July 23, 2026

एक साझा कविता -संग्रह की अगले साल होगी स्वर्ण जयंती

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लगभग 49 साल पहले के आरंग की हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताएँ
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(आलेख स्वराज करुण )
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छत्तीसगढ़ में साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन की उत्साहजनक परम्परा आज भले ही कमज़ोर पड़ गई हो, लेकिन उस दौर में शहरों और कस्बाई गाँवों से प्रकाशित हुए कई संकलन आज भी उस परम्परा की याद दिलाते हैं । महानदी के समीपवर्ती शहर आरंग के 22 कवियों के साझा संग्रह ‘आरंग के कवि ‘ का प्रकाशन लगभग 49 साल पहले जून 1977 में हुआ था । आगामी जून 2027 में इसके 50 साल पूरे हो जाएंगे, जो हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों के इस मिले -जुले कविता संग्रह की स्वर्ण जयंती होगी । बशर्ते इस दुर्लभ हो चले संकलन के कविगण या कोई साहित्यिक संस्था इसे आयोजित करना चाहे।
अभिव्यक्ति की चाहत हर व्यक्ति में होती है । हर किसी के मन में अपने आस -पास हो रही अच्छी -बुरी घटनाओं के बारे में तरह -तरह के विचार उठते रहते हैं , जिन्हें वह बातचीत में किसी न किसी से साझा करता ही है । अगर व्यक्ति कवि या लेखक हुआ तो वह अपने विचारों को या अपनी भावनाओं को लिखकर प्रकट करता है । उसकी अभिव्यक्ति कविता, कहानी, निबंध आदि साहित्यिक विधाओं में समाज के सामने आती है । आरंग के कवियों का यह साझा -संग्रह भी मनुष्य की वैचारिक अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण दस्तावेज है । छत्तीसगढ़ की साहित्यिक विरासत को और भी ज़्यादा धनवान बनाने में स्थानीय स्तर के ऐसे प्रकाशनों का भी सराहनीय योगदान रहा है । ऐसे प्रकाशन जिस गाँव, कस्बे या शहर में होते हैं, उसे भी दूर -दूर तक साहित्यिक पहचान मिलती है ।
आरंग छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक शहर है जो प्रदेश की राजधानी रायपुर से लगभग 35 किलोमीटर पर राष्ट्रीय राजमार्ग 53के किनारे बसा हुआ है ।
स्थानीय साहित्यकारों और साहित्यिक अभिरुचि के नागरिकों ने मिलकर यहाँ हिंदी साहित्य परिषद का गठन किया था, जिसके संयोजक थे सुप्रसिद्ध साहित्यकार डॉ. विनय कुमार पाठक, जो उन दिनों आरंग महाविद्यालय में हिन्दी के सहायक प्राध्यापक हुआ करते थे और छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद छत्तीसगढ़ राजभाषा आयोग के तीसरे अध्यक्ष भी रहे । अध्यक्ष के रूप में उनका कार्यकाल 2016 से 2018 तक रहा. डॉ. पाठक इन दिनों अपने गृहनगर बिलासपुर में साहित्य सृजन के साथ -साथ वहाँ के साहित्यिक आयोजनों में काफी व्यस्त रहते हैं।वे थावे विद्यापीठ (बिहार) के कुलपति भी हैं ।
आरंग में सहायक प्राध्यापक के रूप में अपने कार्यकाल में उन्होंने बेहतरीन साहित्यिक वातावरण बनाने का सराहनीय प्रयास किया था, जिसके फलस्वरूप ‘आरंग के कवि ‘का प्रकाशन संभव हो पाया । इसका सम्पादन भी उन्होंने किया था।
इस संकलन में हिंदी के 13 और छत्तीसगढ़ी के 9 कवि शामिल हैं।
यह साझा कविता संग्रह कवर पेज सहित 32पेज का है, उन दिनों इसकी कीमत सिर्फ़ एक रूपए रखी गई थी । हैण्ड कम्पोजिंग से इसकी छपाई नंदिनी मार्ग, भिलाई नगर स्थित श्री छत्तीसगढ़ प्रेस में हुई थी । बाइंडिंग स्टेपलर से की गई थी । कविता -संग्रह ‘आरंग के कवि ‘का प्रकाशन पचरी घाट, जूना, बिलासपुर स्थित प्रयास प्रकाशन द्वारा किया गया था. यह प्रयास प्रकाशन की तैंतीसवीं भेंट थी ।
संग्रह के प्रारंभ में ‘आरंग और आरंग के कवि ‘शीर्षक अपनी चार पेज की भूमिका में प्रयास प्रकाशन के संचालक डॉ.विनय कुमार पाठक ने इस कस्बे की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पृष्ठ भूमि पर प्रकाश डाला है ।
इसके साथ ही उन्होंने यहाँ के यादगार साहित्यिक आयोजनों की भी चर्चा की है । उन्होंने यह भूमिका उन्होंने 11जून 1977 को छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस के अवसर पर लिखी थी । डॉ. पाठक भूमिका की शुरुआत करते हुए लिखते हैं –
“मोरध्वज की दानशीलता के लिए विश्व विख्यात, जैनियों के श्रद्धा का केन्द्र स्थल, कलचुरि युग के सांस्कृतिक -कलात्मक विकास का प्रतीक आरंग युग के विविध आरोह -अवरोह को अभिव्यक्त करता है, जहाँ शैव, वैष्णव, जैन, बौद्ध और आंचलिक देवी -देवताओं के सामान्य और विशिष्ट रूप अवस्थित हैं ।
कहीं सत्यनाम की गूंज है तो कहीं कबीर पंथ के चौका का स्वर । स्वधर्मों में संलग्न यहाँ के वासी और इतर धर्मावलम्बी धर्म -निरपेक्षता और सह -अस्तित्व का सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं ।
आरंग छत्तीसगढ़ का संक्षिप्त संस्करण कहा जा सकता है. छत्तीसगढ़ का सही स्वरूप आरंग में केंद्रीभूत है । ”
डॉ. पाठक आगे लिखते हैं -“खंडहर अतीत की उज्ज्वल गाथा को उदाभाषित करता है.ऐतिहासिक -सांस्कृतिक दृष्टि से आरंग की समृद्धि अभिलेखों और उपलब्ध पुरातत्व सामग्रियों में संरक्षित है ।
जिस नगरी की सांस्कृतिक -ऐतिहासिक समृद्धि विश्रुत -विख्यात हो, वहाँ की साहित्यिक -थाती निःसंदेह सामर्थ्यवान होगी ।
ऐसा आभास होता है कि यहाँ की साहित्यिक -साधना स्वान्तः सुखाय में संलग्न रही । उचित पर्यावरण के अभाव में यहाँ की प्रतिभाएँ काल -कवलित हो गईं । नौकरी पेशे से आयातित साहित्यिकों ने यहाँ के साहित्यिकों के साथ संशलिष्ट -समन्वित होकर हिंदी साहित्य समिति की स्थापना की, जिसमें सर्वश्री बाबूलाल चौबे, नत्थूलाल दुबे, चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, रामनारायण शुक्ला, रामानुज दास वैष्णव, लखन लाल गुप्ता (वस्त्र विक्रेता )आदि का योगदान उल्लेखनीय रहा । भूमिका में डॉ. पाठक ने लिखा है कि तीन दिसम्बर 1973 को आरंग में हिन्दी साहित्य परिषद की स्थापना हुई, जिसका विधिवत उदघाटन डॉ. पालेश्वर शर्मा ने किया तथा अध्यक्षता ठाकुर हृदय सिंह चौहान ने की । परिषद के तत्वाधान में 26जनवरी 1974 को कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ, जिसमें ‘अकादसी ‘का विमोचन भी हुआ.उन्होंने चर्चा के दौरान बताया कि ‘अकादसी ‘ उनकी छत्तीसगढ़ी कविताओं का संग्रह था ।
डॉ. पाठक भूमिका में आगे लिखते हैं -कवि सम्मेलन में सर्वश्री रविशंकर शुक्ल, पन्नालाल सराठे ‘रत्नेश ‘, रामेश्वर वैष्णव आदि कवियों के साथ स्थानीय प्रतिभाएँ भी मंचित हुईं । प्रथम अधिवेशन में सर्वश्री पवन दीवान, विमल पाठक, लक्ष्मण मस्तूरिया, विश्वनाथ योगी, डॉ. प्रेम त्रिपाठी, मनोहर शर्मा, ईश्वर शर्मा, माखन लाल तम्बोली आदि कवियों की उपस्थिति ने जन मानस पर प्रभाव डाला । द्वितीय अधिवेशन में नवरंग कला केन्द्र, भिलाई नगर के टेलीविजन और आकाशवाणी के ख्याति प्राप्त छत्तीसगढ़ी लोक -कलाकारों का सांस्कृतिक कार्यक्रम सम्पन्न हुआ । इसी कार्यक्रम में छत्तीसगढ़ी साहित्य के युग -प्रवर्तक पंडित द्वारिका प्रसाद तिवारी ‘विप्र ‘का अभिनंदन किया गया । प्रथम और द्वितीय अधिवेशन के साथ छत्तीसगढ़ी समारोह दिवस का तृतीय -चतुर्थ आयोजन समन्वित था । तृतीय अधिवेशन में प्रसिद्ध छत्तीसगढ़ी नाटक ‘माटी जागिस रे ‘ का मंचन स्थानीय फ्रेंड्स क्लब के साथ सहयोगार्थ हुआ । इस भव्य मंच पर श्री विमल कुमार पाठक का सम्मान परिषद की ओर से किया गया । इसके पूर्व डॉ. शत्रुघ्न पाण्डेय के मुख्य आतिथ्य में हिंदी दिवस मनाया गया ।
.डॉ. विनय कुमार पाठक ने भूमिका में ‘आरंग के कवि ‘ को आरंग नगरी के प्रकाशित -अप्रकाशित, साधक -आराधक, परिष्कृत -अपरिष्कृत, प्राचीन -अर्वाचीन, समग्र कवियों का संचयन बताया है । उन्होंने ‘आरंग के कवि ‘ को एक ऐसा पुष्प -स्तवक भी बताया है, जिसमें उनके शब्दों में “विविध रंगी पुष्प रुपी कवि गण समन्वित -संगुफित हैं और जो आरंग की वर्तमान साहित्यिक चेतना को मुखरित करने का विनम्र प्रयास कर रहा है । ”
उल्लेखनीय है कि 22 कविताओं के इस छोटे -से लेकिन महत्वपूर्ण साझा संकलन के हिन्दी कवियों में सर्वश्री चिन्ता प्रसाद द्विवेदी, बाबूलाल चौबे, रामानुज दास वैष्णव, भगत सिंह सोनी, निर्मल कुमार रिछारिया, रामदेव सिंह , अनूपनाथ योगी,गोवर्धन लाल अग्रवाल, राममोहन अग्रवाल,प्रहलाद कुमार मराठा, चुन्नीलाल चंद्रवंशी , रूद्रनाथ चंद्राकर और मनोहर लाल साहू की रचनाएँ शामिल हैं, वहीं डॉ. विनय कुमार पाठक, वीरेन्द्र कुमार नामदेव, कृष्णमोहन अग्रवाल, सत्येन्द्र कुमार यदु, अरुण कुमार दुबे, लखन लाल अग्रवाल, दीनदयाल साहू,लखन लाल गुप्ता और श्रीमती रजनी पाठक की छत्तीसगढ़ी कविताएँ भी प्रकाशित की गई हैं ।
दोनों ही भाषाओं की लगभग सभी कविताओं में जन भावनाओं को अभिव्यक्ति देने का सार्थक प्रयास किया गया है, जिनमें सामाजिक विसंगतियों के साथ -साथ समाज का दुःख -दर्द भी प्रकट होता है ।
हिन्दी खण्ड में पहली कविता चिन्ता प्रसाद द्विवेदी की है, उनके गीत ‘अधूरा जीवन ‘के इस छंद को देखिए –
*सुनाऊँ किसे आपबीती कि मैंने
युगों से यातनाएँ सही हैं,
किसी की खुशी के लिए ही हमेशा,
हमारी जवानी अधूरी रही है । *
आगामी कड़ियों में बाबूलाल चौबे ने ‘दीप शिखा ‘, रामानुज दास वैष्णव ने ‘विज्ञान का दानव ‘, भगत सिंह सोनी ने ‘धनात्मक ज़िन्दगी ‘ शीर्षक कविताओं में अपनी -अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति दी है.
भगत सिंह सोनी की कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं –
*सुना है कुछ लोग
धनात्मक ज़िन्दगी जीते हैं.
मुझे नहीं मालूम,
सिर्फ़ जानता हूँ –
कुरिया से कब्रिस्तान तक की
ऋणात्मक ज़िन्दगी । *
प्रहलाद कुमार मराठा की कविता ‘नेता नहीं, काम चाहिए ‘ और चुन्नीलाल चंद्रवंशी की कविता ‘चमचावाद ‘में राजनीतिक परिस्थितियों पर व्यंग्य प्रहार है ।
छत्तीसगढ़ी खण्ड में डॉ. विनय कुमार पाठक का गीत ‘हमर मया के सुरूज मरगे ‘ की भावनाएँ बहुत मर्मस्पर्शी हैं –
*हमर मया के सुरूज मरगे, एमा मोला नइये अचरज,
अचरज हे तो एक गोठ म, आँसू के तप विरथा होगे ।
हमर मया बासी कस गुरतुर,दया -पेज म बूड़े रहै,
अंगाकर रोटी कस मन तेमा, मिरचा अंतस म गुड़े रहै ।
भगवाने के कान फूटगे, एमा मोला नइये अचरज,
अचरज हे तो एक गोठ म तुलसा के जप विरथा होगे । *

संकलन में वीरेन्द्र कुमार नामदेव ने अपने छत्तीसगढ़ी गीत ‘लहू औटाके जिनगी जीथस ‘ में देश के किसानों को सम्बोधित करते हुए उनकी मेहनत को शब्दों के भावनात्मक साँचे में ढाला है । इन पंक्तियों में उनकी अभिव्यक्ति देखिए –
*जाग जा नगरिहा, उठ जा रे किसान
सुरूज अपन अंगठी ले खरोचत हे कान.
गियान के कुकरा बासत हे,सुन ले देके कान.
बइला, नाँगर तोर संगवारी
वोकरे संग करथस तंय गोठ,
लहू औटाके जिनगी जीथस,
मन ल चिटको नइ करस मोठ ।
तोर किसानिन कस हरियर लुगरा
पहिरे मटमटावय धान । *
संग्रह में कृष्ण मोहन अग्रवाल का गीत ‘हिरदे के सोन चिरइया’ और सत्येन्द्र कुमार यदु का गीत ‘हमर नानकुन सुघ्घर गाँव ‘ भी बहुत प्रभावशाली है, वहीं ‘ घुना घुना कस देस ‘शीर्षक अरुण कुमार दुबे के छत्तीसगढ़ी गीत में देश की हालत पर मार्मिक व्यंग्य है. लखन लाल अग्रवाल अपनी रचना ‘ये धान के कटोरा मोर ‘ में छत्तीसगढ़ के गाँवों, किसानों और मज़दूरों की पीड़ा को वाणी देते हैं-
*ये धान के कटोरा मोर, कइसे कंगला बनगे,
जगह -जगह भिखमंगा बाढ़ीन,
चरौटा भाजी तक नहीं बाचिस,
खाली होगे गाँव दिन -दिन, रोजी के तलाश में । *

हालांकि कवि इस गंभीर संकट से मुक्ति के लिए ग्रामीणों से कहते हैं –
* तरिया बांध के, नरवा बांध के, सिंचाई ला बढ़ाऔ,
कुआँ खोदावो, पम्प लगाओ, नहर बढ़ाय के साधन जुटाओ ।
अपन बस के जम्मो ताकत, तरक्की बर लगावो । *
अगले क्रम में कवि लखनलाल गुप्ता छत्तीसगढ़ के लोगों का स्वाभिमान जगाने की कोशिश करते हैं. उनकी इस कविता का शीर्षक है – माथा के करम ला नहीं, हाथ के करम ला देख ‘. इस रचना की प्रारंभिक पंक्तियों में कवि की भावनाओं को महसूस कीजिए –
*हमन आन छत्तीसगढ़िया औ रहेन
छत्तीसगढ़िया रे छत्तीसगढ़िया,
दुनिया ह जावथे चाँद के ऊपर,
फेर हमन रेहेन मुड़गड़िया रे मुड़गड़िया ।
छत्तीसगढ़िया छत्तीसगढ़िया ला काटथे,
त दूसर मन काबर हमर दुःख ल हरही,
हमरे हमर ल नइ देखे सकन,
तौ दूसर मन काबर हमर परवाह करहीं । *
कुल मिलाकर ‘आरंग के कवि ‘ हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कविताओं का एक छोटा लेकिन बहुत महत्वपूर्ण संकलन है. इसके प्रकाशन के पाँच दशक अगले साल जून 2027 में पूरे हो जाएंगे ।
बहुत संभव है कि छत्तीसगढ़ की साहित्यिक बिरादरी की नई पीढ़ी को आज शायद याद भी नहीं होगा कि हिन्दी और छत्तीसगढ़ी कवियों का ऐसा कोई संयुक्त संकलन 49 साल पहले प्रकाशित हुआ था । साझा कविता संग्रहों के प्रकाशन के इस प्रकार के रचनात्मक प्रयास पहले बहुत हुआ करते थे, एक परम्परा -सी चल पड़ी थी,क्या इसे आज भी रखने की ज़रूरत नहीं है?
-स्वराज करुण
(यह आलेख मेरे ब्लॉग में भी प्रकाशित )

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