पुस्तक समीक्षा : कृति- अपने पैरों पर!(उपन्यास)
लेखक – भवतोष पाण्डेय
प्रकाश -नोशन प्रेस
पृष्ठ संख्या – 145
मूल्य- 249
उपलब्धता- अमेज़न और फ्लिपकार्ट दोनों पर उपलब्ध है।
भवतोष पाण्डेय का उपन्यास ‘अपने पैरों पर!’ आज ही पढ़कर रीता। उपन्यास मध्यम मध्यमवर्गीय समाज की त्रासदी है। कथा नायक ‘दक्ष’ के माता-पिता बेटे के परीक्षा परिणाम से उत्साहित होकर। उसके भविष्य के हसीन सपने बुनते हैं। एक सरकारी महकमे में साधारण क्लर्क की हैसियत वाले देवी स्वरूप जी, जी पी एफ से लोन लेकर शिक्षा के बाज़ार में कूद पड़ते हैं। पंच सितारा अधोसंरचना वाले कोटा के कोचिंग सेन्टर की भूल-भुलैया में अपने सपनों के साथ दक्ष का प्रवेश होता है। एक प्रतिभावन छात्र किस तरह असफल पर असफल झेलते हुए समझौता करके एक सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेज में मेकेनिकल इंजीनियरिंग में प्रवेश ले लेता है। ध्यातव्य यह है कि प्रतिभाशाली दक्ष बिना कोटा की खाक छानते भी दो साल पहले ही, अपने दम पर इस काॅलेज में प्रवेश पा सकता था। लेकिन मध्यम वर्ग के सपने और बाजारवाद का शिकंजा उसे निरंतर कर्जदार बनाकर संघर्ष करने के लिए विवश कर रहा है।
इंजीनियरिंग करके निकला बच्चा एक प्रोडक्ट से ज्यादा कुछ भी नहीं है।
पढ़ाई पूरी करने के बाद कथा नायक का संघर्ष चरम पर पहुंच जाता है। समाज और परिवार दक्ष के यथार्थ से सामंजस्य नहीं बैठा पाते। अपनी शैक्षणिक योग्यता के विपरीत आई टी सेक्टर में कम वेतन पर काम करते हुए कुंठा और द्वंद्व का शिकार हो जाता है। एक व्यक्ति का व्यक्तित्व कई राहों पर एक साथ चलते चलते खंड-खंड हो जाता है। अंत में दक्ष अपनी सारी ऊर्जा समेटकर प्रोजेक्ट मैनेजर की हैसियत से बैंगलुरू चला जाता है। कहानी में टिया और दक्ष का चरित्र जीवन के बहुत बड़े सच से पर्दा उठा देता है। बाज़ारवाद के दबाव में सफलता की होड़ के बीच मानवीय संवेदना का कोई मूल्य नहीं रह गया है। जो हम खोते हैं उसकी तुलना में जो हम पाते हैं वह बहुत बौना है लेकिन इसका एहसास तब होता है जब हमारे आगे कुआं और पीछे खाई होती है।
दक्ष के पिता तो कर्ज में डूबे सेवानिवृत्त हो गये। दक्ष चाहकर भी मदद नहीं कर पा रहा है। इस स्थिति से निकलने के लिए वह एक छलांग लगाता है । नौकरी छोड़ कर्ज लेकर एम बी ए में प्रवेश ले लेता है। एक वर्ष का कोर्स और सपने। यहां भी ब्रांड वैल्यू का शिकार हो जाता है । लटेपटे अट्ठारह लाख का पैकेज मिलता है। मध्यमवर्गीय समाज के लिए यह बहुत बड़ी उपलब्धि है,पर प्याज के छिलके उतारते जाइए अंत में शून्य बचता है।
दक्ष की उपलब्धि का समाज में डंका बजता है और दक्ष एक और त्रासदी का शिकार हो जाता है। सिर्फ दक्ष नहीं हर मध्यमवर्गीय सफल लड़का इसका शिकार हैं। मध्मवर्ग अपने सफल पुत्रों का विवाह अपने से अधिक सामाजिक और आर्थिक स्थिति वाले घरों में करने के लिए अभिशप्त हैं। अच्छी नौकरी के बाद भी दक्ष के एक पैर में लोन की चक्की और दूसरे पैर में पत्नी देवलीना के आर्थिक गुरुर की चक्की जो उसे डुबोने के लिए पर्याप्त हैं। देवलीना का अपने बेटे यक्ष को लेकर निकल जाना ,दक्ष का कुछ भी न बोलना। शायद बहुत कुछ बोल जाता है।
यह उपन्यास हर मध्यमवर्गीय अभिभावकों और विद्यार्थियों को अवश्य पढ़ना चाहिए। इस बाज़ारवाद से निपटने का एक ही उपाय है,हमें अपनी सोच को री-सेट करना होगा।
भवतोष जी स्वयं इंजीनियरिंग के विद्यार्थी रहे हैं वर्तमान में पब्लिक सेक्टर में कार्यरत हैं इसलिए यह कथा आंखों देखी है, कानों सुनी या कल्पना से उपजी नहीं है। कथा के हर पात्र अपनी अपनी भूमिका के लिए चाक-चौबंद हैं। भवतोष जी को इस अनमोल कृति के सृजन के लिए साधुवाद।
डॉ प्रेमकुमार पाण्डेय
केन्द्रीय विद्यालय सरायपाली
9826561819