मुंशी नवाब राय को याद करते हुए…
रमेश अनुपम
अक्सर हमारे पढ़ने लिखने वाले और खुद को तीरंदाज समझने वाले भी मुंशी नवाब राय को याद करना जरूरी नहीं समझते हैं। उन्हें प्रेमचंद को याद करना कहीं अधिक सुविधाजनक और आसान काम लगता है ।
मुंशी नवाब राय को याद करेंगे तो हमें खुदी राम बोस और 11 अगस्त 1908 को भी याद करना होगा कि अचानक क्या हुआ मुंशी नवाब राय को कई रातों तक नींद ही नहीं आई । रात _दिन वे खुदी राम बोस को ही याद करते रहे । यह उन दिनों की बात है जब वे कानपुर में सरकारी मुलाजिम थे ।
उन्हीं दिनों की बात है कि एक दिन अचानक मुंशी नवाब राय उस पंद्रह वर्षीय किशोर शहीद खुदी राम बोस की तस्वीर लाकर उसे अपने घर की दीवार पर टांग दिया था। ये वही नवाब राय थे जिन्हें अपने घर की दीवारों पर किसी की भी तस्वीर लगाना कभी गंवारा ही नहीं था।
सरकारी मुलाजिम होते हुए भी अपने घर की दीवार पर खुदी राम बोस जैसे एक क्रांतिकारी की तस्वीर लगाने का हौसला केवल और केवल मुंशी नवाब राय ही जुटा सकते थे।
इसके साथ ही हमें स्वामी विवेकानंद को भी याद करना पड़ेगा । स्वामी विवेकानंद से मुंशी नवाब राय बेहद प्रभावित थे । नवाब राय ने स्वामी विवेकानंद के विचारों को अपनी डायरी में लिख रखा था :
” मेरे नौजवान दोस्तों , बलवान बनो ! तुम्हारे लिए मेरी यही सलाह है । तुम भगवदगीता की स्वाध्याय की अपेक्षा फुटबॉल खेलकर कहीं अधिक सुगमता से मुक्ति प्राप्त कर सकते हो। जब तुम्हारी रगें और
पुटठे अधिक दृढ़ होंगे तो तुम भगवदगीता के उपदेशों पर अधिक अच्छी तरह चल सकते हो । गीता का उपदेश कायरों को नहीं दिया गया था , अर्जुन को दिया गया था जो बड़ा शूरवीर , पराक्रमी और क्षत्रिय शिरोमणि था ।”
नवाब राय अच्छा भला उर्दू में लिखते थे। उन्हें उर्दू और हिंदी दोनों ही जुबान से मोहब्बत जो
थी ।
उनका पहला कहानी संग्रह ’सोजे वतन’ भी उर्दू लिपि में साया हुआ था , जो सन 1909 में अंग्रेजी हुक्मरान के भेंट चढ़ गया ।
अंग्रेजी हुक्मरान ने ’सोजे वतन’ की सारी प्रतियां जब्त कर ली थी और नवाब राय को हुक्म दिया था कि आगे से वो जो भी लिखेंगे उसे छपने से पहले उन्हें दिखाना होगा। यह भी कि मंजूरी मिलने पर ही वह साया हो सकेगा ।
मुंशी नवाब राय पर अंग्रेजी हुक्मरान नजर रखने लगे थे। उनकी नजरों में मुंशी नवाब राय एक ख़तरनाक अदीब थे ।
नवाब राय के अजीज दोस्त दयानरायण ने सलाह दी कि तुम अपना नाम बदल लो और प्रेमचंद रख लो , तभी तुम आगे लिख सकोगे ।
यह सन 1910 का वाक्या है ।
नवाब राय को आखिरकार मरना ही पड़ा ।