September 4, 2026
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समीक्षक ऋषि गजपाल

लेखक – यशवंत साहू
प्रकाशन , २०२२ प्रथम संस्करण
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एक लोकगाथा , जो कुछ दशकों बाद लोककथा के रूप में कही और सुनी जाने वाली चीज हो जाती है , को अस्तित्व में बनाये रखने के लिए लेखक का प्रयास काबिले तारीफ हो सकता है | इसी क्रम में अंचल के बेहद लोकप्रिय लोकगाथा को लेखक यशवंत साहू ने “ दसमत “ नाम से उपन्यास की शक्ल में उतार कर पात्रों को नाटक की तरह पेश करते हुए जिज्ञासा और रोचकता को साधने का अप्रतिम प्रयास किया है | किताब के आवरण पर ही लिखा है – लोकगाथा “ दसमत कैना “ पर आधारित उपन्यास | दसमत नाम की राजकन्या पर केन्द्रित यह उपन्यास , अद्भुत कल्पना के सहारे संवाद अदायगी शैली में प्रस्तुत किया गया है | हालांकि लेखक ने इसे पहले छत्तीसगढ़ी उपन्यास के रूप में सफलतापूर्वक पेश किया था और इसकी व्यापकता को ध्यान में रखते हुए बाद में इसे हिन्दी में प्रस्तुत करने का विचार किया | कथा-तत्व की प्रासंगिकता और प्रामाणिकता को केंद्र में रखते हुए संवादों को छत्तीसगढ़ी में ही रखने का उत्तम विचार किया |
शुरुआत में ही लेखक ने एक-एक पात्र का परिचय दिया है जैसे हर पात्र को उसने करीब से सुना देखा हो | ये पाठकों को अपने गिरफ्त में लेने की आजमाई हुई अच्छी शैली है | अँधा युग , दीपदान , भक्त प्रहलाद , घासीराम कोतवाल , पहेली , आगरा बाजार जैसे न जाने कितने नाटक हुए जिसे पढ़ते हुए हम अपने आसपास की घटनाओं में पात्रों को ढूँढने का प्रयास शिद्दत से करने लगते हैं और सामयिक संदर्भ में कल्पित करते हुए सहज होते हैं | जब छोटे-छोटे राज्य अस्तित्व में नहीं आये थे तब देश के एक कोने की गाथा को भी अपना मानकर अन्य क्षेत्र के लोग लोककथा के रूप में छौंक बघार के साथ अतिरंजकता में प्रस्तुत करते थे और कम ही सही लेकिन आज भी करते हैं | यह गाथा देवभोग राज्य के राजा भोगदेव और उसकी पत्नी केतकी की बेटी दसमत के अदम्य साहस और नेतृत्व पर आधारित है | वर्तमान में छत्तीसगढ़ का देवभोग उड़ीसा राज्य की सीमा से लगा है | इस लोकगाथा को किताब में दो भाग में प्रस्तुत किया गया है – देश और परदेश |
प्रथम भाग ‘ देश ‘ में देवभोग राज्य के राजा भोगदेव और उनकी पत्नी केतकी की सात पुत्रियाँ बताई गई है | उनके राज्य में हर तरह की सुख-समृद्धि की कल्पना की गई है | राज-सत्ता में हमेशा ऐश्वर्य के तमाम साधनों के साथ अहंकार और अधिकार की प्रबल भावना निहित होती है और हर शासक इसे अपना स्वाभाविक गुण मानता है | सत्ता और समृद्धि के मद में चूर राज्य भोगदेव ने एक बार अपनी पुत्रियों को पूछ लिया कि वे अपने लालन-पालन , सुख-सुविधा और ऐश्वर्य-भोग में किसका भाग्य मानती हैं | आशानुकूल सभी पुत्रियों ने कहा कि वे अपने जन्मदाता माँ-बाप यानि राजा और रानी के भाग्य को ही अपना भाग्य मानती हैं जिनके उत्तम प्रयास फलस्वरूप भविष्य सुनिश्चित है , इसमें पूछने की क्या बात है | राजा बहुत खुश हुआ लेकिन सबसे छोटी बेटी दसमत के शंकालु और संदिग्ध हाव-भाव को देखकर मन में शंका हुई और निवारण हेतु पुनः उससे अपना जवाब स्पष्ट रूप से पाने की अपेक्षा की | इस पर वाकई दसमत ने जो कहा वह उनके लिए हैरान परेशान करने वाला अपमानजनक ही महसूस हुआ | हर माँ-बाप अपनी संतान से प्रायः यही अपेक्षा करता है तब राज्य के उस शक्तिशाली और सामर्थ्यवान राजा को अपने किसी सन्तान से इस जवाब की कैसे उम्मीद की जा सकती है ? यहाँ तक कि सम्पूर्ण राज्य और प्रजा अपने भाग्य और हैसियत को राजा से अलग करके नहीं देखती तब इस नादान घमंडी लड़की की यह मजाल जो माँ बाप की सत्ता को चुनौती दे और लालन-पालन के अहसान को भूल जाय | अपनी खुद की बेटी होने के बावजूद राजा को दसमत पर क्रोध आया | उसने बहुत कोशिश की कि बेटी अपनी भूल स्वीकार ले तो मन का अहम शांत हो जाये लेकिन जिद्दी राजा की जिद्दी और स्वाभिमानी बेटी को भी अपना जवाब पलटने में दुविधा थी | वह जो ठीक समझती थी वही अंततः स्वीकार करने को तैयार थी | अब पानी सर के उपर जा चुका था और रानी के अनुनय विनय के बावजूद दसमत का विवाह राज्य के सबसे गरीब दरिद्र ओड़ युवक सूदन ( मधुसूदन ) से कर दिया गया और ताना भी मारा कि अब अपने भाग्य को अपने सामर्थ्य से पलट दो या फिर अपनी भूल मान लो | वह स्वाभिमानी बेटी अपने वचन के अनुसार उस गरीब युवक से विवाह कर अपने ससुराल पहुँच गई और समय और हैसियत के अनुरूप उसी दारिद्रय परिस्थिति में अपने को ढालना शुरू कर दिया | ओड़ बस्ती के लोग मेहनती थे और वे सब खनती गोदी का काम करके धरती से पानी ओगराने का काम बड़े जतन से करते थे | उनके इस हुनर से दुनिया वाकिफ थी | दसमत ने भी इस नये संस्कार आउए सेवा को हृदय से अंगीकार किया |
उधर राज्य में बेचैन पिता अपनी स्वाभिमानी बेटी का हाल-चाल जानने के लिए उत्सुक था | कुछ दिन बाद दसमत की सहेलियां ओड़ बस्ती में भ्रमण करने आई और देखकर दंग रह गई कि कोई बाप सिर्फ अपने अहम को साधने के लिए अपनी दुलौरिन बेटी के साथ ऐसा अत्याचार कर सकता है | दसमत ने उन सहेलियों का न सिर्फ यथाशक्ति बेहतर आदर सत्कार किया बल्कि लौटते समय सहेलियों के हाथ माँ-बाप द्वारा दिए गए जेवर गहने रूपये पैसे की पोटली वापस लौटा दी | उत्सुकता से राह देख रहे राजा ने जब यह सब सुना और देखा तो आश्चर्य और अफ़सोस हुआ लेकिन फिर भी मन का अहम अभी शेष था और समय भी था वाणी को सत्यता की कसौटी पर खरा उतरते देखने के जिद के लिए | दसमत ने अब उस गरीब बस्ती के ओड़ परिवार की वेशभूषा रहन-सहन खान-पान अतिवृद्ध सास की सेवा और गरीब युवक सूदन ( मधुसुदन ) को पति के रूप में ही स्वीकार कर लिया था | पढ़ी लिखी दुनियादारी जानती उस लड़की ने बस्ती में कब से चले आ रहे महाजनों के शोषण से लोगों को मुक्ति दिलाई और अपनी बुद्धिमता का परिचय देते हुए लोगों का दिल और भरोसा जीत लिया | वे सब भी उसकी सेवा और समझ से खुश आउए आशान्वित थे |
भाग दो – “ परदेश “ , अकाल पीड़ित ओड़ बस्ती के लोगों का शिवदुर्ग नामक सशक्त राज्य की तरफ पलायन और संघर्ष की कहानी है | जब आर्थिक और सामाजिक बल देने वाले मवेशियों को पालने पोसने की हैसियत भी नहीं बची तब उन्हें खुला छोड़ देना ही उचित उपाय था लेकिन भावनाओं और समझ का मारा इंसान क्या करे ? दसमत की बुद्धि के अनुसार पचास कोस दूर शिवनाथ-तांदुला नदी के समृद्ध इलाकों में रोजगार के लिए पलायन का उपाय सुझाया क्योंकि उस इलाके में धरती के नीचे का जल कभी सूखता नहीं है ऐसी धारणा थी | सब कुछ टी हो जाने के बाद बस्ती में छोटे बच्चों को और घर-बार को बुजुर्गों के सहारे छोड़कर काम कर सकने वाले स्त्री पुरुष का काफिला उस दिशा में निकल गया और कई दिनों तक चलते ठहरते तांदुला शिवनाथ के संगम वाले क्षेत्र में पहुँचकर डेरा जमा लेते हैं | सब कुछ ठीक लगता देख रातभर का विश्राम कर दूसरे दिन सारे लोग शिवदुर्ग के राजा मह्मदेव के दरबार में पहुंचकर अपनी आपबीती बताते हैं | देवभोग की धरती से लाये कुछ चमकते कीमती कंकड़ पत्थरों की भेंट पाकर राजा खुश हो जाता है और उन लोगों को रोजगार का आश्वासन मिलता है | शिव दुर्ग के चारों तरफ बांध और तालाब खोदने का काम दे दिया जाता है जो बाढ़ के दिनों में शिवनाथ नदी के अतिरिक्त पानी को सहेजने के काम आता | ओड़ लोगों को साल भर का काम मिल गया | राजा महामदेव जिनकी पहले ही सात पत्नियाँ थी लेकिन बावजूद इसके वह हमेशा तलाश में ही बेचैन रहता | उसे एक दिन उनके कार्यों की सुध लेने की इच्छा हुई और बाँध में काम करती दसमत के सौन्दर्य पर मुग्ध हो गया | मन ही मन उसे पाने की युक्ति जमाने लगा | प्रेमासक्ति का मारा राजा अंततः उससे प्रेमयाचना करने लगता है | उस समय उसे एक विवाहिता स्त्री की मर्यादा का भी अहसास नहीं था और न ही स्वयं के मान-सम्मान की | आसक्ति की हद पार करते हुए वह दसमत को पाने के लिए नीच से नीच हरकत करने पर उतारू होने लगा | आखिरकार उसकी बेहद नागवार हरकतों से नाराज उन कामगारों ने अपने डेरा बस्ती में घुस आए उस कामातुर राजा को बेइज्जत कर निकाल बाहर किया |
लेकिन दसमत समझ जाती है कि अब दम्भी और कामी राजा उसका पीछा छोड़ने वाला नहीं है और किसी भी हद तक जा सकता है इसलिए अच्छा है समय रहते दूसरी तरफ कूच कर लिया जाय | थके मंडे निर्बल बीमार लोगों को नदी के इसी तरफ कोटेला भाठा में शरण लेना पड़ा और सशक्त लोगों को नदी के उस तरफ बीस कोस की दूरी पर स्थित पहाड़ियों की तरफ जाना तय हुआ | वहाँ भी मेहनती ओड़ लोगों ने अपनी जरूरत के हिसाब से दो पहाड़ियों के बीच गुजरते नाला को बांधकर निस्तारी के लिए एक सुंदर जलाशय का निर्माण कर लिया और खुश होकर जीवन निर्वाह करने लगे |
लेकिन चोट खाया राजा अपनी सेना के माध्यम से उन विद्रोही लोगों की खोज जारी रखी | उसे दसमत जैस स्त्री को हाथ से जाने देना गँवारा नहीं था | खबर मिलते ही सैकड़ों सैनिकों के साथ उन पर हमला कर ही देता है | सारे ओड़ कामगार मारे जाते हैं जिसमें दसमत का पति सूदन भी मारा जाता है | इस लाचार समय में दसमत अपना धैर्य बंधे रखती है और बेहतर विकल्प पर विचार करती है | तब अंतिम अस्त्र के रूप में अपनी अस्मत की रक्षा हेतु आत्महत्या ही नजर आती है | चालाकी से उन मृत देहों के चिता की व्यवस्था उस कपटी आसक्त राज से करवाती है और अपने सामने अनगिनत चिताओं को जलते हुए देखती है | राजा की योजना के विपरीत वह आपनी योजना को कार्यान्वित करती है और दुष्ट कामी राजा की पटरानी बनने से इंकार करती पति की जलती चिता में खुद को स्वाहा कर देती है | राजा अपनी जिद में दसमत को खो देता है और अपमानित होकर राज्य लौटने पर मजबूर हो जाता है |
यह कहानी कितनों के मुँह से कितने ही प्रकार से और कितने ही भाषा में सुनी कही जाती रही है फिर भी हर बार नई , रोचक और जिंदादिल लगती है | बुजुर्गों की अतिभावुक लच्छेदार शैली में सुनते हुए आँखों से आँसू तक आ जाते हैं | लेखक यशवंत साहू ने इसे पटकथा शैली में स्थानीय संवादों के साथ सभी पात्रों को जीवंत कर दिया है और पढ़ते हुए हर बार तात्कालिक दृश्य आँखों के आगे सजीव हो जाते हैं | पात्रों का परिचय आरंभ में देकर और अंत में कुछ स्थानीय शब्दावलियों के अर्थ बताकर पाठकों की सुविधा का ध्यान रखा गया है | कुछ घुमन्तू समुदाय के लोग इसे सहज गीत संगीत की शैली में अद्भुत ढंग से पेश करते हुए पात्रों और किस्सों को अमरता प्रदान कर देते हैं | राज्यों की सीमाओं को तोड़कर विस्तार पाने वाली कथाएं – गाथाएं अब लुप्तप्राय होने लगी है और सहजता से सुनने और सुनाने वालों की भी कमी होने लगी है | ऐसे में लेखक का यह प्रयास सराहनीय है हालाँकि स्थानीय बोली के संवादों को और भी मधुरता से पेश किये जाने की गुंजाइश बनती थी | इलाके के ख्यात कलाकार लेड़गा देवार अपनी लयदार आवाज में रूँझू बजाते हुए इस लोकगाथा को न जाने कितने बरसों से सुनते या रहे हैं और आज भी उन्हें सुनना एक अद्भुत अनुभव होता है | यह उपन्यास भी पढ़ते हुए चरित्रों के साथ पाठक संवाद करने की मनःस्थिति में पहुँच जाते हैं |

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