छत्तीसगढ़ को ज्ञानपीठ अर्थात् … उस ओझल होती मनुष्यता का सम्मान

है – जिसमें “हताशा से बैठ गए व्यक्ति” को पहचान कर “हाथ बढ़ाने वाली करुणा” भीगी दिखाई पड़ती है।
“नमस्कार शुक्ल जी”
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नवासी में प्रवेश
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■ राजेश गनोदवाले
इकतीस दिसंबर की दोपहरी थी वह। जाते हुए बरस का आखरी दिन जब कवि के घर पर होने का सुखदाई अवसर सालों बाद मिला। एक शहर में होते हुए भी यह दूरी – जो कुछ ही मोहल्ले के अंतराल की थी कैसी सालों में फैल गई पता ही नहीं चला। कुछ परिस्थिति जन्य बंदिशें और कुछ कोरोना काल। हम मिल न पाए। लेकिन मेरी ओर से भी कोई प्रयास कहां हुआ था। पिछली बातचीत टेलीफोन पर की थी इण्डिया टुडे के अंतिम पेज [ कॉलम ] के लिए। संदर्भ था — “मास्क और कवि”
इस बार इच्छा ने करवट ली तो लगा कि जाया जाए। फोन पर ही उनका न्योता मिला कि सुबह आ सकता हूं। तेज़ जाड़े की इस सुबह निकलना असमंजस भरा हो सकता है। शुक्ल जी यह बात ताड़ गए थे। पुनः संदेश आया कि दोपहर में आ जाऊं। सच में दोपहर सुविधाजनक लगा।
निकला तो ख़ुद पर हैरान हुआ कि इस बार शैलेन्द्र नगर में उसी सड़क में उनका घर तलाशते करीब पाँच सात-मिनट खर्च हो गए! जबकि कितनी दफा घर जाना हुआ है। पहुंचा तो वे धूप में मेरी प्रतीक्षा करते बैठ कर अभी-अभी ही वापस कमरे में चले गए थे। थोड़ा संकोच हुआ ! 10 मिनट की देरी भी तो आखिर देरी होती है। तब ,जब उम्र और उससे जुड़ी जकड़नों का जमाव बेचैनी बना हुआ हो!
उनके अत्यंत प्रतिभाशाली लेकिन उससे कहीं अधिक संकोची मन वाले पुत्र शाश्वत ने अगवानी करते मुझे बिठाया और उन्हें बताया।
“दादा, गनोदवालेजी आ गए हैं!” दो बार दीवाल के उस पार से पुत्र की आवाज़ सुनाई दी और बाद में शुक्ल जी की।
“अच्छा आ गए क्या!”
इस आवाज़ से ही जैसे वे अपनी संपूर्णता में दिखाई दिए। आवाज को भी मैंने दृश्य मान उनकी अनुपस्थिति को अनुभव किया! लेकिन जैसे उनकी अधलेटी तंद्रा का कोई तार बिखर गया हो ऐसा लगा। आवाज़ का आना भी आने जैसा ही तो था!
और वे सामने थे। हल्के झुके हुए से। ठीक एक दिन बाद यानी 1 जनवरी, 2025 को नवासी में जाने वाले विनोद कुमार शुक्ल ।
पुत्र शाश्वत ने मेरी ओर देखते कहा,
“आप यहां बैठ जाइए। दादा उधर बैठ जाएंगे।” बैठक में इधर-उधर होते हम करीब बैठ गए। इसी मध्य शाश्वत ने श्रवण मशीन लाकर उन्हें लगा दी। हालांकि विनोदजी ने इसके पहले ही यंत्र का इशारा कर दिया था। और उठकर गए पुत्र की प्रतीक्षा करने लगे। मानो “अपने सुनने को” आते हुए देख रहे हों।
“काफ़ी सालों बाद आना हुआ न?”
उनकी जिज्ञासा का समाधान मैंने किया। हमारी इस बातचीत में, जिसका यों तो कोई संदर्भ नहीं था , पुत्र की सहायता से सहज आगे बढ़ती गई। जब मेरा कहा जा रहा, कानों तक पूरी तरह नहीं जाता था तो वे बाईं ओर बैठे शाश्वत की ओर “क्या कह रहे हैं?” कह कर ज़रा तिरछे हो जाते। और शाश्वत किसी सिद्ध दुभाषिए की तरह उन्हें मेरा कह दिया गया दोहराते जाते। इस तरह अपने ही कहे को मैं विनोदजी के साथ दोबारा सुनता जाता। हम दोनों ही एक तरह से शाश्वत के साथ बंधे थे। जैसे तानपुरा की सहायता में गवैया बंधा होता है। दुनिया का श्रेष्ठतम रचनाकार सहजता से सामने बैठा हो तो कहना क्या चाहिए अच्छी तरह समझ न आए। कुछ कहने का लेकर तो वैसे गया भी नहीं था। यदि कुछ लेकर गया था तो सिर्फ मिलना लेकर गया था!
सहसा मैंने याद किया :
आज मैं इस बात का विचार कर रहा था कि आपको पहली बार कब देखा ? वे भी चौंके! कृषि महाविद्यालय में चावल पर आकाशवाणी के लिए एक रूपक बनाए जाने के दौरान का वह पल था। दूसरी स्मृति तब की थी जब उन्होंने मेरी कविताओं की एक नुमाइश का उद्घाटन किया था। डॉ.राजेंद्र मिश्र के साथ। उद्घाटन के ठीक बाद की मेरे लिए कही पंक्तियां याद करने की कोशिश की जो बाद में उनके संग्रह “सब कुछ होना बचा रहेगा” में पूरी कविता बन शामिल हुई थी। लिखा हुआ वह याद तो आया मगर अधूरा। शाश्वत भी याद करने लगे, तत्काल पूरी पंक्ति याद आते ही मैंने दोहराई – जो उन्होंने कैनवास पर दर्ज की थी :
“लगता है
ज़िंदगी को नष्ट करने का धमाका हो सकता है। इसके पहले कि,
जिन्दगी को नष्ट करने का धमाका हो
ज़िन्दगी का बड़ा धमाका हो!”
विनोदजी ने तत्काल हामी भरी कि यही लाइनें हैं। ग़ज़ब है, दिसंबर के महीने में सन् 1991 को लिखी गई अपनी पंक्तियों के क्रम-जमाव को लेकर अभी भी सजगता! दिसम्बर था वह दिन और आज 31 दिसम्बर , 2024 का दिन। 35 वर्षों का समय उन्हें देखते, पढ़ते, सुनते बीत गया! पता ही नहीं लगा। उस समय उनके घर महीने, दो-तीन महीने में एकाद चक्कर हो ही जाता था। अपना कहानी संग्रह “महाविद्यालय” और अतिरिक्त लम्बे शीर्षक वाला पहला कविता संग्रह उन्होंने ही पढ़ने दिया था। यह भी याद है।
श्रवणीयता का सिरा जब ज़रा बाधित हो तो क्या बातें की जाए समझ नहीं आता। दूसरी बात, उन्हें बहुत बिठाए रखना भी अपराध बोध लगने लगा था! मेरा “क्या , कैसा चल रहा है?” उनकी जिज्ञासा सुन उन्हें बताया कि अपने लिखे को समेट रहा हूँ। संग्रह की तैयारियां लगभग हैं, लेकिन मेरी ही लापरवाही कि काम ख़त्म होने की जगह पर आकर भी ठहरा है! “ज़रा सा रुका हुआ” अभी भी रुका हुआ ही है।
अब उनकी चपलता उभर आई कि प्रकाशन के लिए किन्हें दे रहे हो? मेरा ध्यान तो ‘हिंद युग्म’ को लेकर है कि संग्रह उससे आ जाए, बताने पर उनकी सहमति सुनाई दी। जब कहानियों की पांडुलिपि का शीर्षक बताया तो हलके से हंस दिए। यह हँसी शीर्षक रखने के मेरे अपने ढंग को लेकर थी। पुत्र शाश्वत भी उनके संग प्रफुल्लित था। दोनों की मुस्कुराहट का निहितार्थ मैंने अपने लिए शीर्षक की स्वीकारोक्ति वाली सहमति के रूप में देखा कि ‘अच्छा है!’
विनोदजी भले ही नवें दशक की ओर मुड़ रहे हों बावजूद बढ़ी हुई उम्र से देह लगभग अछूती है। चेहरे में अभी भी वही चैतन्यता। झुर्रियां नहीं हैं। बीसेक मिनट बाद मैंने अनुमति लेते हुए “अब आप आराम करिए” कहा तो हमेशा की तरह उन्होंने चाय का आग्रह किया। और चाय लेकर ही जाऊं कहते उठ खड़े हुए। वे बाईं ओर मुड़ कर दीवाल के पीछे कमरे में चले गए। मेरी नज़र दाईं ओर दीवाल पर टंगी उनकी श्वेत श्याम फोटो पर पड़ी जो नेपथ्य से ली गई थी। फोटो में वे कहीं देखते हुए दिख रहे थे। दीवाल पर टंगी यह फोटो भी शाश्वत की ही खींची हुई है। स्टील फोटोग्राफी में एक रचनाकार के रूप में जिस तरह से उन्होंने अपने पिता को कैमरा फ्रेम में लाया वह साधारण दृष्टि की उपज नहीं है।
फोटो से याद आया। इधर पिछले कुछ सालों में जितनी फोटो उनकी प्रकाशित देखी गई वे सभी उनके पुत्र ने निकाली हैं। शाश्वत के भीतर गुणी छायाकार बैठा है समझ आता है। छायाकारी, शाश्वत का प्राथमिक काम नहीं, लेकिन फिर भी जब कभी वे कैमरा संभालते हैं नवाचार करते हैं। यानी नज़रिया भी और श्वेतश्याम की गहराई भी। मालूम नहीं कभी उन्होंने सिनेमेटोग्राफर के अंदाज़ में अपने पिता की दिनचर्या शूट की या नहीं। यदि करें तो जो मिलेगा वह किसी और को मिल नहीं सकता इतना तय है!
इधर विनोदजी अपने कमरे में चले गए थे। वे अब नहीं थे, जैसे ‘नहीं में उनका होना’ रुका हुआ था!अब रुकना और अच्छा लगा कि वे दीवार के उस पार हैं , इधर मैं हूं। कमरे में अनुपस्थिति का एक सुख इस तरह था कि थोड़ी देर पहले उनके इस कमरे में होने की ‘अब चली गई आहट’ के सहारे जैसे मैं बैठा हुआ था! कुछ पलों बाद निकलने को हुआ ही था कि शाश्वत ने चाय लिए बिना न जाने का अनुरोध किया। “भैया रुकिए, दादा पूछेंगे कि चाय पिलाई या नहीं!”
चाय सामने थी। अब रुकना और अच्छा लगा कि वे दीवार के उस पार हैं , इधर मैं हूं। इसी बीच विनोद जी की दिनचर्या का पता लगा। वे रोजाना सुबह 6 बजे उठ जाते हैं। स्कूल जाती नातिन को दरवाजे तक विदाई देना उनका अबाधित क्रम है। नाश्ता वही जो नातिन के टिफिन खातिर तैयार होता है। फ़िर अखबार आदि पढ़ना और ठीक बाद आँगन में ज़रा चहल कदमी। उन्हें गमलों की देखभाल करना इस उम्र में भी पसंद है। पौधों की बेतरतीब होती कलमें सेट करना, मिट्टी बदलना और गमलों में पानी देना नियमित चक्र है।
उधर ज्यों ही मैं निकलने को हुआ ही था कि एक ‘नया पाठ’ आकर जुड़ गया। इस पाठ का साक्षी होना अपने आप में खूबसूरत स्मृति बनी। विनोदजी को पहचानने का एक नया झिरिया मिला। शाश्वत ने बताया कि मैं कुछ देर और रुक जाऊँ। कारण अभी दादा के एक बरसों पुराने मित्र भी उन्हें बधाई देने घर आ रहे हैं जिन्होंने साथ में पढ़ाई की और नौकरी भी! साथ के मित्रों में से अब कोई और नहीं बचा। अकेले वे ही हैं इस उम्र वाले दोस्त !
दोनों एक-दूसरे की किशोर वय से परिचित हैं। उनके बारे में पता लगा कि उनकी हैंडराइटिंग इतनी अच्छी होती थी कि विनोदजी की कविताएं भी कई बार उनकी लिपि में उतार कर प्रकाशित होने भेजी जाती थीं!
कभी मेरे मन में यह बात आई थी कि विनोदजी पर या तो लेखकों के संस्मरण हैं या फिर आलोचकों ने लिखा है। अधिकतर संस्मरण या टीप उन्हें केवल लेखक मानते आई है। कभी किसी ने उनके जीवन में झांककर देखने की यदि कोशिश की भी होगी तो उसकी सूचना नहीं है। वैसा कुछ पढ़ने भी नहीं मिला। ऐसे में कोई दोस्त जो इतना पुराना है यकीनन वह उनको ‘उस तरह’ से बता सकेगा – जिस तरह से वे अभी तक सामने नहीं आए हैं! और मैं शाश्वत के आग्रह पर रूक गया। कुछ ही प्रतीक्षा के बाद उनके नौजवानी से पहले के वह मित्र खुद गाड़ी चलाते हुए घर आ आए। गर्मजोशी से भरे हुए। अस्सी के ऊपर की उम्र में भी दुरुस्त। चेहरा तना हुआ। इकहरा बदन। उम्र गत चर्बी से बेअसर। करीने से काढ़े बाल और बाकायदा बेल्ट आदि बांध कर आए थे वे। देखकर ही लगा कि सचमुच उनके यार हैं! फूल लेकर नहीं, ख़ुद फूल की तरह आए थे वे! आते ही उन्होंने विनोदजी को गले लगा लिया। उधर विनोदजी भी प्रसन्न। दिखाई न देती लेकिन चेहरे पर तैरती मुस्कुराहट के साथ वे इस यार को अपने पास देखकर आनंदित थे!
कुछ देर तक तो उन्होंने कुछ कहा नहीं। मुस्कुराता चेहरा अलबत्ता कुछ कहने की नम्र कोशिश में था। दोनों के मध्य सामान्य “कैसे हैं?” “ठीक हूँ!” का आदान प्रदान हुआ। यदि मेरी ही तरह वे ठीक एक दिन पहले अपने इस पुराने मित्र को बधाई देने आए हैं तो साफ़ था कि यह सूखी बधाई नहीं, बहुत कुछ था। मैंने उनसे पुराने किस्सों की बात छेड़ी तो विनोदजी की तरफ एक बार देखा और मेरी ओर मुखातिब होकर कहा, “कोई एक हो तो बताऊं किस्से ही किस्से हैं!”
“क्या मैं उनसे कभी मिल सकता हूं ? ताकि उनके इस रचनाकार मित्र को लेकर पढ़ाई के दौरान की कुछ बातें जान सकूं।” मेरी इस जिज्ञासा पर भी सहर्ष राजी हो गए। ‘बोनस’ की तरह था मेरे लिए उनके मित्र से हुई यह मुलाकात।
साइकिल पर साझा घूमने और सिनेमा जाने वाले दो दोस्तों के मध्य मुझे लगा कि भले ऊंचा सुनते हों लेकिन उनका एक बरसों पुराना मित्र यदि उनसे नवासी की उम्र में मुलाकात करने आया है तो दोनों के ‘एकांत’ का सम्मान करना चाहिए – और मैं अनुमति लेकर बाहर आ गया। इस खुशमन के साथ कि मिल कर आया हूँ, फिर मिलने की बात कह कर आया हूँ।
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