणी संगम प्रयागराज राजिम के निकट जिला धमतरी के अंतर्गत सेनानी ग्राम कहे जानें वालें खिसोरा के एक प्रतिष्ठित एवं संपन्न परिवार में 6 दिसंबर 1946 को ललित पटेल का जन्म हुआ था l
आपके दादाजी स्वर्गीय देवनाथ पटेल एवं उनके भाई अलखराम पटेल तथा पिता माधोराम पटेल और चाचा भूखेलाल पटेल स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थें l आपके पिता माधोरामजी पटेल ग्राम के “पटैल ” एवं प्रमुख व्यक्ति थें चूँकि आपका संबंध सेनानी परिवार सें था अतः अपनें पूर्वजों एवं परिजनों के व्यक्तित्व का विशेष असर आपके जीवन एवं व्यक्तित्व पर पड़ा l
संगीत के साथ साथ अभिनय का गुण आपको अपनें पूर्वजों से विरासत के रूप में मिला l प्रारंभ से ही आप में कुशल नेतृत्वकर्ता , साहित्यकार , राजनीतिज्ञ एवं समाजसेवी के गुण विद्यमान थें l
आप सुधारवादी विचारधारा के समर्थक थें l

शिक्षा-दीक्षा –
आपकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा गांव में होने के बाद मैट्रिक के लिए आप राजिम चलें गयें । राजिम में आप श्रीमदभागवत आश्रम के भगवताचार्य स्वामी कृष्णा रंजनजी महाराज एवं संत कवि पवन दीवानजी के सानिध्य में रहकर साहित्य, समाज, राजनीति एवं अध्यात्म की शिक्षा ग्रहण करतें रहें । परिवारिक दायित्वों का कुशलतापूर्वक निर्वहन करने के पश्चात आपकी सक्रियता साहित्य के क्षेत्र में और अधिक बढ़ गई l

साहित्यिक योगदान –
साहित्यिक गतिविधियों में आपकी सक्रिय भूमिका रही। आप संगम साहित्य एवं सांस्कृतिक समिति मगरलोड और बिंब साहित्य समिति राजिम से जुड़े रहें । गोष्ठियों, कवि सम्मेलनों एवं धार्मिक मंचों पर आपकी बराबर उपस्थिति रहती थी। ठेठ छत्तीसगढ़ी के कवि के रुप में आपको विशेष प्रसिद्धि मिली। साहित्य के प्रथम पुष्प के रुप में आपके द्वारा संकलित-सम्पादित एवं प्रकाशित ”आजादी की लड़ाई ” परतंत्र भारत की व्यथा-कथा कहता एक ऐतिहासिक दस्तावेज है। जेलों में भारतीयों पर हो रहे अत्याचारों का आँखों देखा वर्णन इस संकलन में है। इसी तरह छंदमुक्त नई कविताओं का संग्रह “जय हो छतीसगढ़ ” काफी लोकप्रिय हुआ। संग्रह की कुछ पक्तियां इस प्रकार से है –

सरी मंझानिया जब लें रखवारी होगे ,
झांझ संगवारी होगे l
झाला मा झोला बईठ -बईठ के
गरमा गरम खवाथे l
नवा बहुरिया बनके उमस
नखरा गजब दिखाथें l

दिनकरजी की ही तरह आपनें भी अपनी कविता में हमारे पूर्वजों द्वारा काफी मशक्कत से प्राप्त आजादी की कीमत को पहचानने एवं इस अनमोल खजाने को बचाएं रखनें का आहवान युवा पीढ़ी सें किया है l
पंक्तियाँ दृष्टव्य है –

” लहू बोहा दिन पुरखा मन ,
हांसत हांसत खड़े -खड़े
रे सपूत सकलाय पूंजी ला झन लूटा , अउ चमका दें
लहू नहीं थोरकुन पसीना तो बोहाव गा l”

छत्तीसगढ़ की ग्राम्य संस्कृति एवं लोकपर्वों को उजागर करती ” गाँव मा तिहार ” आपका छत्तीसगढ़ी निबंध संग्रह है l

धार्मिक व अन्य कार्यों में रुचि –

सन 1986-87 में ग्राम खिसोरा में विशाल गायत्री यज्ञ के आयोजन में मां गायत्री और परम पूज्य गुरुदेव की कृपा आप पर हुई। इसी समय से आप गायत्री मिशन से जुड़े और आत्म-सुधार के साथ-साथ समाज-सुधार के कार्यों में जुट गए। शांतिकुंज हरिद्वार में लंबे समय तक रहकर आपने सेवाएं दी।
परमपूज्य गुरुदेव पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य पर आपकी गहरी निष्ठा थी। इस बात का अंदाजा आपकी इन रचनाओं से सहज ही लगाया जा सकता है-

“अटके परे रेहे हंव, मार के झटका, जमा के सटका रद्दा धराय मोला….
जब जिनगी ह जहर होगे ,
अंधियारी परगे आंखी मां, तब ते दुलारे अमरित बनके
आए दीया बनके मुहाटी मा
हांस के तैंहा जियाये मोला…
चमका के रेंगना सिखाये मोला l”

पीले वस्त्र धारणकर, युग-साहित्य थैले में लेकर, हाथों में ढपली लिए प्रज्ञा गीत गाते गांव-गांव, नगर-नगर एवं गली-गली जाकर जन -जागरण का कार्य आपने किया। गायत्री यज्ञ-हवन-पूजन आदि कार्यों में आप आजीवन लगें रहे।

शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण अवदान के रूप में खिसोरा में सरस्वती शिशु मंदिर स्कूल की स्थापना करने में आपकी अग्रणी भूमिका रही। छत्तीसगढ़ कोसरिया मरार समाज को संगठित एवं स्थापित करने में भी आपका योगदान रहा , आप इसके संस्थापक सदस्यों में से एक रहें हैं।

माँ सरस्वती का यह साधक 26 मई 2018 को अपनी भौतिक देह त्यागकर समर्थ सत्ता में लीन हो गया। आपके शैक्षिक, सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक अवदानों के लिए आपको हमेशा याद किया जाएगा।

लेखक
– विजय दीप
सहायक प्राध्यापक कुरूद महाविद्यालय

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