July 4, 2026

पाठ – तेईस “ सिरजनहार “ संस्मरण “

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ऋषि गजपाल

लेखक – विनोद साव
सर्वप्रिय प्रकाशन , २०२३ ( प्रथम संस्करण )
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छत्तीसगढ़ की धरती के अमर सिरजनहार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी और गजानन माधव मुक्तिबोध को समर्पित संस्मरण संकलन की इस किताब का शीर्षक ही “ सिरजनहार “ है | लेखक विनोद साव ने इसमें छत्तीसगढ़ के उन सिरजनहारों पर संस्मरण प्रस्तुत किया है जिनका छत्तीसगढ़ की शिक्षा , कला – संस्कृति और साहित्य को सम्पूर्णता प्रदान करने में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हाथ रहा है | इस तरह का उद्यम अंचल के ख्यात साहित्यकार परदेसी राम वर्मा ने स्थानीय स्तर पर कुछ साल पहले किया था ‘ अपने लोग ‘ शीर्षक से , जिसमें उनके अपने चिन्हित लोगों पर संस्मरण लेख संकलित था | हर इंसान के जीवन में कुछ ऐसे अमिट किरदार होते हैं जो पात्र को गढ़ने और वांछित आकार देने में सहायक होते हैं और जिन्हें आजीवन वह अपने हृदय स्थल में मास्टर पीस की तरह संकलित कर लेने में सुविधा पाता है | मौके बेमौके पर वह उन किरदारों का उल्लेख करते हुए स्वयं को कृतज्ञ करने से परहेज भी नहीं करता और यदि वह कलम का धनी हुआ तो उचित समय में उन दिलदार किरादरों को याद करते हुए किताब की शक्ल में उल्लेख कर जनमानस के सामने प्रस्तुत कर देता है ताकि भविष्य में भी वह लोगों के लिए प्रकाश स्तम्भ की तरह काम करता रहे |
इस किताब का पहला लेख छत्तीसगढ़ के श्रेष्ठ लोककला मर्मज्ञ एवं कला पारखी दाऊ रामचन्द्र देशमुख , बघेरा वाले पर है जो भरपूर आत्मीयता के साथ लिखा गया है |इससे यह प्रतीत होता है कि लेखक का साहित्य के अलावा कला एवं संस्कृति से गहरा नाता रहा है क्योंकि इस किताब में तीजन बाई , ममता चन्द्राकर , रामहृदय तिवारी , प्रेम साइमन , खुमान लाल साव जैसे उच्च दर्जे के कलाकारों पर आत्मीय दृष्टि पड़ी है | इन पर लिखते हुए लेखक जैसे उस समय में स्वयं को जीने लगता है | लेखक विनोद साव आज राष्ट्रीय स्तर के सिद्ध-हस्त व्यंग्यकार हैं इसलिए उन्होंने अंचल के व्यंग्यकारों पर भी खूब लेखनी चलाई है | महासमुंद के लतीफ घोंघी , धमतरी के त्रिभुवन पाण्डेय , रायपुर के विनोद शंकर शुक्ल और प्रभाकर चौबे, भिलाई के रवि श्रीवास्तव , जयप्रकाश पर लिखते हुए लेखक ने अपनी पसंदीदा विधा को यथोचित मान दिया है | बहुत आत्मीयता के साथ गहन पड़ताल करते हुए लेखक ने नये-पुराने व्यंग्यकारों को शिद्दत से याद किया जिनमें शरद जोशी , रविन्द्र त्यागी , हरिशंकर परसाई , श्रीलाल शुक्ल जैसे ख्यात लोगों की स्मृतियाँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से साझा हुई है |
विनोद साव ने यात्रायें भी खूब की हैं और सेवानिवृत्ति के बाद इसमें अभूतपूर्व तेजी आई है | उम्र की दुश्वारियों को पीछे धकेलते हुए अकेले या किसी हमविचार मित्र या फिर प्रिय अर्धांगिनी को साथ लेकर अपनी यायावरी क्षुधा पूर्ति में सक्षम दिखते हैं और लौटकर उस यात्रा की एक एक बारीकियों और इस दौरान म्न्मोहने वाले किरदारों को चित्त में सहेज लेने के बाद साहित्य में उतार देते हैं | यात्रा उनका मनपसंद शगल है | मनपसंद काम ही इन्सान को जीवंत और क्रिएटिव बनाये रखता है विपरीत परिस्थियों में भी | उनकी अपनी तार्किक और चुटीली भाषा है जिसकी बदौलत लेख रचनाएँ , पठनीय और स्मरणीय हो जाती हैं | उनके यात्रा संसमरण खूब छपे , पढ़े और सराहे जाते हैं | इस किताब में अनेक जीवन संस्मरण प्रस्तुत करते हुए भी संदर्भवश किसी न किसी यात्रा का खट-मिट्ठा खुबानी स्वाद आ ही जाता है | यात्राओं के दौरान हुई मुलाकतें अधिक सजीव और खोजपरक होती हैं | उदयप्रकाश , रमाकांत श्रीवास्तव , सतीश जायसवाल , डा .राजेन्द्र मिश्र , परदेसी राम वर्मा , राष्ट्रबंधु , गजेन्द्र तिवारी , ललित सुरजन , पवन दीवान , दानेश्वर शर्मा , मुकुंद कौशल , डा.. बलदेव , नरेंद्र श्रीवास्तव , रघुवीर पथिक , एल . रुद्र्मुर्ती ,किसनलाल , जाकिर हुसैन , द्वारिका प्रसाद अग्रवाल , जया जादवानी , संतोष झांझी , लोकबाबू इत्यादि हुनरमंदों की लम्बी फेहरिस्त है जिन पर लेखक ने मनोनुकूल संस्मरण प्रस्तुत किया है |
पिता स्व. अर्जुन साव पर उन्होंने डूब कर लिखा है जिनसे आजीवन स्वाभाविक रूप से निकटता रही है | ख्याति प्राप्त शिक्षाविद अर्जुन साव पर तो हम लोगों ने भी पूर्व पीढ़ी के लोगों से कितनी ही याद रहने वाली बातें सुनी है जिस का जिक्र लेखक ने यहाँ किया है | नारियल की तरह बाहर से कठोर और भीतर से नर्म , स्वच्छ और स्वास्थ्यवर्धक पूर्ण फल के रूप में उनके व्यक्तित्व का ब्यौरा देते हुए लेखक अतिशय भावुक भी हुए और इसी तारतम्य में दादा जो यशस्वी सम्पादक , समाज सुधारक ,समाज रत्न थे , पतिराम साव का भी जिक्र किया | पता चलता है कि लेखक ने सहज ही एक समृद्ध साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत पाई है जिसका प्रतिफल एक भरे-पूरे , सफल, संस्कारवान परिवार के रूप में सामने है और जिनकी पीढ़ी दर पीढ़ी कड़ियाँ श्रेष्ठ पदों पर सुशोभित होकर चमकते रहे हैं , चमक रहे हैं और चमकते रहेंगे | पीछले माह लेखक ने यशस्वी ददा पर केन्द्रित कुछ स्मरण कार्यक्रम भी आयोजित किये | किसी ने कहा है कि जिन्हें अपना शहर याद नहीं करता उसे दुनिया भी याद नहीं करती | बेशक यह सौ फीसदी सच प्रमाण है |
इस संकलन के कुछ लेख ऐसे भी हैं जिसमें कृतित्व की व्यापक समीक्षा की गई है जो संभवतः किसी लोकार्पण या समीक्षा कार्यक्रम के दौरान पढ़ी लिखी गई होगी , इस कारण संदर्भित व्यक्तित्व की पड़ताल अधूरी ही रह गई | विनोद साव भिलाई इस्पात संयंत्र के एक सफल और अनुशासित अधिकारी रहे हैं इसलिए उनके दायरे के लोग भी अनुशासित जीवन जीने में विश्वास करते रहे होंगे |

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