May 27, 2026

पाकिस्तानी इतिहास एवं पुरातत्व के पिता- बसना(छत्तीसगढ़) में जन्मे, प्रोफेसर डॉ.अहमद हसन दानी—२

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पूर्व लेख से निरंतर-

श्री दानी एक प्रसिद्ध पाकिस्तानी पुरातत्वविद्, इतिहासकार और भाषाविद थे, जो सिंधु घाटी सभ्यता, गांधार और मध्य एशियाई पुरातत्व के अग्रणी विशेषज्ञ थे, जिन्होंने पाकिस्तान में पुरातत्व को एक विषय के रूप में स्थापित किया और ‘सिंधु सभ्यता- नए परिप्रेक्ष्य’ जैसे महत्वपूर्ण कार्य किए, तथा ‘रहमान ढेरी’ जैसे स्थलों की खुदाई की।
उनकी १९६१ की कृति, ‘बंगाल में मुस्लिम वास्तुकला’, के समर्पण में उन्होंने कहा, “मेरे उन पूर्वजों को, जिन्होंने लगभग १८५० में कश्मीर छोड़ दिया और छत्तीसगढ़ में गोंडों के बीच संस्कृति का प्रसार करने के लिए बस गए और अब बसना में दफन हैं – जो मेरा बचपन का गांव है।” बसना में श्री दानी के भतीजे श्री कैसर मुर्तज़ा दानी ने भी यही बताया कि उनके पिता ग़ुलाम मुर्तज़ा दानी के सगे छोटे भाई श्री अहमद हुसैन दानी थे, इनके पिता श्री ग़ुलाम नबी दानी थे। इनके पूर्वज कश्मीर के श्रीनगर के निकट असनोल के निवासी थे, जो सरायपाली, बसना, संबलपुर, बरगढ़ इस क्षेत्र में, कश्मीर से गर्म कपड़ों का व्यापार करने आते थे। श्री मुर्तज़ा दानी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि उनके पूर्वज कश्मीरी ब्राह्मण थे एवं उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था, पूर्व में उनके पूर्वज जातिगत उपनाम “चौधरी” लिखा करते थे। “दानी” यह उपनाम अंग्रेज़ों का दिया हुआ है। आज से डेढ़-दो सौ वर्ष पूर्व जब श्री दानी के पूर्वज इस क्षेत्र में कश्मीर से आए, तब यह क्षेत्र अत्यंत पिछड़ा हुआ था एवं यहाँ सरायपाली, सारंगढ़ के राजा एवं अनेक छोटे-छोटे गोंड ज़मींदार हुआ करते थे। अंग्रेजों के समान दिखने वाले, गोरे, ऊँचे-पूरे इन कश्मीरी मुसलमान व्यापारियों से अंग्रेज़ एवं इस क्षेत्र के राजा प्रभावित थे।उनमें व्यापारिक बुद्धि कौशल भी थी, अतः इस क्षेत्र के राजाओं ने इन कश्मीरी मुसलमानों को कुछ गाँव का गौंटीया, मालगुजार बनाकर, इन्हें कुछ गाँव दे दिये थे, फलस्वरूप दानी परिवार अत्यंत सम्पन्न भूस्वामी एवं राजनैतिक रूप से इस क्षेत्र में प्रभावशाली हो गए थे। इनके परिवार से अब्दुल हमीद दानी वर्ष १९५७ में बसना विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट से चुनाव लड़े व पराजित हुए।पुनः वर्ष १९६२ में वे कांग्रेस से इस क्षेत्र से विधायक चुने गए।
श्री अहमद हुसैन दानी का विवाह बसना के निकट के ग्राम छांदनपुर के गोंटिया श्री सिकंदर दानी की पुत्री पत्नी श्रीमती सैफ़िया सुल्ताना दानी से सन् १९४९ में हुआ था, उनके तीन बेटे (अनीस, नवेद और जुनैद) और एक बेटी (फौजिया) थी। वर्तमान में इनका संबंध भारत से नहीं हैं, वे पाकिस्तान अथवा विदेशों में रहते हैं। जब तक श्री अहमद हुसैन दानी जीवित रहे एवं जब वे भारत आते थे, तो बसना अपने बड़े भाई, परिवारजनों से भेंट करने अवश्य आते थे। वर्ष १९८४ में श्री दानी ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की यात्रा की।जब वे बसना आते तब बसना के शिक्षित लोग उनसे मिलने के लिए आया करते थे। श्री कैसर मुर्तज़ा दानी का परिवार भी अब नियमित रूप से बसना में नहीं रहता।रायपुर के अत्यंत संपन्न क्षेत्र शंकर नगर में ‘पाहुना’ के निकट उनका एक बड़ा सा मकान है, जहाँ उनकी पत्नी एवं ससुर रहते हैं, उनकी संतान भी बाहर है। श्री दानी यहाँ बसना में अपनी लगभग पैतीस एकड़ कृषि भूमि की देख-रेख एवं कृषि करने आते रहते हैं।
श्री अहमद हुसैन दानी के विषय में मुख्य बातेंः-विशेषज्ञता-श्री दानी पुरातत्वविद्, इतिहासकार और भाषाविद्. पुरालेख विशेषज्ञ,प्राचीन खरोष्ठी लिपि के विशेषज्ञ, सिंधु-पूर्व सभ्यता, गांधार, मध्य एशियाई और दक्षिण एशियाई पुरातत्व और इतिहास के विद्वान थे।भारतीय मीडिया ‘द प्रिंट’ को पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा सरकार के पुरातत्व और संग्रहालय महानिदेशालय के महानिदेशक डॉ. अब्दुल समद ने बताया कि “प्रोफेसर अहमद हसन दानी ने आधुनिक पाकिस्तान के इतिहास को आकार दिया और उसका पुनर्निर्माण किया।”
शैक्षणिक योगदान- स्व.श्री दानी ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में पुरातत्व को एक अकादमिक विषय के रूप में प्रस्तुत किया। सर मॉर्टिमर व्हीलर के साथ मोहनजोदड़ो की खुदाई में मदद की।विभिन्न शैक्षणिक पदों पर रहे और कई शोध किए।
प्रमुख कार्य-उत्तरी पाकिस्तान में पुरातात्विक उत्खनन, विशेषकर गांधार और सिंधु-पूर्व स्थलों पर।प्रोफ़ेसर डॉ.अहमद हसन दानी ने पुरातत्व, इतिहास, मध्य एशिया, सिंधु सभ्यता तथा भारतीय लिपि-विज्ञान पर तीस से अधिक पुस्तकें लिखीं। वे दक्षिण एशिया और मध्य एशिया के प्रमुख पुरातत्वविदों में गिने जाते हैं। उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकें हैं—Indus Civilization: New Perspectives( सिंधु/हड़प्पा सभ्यता पर उनका महत्वपूर्ण कार्य) २-Indian Palaeography(भारतीय पुरालेखों और ब्राह्मी आदि के विकास पर प्रसिद्ध पुस्तक) ३-History of Pakistan: Pakistan Through Ages(पाकिस्तान के इतिहास पर विस्तृत ग्रंथ) ४-Historic City of Taxila (तक्षशिला के इतिहास और पुरातत्व पर) ४-History of Northern Areas of Pakistan(उत्तरी पाकिस्तान के इतिहास पर) ५-Romance of the Khyber Pass
(ख़ैबर दर्रे के ऐतिहासिक महत्व पर) ६-New Light on Central Asia(मध्य एशिया के इतिहास एवं संस्कृति पर) ७-Central Asia Today(आधुनिक मध्य एशिया संबंधी अध्ययन) ८-Human Records on Karakorum Highway (काराकोरम क्षेत्र की शिलाचित्र एवं ऐतिहासिक धरोहरों पर) ।श्री दानी वैदिक ‘हरियुपिया’ को हड़प्पा से जोड़ने वाले पहले विद्वानों में से थे।
विचारधारा:-उन्होंने पाकिस्तान के इतिहास में मध्य एशिया के प्रभाव पर जोर दिया और पूर्व-इस्लाम संस्कृतियों के महत्व पर जोर दिया।
भारतीय इतिहास का एक विवादास्पद विषय रहा है “आर्य आक्रमण का सिद्धांत” जिसे पश्चिमी इतिहासकारों ने प्रतिपादित कर मान्यता प्रदान की है, परन्तु प्रोफ़ेसर दानी इस मत के विरुद्ध थे, उन्होंने उस पुराने “आर्य आक्रमण सिद्धांत” (Aryan Invasion Theory) को स्वीकार नहीं किया, जिसमें कहा जाता था कि आर्यों ने आक्रमण करके Indus Valley Civilization अर्थात मोहनजोदड़ो-हड़प्पा सभ्यता का विनाश कर दिया।डॉ. दानी का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत संतुलित और पुरातात्त्विक साक्ष्यों पर आधारित था। उन्होंने सिद्ध किया कि-
मोहनजोदड़ो और हड़प्पा का पतन एक धीमी ऐतिहासिक प्रक्रिया थी।
इसके पीछे नदी मार्गों में परिवर्तन, पर्यावरणीय बदलाव, आर्थिक गिरावट, तथा व्यापार तंत्र के टूटने जैसे कारण अधिक महत्वपूर्ण थे।
उपलब्ध पुरातात्त्विक प्रमाण किसी बड़े सैन्य आक्रमण या व्यापक नरसंहार को स्पष्ट रूप से सिद्ध नहीं करते।
शेष अगले लेख में।

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