“जो जागा, वही जीता”
पाण्डुका (राजिम) की मिट्टी से निकला विश्व का महर्षि महेश योगी….
भारत की मिट्टी ही कुछ ऐसी है कि यहाँ कंकर-कंकर में शंकर बसता है। पाण्डुका गाँव, राजिम के पास, महानदी की गोद में बसा एक छोटा सा नाम। 12 जनवरी 1918 को इसी मिट्टी में वन विभाग के ईमानदार रेंजर रामप्रसाद वर्मा के घर एक बालक जन्मा। माँ सत्यभामा देवी ने नाम रखा महेश। किसे पता था कि जंगलात बाबू का ये बेटा एक दिन पूरी दुनिया के मन का जंगल साफ करेगा। पाण्डुका ने उसे तीन अनमोल सौगात दीं – महानदी सी निर्मलता, साखू के जंगल सी गहराई और माँ की लोरी में घुला हुआ राम नाम। पाँच साल वहीं खेला-कूदा, फिर पिता के तबादले के साथ जबलपुर आ गया। जबलपुर ने उसे विज्ञान दिया, हिमालय ने उसे ज्ञान दिया। इलाहाबाद से भौतिकी में एम,एस,सी, करने वाला महेश, ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती का शिष्य बनकर महेश योगी हो गया। तेरह साल बर्फ में तप किया और गुरु का आदेश लेकर उतरा – “जाओ, दुनिया को बताओ कि भगवान को पाने के लिए घर नहीं, आँख बंद करना काफी है।”
शादी नहीं की। पूछने वालों से कहते थे – “जब सारा संसार मेरा परिवार है तो एक घर का मोह क्यों करूँ?” और सचमुच निकल पड़े। 1959 में भारत से बाहर कदम रखा तो पीछे मुड़कर नहीं देखा। स्विट्जरलैंड में चौदह साल तप किया, हॉलैंड के व्लोड्रोप में दस साल ज्ञान बाँटा। 5 फरवरी 2008 को वहीं महासमाधि ले ली। समाधि पर आज भी चार शब्द चमकते हैं – “जो जागा, वही जीता।” ये चार शब्द नहीं, भारत का आत्म-घोष हैं।
भारत का कोई भी सन्यासी जब विश्व भ्रमण करने निकला, तो दुनिया उसके चरणों में झुक गई। विवेकानंद शिकागो में गरजे तो अमेरिका ने कहा “सुनो, पूरब बोल रहा है।” स्वामी रामतीर्थ ने वेदांत सुनाया तो लोग बोले “ये आदमी नहीं, आग का दरिया है।” ओशो ने पश्चिम की नींद तोड़ी तो भूचाल आ गया। और महेश योगी ने जब ध्यान सिखाया तो Beatles से लेकर मजदूर तक, सबने पालथी मार ली। असल में हम ही अपने सनातन को नहीं समझ पाए। दुनिया समझ रही है। क्योंकि मानवता ही इस धर्म की जड़ है, वसुधैव कुटुम्बकम् इसकी डाल है, और समस्त जीवों पर दया इसका फल है।
आज महर्षि का आंदोलन 130 से ज्यादा देशों में है। 6000 से ज्यादा केंद्र हैं। महर्षि विद्या मंदिर के डेढ़ सौ स्कूल भारत में बच्चों को डिग्री के साथ दिशा दे रहे हैं। पाण्डुका में जन्मभूमि स्मारक बना है। जबलपुर में यादें बसी हैं। पर सबसे बड़ी बात ये कि उन्होंने साबित कर दिया – *ज्ञान किसी जाति की बपौती नहीं।
भारत की मिट्टी का यही करिश्मा है। यहाँ तपस्वी किसी भी घर में पैदा हो सकता है। वाल्मीकि डाकू से महर्षि बने। रैदास चर्मकार से संत शिरोमणि बने। कबीर जुलाहे से जगतगुरु बने। नानक खत्री घर से निकले और सिख पंथ बना गए। तुकाराम कुणबी थे, नामदेव दर्जी थे, महेश योगी कायस्थ थे। ये सबूत है कि आत्मा से परमात्मा का सफर तय करने का हक सिर्फ जनेऊ पहनने वाले को नहीं, हर उस दिल को है जो धड़कता है। सनातन ने कभी नहीं कहा कि वेद सिर्फ ब्राह्मण पढ़े। सनातन ने कहा – “यो जागार, स देवेषु” – जो जाग गया, वही देवता है। चाहे वो शबरी भीलनी हो या विदुर दासी-पुत्र।
इतना विस्तृत ज्ञान किसी और पंथ में नहीं मिलता। कहीं शरीर को दुख दो तो मुक्ति मिलेगी, कहीं सिर्फ प्रार्थना करो तो स्वर्ग मिलेगा। पर सनातन कहता है – “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” – ये आत्मा कमजोर को नहीं मिलती। यहाँ ध्यान है, ज्ञान है, कर्म है, भक्ति है। यहाँ नदी माँ है, पेड़ भी देवता है, धरती माता है, आकाश पिता है। यहाँ चींटी को आटा खिलाकर भी मोक्ष माँगा जाता है। ये विज्ञान है कि तुम जो दोगे, वही लौटेगा। ये धर्म नहीं, जीने की कला है।
सभी जीव ,जंतु देवी देवता के समान है।
कमी हममें है। हम मंदिर की सीढ़ी तो गिनते हैं, पर मन की सीढ़ी चढ़ना भूल गए। हम चढ़ावा तो चढ़ाते हैं, पर चरित्र चढ़ाना भूल गए। हम ग्रंथ को सिर पर रखते हैं, पर अर्थ को दिल में नहीं उतारते। जरूरत है पढ़ने की नहीं, गढ़ने की। समझने की नहीं, जीने की।
अंतिम बात, दिल से दिल तक…..
राजा का धर्म है कि वो भेष बदलकर प्रजा का दुख देखे। क्योंकि ताज का वजन आँसुओं से तौला जाता है। पर जब राजा AC में कैद हो जाए, कठपुतली बन जाएं..तो जनता के दिल का दरवाजा बंद हो जाता है। तभी तो कुर्सी वाले पाँच साल में भुला दिए जाते हैं।
__पर देखो सन्यासी को। वो कुटिया से निकला और कुर्सियों का बादशाह बन गया। न वोट माँगा, न नोट माँगा। सिर्फ कहा – “आँख बंद कर।” और 130 देशों ने आँखें मूंद लीं। क्योंकि उसके झोले में झूठ नहीं, झरने जैसा सच था।
भारत की मिट्टी मरी नहीं है, हम सो गए हैं। ये मिट्टी आज भी महेश पैदा कर सकती है, बस हमें पाण्डुका बनना होगा – निर्मल, सरल, और राम नाम में डूबा हुआ। जिस दिन हमने वेद को वसीयत समझना छोड़ दिया और विरासत समझ लिया, उस दिन फिर कोई महेश, कोई विवेकानंद इसी मिट्टी से उठेगा।
और दुनिया? दुनिया तो इंतजार कर रही है। उसे तलवार वाले नहीं चाहिए, उसे त्याग वाले चाहिए। उसे बम वाले नहीं चाहिए, उसे ब्रह्मज्ञान वाले लोग चाहिए….
क्योंकि अंत में सिर्फ वही जीतता है… जो जागा, वही जीता।
और भारत? भारत तो पैदाइशी जागा हुआ है। बस पलकें खोलने की देर है।
जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान।
मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान।
संजय कबीर🙏🙏🙏