‘समाजरत्न’ पतिराम साव जी…
पतिराम साव जी का दुर्ग
‘समाजरत्न’ पतिराम साव १९ मई १९०४ को जन्मे थे और ९२ वर्ष की आयु में ५ अक्टूबर १९९५ को दिवंगत हुए थे. उनके योगदान पर रायपुर के एक प्रांतीय सामाजिक सम्मलेन में उन्हें ‘समाजरत्न’ सम्मान से विभूषित किया गया था. वे छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के मुंगेली-पथरिया के पास देवरी गाँव के मूल निवासी थे. बिलासपुर नार्मल स्कूल से शिक्षा पूरी कर वे १९२७ में दुर्ग आ गए थे. वे अपने समय में एक आदर्श शिक्षक, समर्पित समाजसेवी और स्थापित साहित्यकार हो गए थे. यही गुण उनकी वंशज पीढ़ी में भी फला फूला. मैंने अपने एक व्यंग्य संग्रह ‘हार पहनाने का सुख’ को उन्हें इन शब्दों में समर्पित किया था ‘दादाजी पतिराम साव को जिनसे विरासत में मुझे कलम मिली.’
दुर्ग नगर पालिका स्कूल में शिक्षक पद पर उनका चयन हो गया उनका इंटरव्यू तत्कालीन नगर पालिका अध्यक्ष दाऊ घनश्याम सिंह गुप्त ने लिया था. गुप्त जी बाद में सेंट्रल प्रोविंस और बरार यानि मध्य भारत के पहले विधानसभा अध्यक्ष भी हो गए थे.
महात्मा गाँधी १९३३ से ३६ के बीच दुर्ग दो बार आए थे. जहाँ उनका सभास्थल था वहां अब महात्मा गाँधी स्कूल है इंदिरा मार्किट के पास. उन्होंने सभा आयोजक घनश्याम सिंह गुप्त से पूछा कि “दुर्ग में देखने के लिए क्या चीज है?” तब गुप्त जी ने कहा कि “बापू… दुर्ग में एक तो शिवनाथ नदी है और दूसरा स्थान है भंगी स्कूल जहाँ सवर्ण छात्र भी भंगी छात्रों के साथ बैठकर विद्या अर्जन करते हैं.” गाँधी जी चौंक गए, बोले “अरे ये तो बड़ा दुर्लभ प्रसंग है. चलो इसी स्कूल में.” शनिचरी बाजार दुर्ग के इस स्कूल के पास मेहत्तर पारा था. बाद में यह स्कूल वल्लभ भाई पटेल पाठशाला कहलाया. उस स्कूल में तब पतिराम साव जी प्रधान अध्यापक थे. गाँधी जी वहां पहुंचे. साव जी ने उन्हें हार पहनाकर चरण स्पर्श किया. चौथी कक्षा के एक भंगी छात्र कार्तिक राम ने भी बापू को हार पहनाया.
मैंने छात्र जीवन में स्कूल से निकलने वाली स्मारिका में एक छोटा-सा आलेख लिखा था “जब हरिजन छात्र कार्तिक राम ने गाँधी जी को हार पहनाया.” तब स्कूल शौचालय के लिए सेफ्टी टैंक बनाने दुर्ग से एक ठेकेदार आए थे. साव जी के ज्येष्ठ पुत्र और हमारे प्राचार्य पिता अर्जुनसिंह साव ने उनके पास बुलाते हुए मुझसे कहा कि ‘ये हैं वही कार्तिक राम जी जिन्होंने गाँधी जी को हार पहनाया था.” मैं रोमाचित हुआ मेरी रचना का एक ऐतिहासिक पात्र मेरे सामने खड़ा था.
वर्धा आश्रम में साव जी सत्संग चर्चा के लिए विनोबा भावे जी के पास पवनार आश्रम जाया करते थे. उनके साथ कसारीडीह दुर्ग में रहने वाले मुंशी रज़ा भी जाते थे. मुंशी रज़ा दुर्ग के सबसे बड़े फटाका विक्रेता थे. वे हर साल दुर्ग में २६ जनवरी को जिला कचहरी में और दशहरा में दुर्ग स्टेडियम में निशुल्क आतिशबाजी करवाया करते थे. लेकिन रजा साहब थे बड़े आध्यात्मिक संस्कारों के व्यक्ति. वर्धा में गाँधी आश्रम की प्रबंधक थीं गाँधी जी के तीसरे पुत्र रामदास की पत्नी निर्मला गाँधी. उनसे भेंट हुई तब उन्हें दुर्ग आने का आमंत्रण इन्होंने दिया. यह बड़ा सुखद संयोग था कि गाँधी जी की बहू निर्मला जी दुर्ग स्थित पचरी पारा में हमारे घर पधारी थीं. मैं उस समय दसवीं कक्षा का छात्र था तब उन्हें मैंने प्रणाम करते हुए यह बताया कि ‘अपने स्कूल में हम लोगों ने ‘मुझे बापू से शिकायत है’ नाटक का मंचन किया था और इस नाटक में मैंने देवदास गाँधी की भूमिका की थी.” यह सुनकर वे शाबाशी देते हुए बोलीं कि “अच्छा किया था … अच्छा किया था.”
पाटन हाई स्कूल एक निजी स्कूल था उसके सरकारीकरण के लिए प्राचार्य पिताजी ने अपने दुर्ग स्कूल में पढ़े साथी बाद के शिक्षामंत्री धर्मपाल गुप्ता (दाऊ घनश्याम सिंह गुप्त जी के सुपुत्र) से कहा तब गुप्ता जी ने अपने गुरु पतिराम साव जी को भोपाल आमंत्रित किया और संविद शासन के मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह से मिलवाया. मुख्यमंत्री महोदय ने अपने सामने छोटी कद के धोती कुरता, गाँधी टोपी पहने और हाथ में छड़ी लिए साव जी के सौम्य चेहरे को देखा तो बोल उठे कि ‘नमस्कार गुरुजी… मुझे आप जैसे पुराने शिक्षकों से मिलकर बड़ी प्रसन्नता होती है.”… और उसके बाद पाटन स्कूल सरकारी स्कूल घोषित हो गया.
वर्ष १९३० में साव जी स्वाधीनता संग्राम के दौर में ‘लाहौर अधिवेशन’ में गए जहाँ नेहरू जी की अध्यक्षता में औपनिवेशिक नहीं बल्कि सम्पूर्ण स्वराज की मांग हुई थी. उनके साथ दुर्ग के सक्रिय नेता मोहनलाल बाकलीवाल व अन्य साथी भी दिसम्बर की कड़कती शीत में दुर्ग से लाहौर चले गए थे. बाकलीवाल जी बाद में दुर्ग के प्रथम विधायक हो गए थे. आदर्शवादी साव जी ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का प्रमाणपत्र कभी नहीं लिया. जब जोगी जी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री हुए तो उनके निवास में अनुदान के लिए एक आवेदन मैं ले गया था ताकि हम लोग यशस्वी व्यक्तित्व साव जी के जन्म-शताब्दी वर्ष पर कुछ कार्यक्रम करवा सकें. मैंने कोई रिश्ता बताए बिना आवेदन पत्र उनके हाथ में धराते हुए कहा कि ‘ये हमारे समाज के महापुरुष थे.” लेकिन जोगी जी ने भांप लिया, मुझसे हँसते खेलते हुए पूछे “तोर काए लागे… दादा जी?”.
आदर्श शिक्षक साव जी का एक क्रान्तिकारी रूप सामने आया जब वे शिक्षकों की मांगों के लिए प्रांतीय आन्दोलन में कूद पड़े थे और तब उन्हें पंद्रह दिनों की सजा हुई और नागपुर जेल में उन्हें रहना पड़ा था. जेल से रिहा होने के बाद उन्हें प्रधान अध्यापक पद से पदावनत कर अध्यापक बना दिया गया था. स्वाधीनता आन्दोलन के दिनों में वे दुर्ग में अपने कवि मित्रों को लेकर ‘पिकेटिंग’ करने यानि धरना देने जाते थे. तब शराब दुकानों के पास खड़े होकर गीत गाकर शराब खोरी के खिलाफ मुहिम छेड़ते थे और पीने वालों को समझाकर उन्हें दुकान से दूर ठेलते थे. यह था ‘कविता चौराहे पर’ का आरंभिक प्रयोग.
बाद में मंचों पर कविता पाठ का आरंभ इस तरह हुआ कि जब जब भी कोई मंत्री या विशिष्ट व्यक्ति दौरे पर दुर्ग आता तो उनके आगमन से पूर्व उपस्थित जनता को कविता सुनाई जाती थी जो ज्यादातर देशभक्ति पूर्ण गीत होते थे या सामाजिक उत्थान वाली कोई कविता होती थी. बाद में इस परम्परा में अंतिम कवि हमें पवन दीवान दिखाई देते हैं जो प्रधानमंत्री के आगमन से पूर्व मंच के सामने उपस्थित लाखों जनमानस को अपने लच्छेदार भाषण और मधुर गीतों से बांध लिया करते थे. कहते हैं कि कुछ इन्हीं दशाओं में जार्ज पंचम के सामने टैगोर ने ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ का ऐतिहासिक गान किया था.
साव जी ने दुर्ग के साथी साहित्यकारों के साथ मिलकर १९३० में दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति का गठन करवाया. जिसके प्रथम अध्यक्ष द्वारकानाथ तिवारी (प्रसिद्ध वकील प्रह्लाद तिवारी के पिता) हुए और प्रथम मंत्री यानि सचिव साव जी बने. तब दुर्ग के साथी कवि शिशुपाल बलदेव यादव, उदय प्रसाद उदय(ताम्रकार), कोदूराम दलित तथा अनेक साथी सक्रिय थे.
मध्यप्रदेश शासन के भाषा विभाग ने दुर्ग जिले के दो साहित्यकारों को उनकी साहित्य सेवा के लिए तीन सौ रुपये महीने की मानदेय राशि प्रदान की थी. यह दो साहित्यकारों- को पतिराम साव और झुमुक लाल दीन (वर्मा) को आजीवन मिलती रही थी. भाषा विभाग ने प्रमाण पत्र मंप इन्हें महावीर प्रसाद द्विवेदी युगीन रचनाकार माना था. तब कोलकाता के ‘विश्वामित्र’ और ‘काव्य कलाधर’, माखन लाल चतुर्वेदी की पत्रिका ‘कर्मवीर’ आदि में उनकी कविताएं प्रकाशित होती थीं.
जब क्रान्तिकारी कवि मुक्तिबोध का नाम राजनांदगांव से उभर रहा था. दुर्ग के बुजुर्ग कवियों ने युवा मुक्तिबोध को हिंदी भवन दुर्ग में काव्यपाठ के लिए आमंत्रित किया था. कुछ वक्तव्य देने के बाद जब मुक्तिबोध को कविता पाठ के लिए कहा गया तब उन्होंने विनम्रता से कहा कि ‘मुझे अपनी कविताएं याद नहीं रहतीं.’ इस पर बुजुर्ग कवि गण अचंभित हुए जिन्हें अपनी दर्जनों कविताएं याद रहती थीं और किसी भी गोष्ठी में सुना दिया करते थे. फिर मुक्तिबोध जी ने पढ़कर अपनी एक चर्चित कविता ‘ओरांग उटान’ को सुनाया था.
आज जिसे ‘हिन्दी भवन’ कहा जाता है यह ब्रिटिश शैली की बनी इमारत एडवर्ड मेमोरियल हॉल है. इसे दिल्ली दरवाजा भी कहा जाता था. यह १९११ में बना था. जिस कमिश्नर लॉरी ने इस भवन का उद्घाटन किया था उनके नाम से यहां लॉरी पब्लिक लाइब्रेरी चलती थी और यहीं ऊपर दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति का कार्यालय था जहाँ पतिराम साव जी अपने साहित्यकार साथियों के साथ सक्रिय रहते थे. यहां साहित्यकारों के साथ विद्यार्थियों को जोड़कर हर साल भव्य रूप में तुलसी जयंती मनाई जाती थी. यहीं गुजराती भाइयों ने दुर्गा देवी की पहली प्रतिमा बिठाकर दुर्गोत्सव आरंभ किया था जो दुर्गोत्सव पिछले कई दशकों से सार्वजनिक महत्ता के साथ पूरे दुर्ग शहर में मनाया जाता है. दुर्ग के पडोसी शहरों रायपुर और राजनांदगांव में गणेशोत्सव की धूम होती है जबकि दुर्ग में दुर्गोत्सव की धूम रही.
वर्ष १९६० से १९६८ तक साव जी ने ‘साहू-संदेश’ नाम से मासिक पत्रिका का संपादन किया था. पत्रिका प्रकाशन का उद्देश्य उनकी इन पंक्तियों से स्पष्ट था :
गिरे जनों को ऊपर लाने का करके संकल्प विशेष
जनसेवा में रत रहने को निकल पड़ा साहू संदेश.
पत्रिका के मुखपृष्ठ पर मैथिलीशरण गुप्त की ये पंक्तियाँ आव्हान करती थीं:
जिसको न निज गौरव, निज भाषा का अभिमान है
वो नर नहीं पशु निरा है और मृतक समान है.
अंधकार है वहाँ जहाँ आदित्य नहीं
मुर्दा है वह देश जहाँ साहित्य नही
साव जी कहते थे कि जिस प्रकार भक्तिकालीन कवियों में तुलसीदास उन्हें गहरे प्रभावित करते थे वैसे ही आधुनिक कवियों में उन्हें मैथिलीशरण गुप्त अत्यंत प्रिय लगते थे. हिंदी आलोचना में भी बाद की स्थापनाओं में ‘पंचवटी’ और ‘साकेत’ जैसे अमर खंडकाव्यों के रचयिता होने के कारण मैथिलीशरण गुप्त को आधुनिक तुलसीदास कहा जाता था.
पतिराम साव जी द्वारा सम्पादित ‘साहू-संदेश’ पत्रिका के पचास पृष्ठों वाले अंक आठ वर्षों तक प्रत्येक माह समय पर निकल जाया करते. इसके हर अंक में सामयिक विषयों पर साव जी विचारोत्तेजक सम्पादकीय लिखा करते थे. इस जात-समाज की पत्रिका में ही तब के सर्व-समाज के साहित्यकार छपा करते थे. इनमें खूबचंद बघेल और बैरिस्टर छेदीलाल जैसे प्रतिष्ठित विचारकों के आलेखों का पुनर्प्रकाशन होता था. इसके हर अंक में कोदूराम दलित की हास्य-व्यंग्य कविताएं छपा करती थीं. तब के युवा रचनाकार दानेश्वर शर्मा, रघुवीर अग्रवाल पथिक तथा अन्यान्य साहित्यकार छपा करते थे. ये पत्रिकाएँ जातिगत होती थीं पर जातिवादी नहीं होती थीं. ऐसी पत्रिकाओं में तब साहित्य और विचार के लिए जगह बनती थी. इसी प्रकार भारतेन्दु युग के एक बड़े निबंधकार प्रतापनारायण मिश्र भी पूर्व में एक पत्रिका सम्पादित किया करते थे उसका नाम था ‘ब्राम्हण’.
साव जी ने शिक्षा विभाग की मांग पर ‘दुर्ग जिले का भूगोल’ लिखा और ‘आदर्श बालक’ नामक एक नीति-पुस्तिका भी लिखी थी. उनके गुरु लुधियाना वाले कबीरपंथी स्वामी मुक्तानंद थे. साव जी कवि थे तो अपने नाम के साथ उपनाम में ‘मुक्त’ लगाते थे- उनके काव्य संग्रह का नाम भी था ‘मुक्त-तरंग’. पतिराम साव ‘मुक्त’ इस नाम से उन्होंने नगर निगम दुर्ग को एक आवेदन दिया था और पद्मनाभपुर दुर्ग के पीछे वाले क्षेत्र का नाम मुक्तनगर नाम से पंजीकृत हो गया. उसमें अंतिम समय १९९६ तक दादाजी यानि साव जी तो रहे ही. हम सब भी मुक्तनगर के निवासी हो गए. यहां सपरिवार आनंदमय रहते हैं अपने पिता साव जी की तरह स्वस्थ और दीर्घ जीवन जीने वाले उनके दूसरे पुत्र प्रो.ललित कुमार साव. ललित जी कहते हैं कि “अब मैं भी पिता की आयु ९१ बरस की उम्र को छू रहा हूँ.”
साठ वर्ष की आयु पूरे करने के बाद साव जी सायटिका रोग से ग्रस्त हो गए थे तब उससे छुटकारा पाने के लिए योग व ध्यान केन्द्रों की ओर मुड़े. दुर्ग किलामंदिर में योग विद्यालय खुलवाया. बाद में जब अपनी बसाई कॉलोनी मुक्तनगर में आ गए तब निकट ही पद्मनाभपुर जनता कॉलोनी के सभागार में ‘योग मित्र मंडल’ की स्थापना करवाई थी. पर साहित्यिक और वैचारिक उर्जा से भरे साव जी कहा करते थे कि “मेरे स्वास्थ्य का राज है साहित्य सेवा में रस लेना. अगर यह आधार न होता तो जाने कितनी छोटी-छोटी चिंताओं के भंवर में डूबता-उतरता बूढा जाता.”
लोककला मंच के प्रसिद्द उद्घोषक डॉ. सुरेश देशमुख बताते हैं कि ‘साव जी के विराट योगदान को देखते हुए दाऊ रामचन्द्र देशमुख ने ‘चंदैनी गोंदा’ के विराट मंच पर दुर्ग जिले के ग्राम तिरगा-झोला में उनका अभिनन्दन किया था.
आइए अंत में हम पतिराम साव की लिखी अनेक कविताओं में से एक कविता ‘शून्य की सत्ता’ शीर्षक से देखें जिसमें उनके अंतिम समय के आध्यात्मिक भाव का संस्पर्श हमें दिखता है:
शून्य ही के गर्भ में ये चमकते हैं चाँद तारे
शून्य के आधार पर ही, लटकते हैं लोक सारे.
शून्य ही से सृष्टि का नित सृजन और संहार है
शून्य में ही चल रहा संसार का व्यवहार है.
शून्य सर्वाधिकार है, यह शून्य सबका सार है
शून्य में ही कल्पनाओं का भरा भंडार है.
शून्य में कर कल्पना कवि स्वर सुनाता शून्य में
शून्य ही सब सुन रहे हैं लीन होकर शून्य में.
शून्य सबसे प्रथम था बस अंत में भी शून्य है
मध्य में जो भासता यह भी असल में शून्य है.
कल्पना का श्रोत-श्रोता, देख तू भी शून्य है
व्याप्य व्यापक भाव से जगदीश्वर भी शून्य है.
शून्य केवल सत्य है – चैतन्य है – आनंद है
शून्य ही संसार तरु का एक शाश्वत कंद है.
शून्य ही बस अंत में उपलब्ध जीवन सार है
शून्य में तल्लीन होना – जीव का उद्धार है.
शून्य की महिमा अमिट कोई बता सकता नहीं
शून्य की सत्ता बिना पत्ता भी हिल सकता नहीं.
०००
विनोद साव
‘छत्तीसगढ़ आसपास-जून अंक के स्तम्भ ‘कुछ जमीन से कुछ हवा से-१४३’ में प्रकाशित).