सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चिंतन से प्रसूत कृति – रात जागा पाखी उवाच
जीवन का सांध्यकाल प्रायः एकाकीपन का समय होता है। जहाॅं मन अतीत के सागर में डुबकियाॅं लगाते रहता है। अतीत में जीते हुए खुश होना जानता है। क्या खोया? क्या पाया? का जब हिसाब लगाता है, तब उसे निराशा हाथ लगती है। लेकिन जीवन का उत्तरार्ध परिवार की खुशियों सहित उम्रभर की कमाई हुई सारी पूॅंजी दोनों हाथों से न्योछावर कर स्वयं निराशा के बादलों में कहीं खो जाता है। मन एकाकीपन से घिर जाता है। पर, दो मिनट साथ बैठकर बतियाने वाला कोई नहीं होता। बच्चे पढ़ाई में और युवा ताकत अपनी जिम्मेदारी उठाने में लगा रहता है। तब जीवन के उत्तरार्ध के पास बचता है तो एकांत/एकाकीपन। ढेरों शिकायतें। पारिवारिक और सामाजिक खिन्नता। एक खीझ। इनके अतिरिक्त और कुछ भी तो हाथ नहीं आता।
एकाकीपन दूर करने का जतन खुद को करना पड़ता है। जीवन की बची-खुची साॅंसें लेने हमउम्र साथियों के बीच बैठना सर्वोत्तम जतन हो सकता है। ‘संगवारी ग्रुप’ ऐसे ही जतन का नाम है। जहाॅं न लौटने वाला बचपन सहित पूरे जीवन का आनंद ढलते सूरज की लालिमा और घोसलों की ओर लौटते पक्षियों के कलरव की आहट के साथ बैठकर लिया जाता है।
महिलाओं के इस ग्रुप में इतना संयम कि घर-गृहस्थी यानी सास-बहू, ननद-भाभी की चर्चा नहीं होती। इससे सबके घरों की लाज बची रहती है। किसी की वैयक्तिकता आहत नहीं होती। किसी के घरेलू मामलों में पड़ने से बचते हैं। (पृष्ठ 12) घर के बाहर और भीतर दोनों जगह मन खिन्न होने से बचता है। ग्रुप का यह संयम और सकारात्मकता वंदनीय हैं। अनुसरणीय हैं। सभी सदस्य साधुवाद के पात्र हैं। प्रेरणापुंज है यह ग्रुप। इस अंश को पढ़ते हुए सभी सदस्यों को मन-ही-मन नमन किये बिना रह नहीं सका।
साहित्यकार, कलाकार, चित्रकार या कुछ और होने से पूर्व हर कोई पहले मनुष्य होता है। मनुष्य होने के नाते वह दिनभर अपने पारिवारिक, सामाजिक और जीविकोपार्जन के कार्यों में व्यस्त रहता है। लेकिन उनकी साहित्यिक अभिरुचि/कलाकारी उसे कुछ करने विवश करती है। एक साहित्यकार रात को जागकर अपने विचारों को शब्दाकार देने में जुट जाता है। संगवारी ग्रुप, जिनके सभी सदस्य महिला हैं। पद्मनाभपुर दुर्ग के ग्रुप है। संध्या के समय वे पार्क में मिलते हैं। उन्हीं में एक नाम है सरला शर्मा।
वे जीवन के उत्तरार्ध में वे इतनी ऊर्जस्वित हैं, कि सबको चकित करती हैं। खूब पढ़ाकू हैं। अध्ययनशील भी। रात जागा पाखी की तरह देर रात तक जागती हैं। खट्टे-मीठे अनुभवों को शब्दों में चुनकर सहेजती हैं। उन्हीं शब्दों के वट वृक्ष का नाम है- रात जागा पाखी उवाच।
जब भी कोई किताब मिले, किताब मिलने की खुशी कुछ लिखकर जाहिर करना ही चाहिए। जिससे रचनाकार ऊर्जस्वित हो सके। उनकी सृजनशीलता को मान मिल सके। अपेक्षा की पूर्ति हो। मेरा मन कर रहा है कि ‘रात जागा पाखी उवाच’ पर आपसे अपनी बात कह दूॅं। साहित्य का विद्यार्थी हूॅं। पढ़ रहा हूॅं। पढ़ने का आनंद ले रहा हूॅं। साथ ही उसकी भाषा भी सीख रहा हूॅं। क्या लिखना है? कितना लिखना है? अभी समझ नहीं है। फिर भी एक कोशिश आपसे साझा कर रहा हूॅं।
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय।
औरन को शीतल करे, आपहु शीतल होय।।
लोकव्यापी, कबीर जी का ये दोहा मनुष्य के जीवन में सुख और शांति दोनों के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। इसमें मनुष्य के लिए बड़ा संदेश है।
इसके अतिरिक्त बचपन में एक कथन और बहुतेरे सुनने मिलते रहे हैं-
बातन हाथी पाइए, बातन हाथी पॉंव।
यह भी मनुष्य को सचेत करता है कि वह बातचीत करते हुए सावधान रहे। सोच समझ कर ही अपनी बात कहे। वाणी का संयम, बिगड़ते हालात को काबू करने में मदद करता है। अन्यथा बड़बोलापन भारी पड़ता ही है। जीवन में संयम का होना बहुत ज़रूरी है। हमारी बातों में जो संयम और संतुलन होना चाहिए, उसका सुंदर समन्वय ‘रात जागा पाखी उवाच’ में दिखता है।
पहले ही कह चुका हूॅं कि साहित्यकार सबसे पहले एक मनुष्य होता है। मनुष्य होने के नाते वह दिनभर अपने पारिवारिक, सामाजिक और जीविकोपार्जन के कार्यों में व्यस्त रहता है। उनकी साहित्यिक अभिरुचि उसे कुछ लिखने विवश करती है। वह रात्रि में निद्रा देवी से प्रार्थना करता है कि वह अभी कुछ देर विश्राम करें और उन्हें अपने विचारों को शब्दाकार देने में अपना सहयोग प्रदान करें।
देर रात तक लिखने वालों में से छत्तीसगढ़ी के गीतकार पटकथा लेखक गिरिवर दास मानिकपुरी जी याद आ रहे हैं। उनसे मेरी दो-तीन महीने में एक बार बात हो जाती थी। जब उनका स्वास्थ्य खराब होने की जानकारी मिली। उनसे बात की, उनका हाल-चाल जाना। तब वे एक शिकायत कर रहे थे कि तेरी चाची आजकल मुझे खूब डांटती है। पूछने पर उन्होंने बताया था कि मैं देर रात को ही लिख पाता हूॅं। लेखन में मेरा जगराता चलता है। लिखे बग़ैर सो ही नहीं पाता। लिख न लूॅं…. मुझे नींद नहीं आती है। … मैंने कहा…डाॅंटना जायज है चाचा। पहले स्वास्थ्य फिर शेष। … स्मृति का यह पिटारा यहीं बंद करना उचित है।
‘रात जागा पाखी उवाच’ अपने नाम से ही इस बात की पुष्टि कर रहा है कि उसमें रात जागा पाखी की बातें हैं। देखन में छोटे लगे, घाव करे गंभीर ….ऐसे बिहारी के ‘सतसई’ (दोहों) के लिए कहे गये हैं। लेकिन दुर्ग, छत्तीसगढ़ के साहित्यकार श्रीमती सरला शर्मा के ‘रात जागा पाखी उवाच’ के गद्य रचनाओं के लिए भी यह बात सोलह आने फिट बैठती है। लेखिका सरला शर्मा के इस संग्रह में शामिल रचनाऍं चिंतन से प्रसूत हैं। जो आकार में छोटे-छोटे हैं। लेकिन वे हमारे अवचेतन मन में सुप्त चेतना को जागृत करने वाली प्रतीत होते हैं।
दो से तीन पृष्ठ में कही गई बातों का विषय (कथानक) और प्रसंग दोनों विविधता लिए हुए हैं। किस पर लिखूॅं? और किसे रहने दूॅं? चुनना कठिन है। समय और लेखन दोनों की अपनी सीमा है। जिसे नहीं लांघना ही श्रेयस्कर है। आप यह भी मान सकते हैं कि ऐसा कह/लिखकर मैं अपनी कमजोरी छिपाने का यत्न कर रहा हूॅं।
यद्यपि इस संग्रह को साहित्य के किसी एक विधा का कहना कठिन है। इतना ज़रूर कह सकता हूॅं कि एक सूत्र है, जो इन लेखों का सृजन भूमि रहा है। वह सूत्र मुझे संस्मरण के रूप में अधिक दृष्टिगोचर हुआ है। कहीं-कहीं ये डायरी का स्मरण कराते हैं। जिनमें कुछ खट्टे अनुभव हैं, कुछ मीठे और कुछ तीखे नमकीन भी। ये अनुभव किसी खजाने से कम नहीं हैं। जिन्हें साझा करना निश्चित ही अभिनंदनीय है। स्वागतेय है।
इस संग्रह का पहला पाठ जीवन में ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ का पाठ सिखाता है। यह अति किसी भी मामले या विषय का हो सकता है। जीवन में संतुलन जरूरी है। कड़ुवा बनना ही नहीं है लेकिन इतना मीठा भी न बनें कि कोई हमें निगल लें और डकार भी न मारे। यह use and throw होने से बचने का रास्ता सुझाता है।
लोकजीवन और परम्परा एक-दूसरे को पोषित करते हैं। छत्तीसगढ़ के संदर्भ में कहें तो यहाॅं की परम्पराऍं विषम परिस्थितियों में भी जीने की कला सिखाती हैं। यहाॅं के लोग उत्सवधर्मी होते हैं। सुख की प्राप्ति हेतु खूब जतन करते हैं, यत्न करते हैं। संक्षेप में कहूॅं तो लोकजीवन में सुख का मूल उत्सव और परम्पराऍं ही हैं।
परंपराओं के पालन का उद्देश्य जीवन की आपाधापी के बीच उत्साह उमंग सुख सौहार्द की प्राप्ति है यही सुख तो जीवन को गति देता है अंतत मनुष्य का मूल उद्देश्य तो सुख की प्राप्ति ही है। (पृष्ठ 17)
अहंकार की रक्षा के लिए कोई प्रार्थना करे, गुहार लगाए। यह सुन या पढ़ कर आपको अजीब लग सकता है। लेकिन रात जागा पाखी उवाच में धर्मधारिणी से यह प्रार्थना की गई है। इसमें अहंकार की व्याख्या जिस तरीके से की गई है और उसके प्रसंग/दृष्टांत रखे गये हैं। उससे आप भी अहंकार की रक्षा के लिए सहमत हुए बग़ैर नहीं रह सकते।
…..सांसारिक कष्टों से जूझने, जीतने के लिए समस्याओं के समाधान के लिए वह किसी के सामने रोता, गिड़गिड़ाता नहीं किसी से फरियाद नहीं करता बल्कि स्वयं पर विश्वास करता है यह भी तो अहंकार ही है।….. पृष्ठ 25
समर्पण और विनम्रता को उद्धृत करता श्लोक के अर्थ है – मैं पातकी हूॅं, तो हूॅं, तुम तो पापनाशिनी हो न? ठीक है पर मुझे कोई दया, क्षमा नहीं चाहिए जो उचित हो वही करो…. मुक्ति से परे कर्ता भाव विलुप्त, दृष्टा भाव जागृत हो जाता है, यही है श्लाघनीय सात्विक अहंकार…. पृष्ठ 26
संसार में लोक या लोकजीवन से पृथक कोई रह ही नहीं सकता। फिर लोक के उत्सवों से भला कोई स्वयं को कैसे पृथक रख सकता है। ऐसे में लोक पर्वों से जुड़ी बातें जिनमें प्रकृति पूजा के साथ आध्यात्मिक विषय होते हैं, वे लेखनी के माध्यम से काग़ज़ में उतर आती हैं। जो जन-जन में ऊर्जा का संचार करती है। आत्मशक्ति पैदा करती है। इसका पुट इस संग्रह में मिलता है।
यद्यपि आज बेटियों ने सफलता के कई कीर्तिमान रचे हैं और रचने की दिशा में अग्रसर हैं। बावजूद उनका पथ कंटकों से भरे पड़े हैं। बेटियों के साथ रोज कई भयावह और दर्दनाक घटनाएं घटती हैं। जिनमें से कुछ घटनाएं ही अखबारों और टीवी समाचारों में खबर बन पाती हैं। जो मन को लहुलुहान करती हैं। ये घटनाएं समाज के गाल पर पड़े किसी तमाचे से कम नहीं होतीं। प्रोफेसर सतीश देशपांडे ‘निर्विकल्प’ की कविता ‘लड़की होने का मतलब’ के बहाने सरला शर्मा अपने सामाजिक दायित्व को भी अपनी लेखनी के माध्यम से पूरा करती हैं। (पृष्ठ 112-114)
वर्तमान समय में मनुष्य के प्रगति के पथ में बड़ी बाधा है उसकी आत्ममुग्धता। साहित्यकार को इससे बचने की सलाह और उस पर तंज दोनों का समन्वय भी इस पुस्तक में है। ख़ासकर नई पीढ़ी को इससे बचना ही चाहिए। आत्ममुग्धता हमेशा अहितकर है। यह बात सभी को समझनी होगी।
सरला शर्मा न केवल छत्तीसगढ़ के बल्कि देश के अन्य हिस्सों के पुरोधा साहित्यकारों को भी स्मरण करती हैं। जमुना प्रसाद कसार, पालेश्वर शर्मा, पवन दीवान, मुकुंद कौशल, शेषनाथ शर्मा शील, जैसे छत्तीसगढ़ के साहित्यिक पुरोधाओं की स्मृतियों के साथ तुलसी, कबीर , प्रेमचंद, निराला, धर्मवीर भारती, जयशंकर प्रसाद से जुड़ी प्रासंगिक बातें/चर्चा उनके प्रति उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि है। स्मरणांजलि है। वहीं उन्होंने विविध साहित्यिक आयोजन की रपट वर्तमान को भी पंजीबद्ध करने का स्तुत्य प्रयास है। सभी पठनीय है। ऐसा करते हुए वे मुझे स्थापित और नवोदित के बीच सेतु नज़र आती हैं। उनके भीतर का माटी और भाषा के प्रति लगाव एक प्रेरणा है उऋण होने की। इस पुस्तक में छत्तीसगढ़ की माटी की खुशबू है। जो मन को सुवासित करती है। जिसमें शहीद वीर नारायण सिंह को दी गई भावांजलि है, तो छत्तीसगढ़ी लोक संस्कृति की छटा है। लोक रंग है। लोक जीवन है।
मानव जीवन पर विज्ञान जैसे-जैसे हावी होते जा रहा है। वैसे-वैसे रोजगार के अवसर उनके हाथों से फिसलता जा रहा है। बेरोज़गारी उनके आसन्न मुॅंह बाए खड़ी है। तिस पर ‘ए आई’ और कहर बन कर टूट रहा है। न जाने यह कितनों की नौकरी को निगल जाएगा। मनुष्य द्वारा बनाई गईं चीजें उस पर ही भारी पड़ने लगी हैं। जो चिंताजनक है। जिसे मनुष्य नजरअंदाज कर शुतुरमुर्ग की तरह छुपने का यत्न करता दिख रहा है।
सोशल मीडिया जैसी आभासी दुनिया इतना आकर्षक है कि हम उससे चाहकर मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। हालांकि समय के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए। लेकिन आभासी दुनिया का मायाजाल ऐसा है कि हम पास बैठे लोगों से दूर होते जा रहे हैं। अजनबियों से पहचान बढ़ती जा रही है। वह भी कोसों दूर बैठे लोगों के साथ। अपनों के लिए समय नहीं है। एकाकीपन का व्यास दिनों-दिन बढ़ते जा रहा है। आदमी एकाकीपन को ढोने मज़बूर है। आदमी के इस टीस को लेखिका सरला शर्मा भली-भांति समझती हैं। चिंतित हैं। उसे उजागर भी करती है। इस पर उनका चिंतन समाज हित में है। वो रास्ता भी सुझाती दिखती हैं।
सोशल मीडिया के दुरुपयोग के प्रति जागरूक युवा वर्ग को ही होना होगा, संयम का रास्ता उसी को अपनाना होगा इसके सिवाय कोई अन्य विकल्प नहीं है। (पृष्ठ 238) किताब का अंतिम पैरा
इन सब के बावजूद सोशल मीडिया की उपादेयता की उपेक्षा नहीं की जा सकती। इसे नज़र-अंदाज करना, अपने समय की धारा के विपरीत चलना होगा। जो कतई सही नहीं है। सचेत रहते हुए संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा। आगे बढ़ना ही जीवित होने का परिचायक है।
सरला शर्मा की सोशल मीडिया और उसके प्रभाव पर सम्यक दृष्टि समाज के लिए एक संदेश है। ‘प्रेम गली अति सांकरी, जामे दोउ न समाय।’ की तरह ही सोशल मीडिया एक सॅंकरी गली है। जहाॅं ‘नज़र हटी कि दुर्घटना घटी’ की संभावना बढ़ जाती है। कुछ नहीं तो इसका अधिक प्रयोग पारिवारिक जीवन को बाधित करता ही है। इसका उदाहरण आपको अपने आसपास ही मिल सकता है।
मनुष्य जब आपा-धापी से थक जाता है। विश्राम चाहता है। गीत-संगीत सुनता है। प्रकृति की ओर लौटता है। नदी, पहाड़, जंगल और झरनों में जाकर आनंद की तलाश करता है। जो वास्तव में तनाव मुक्त जीवन और मन की शांति होती है। मन को असली शांति आत्मा का परमात्मा से संवाद स्थापित होने पर मिलती है। यह संवाद अध्यात्म की ओर एक कदम है। जिससे मनुष्य में मनुष्यता आती है। प्राणियों के प्रति प्रेम जागृत करता है। ईश्वर के प्रति हमारा समर्पण भाव ही हमें उससे संवाद का माध्यम होता है।
धार्मिक ग्रंथ, पुराण और हमारी लोक मान्यताएं जो ईश्वर से संवाद के मार्ग को प्रशस्त करते हैं। ‘रात जागा पाखी उवाच’ में इनसे जुड़े संस्मरण और अनुभव पाठक को आध्यात्मिक दिशा प्रदान करने वाले प्रतीत होंगे।
इस कृति को एक वाक्य में रेखांकित करते हुए यही कहूॅंगा कि ‘रात जागा पाखी उवाच’ सामाजिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चिंतन से प्रसूत कृति है। इसका कव्हरपृष्ठ आकर्षक, भीतरी पन्नों में छपाई और काग़ज़ की क्वालिटी अच्छी है। साहित्यिक गतिविधियों केंद्रित कुछ बातें जो 8-10 पंक्तियों में हैं। वे भी अन्य लेखों की भांति विस्तार के साथ होतीं तो इसकी गंभीरता बनी रहती। जिससे पाठक की तन्मयता भी बनी रहेगी। अपनी बात किताब के फ्लेप नोट में डॉ. सुधीर शर्मा के लिखे शब्दों के साथ पूरी करना चाहता हूॅं।
‘इस कृति की व्यापकता इसके विषयों की विविधता में छिपी है जहाॅं एक ओर इसमें कड़वे-मीठे व्यवहारों और मानवीय रिश्तों के संतुलन पर पाखी की चुटीली टिप्पणियाॅं हैं, वहीं दूसरी ओर इसमें ज्योतिष, राशिफल और भाग्य बनाम कर्म जैसे विषयों पर गंभीर तार्किक विमर्श भी है।’
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कृति – रात जागा पाखी उवाच
लेखिका – सरला शर्मा
प्रकाशक – सर्वप्रिय प्रकाशन दिल्ली
मूल्य – 275/-
पृष्ठ संख्या – 238
सर्वाधिकार – नमन शर्मा
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पोखन लाल जायसवाल
पलारी (पठारीडीह)
जिला- बलौदाबाजार-भाटापारा