बुरा न मानो ….गाली है
(गालियों पर चल रही बहस के बीच डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी का यह सारगर्भित लेख भारतीय शास्त्रों से लिए गए उदाहरणों और उद्धरणों के के जरिए पूरी व्याख्या करता है।
थोड़े धैर्य की आवश्यकता होगी। लेख बहुत लंबा है।
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बुरा न मानो ….गाली है
डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी
नैतिक और सांस्कृतिक चेतावनी
गालियाँ,अपशब्द,अश्लील और अभद्र भाषा मन, वचन और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.कृपया इसका सेवन न करें,न किसी को करने दें.
स्वत्व त्याग का घोष (डिस्क्लेमर)
यह लेख कई लेखकों के प्रकाशित साहित्य का संकलन है.कहीं कहीं इस लेख के संकलक ने अपने विचार रखे हैं.इसका उद्देश्य भूमंडल या किसी भी ग्रह,उपग्रह की सभ्यता,संस्कृति,समाज,समुदाय,संगठन,संप्रदाय और व्यक्ति विशेष की भावनाओं को ठेस पहुँचाना नहीं है.फिर भी यदि किसी की भावना को ठेस पहुंचती है तो इसके लिए संकलक को नहीं प्रकाशक को जिम्मेदार समझा जाये.
समर्पण
यह लेख उस समाज को समर्पित है जहाँ शिशु के जन्म लेते ही उसके लिंग भेद का संज्ञान लिया जाता है और जन्म से मृत्यु तक उसका उल्लेख किया जाता है.
केवल वयस्कों के लिए ?
गालियाँ या भाषा में अश्लीलता या अभद्रता के सन्दर्भ में भारतीय समाज की क्या मान्यता या विश्वास रहा है ?
भारत की प्रसिद्ध विद्वान देवांगना देसाई की एक पुस्तक इरोटिक स्कल्पचर ऑफ इंडिया – ए सोशियो कल्चरल स्टडीज़ में असभ्य या अश्लील कहे जा सकने वाले शब्दों के सन्दर्भ में एक अध्याय है. पुस्तक में प्राचीन भारतीय जीवन में अश्लिलोक्ति और जुगुप्सोक्ति के सन्दर्भ में ऐतिहासिक प्रमाण हैं.पुस्तक में प्रस्तुत की गयी शोध के अनुसार प्राचीन भारत में कुछ धार्मिक अनुष्ठानों ( यज्ञ) और सामाजिक उत्सवों पर असभ्य या अश्लील कही जा सकने वाली भाषा का समाज प्रयोग करता था.
अतीत में ऐसा मना जाता था कि अभद्र भाषा और संकेतों (मुद्राओं) में जादुई (मोहन) शक्तियां होती हैं.पुरातन काल में ऐसा विश्वास किया जाता था कि भाषा और संकेतों (Gestures ) में अभद्रता (obscenity and indecency) बुराई,खतरे,दुर्भाग्य को दूर करता है और वह फल प्राप्ति में सहायक होता है
जे.गोंड (J.Gonda) ने वैदिक संस्कृति में भाषा की अभद्रता (abuse and contumelious speech) की अनुष्ठानिक उपयोगिता/कार्य (ritual function) को रेखांकित किया है. अभद्र भाषा ( गाली ) दुष्ट शक्तियों और दुर्भाग्य को दूर करती हैं या उन्हें दूसरी दिशा में भटका देती हैं.यह “पवित्र” करती है.उदहारण के लिए शतपथ ब्राह्मण ( xiii,5.2.9) के अनुसार बातचीत, संवाद अथवा उपदेश में उपहास ,कलंकित करना/गाली देना,व्यंग्य करना या नीचा दिखाना इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए होता है.कात्यायन श्रौतसूत्र ( xx,6.21) में भी इसी विचार की पुनरावृत्ति है
ऐसा माना जाता था कि अभद्र शब्द और असभ्य भाषा बरसात लाने में मदद करती है.दक्षिण भारत में वर्षा प्राप्त करने के लिए महिलाओं द्वारा अभद्र गीत गाये जाते थे.
देवयात्रा नामक उत्सव में देवयात्रा के दौरान मंदिर में नृत्य करने वाली कन्याओं द्वारा अश्लील/असभ्य गीत गाना और अभद्र इशारे करना देवयात्रा का हिस्सा था.इसका उद्देश्य उपजाऊपन को बढ़ावा देना था.
अश्लील शब्द और चुटकुले, मौसमी उत्सवों जैसे की होली,वसंतोत्सव,और मदन महोत्सव और देवताओं के सम्मान में मनाये जाने अन्य उत्सवों पर पर कहे जाते थे. होली के उत्सव पर, अश्लील चुटकुलों का कहा जाना उत्सव का एक विशेष अंग होता था जिसे “भांड बधाई” कहा जाता था.
हिंदी में भांड शब्द का विशेषण के रूप में अर्थ होता है – बेशर्म,अपमानजनक,अश्लील और अभद्र.
गणेश चतुर्थी के उत्सव में ऐसी एक परंपरा है जिसमे एक पडोसी अपने दूसरे पडोसी को अपमानजनक शब्द कहता है जिसका वह प्रत्युत्तर देता है.ऐसा माना जाता है कि एक दूसरे को अपशब्द या गाली कहना – चतुर्थी के दिन चन्द्रमा देखने के दोष या पाप से मुक्त करता है.( पृष्ठ संख्या ९६ , Erotic sculptures of India – a socio –cultural studies by Devangana Desai )
दुर्गा पूजा के दसवें दिन शबरोत्सव में अश्लील/अभद्र अभिव्यक्ति उत्सव का मुख्य हिस्सा होती है.
जीमूतवाहन ने अपने काल विवेक (पृष्ठ ५१४ ) में इस बात का उल्लेख किया है कि जो व्यक्ति, भग -लिंग से सम्बंधित शब्द , गीत और क्रिया में भाग नहीं लेता उस पर देवी का कोप होता है.ग्रामीण बंगाल में आज भी यह परंपरा दुर्गा पूजा में जीवित है. देवी जया दुर्गा की उपासना में नग्न होकर नाचना, देवी के बारे में बुरा बोलना और अपनी उपासना स्वीकार न करने पर उसे धमकाने जैसी परंपरा विद्यमान है.गुजरात के लोक नाट्य “भवाई” जो देवी अम्बा के सम्मान में किया जाता है उसमे अभद्र/अश्लील तत्व होते हैं
ऐसा विश्वास किया जाता है कि अश्लील प्रदर्शन दुरात्माओं को डराती हैं.ऐसा माना जाता है कि गर्जना और बिजली राक्षस हैं जो भवनों पर अश्लील प्रदर्शन से दूर रखे जा सकते हैं.गुजरात की कुछ सार्वजनिक इमारतों में इक्का दुक्का यौन दृश्यों की उपस्थिति अश्लील प्रदर्शन के रक्षात्मक भूमिका की ओर संकेत करती है.( पृष्ठ संख्या ९७ Magico –Religious Beliefs and Practices, Devangana Desai)
यह विश्वास कि अश्लील प्रदर्शन दुरात्माओं और पाप को दूर रखता है – इसका उल्लेख हमें लोककथाओं और अनुष्ठानों में देखने को मिलता है.खजुराहो के प्रसिद्ध मंदिरों से जुडी दन्त कथाओं में इस विश्वास की स्थापना हमें पृथ्वीराज रासो के महोबाखंड में मिलती है.
अनुष्ठान में अश्लीलता का उपयोग – भांड यज्ञ कहा जाता है जो विवाहेतर संबंधों के पाप से मुक्त होने के लिए किया जाता था.दन्त कथाओं के अनुसार खजुराहों में मिथुन शिल्पों का प्रयोग हेमवती के विवाहेतर सम्बन्ध के पाप से मुक्ति के लिए किया गया था.( कई मान्यताओं में यह एक मान्यता है )
दक्षिण भारत की एक परंपरा के अनुसार जब वर्षा की आवशयकता होती है तब महिलाएं पुरुष की एक मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसे पालकी में रखती हैं और उसे अश्लील गीत गा घर घर ले जा अंत में खेत में स्थापित करती हैं.
अश्वमेध यज्ञ में अनुष्ठानिक संयोग/मैथुन/सम्भोग के साथ यौन संवाद यज्ञ का महत्वपूर्ण हिस्सा होता था.राजा की चारों पत्नियाँ इसमें भाग लेती थी.अग्र महिषी अश्व के साथ शयन करती थी और दूसरी पत्नियाँ अश्लील भाषा (abusive language) का प्रयोग करती थी ( पृष्ठ संख्या १०० ).भारतीय विवाह संस्था का इतिहास,अध्याय चार, अग्नि और यज्ञ के अंतर्गत, विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े ने इसका विस्तार से उल्लेख किया है (देखें पृष्ठ १२६ से आगे)
महाव्रत अनुष्ठान जिसमे प्रजापति के लिए सोम यज्ञ किया जाता था,में भी कुछ रोचक तथ्य देखने को मिलते हैं.इस अनुष्ठान में एक पुंश्चली ( वेश्या ) और एक ब्रम्हचारी यज्ञ वेदी के उत्तर में एक दूसरे को गालियाँ (अश्लील शब्द) देते थे.यह परस्पर अपमान उपजाऊपन को बढ़ाने के लिए समर्पित किया जाता था. इसी अनुष्ठान में दक्षिण दिशा में एक परदे के पीछे एक मागध और एक वेश्या समागम करते थे.
Fertility Festival या ऐसे उत्सव जो उर्वरता बढ़ाने के लिए मनाये जाते थे, हमें प्राचीन जीवन का दर्शन कराते हैं.
इन उत्सवों का सम्बन्ध कृषि जीवन से होता था जो उर्वरता को बढ़ाने के लिए यौन मन्त्र ( जादू , सम्मोहन ) के विश्वास में, समाज की आस्था को प्रदर्शित करते हैं.आमोद प्रमोद , समाज की यौन नैतिकता में ढीलाई , घरों को सजाना , सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनना इन उत्सवों का अंग था. यौन नैतिकता की ढिलाई में समागम, अथवा अश्लील भाषा और कामुक चेष्टा/हाव भाव सम्मिलित थी
प्राचीन और मध्ययुगीन भारत के इन उत्सवों में वसंतोत्सव,मदन महोत्सव,होली,कौमुदी महोत्सव महत्वपूर्ण थे.इनके अतिरिक्त दोलायात्रा, अशोकाष्टमी,यक्ष रात्रि,दमनक चतुर्दशी,अम्बु बाची,नागपंचमी,मित्रसप्तमी,रथसप्तमी,उदक सेवा महोत्सव, शबरोत्सव आदि उत्सव भी थे.
अश्लील शब्दों का प्रयोग और हाव भाव इनमे से अधिकतर उत्सवों का आवश्यक अंग होता था.सुबंधु ने होली पर बोले जाने वाले अश्लील शब्दों का उल्लेख किया है.चंद बरदाई ( १२ शताब्दी ) के बाद के मिथकों और लोक कथाओं में कम से कम और हेमाद्री ( १३ शताब्दी ) के समय ऐसा विश्वास था कि होली के दिन अश्लीलता राक्षसी होलिका और दानव धोंडा को दूर रखेंगी और होलिका का नाश करने में सहायक होंगी.
इसी प्रकार मदन महोत्सव ( जो चैत्र मास में आता है ) में संभ्रांत परिवारों की विवाहित कुल वधुएँ भी अपनी सामाजिक मर्यादा छोड़कर अश्लीलता में लिप्त होती थी.(पृष्ठ १०३ )
८वीं शताब्दी में दामोदरगुप्त और १२वी शताब्दी में जीमूतवाहन ने मदन महोत्सव के दिन “अश्लिलोक्ति” और “जुगुप्सोक्ति” के प्रयोग का उल्लेख किया है.
लक्ष्मीधर ने उदक महोत्सव के दिन अश्लील शब्दों और और गीतों के प्रयोग का वर्णन किया है.उदक महोत्सव के दिन सम्भोग, अश्लील भाषा और आसव में लिप्त होना महोत्सव का हिस्सा था.
जैसा की पहले शबरोत्सव का उल्लेख किया गया है.इस उत्सव में भग लिंग (sex organs) से सम्बंधित गीत, सम्भोग और कामुक स्वांग रचने का उल्लेख है.
कलिका पुराण में शबरोत्सव में उन्मुक्त गीत ( अनैतिक , स्वैरचारी ) कामुक हाव भाव एवं संभावित व्यभिचार ( समूह मैथुन ) का उल्लेख है.इनसे दूर रहने पर देवी का कोप होगा ऐसी मान्यता थी.
१४वीं शताब्दी में चन्देश्वर ने देवी पुराण के हवाले से कहा है कि समाज को इस प्रकार के स्वैराचार की आवश्यकता देवी के प्रकोप से बचने के लिए थी ( पृष्ठ १०४ )
१७वीं शताब्दी के मध्यकालीन भारत की एक बंगाली रचना “बृहद धर्म पुराण” में उल्लेख है कि प्रजनन के अंगों के सम्बन्ध में बोलना,इस उत्सव के सूत्रपात होने पर होता था पर देवी इन अश्लिलोक्ति से प्रसन्न होती हैं
ऐसा समाज का विश्वास था इन उत्सवों के आयोजन से भाग्य की प्राप्ति और दुरात्माओं से मुक्ति और कृषि की पैदावार में अभिवृद्धि होती है.
लक्ष्मीधर ने स्कन्द पुराण और ब्रह्म पुराण का हवाला देते हुए लिखा है कि यदि कोई इन उत्सवों में भाग नहीं लेता तो उन पर भूत और पिशाच का प्रकोप होता है
समय के साथ इन उत्सवों के उद्देश्य में परिवर्तन भी आया और अपने मूल उद्देश्य के साथ आनंद और मस्ती के लिए भी उनका उपयोग होने लगा.इस क्रमिक ह्रास की ओर वात्स्यायन ने संकेत किया है
इन उत्सवों के अतिरिक्त जिस उत्सव का उल्लेख करना आवश्यक है और जिसका पहले भी उल्लेख किया जा चुका है वह है देवयात्रा और रथयात्रा.
मोटे तौर पर देवयात्रा यानी मंदिर की मूर्ति को पालकी या रथ पर बैठाकर उत्सव मनाते हुए नगर की गलियों से शोभा यात्रा निकालना या मंदिर के निकट किसी पवित्र स्थान तक जाना.जब यात्रा में रथ का इस्तेमाल होता है तो इसे रथ यात्रा कहते हैं. देवयात्रा या रथ यात्रा का सम्बन्ध “फर्टिलिटी कल्ट” ( उर्वरता पंथ ) से था.
उत्सव के दिन जब रथ को गलियों में ले जाया जाता था तब रथ को अश्लील शिल्पों से सजाया जाता था.जैसा कि हम पहले भी देख चुके हैं कि प्राचीन समाज का यह विश्वास था कि अश्लीलता और अभद्रता प्रकृति की उत्पादक क्षमता को बढ़ाने में उत्प्रेरक का काम करती है, यहीं भावना या विचार देवयात्रा या रथयात्रा में अश्लील शिल्पों के सन्दर्भ में भी था.होली ,वसंतोत्सव,मदन महोत्सव आदि उत्सवों में जो कामुक प्रदर्शन का उद्देश्य था,वही देवयात्रा में भी सन्निहित था.
थर्सटन ( Thurston) का ऐसा मानना है कि रथ पर अश्लील शिल्प “बुरी नज़र” से बचाते हैं.
नृत्य में पारंगत कन्याओं की देवयात्रा में महत्वपूर्ण भूमिका थी.
Abbe Dubois जिसने १८वीं सदी के उत्तरार्ध में दक्षिण भारत की यात्रा की थी,ने मकर संक्रांति के दिन ऐसी एक देव यात्रा का उल्लेख किया है जिसमे नृत्यांगनायें अपने कामुक नृत्य और अश्लील गीतों से दर्शकों का मनोरंजन करती थी
देवयात्रा एक प्राचीन परंपरा थी जिसका कौटिल्य को भी ज्ञान था.अर्थशास्त्र में इस सन्दर्भ में उल्लेख है.
गुजरात में कुमारगुप्त के समय ( A.D.436-7) भी देवयात्रा निकालती थी.
अत्रि संहिता और कश्यप संहिता इस उत्सव की यात्रा का विस्तार से वर्णन करते हैं.अत्रि संहिता के अनुसार यात्रा का यह उत्सव सभी के लिए “शांति”और “पुष्टि” देने वाला यज्ञ है जो सभी पूजाओं से बढ़कर है.
भविष्य पुराण (I,93,54) के अनुसार जो सूर्य की रथ यात्रा में भाग लेता है वह सूर्य लोक को प्राप्त करता है.
भागवत पुराण भी देवयात्रा का वर्णन करता है जिसके बीच अर्जुन सुभद्रा को ले जाता है.देवयात्रा के दिन नाटकों का मंचन होता था.
८वीं शताब्दी में भवभूति उज्जैनी में अपने नाटक के मंचन का उल्लेख “कालप्रियानाथ” की यात्रा के अवसर पर करता है.इसी प्रकार ९वीं या १०वीं शताब्दी में मुरारी “पुरुषोत्तम यात्रा” के अवसर पर अपने नाटक अनंग राघव का उल्लेख करता है.
श्रीहर्ष नैषधचरित (XV-89) में जगन्नाथ पुरी की रथ यात्रा का उल्लेख है.
यहाँ यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वैदिक साहित्य में कई स्थानों पर यज्ञ के उपकरणों की प्रतीकात्मक तुलना स्त्री पुरुष के प्रजनन की इन्द्रियों से की गयी है.संक्षेप में यज्ञ के बिम्बों में भी स्त्री पुरुष के संयोग को देखा गया है.छान्दोग्य और बृहदारण्य उपनिषद् में इसका स्पष्ट उल्लेख है.
छान्दोग्य उपनिषद् कहता है –
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव
समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदंतः
करोति तेन्गारा अभिनंदा विस्फुलिंगा
तस्मिन्नेत स्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुव्हति तस्या
आहुतेर्गर्भः संभवति ( ChU,V,8.1-2)
ओ गौतम ! स्त्री यज्ञ की अग्नि है. उसका भग प्रदेश ( Mons Veneris) यज्ञ की वेदी है.मन्त्र गान, अग्नि का प्रज्वलन है. प्रजनन के अंग लौ ( लपटें ) हैं. लिंग का योनि में प्रवेश ज्वाला (आग )है ( आग लगाना है ).उसके परिणाम स्वरुप आनंद की अनुभूति स्फुलिंग हैं.जब देवता यज्ञ की अग्नि ( स्त्री ) में वीर्य अर्पित करते हैं तो वह गर्भ धारण करती है
( O Gautama !Woman is sacrificial fire, agni; her Mons Veneris is sacrificial altar, vedi; addressing and chanting is its burning, genitalia is flame and penetration of penis into it is fire; consequential bliss is its sparking. When the gods dedicate their semen into sacrificial fire, i.e., Woman, this results in procreation, i.e., she conceives)
उक्त रचना/ऋचा के रचनाकार ने यज्ञ की प्रक्रिया को मानुषी सम्भोग की प्रक्रिया के रूप में देखा. (क्या यह यज्ञ का अपमान है ?)
ततेद्न्मिथुनमोमित्येत स्मिन्नक्षरे सँ- सृज्यते
यदा वै मिथुनौ समागच्छत आपयतौ वै
तावन्योन्यस्य कामम् II ( ChU,I,1.6)
मिथुन ओम् शब्द में अभिव्यक्त होता है
( Mithuna is expressed in the word OM)
क्या वर्तमान का कवि ओम् की मिथुन में संकल्पना कर सकता है ?
बृहदारण्यकोपनिषदः इस सन्दर्भ में और सुस्पष्ट है
योषा वा अग्निगौतम तस्या उपस्थ एव समिल्लोमानि
धूमो योनिरर्चियदन्तः करोति तेऽड्न्गारा अभिनंदा
विस्फुलिंगातस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा रेतो जुव्हति
तस्या आहुत्यै पुरुषः संभवति स जीवति
यावञ्ज्जीवत्यथ यदा म्रियते II
O Gautama ! Woman is sacrificial fire .her lower portion is the sacrificial altar,Vedi; the pubic hair is the sacrificial grass; vagina is flame, penetration of penis into vagina is fire; and feeling of bliss is sparking. When the gods sacrifice their semen into this fire, purusha is produced. He lives until his share of deeds remain, then he dies ( BrU ,VI, 2.13)
इसके अतिरिक्त
तस्या वेदिरुपोस्थो लोमानि बर्हिश्चर्माधिषवणे
समिद्धो मध्यतस्तौ मुष्कौ स यावान् ह वै वाजपेयेन
यजमानस्य लोको भवति तावानास्य लोको भवति
य एवं विद्वानधोपहासम चरत्यासाँ स्त्रीणाँ
सुकृतं वृङेक्तेऽथ य इदमविद्वानधोपहासं
चरत्यास्य स्त्रियः सुकृतं वृञ्जते II
Mons Veneris of woman is the sacrificial altar, vedi; pubic hair is the sacrificial grass, the middle portion of genitalia is fire in flames; the two labia of the vulva (muskau) are the soma-phalaka, articles of yajna. He who knowing this goes into copulation is entitled to the reward of the Vajapeya yajna and he also acquires punya, reward of his counterpart. He who does it without knowing this symbolism earns no punya, which is acquired by his woman. (BrU, VI, 4.3)
(क्या उपनिषदों में वर्णित यज्ञ की सम्भोग के साथ प्रतीकात्मकता धार्मिक भावनाओं पर चोट कही जा सकती है ?)
प्राचीन ऋषियों ने बिना किसी वर्जना के अपने विचारों को और समाज को वैदिक साहित्य में अभिव्यक्त किया है.
संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि प्राचीन और मध्यकालीन भारत को “अश्लील” और अभद्र भाषा या इशारों या प्रजनन के अंगों के उल्लेख से कोई परहेज़ नहीं था बल्कि वे उनके सामाजिक जीवन का हिस्सा थे.
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित राम चरित मानस में शिव विवाह के उत्सव पर बाबा ने गारियों ( गालियों ) की सामाजिक परम्परा का उल्लेख किया है –
हिमाचल ने आदर पूर्वक सब बारातियों – विष्णु ,ब्रह्मा ,और सब जाति के देवताओं को बुलाया.
“बिबिध पाँति बैठी जेवनारा I लागे परुसन निपुन सुआरा II
नारिबृंद सुर जेवँत जानी I लगीं देन मृदु गारी II
भोजन करने वालों की बहुत सी पंगतें बैठीं.चतुर रसोइये परोसने लगे.स्त्रियों की मंडलियां देवताओं को भोजन करते जानकर कोमल वाणी से गालियाँ देने लगी.
“गारीं मधुर स्वर देहिं सुन्दरि बिंग्य बचन सुनावहीं I
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहिं II
जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यों I
अचवाँइ दीन्हें पान गवसे बास जहँ जाको रह्यो II
सब सुन्दरी मीठे स्वरों में गालियाँ देने लगीं और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगी.देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं ,इसलिए भोजन करने में बड़ी देर लगा रहे हैं.भोजन के समय जो आनंद बढ़ा वह करोड़ों मुँह से भी नहीं कहा जा सकता.(भोजन कर चुकने पर) सबके हाथ मुँह धुलाकर पान दिये गए.फिर सब लोग जो जहाँ ठहरे थे वहाँ चल दिये ( पृष्ठ ११३ , राम चरित मानस , गीत प्रेस , गोरखपुर )
विवाह जैसे मंगल उत्सव पर गालियों का आदान प्रदान का इससे अच्छा उदहारण क्या हो सकता है ?
राम सीता के विवाह पर भी बाबा तुलसीदास ने लोकाचार में गालियों का उल्लेख किया है
“पंच कवल करि जेवन लागे I गारि गान सुनि अति अनुरागे II
भांति अनेक परे पकवाने I सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने II
सब लोग पंच कौर करके भोजन करने लगे.गाली का गाना सुनकर वे अत्यंत प्रेममग्न हो गए.अनेक तरह के अमृत के समान पकवान परोसे गए ,जिसका बखान नहिं हो सकता. (पृष्ठ ३१४, रामचरित मानस, गीता प्रेस)
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती I एक एक रस अगनित भाँती II
जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी I लै लै नाम पुरुष अरु नारी II
छहों रसों के बहुत सुन्दर व्यंजन हैं.एक एक रस के अनगिनती प्रकार के बने हैं.भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियों के नाम ले ले कर मधुर ध्वनि से गाली दे रही हैं ( गाली गा रही हैं )
समय सुहावनि गारि बिराजा I हँसत राउ सुनि सहित समाजा II
एहिं बिधि सबहिं भोजनु कीन्हा I आदर सहित आचमनु दीन्हा II
समय की सुहावनी गाली शोभित हो रही है.उसे सुनकर समाज सहित दशरथ जी हँस रहे हैं.इस रीति से सभी ने भोजन किया और तब सबको आदर सहित आचमन दिया गया.( पृष्ठ -३१५ राम चरित मानस , गीता प्रेस )
इसके अतिरिक्त गोस्वामीजी ने और स्थानों पर भी गालियों का उल्लेख किया है. उदहारण के तौर पर जब सीता स्वयंवर में धनुष टूटने के बाद आये हुए कुछ दुष्ट राजाओं ने उत्पात मचाना शुरू किया तब जनकपुरी की नारियाँ दुष्ट राजाओं को गालियाँ देने लगी.
“खरभरु देखि बिकल पुर नारीं I सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं II ( राम चरित मानस पृष्ठ संख्या २५८ , गीता प्रेस )
गोस्वामी जी ने आगे भी जब विवाह के बाद राम जनकपुरी से अयोध्या लौट आते हैं और सोने (शयन) के लिए जाते हैं तब भी अयोध्या की स्त्रियों द्वारा मंगल गालियों का उल्लेख किया है
नीदऊँ बदन सोह सुठि लोना I मनहुं साँझ सरसीरुह सोना II
घर घर करहिं जागरन नारीं I देहिं परसपर मंगल गारीं II ( बालकाण्ड पृष्ठ संख्या ३३७ गीता प्रेस )
नींद में भी उनका सलोना मुखडा ऐसा सोह रहा था , मानो संध्या के समय का लाल कमल सोह रहा हो.स्त्रियां घर घर जागरण कर रही हैं और आपस में ( एक दूसरी को ) मंगलमयी गालियाँ दे रही हैं.
आगे अयोध्या कांड में राम वनवास के समय अयोध्यावासी कैकेयी को गाली देते हैं
मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी I जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी II
सब मेल मिल गए थे,इतने में ही विधाता ने बात बिगाड़ दी.जहाँ तहाँ लोग कैकेयी को गाली दे रहे हैं. ( रामचरित मानस, गीता प्रेस , पृष्ठ संख्या ३८२ )
एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं I देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं II
नगर के सब स्त्री पुरुष इस प्रकार विलाप कर रहे हैं और उस कुचाली कैकेयी को करोड़ों गालियाँ दे रहे हैं. ( राम चरित मानस गीता प्रेस , पृष्ठ संख्या ३८६ )
सब के प्रिय सब के हितकारी I दुःख सुख सरिस प्रसंसा गारी II
जो सबके प्रिय है और सबका हित करने वाले हैं जिन्हें दुःख और सुख तथा प्रशंसा और गाली (निंदा ) समान है ( राम चरित मानस गीता प्रेस पृष्ठ संख्या ४५२ )
गारीं सकल कैकेइहि देहीं I नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं II
सब कैकेयी को गालियाँ देते हैं जिसने संसार को बिना नेत्र (अंधा ) कर दिया. ( राम चरित मानस , पृष्ठ संख्या ४७३ )
इसके अतिरिक्त राम चरित मानस में रावण द्वारा मारीच को गारी देने का उल्लेख है.
जाहु भवन कुल कुसल बिचारी I सुनत जरा दिन्हिसी बहु गारी II ( गीता प्रेस पृष्ठ ६५४ )
आगे चलकर मानस में ही रावण को लंकावासियों द्वारा गाली देने का उल्लेख मिलता है
सब मिलि देहिं रावनहि गारी I राज करत एहिं मृत्यु हँकारी II
सब मिलकर रावण को गालियाँ देने लगे कि राज्य करते हुए इसने मृत्यु को बुला लिया है.( गीता प्रेस पृष्ठ ८१३ )
गोस्वामीजी के ही रामलला नहछू, जानकी मंगल और पार्वती मंगल में भी गालियों की लोक परंपरा का उल्लेख है.
जानकी मंगल में गोस्वामीजी लिखते हैं कि
चतुर नारि बर कुंवरिहि रीति सिखावहिं
देहिं गारि लहकौरि समौ सुख पावहिं II१४९II
जुआ खेलावन कौतुक कीन्ह सयानिंह
जीति हारि मिस देहिं गारि दुहु रानिन्ह II१५०II
चतुर स्त्रियां वर और दुल्हिन को कुल रीति सिखाती हैं और लहकौरि की विधि के समय गाली गाकर सुख मानती हैं II१४९II जुआ खेलाने में चतुर स्त्रियों ने बड़ा कौतुक किया.वे हार जीत का बहाना करके (कौशल्या और सुनयना) दोंनों रानियों को गाली देतीं थीं II१५०II
पार्वती मंगल में गोस्वामीजी ने गारी का उल्लेख इस प्रकार किया है –
जुआ खेलावत गारि देहिं गिरि नारिहि I
आपनि ओर निहारी प्रमोद पुरारिहि II१३५II
जुआ खेलते समय सब स्त्रियां हिमाचल पत्नी मैना को गाली गाती हैं.शिवजी अपनी ओर देखकर विशेष आनंदित होते हैं ( कि हमारे तो माता है ही नहीं,गाली किसको देंगी)
हिंदी साहित्य और भारत की इतर भाषाओँ के साहित्य में गालियों का प्रयोग है.
मराठी भाषा में एक पुस्तक है – “मराठी भाषेतील असभ्य म्हणी आणि वाक्प्रचार”.इसके संपादक और अभ्यासक है –अश्विनी कुमार दत्तात्रेय मराठे.
मराठे जी ने अपनी पुस्तक में असभ्य म्हणी यानी कहावतों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि,उसके मानस शास्त्रीय और सामाजिक पहलू का विषद अध्ययन किया है.श्री मराठे के अनुसार वे किसी भी भाषा की असभ्य कहावत को अश्लील मानने के लिए तैयार नहीं हैं.क्यों कि व्युत्पत्ति के अनुसार अश्लील का अर्थ “सौंदर्य का अनुभव न देने वाली” होता है.( मराठी भाषेतील असभ्य म्हणी आणि वाक्प्रचार , पृष्ठ १ )
श्री मराठे ने अपनी पुस्तक में उल्लेख किया कि उन्हें ९० प्रतिशत असभ्य कहावतें और उनका वाक्प्रचार महिलाओं के मुख से सुनने को मिला.( पृष्ठ – सात )
मराठी भाषा में प्रकाशित आर.सी.ढेरे द्वारा सम्पादित पुस्तक “शिवी आणि समाजेतिहास” में गालियों की परंपरा पर प्रकाश डाला है.
“शिलालेखांतील गधेगाळ” में उन्होंने उल्लेख किया है कि महाराष्ट्र में शिलाओं पर जो अनेक दान लेख प्राप्त हुए हैं उनमें से कई दान लेखों में गधेगाळ नाम से प्रसिद्द गाली का उल्लेख प्राप्त होता है.दान लेख के अंत में शापाशीर्वादात्मक वचनों का उल्लेख होता है –“ हे दान शासन जो मानील त्याचे कल्याण होईल आणि जो त्याचा भंग करील त्याला यातना भोगाव्या लागतील, त्याचे अकल्याण होईल.” इस प्रकार का भाव इन शापाशीर्वादात्मक वचनों में व्यक्त होता है .गधेगाळ की एक विशेषता यह भी कि जैसे वह शब्दांकित की जा सकती है उसी प्रकार वह दृष्यांकित भी होती है.गधेगाळ का अर्थ गधे के नाम से दी हुई गाली.
“तू गधा है” यह गधे के नाम से दी हुई गाली है पर यह गधेगाळ नहीं है.शब्द और शिल्प दोंनों में अंकित गधेगाळ इससे अलग है.
लेखों में अंकित दानशासन का जो भंग करेगा उसकी माँ अथवा पत्नी का उपभोग गधा करेगा –यह है गधेगाळ !
मणिकपुर से प्राप्त शके १११९ के एक लेख में “लुप्यति लोपायन्ति वा तस्य मातरम गर्दभेन झविजे I
तासगांव के यादव कृष्ण के शक ११७३ के लेख में “ तन्माता नवरासभेन रभसा सोपस्कर रम्यते I – जो शासन भंग करेगा उसकी माता से युवा गधा अत्यन्त आवेग से और यथासंग रीति से रमण करेगा.
इस प्रकार की सुन्दर काव्यमय भाषा में गधेगाळ उत्खनित की गयी है
वेळूस,कोपराड,कालवार,काटी,बिडकीन,बेहरली इत्यादि स्थानों पर लेखों में शब्द और शिल्प दोंनों में अंकित गधेगाळ दिखाई पड़ती हैं.
संगमेश्वर (कर्णेश्वर मंदिर),राजली, धर्मपुरी स्थानों के लेख में केवल शिल्पों में अंकित गधेगाळ मिलती है.
वेळूस के एक लेख में “तेयाचिए माएसी गाडौ घोडु” में गधे के साथ घोड़े का भी उल्लेख किया है.(शिवी आणि समाजेतिहास ११३)
दाभोळ के लेख में “त्यावरि व त्याचे मएवरि गदडो असे” इस प्रकार आदेश का भंग करने वाले का उसकी माता के अलावा उसका भी गधे के साथ सम्बन्ध जोड़ा गया है.
चूँकि माता का स्थान सबसे पवित्र होता है इसलिए यह गालियाँ माता को उद्देश्य कर कही गयी है पर कुछ स्थानों पर पत्नी के शील को भी शब्दों से भंग किया गया है.
मिरज के इमाम दरगाह के लेख में “त्याचे बाइएलेवरि गाढोऊ” और विजापुर के ताज बावडी में मिले लेख में फारसी में “खर बर झन व मादर –इ –उ –सवार बाशद” इस प्रकार उल्लेख है.
गधे को लेकर गाली देने की परंपरा बहुत पुरानी है.ज्ञानबा (ज्ञानेश्वर) से लेकर तुकोबा (तुकाराम) तक सभी संतों ने इस परंपरा का निर्वाह किया है ( ११४ -११५ )
विदेहमुक्त गोविन्द्प्रभु से लेकर अक्कलकोट के स्वामी समर्थ और चक्रधर से लेकर तुकाराम तक अनेक संत पुरुषों ने अपनी वाणी में गालियों को स्थान दिया है.(११५ )
अभिजात अभिरुचि से संपन्न मोरोपंत भी गालियों के प्रभाव से मुक्त नहीं रह पाए.
ज्ञानेश्वर ने कहा है –
खरी टेंको नेंदी उडे I लातौनी फोडी नाकाडें II
तर्ही जैसा न काढे I माघातौ खरू II
तैसा जो विषयांलागि I उडी घाली जळतिये आगीं II
व्यसनाचि आंगि I लेणी मिरवी II ( ज्ञा.१३ .७०४ -७०५ )
गधी गधे को स्पर्श न करने देते हुए उछलकर पिछली टांगों से नाक फोडती है तब भी जैसे गधा पीछे नहीं सरकता उसी प्रकार विषयाक्त पुरुष जलती हुई आग के समान स्त्री देह के उपभोग पाने के लिए आगे बढता है ( झेपावतो) और भोग से प्राप्त होने वाले संकट को शरीर पर अलंकार के रूप में धारण करता है.
यह दृष्टांत ज्ञानदेव द्वारा विषय लम्पटों को दी हुई एक तीखी गाली है.
इस प्रकार के दृष्टान्त का उल्लेख श्रीमद भागवत में एक बार नहीं तीन बार मिलता है.
एकादश स्कंध में एक प्रसंग में उद्धव श्री कृष्ण से प्रश्न पूछते हैं –
“विदन्ति मर्त्याः प्रायेण विषयान् पद्मापद I
तथापि भुंजते कृष्ण कथ श्वखराजवत् II ( भा . ११ .१३ .८ )
हे कृष्ण ! विषय यानी आपदाओं के स्थान ऐसा सभी सामान्य मर्त्य लोग जानते हैं फिर भी वे कुत्ते , गधे और बकरे की भांति विषयों का सेवन कैसे करते हैं ?
भागवतकार ने विषयासक्तों के आदर्श के रूप में कुत्ते,गधे,और बकरे का उल्लेख किया है.
गधे से सम्बंधित एक और गाली मराठी भाषा में उपलब्ध होती है.वह है “गाढ़वाच्या गांडीत जाणे/घालणे”. जब यह वाक्य प्रयोग दूसरे के लिए होता है तो वह दूसरे की अवहेलना, अप्रतिष्ठा अथवा तुच्छता दर्शाने के किया जाता है पर जब स्वयं के लिए होता है तो उससे आत्म निंदा अथवा यातना प्रकट होती है जो जहन्नुम/नर्क में जाने के बराबर है.
संस्कृत में “उपस्थ” शब्द गुद( गुदा) और योनि दोंनों को अभिव्यक्त करता है ( १२१ )
वैदिक निर्ॠति मृत्यु की,विनाश की अवदशा की देवता है,जो अदिति के विरुद्ध शक्ति की प्रतिनिधि है.अदिति मातृत्व,समृद्धि और सुफलता की देवता है.दोंनों का पृथ्वी के नामों के रूप में भी वेदों में उल्लेख है.वैदिक ऋषि अदिति को पास लाना चाहते हैं और निर्ॠति को दूर रखना चाहते हैं.गधा निर्ॠति का प्रतिनिधि है.( उससे सम्बन्ध है).निर्ॠति का यह प्रतिनिधि निष्फलता ,दरिद्रता और अशुभ का कारक है इसलिए जिस स्त्री से उसका बलजबरी से सम्बन्ध जोड़ा जायेगा उस स्त्री की कोख बाँझ होगी और उसके उदर से अवदशा जन्म लेगी.
“तेयाची माय गाढवे झविजे” इस गाली में उपर्युक्त सारे भाव/सूचन आ जाते हैं.
जन्म मरण और पुनर्जन्म का सम्बन्ध माता के गर्भ से है.जन्म और पुनर्जन्म माता के गर्भ से और मरण यानी पृथ्वी माता ( धरती) के गर्भ में शयन करना, ऐसी वैदिक ऋषियों की अवधारणा है.
मिट्टी ( मराठी –माती) का एक रूप माता है और दूसरा रूप मृत्यु है.
वैदिक ऋषि जब मिट्टी/धरती का मातृरूप में निर्देश करते हैं तो वे अदितेरुपस्थे ( अदिति की योनि –गर्भाशय में ) शब्दों का चयन करते हैं और जब मृत्यु रूप का उल्लेख करते हैं तो निर्ॠतेरुपस्थे (निर्ॠति की योनि या गर्भाशय में ) शब्द का चयन करते हैं.निर्ॠति के उपस्थ का उल्लेख करने वाले ऋग्वेद के कुछ उल्लेख हैं ( पाँच , ऋग्वेद -१.११७ .५. ऋग्वेद ७ .१०४ .९ , ऋग्वेद १०,१८.१० , ऋग्वेद १०.९५.१४ , ऋग्वेद १०.१६१.२ )
इनमें से ऋग्वेद १०.९५.१४ इस प्रकार है
“सुऽदेव अद्य प्रऽपतेत अनावृत् पराऽवतम् गंतवै ऊँ (इति) अधःशयीत निःॠते उपऽस्थे अध एनम् वृकः रभमासः अद्युः
(पुरुरुवा उर्वशी से कहता है) क्या ? तो मैं (पतिरूप) जो उत्कृष्ट देव आज ही अनावृत् होऊं ना ? इस पृथ्वी के अंतिम छोर पर जाकर वहाँ (स्वयं) को पटकूं ना ? क्या में निर्ॠति के “उपस्थ” ( गुद /योनि ) के तल में जाकर शयन करूँ.इस स्थिति से तो यही बेहतर होगा कि (इस प्राणी को /मुझे) लोमड़ी/भेडिये तुरंत खा ले तो बुरा क्या है ?
“निर्ॠति का उपस्थ” और “गाढ़वा ची गांड” दोंनों वक्प्रचार का अर्थ एक ही है.( १२३ )
निर्ॠति गुदेंद्रियों की अधिष्ठात्री देवता है इस ओर स्पष्ट संकेत एकनाथी भागवत में मिलता है.
गुदेंद्रिया विसर्ग विषयो I निर्ॠति अधिदैवत तेथील पहा वो II
क्षरशक्तीचा तेथ निर्वाहो I यासी अलिप्त देवो अक्षरत्वें II ( एकनाथी भागवत २२.३६८)
विसर्ग जिसका विषय है और जो क्षर शक्ति का आश्रय है , उस गुदेंद्रिय के अधिदैवत हैं निर्ॠति.अर्थात परमेश्वर अक्षर होने के कारण उससे अलिप्त है.
घोड़ेगाळ
मराठी भाषा में गधेगाळ की तरह घोड़ेगाळ भी प्रचलित है.मराठी वक्प्रचार में गाली देने के लिए “घोड़ा लावणे” यह गाली प्रयोग में आती है.”थांब , तुझ्या आईला घोड़ाच लावतो” अथवा “तुझ्या आईला लावला घोड़ा”
यह गाली सम्भोग सूचक होने के बाद भी “तेयाची माय गाढ़वे झविजे” जितनी तीव्र नहीं है.
घोड़ा और गधा एक ही वर्ग के प्राणी होने के बावजूद घोड़ा कभी भी अशुभ या अमंगल नहीं माना गया.
इस गाली के उद्गम के लिए हमें फिर वेदकाल की ओर प्रस्थान करना पड़ेगा.
वेदकाल में अश्वमेध नामक यज्ञ की महत्ता थी.
रामायण के बालकाण्ड में दशरथ और उत्तरकाण्ड में भगवान श्री राम ने यह यज्ञ किया था ऐसा वर्णन मिलता है.महाभारत में धर्मराज ने यह यज्ञ किया था, ऐसा वर्णन है.
संतान प्राप्ति , राज्य वृद्धि,और धनधान्य की समृद्धि के लिए यह यज्ञ किया जाता था.इस यज्ञ में संस्कार पूर्वक घोड़े को निष्प्राण कर (शमन कर ) यज्ञ की अग्नि में उसकी आहुति देना प्रधान विधि थी.परन्तु यज्ञ का एक अति महत्व का भाग यह भी था कि संस्कार पूर्वक शमन किये हुए अश्व को स्वर्ण की एक बड़ी गोलाकार चकती पर रखा जाता था.उसी चकती पर घोड़े के साथ रानी अथवा यजमान पत्नी को शयन करना होता था.उसके बाद दोंनों पर एक वस्त्र ओढाया जाता था.इस प्रकार रानी और घोड़े के बीच सांकेतिक सम्बन्ध को संपन्न किया जाता था. इसी से जन्म लेता है एक वाक्प्रचार – “घोड़ा लावणे” यानी घोड़ा लगाना.जब यह प्रक्रिया संपन्न होती थी तब मन्त्र पढ़े जाते थे.आज वे हमें अश्लील (?) लग सकते हैं पर वे रानी और घोड़े के सम्भोग क्रिया का वर्णन करते हैं और उस क्रिया को उत्तेजन देते थे
“स्वर्गे लोके प्रोर्णुवातां वृषा वामश्वो
रेतोधा रेतो दधातु II
स्वर्गलोक (में ) आच्छादित हो.यह सामर्थ्यवान वीर्य धारण करने वाला अश्व वीर्य ( रानी की इन्द्रिय ) में रखो.
यह सारी प्रक्रिया अपार्थिव है.सोने की चकती – सूर्य के दिव्य लोक की प्रतीक है.अश्व यह सूर्य का प्रतीक है. वह सूर्य है, द्यो है,दिव्य पुरुष है,और रानी ? रानी विश्व जननी – पृथ्वी की प्रतिनिधि है. रानी और अश्व का मिलन द्यावा –पृथ्वी का मिलन है .इस मिलन से दिव्य प्रजा जन्म लेगी,राज्य वृद्धि होगी,भूमि सुफलित सुजला होगी.संक्षेप में पूरी अवधारणा पार्थिव लौकिक न होकर अलौकिक –दिव्य है
रानी और अश्व का मिलन मन्त्रों पूरी तरह से यथार्थ परक होने पर भी प्रत्यक्ष कृति में वह सांकेतिक था.यानी घोड़े की इन्द्रिय का रानी को निकट स्पर्श किया जाता था.
अब प्रश्न यह है कि जो दिव्य है अलौकिक है वह “गाली”के रूप में कैसे परिवर्तित हो गया ?
कारण स्पष्ट है – वेद काल में जो यज्ञ विरोधी समाज था उनकी दृष्टि में अश्वमेध जैसे सभी यज्ञ विधि “चमत्कारिक” माने जाने स्वभाविक थे.उसके बाद भी वैदिक परम्परा से आहत और वैदिकों की दृष्टि में “पाखंडी” बना हुआ बड़ा समाज था उन्हें ये सारे क्रिया कलाप विचित्र लगाने स्वाभाविक थे.बौद्ध, जैन , चार्वाक पंथों ने खुले आम यज्ञ संस्था का उपहास किया.परन्तु जो सर्व साधारण समाज वैदिक मन्त्रों , आचारों से दूर या वंचित था, वह उससे दूर होता गया और उदासीन भी.उसे ये आचार सिर्फ गूढ़ ही नहीं विकृत भी लगना स्वाभाविक था. जिसे दिव्य समझा जाता था वह विरोधियों के लिए “गाली” बन गया.वेद विरोधियों ने उसे स्त्री और पशु के मिलन के रूप में देखा और गाली के तौर पर इसका उपयोग किया.भारत के “काम शिल्पों” में भी स्त्री और घोड़े का मिलन देखने को मिलता है.
यहाँ इतिहासाचार्य विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े के “भारतीय विवाह संस्थेचा इतिहास” का उल्लेख करना आवश्यक है.इस पुस्तक के चौथे प्रकरण “अग्नि और यज्ञ” में इतिहासाचार्य राजवाड़े ने यज्ञ के इतिहास और समाज शास्त्र का विवेचन किया है.इसी प्रकरण में उन्होंने अश्वमेध यज्ञ की प्रक्रिया में यजमान (राजा) की पत्नियों के विलाप का विस्तार से वर्णन किया है.यज्ञ भूमि पर ऋत्विज और राजा की पत्नियों के बीच का अनुष्ठानिक संवाद (विलाप) हमारी आधुनिक दृष्टि में वीभत्स कहा जाएगा.राजवाड़े जी के अनुसार उस समय भी समाज उसकी वीभत्सता से परिचित था परन्तु वह धार्मिक अनुष्ठान का अंग था.इसलिए यज्ञ कर्म में परंपरा के रूप में उसका निर्वाह होता था.
मराठी भाषा में “गाढ़वा चा नांगर फिरविणे” यह भी “गधेगाळ” ही है.इसी प्रकार “सोना चा नांगर” यह “गाढ़वा चा नांगर” के विपरीत है. “गाढ़वा चा नांगर” यह अधम पुरुष की इन्द्रिय है और स्वर्ण ( सोने) का नांगर यह उत्तम या दिव्य पुरुष की इन्द्रिय है.
संक्षेप में गालियों के उद्गम पर विचार करने पर वह हमें प्राचीन परम्पराओं की ओर भी ले जाती है.
संत साहित्य में भी जिसे अभद्र कहा जा सकता है ऐसे शब्दों का अभाव नहीं हैं.कुछ उदहारण प्रस्तुत हैं
१ भले तरी देऊ गांडीची लंगोटी
नाढाळाचे माथी हाणू काठी
२ तुका म्हणे शिंदळीच्या
व्यर्थ श्रमाविली वाचा
३ तुका म्हणे ऐसा नरा
मोजून मारव्या पैजारा
४ अभवत ब्राह्मण जळो त्याचे तोंड
काय त्याशी रांड प्रसवली
५ तुका म्हणे खीळापडो त्याच्या तोंडात
किती बोलो भांडा I वादकाशी
६ तुका झाला सांडा I विटाम्बिती पोरे रांडा II
४५२२ ……लाम्ब लोम्बताती अंड Iभरभरा वाजे गांड II७II
तुका म्हणे आतां तरी I स्मरा वेगीं हरी हरी II८II
४५२३ वृद्धपणीं न पुसे कोणी Iविटम्बणी देहाची II१II
नवद्वारें झाली मोकळीक I गांड सरली वाजती II२II
तुकारामा ची गाथा से कुछ और उदारहण प्रस्तुत है.
गाजराची पुंगी I तैसे नवे जाले जोगी II
काय करोनि पठन I केलि अहंता जतन II
अल्प असे ज्ञान I अंगी ताठा अभिमान II
तुका म्हणे **(लिंग के लिए प्रचलित शब्द) I त्याचे हाणोनि फोडा तोंड II २१६
गेली विरसरी I मग त्यासी रांड मारी II
मग न ये तैसी सत्ता I गेली मागील आणता
भंगलिया चित्ता I न ये काशाने संदिता II
तुका म्हणे धीर I भंगलिया पाठी कीर II २१७
घरी रांडा पोरे मरती उपासी ……… २१८
शिरीन मूसवी ने अपनी पुस्तक एपिसोड इन द लाईफ ऑफ अकबर में पृष्ठ १५ पर महम अंगा के बेटे आधम खान को उसकी हत्या के पूर्व अकबर महान द्वारा “गांडू” कहने का उल्लेख किया है.
राजेंद्र शंकर भट्ट की पुस्तक “मेवाड़ के राणा और शाहंशाह अकबर” में पृष्ठ संख्या १६५ पर दलपत विलास के हवाले अकबर द्वारा हरामजादे शब्द के प्रयोग करने का उल्लेख किया है.
प्राचीन भारत की काव्य परंपरा में ऐसी बहुत सी रचनाएँ हैं जिसे हमारा समाज “अश्लील” कह खारिज कर सकता है. मिथुन शिल्पों से हमारे प्राचीन मंदिर सजे हुए हैं.हमारा प्राचीन काव्य “श्रृंगार” से संपन्न है.
प्राचीन भारत की काव्य परंपरा भी देवी देवताओं को अपने काव्य का नायक अथवा नायिका बनाने और उनके श्रृंगार का वर्णन करने में नहीं हिचकिचाती.
महाकवि कालिदास के कुमार संभव की पृष्ठभूमि शिव पुराण से है ऐसा प्रतीत होता है.वाल्मीकि रामायण में भी देवताओं का शिव पार्वती को सुरत क्रीडा से निवृत्त करने तथा उमा देवी का देवताओं और पृथ्वी को शाप देने की कथा है( श्रीमद वाल्मीकि रामायण, गीता प्रेस, पृष्ठ १३६ )
कालिदास कुमार संभव के आठवें और नौवें सर्ग में जिस प्रकार से शिव पार्वती के रमण का वर्णन करते हैं वह काव्यात्मकता , रसात्मकता , रचनात्मकता का श्रेष्ठ उदहारण है या काव्य की अश्लीलता ?
महाकवि ने अपने काव्य में पार्वती और शिव को मानुषी व्यवहार करते दिखाया है.
कुमार संभवं के आठवें सर्व से कुछ उदहारण देखिये.
“विवाह हो जाने पर पार्वती मन से तो यही चाहती थीं कि शिव से दूर न रहूँ पर साथ ही कुछ झिझक भी बनी हुई थी.महादेव तो उनके प्रेम और झिझक से भरे सुन्दर शरीर को देख देख कर उन पर लट्टू हुए जा रहे थे” ( सर्ग ८.१ )
“जब शंकर अपने हाथ उनकी नाभि की ओर बढ़ाते तब पार्वती कांपती हुई उनका हाथ थाम लेती , पर न जाने कैसे उनकी साड़ी (दुकूल ) की गाँठ ढीली पड़कर अपने आप खुल जाती” (कुमार संभवं – ८.४ )
“जब कभी अकेले में शिव उनके कपडे खींचकर उन्हें उघाड़ देते तो वे अपनी दोंनों हथेलियों से शिव के दोंनों नेत्र बंद कर लेती जिससे वे देख न पावें पर शिव भी ऐसे गुरु थे कि झट अपना तीसरा नेत्र खोलकर देखने लगते और वे हार मानकर बैठ जाती” ( ८.७ )
“महादेव जव उन्हें चूमना चाहते थे तो वे अपना ओठ (होंठ) ही न बढाती और जब वे उन्हें कसकर छाती से लगाना चाहते तो वे अपने हाथ तक न उठाती.इस प्रकार बाधाओं के साथ अधूरा रस पाकर भी शिव ने वधू के साथ जो सम्भोग किया उसमें उन्हें आनंद ही मिला” ( ८.८ )
“धीरे धीरे पार्वती की झिझक भी मिटने लगी और इसलिए जब कभी महादेव उन्हें चूमते समय काटते नहीं थे,चूमते हुए घाव नहीं करते थे और बहुत धीरे धीरे सम्भोग करते थे तो ये आनाकानी नहीं करती थीं.पर जहाँ वे इससे आगे बढ़ते कि वे घबरा उठतीं” ( ८.९ )
“कुछ दिनों तक तो महादेव ज्यों त्यों करके पार्वती से सम्भोग करते रहे पर धीरे धीरे जब पार्वती को भी सम्भोग का रस मिलने लगा तब उनकी झिझक धीरे धीरे जाती रही” ( ८.१३ )
“पार्वती ने शंकर से अकेले में जो काम कला की शिक्षा ली थी उस कला के अनुसार उन्होंने महादेव के साथ नयी नवेलियों की चटक मटक भरा जो सम्भोग किया वही मानो कला सीखने की गुरु दक्षिणा थी” ( ८.१७ )
क्या यह महाकवि की कल्पना थी या जीवन का यथार्थ जो उन्होंने अपने काव्य कुमार संभवं में अभिव्यक्त किया और उसके नायक नायिका बने शिव और पार्वती.क्या कोई कवि या रचनाकार इसे संस्कृति विरोधी या शिव और पार्वती की अवमानना कह सकता है.आगे महाकवि कालिदास लिखते हैं
“पवन के वेग से चलने वाले उस बैल पर चढ़कर और आगे पार्वती का स्तन पकड़े हुए बैठकर वे मेरु पर्वत पर जा पहुंचे और वहाँ सुनहरे पत्तों से बिछी हुई शय्या पर उन्होंने एक रात सम्भोग किया” (८.२२ )
“दोंनों एक दूसरे को हराने पर तुले हुए थे,इसलिए उमा और शंकर ने ऐसा सम्भोग किया कि दोंनों के केश छितरा गए ,चन्दन पुंछ गया ,नख चिन्ह भी इधर के उधर हो गए और पार्वती की करधनी भी टूट गयी फिर भी पार्वती के साथ सम्भोग शंकर का जी नहीं भरा” (८.८३ )
“वायु के झोंके से कपड़ा हट जाने से पार्वती की नंगी जांघों पर जो नखों के चिन्ह की पाँत दिखाई दे रही थी उसे एकटक होकर शिव देखते जा रहे थे और जब अपने उघडे हुए कपड़ों को पार्वती ठीक करने चली तब शिव ने झट उनका हाथ थाम लिया” ( ८.८७)
“भगवान शंकर ने बराबर दिन रात पार्वती के साथ सम्भोग करते हुए सैकड़ों वर्ष ऐसे बीता दिये मानो केवल एक ही रात बीती हो.पर भगवान शंकर का जी इतने सम्भोग से भी उसी प्रकार नहीं भरा जैसे समुद्र के जल में रहने पर भी बडवानल की प्यास कभी नहीं बुझती” ( ८.९१)
आठवें सर्ग के अंत में उल्लेख है कि “महाकवि श्रीकलिदास के रचे हुए कुमार संभव महाकाव्य में शंकर –पार्वती की काम –क्रीडा वर्णन नाम का आठवां सर्ग पूर्ण हुआ.
किसी भी मन में स्वाभाविक प्रश्न उठ सकता है कि क्या महाकवि कालिदास नहीं जानते थे कि महादेव परब्रह्म है. ईश्वर हैं, भगवान हैं ? फिर भी वे वहाँ पहुँच गए जहाँ महादेव की आज्ञा के बिना सूर्य भी नहीं पहुँच सकता था.
मेरी दृष्टि में यह यह भारतीय संस्कृति का खुलापन था कि उसने महाकवि की इस कल्पनाशीलता का भी सम्मान किया.
मेरे सामने सवाल है कि क्यों किया होगा ऐसा महाकवि ने ?
क्या इसलिए कि महाकवि जीव और ब्रह्म के एक्य से परिचित थे.इसलिए की उनका जीव और ब्रह्म की अभिन्नता में विश्वास था इसलिए जब एक कवि को परमब्रह्म,सकल ब्रह्माण्ड में व्याप्त शिव की लीला ( मनुष्यों जैसी ) का वर्णन करते हैं तो मानवीय संकोच को अपने काव्य रचना में बाधा नहीं बनने देते.
कवि के लिए ब्रह्म भी जीव जैसा ही व्यवहार करता है –उसके रचना संसार में.इसलिए महाकवि कालिदास कुमार संभव की रचना कर सकते हैं.
महाकवि कालिदास इस परंपरा के एक मात्र उदहारण नहीं है.प्राचीन भारतीय काव्य में ऐसे कालजयी कवि हुए जिन्होंने अपनी रचानाओं में “पुरुष और प्रकृति” “पुरुष और शक्ति” को अपने श्रृंगार काव्य का भी बेझिझक हिस्सा बनाया.
भगवान श्री हरि विष्णु और देवी लक्ष्मी को लेकर भी ऐसी कई रचनाएँ हैं.
अतिविपुलं कुचयुगलं रहसि करैरामृशन्मुहुर्लक्ष्म्याः।
तदपहृतं निजहृदयं जयति हरिर्मृगयमाण इव।।५।। (सुभाषित रत्न भण्डागारम्)
अर्थात जिन्होंने एकांत में लक्ष्मी के विशाल स्तन अपने हाथों से बार बार मले (रगडे ) हरि यानी सिंह जिस प्रकार से प्राणियों का शिकार करता है उसी प्रकार जो प्रत्येक के हृदय का हरण करता है उसका जयजयकार हो
Let He be victorious, who repeatedly rubbed the huge breasts of Goddess Laxmi in privacy, like lion who pursues the hearts of every one.
कृष्ण और राधा को लेकर जयदेव के गीत गोविन्द से कौन अपरिचित है ?
शांत , दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुरा भक्ति के पाँच प्रकार कहे हैं.मधुरा भक्ति के उदहारण की गीत गोविन्द श्रेष्ठ रचना मानी जाती है.मधुरा भक्ति में भक्त और ईश्वर प्रेमी प्रेमिका या पति पत्नी के रूप में व्यवहार करते हैं (सम्भोग तक) और साख्य में मित्रवत.
गीत गोविन्द से एक उदहारण देखिये.
श्रितकमलाकुच-मण्डल धृतकुण्डल ए I
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे IIध्रुव पदII १II
अपने कोमल हाथों से लक्ष्मी के कठोर स्तनों का मर्दन करने वाले ! कानों में स्वर्णमंडित एवं दैदीप्यमान कुण्डलों को धारण करने वाले !अपने कंठ में सुन्धित पुष्पों की मनोरम माला को पहनकर उससे विभूषित होने वाले हे श्री कृष्ण ! आपकी जय हो ! मैं आपको पुनः पुनः प्रणाम करता हूँ.
भारतीय मानस या हिंदू मानस की उदात्तता का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है कि पुराणों में ब्रह्माण्ड के रचयिता ब्रह्मा को प्रताड़ित भी किया है.परमब्रह्म की मानवीय लीला (दुर्बलताओं) को भी पुराणों ने स्मृतियों में जीवित रखा.
इसी सन्दर्भ में शिव पुराण में सती और शिव के विवाह के अवसर पर सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा पर शिव द्वारा क्रोधित होने का प्रसंग है.ब्रह्मा की दृष्टि पतित होने पर ब्रह्मा को मारने के लिए उठे शिव ब्रह्मा को “पापात्मा” कह कर संबोधित करते हैं और उनकी निंदा कर उन्हें अपराधी कहते हैं.( सन्दर्भ ग्रन्थ – श्री शिव महापुराण भाषा, पृष्ठ संख्या १६९,१७०,१७१ , संपादक –पंडित श्री राम लग्न शुक्ल “विशारद”, प्रकाशन वर्ष २००८ , प्रकाशक –श्री ठाकुर प्रसाद पुस्तक भण्डार,कचौड़ी गली, वाराणसी,उत्तर प्रदेश २२१००१ )
शिव पुराण के रचनाकार ने सृष्टि के रचयिता की मानवीय दुर्बलता का वर्णन करने में संकोच नहीं किया.
क्या इस प्रसंग के सन्दर्भ में शिव द्वारा ब्रह्मा को “पापात्मा” कहना “गाली” कहा जा सकता है ?
इतना ही नहीं इस प्रसंग में विष्णु द्वारा शिव को समझाए जाने पर कि वे तीनों –ब्रह्मा , विष्णु ,महेश अभिन्न है तब क्रोध के वश शिव ने ब्रह्मा को अपने से भिन्न कहा.
गीता प्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित संक्षिप्त शिवपुराण में उक्त घटना पढने को नहीं मिलती परन्तु पंडित राम शास्त्री द्वारा सम्पादित श्री शिव पुराण (चुन्नू पॉकेट बुक्स ,मेरठ ) में शिव सती विवाह के उत्सव पर ब्रह्मा की दृष्टि के पतित होने का उल्लेख है.
एक ही घटना को विद्वानों से अलग अलग तरह से प्रस्तुत किया है.
पौराणिक कथाओं में देवताओं के पतन की अनेक कहानियां पढने को मिलती हैं पर भारतीय समाज ने उसे कभी देवताओं का अपमान नहीं माना बल्कि यह भारतीय या हिंदू समाज की विशिष्टता है कि वह देवताओं की लीला अथवा मानवीय दुर्बलता को भी स्वीकार करता है.कारण साफ़ है यह समाज को चेतावनी है कि देवताओं का भी पतन हो सकता है तो मनुष्यों की तो औकात ही क्या.पतन की उन कहानियों में नैतिकता का सन्देश छिपा है.
राम चरित मानस और दूसरे उदाहरणों से एक बात स्पष्ट है कि भारत की लोक परंपरा में देवों को भी गालियाँ दी जा सकती है और देवता उसका आनंद भी लेते हैं.शिव विवाह पर गालियाँ पाना देवताओं ने अपमान नहीं माना.प्रभु श्री राम के विवाह पर भी बारातियों ने गालियों का आनंद लिया.
महान चित्रकार राजा रवि वर्मा भारत के पहले चित्रकार थे जिन्होंने देवी देवताओं के चेहरे को आकार दिया.उनसे पहले देवी देवता या तो शिल्पों में थे या मिनियेचर पेंटिंग में. स्त्रियों और देवांगनाओं के अर्ध नग्न चित्रों पर विवाद हुआ. राजा रवि वर्मा ने जब सुगंधा बाई को प्रतिदर्श (Model) बनाकर देवी देवातओं के चित्र बनाये तो समाज ने उनका विरोध किया.उन पर अश्लीलता , सामाजिक नैतिकता ( मर्यादा ) का उल्लंघन, लोगों की धार्मिक और सांस्कृतिक भावनाओं को आहत करने के आरोप लगे.अदालत में राजा रवि वर्मा पर मुक़दमा हुआ.राज रवि वर्मा मुक़दमा जीते पर सुगंधा बाई ने आत्महत्या की.
वैदिक साहित्य में , उपनिषदों में , महाकाव्यों में , पुराणों में ऐसी कई अलौकिक घटनाएँ हैं जिन पर फिल्म अथवा नाटक बनाये जाये तो हमारी सांसारिक दृष्टि से समाज या तो उसे अश्लील, अतार्किक ,असामाजिक कहेगा या संस्कृति विरोधी और उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बताएगा.
शिव पुराण में एक प्रसंग है ( संक्षिप्त शिव पुराण , गीता प्रेस , पृष्ठ संख्या ४२ ) जहाँ ऋषिगण सूत जी से शिव लिंग की उपासना के सन्दर्भ में प्रश्न करते है.
ऋषियों ने पूछा – “मूर्ति में ही सर्वत्र देवताओं की पूजा होती है (लिंग में नहीं) परन्तु भगवान शिव की पूजा सब जगह मूर्ति और लिंग में भी क्यों की जाती है ?
सूतजी ने कहा –“मुनीश्वरों ! तुम्हारा यह प्रश्न तो बड़ा ही पवित्र और अत्यंत अदभुत है.इस विषय में महादेवजी ही वक्ता हो सकते हैं.दूसरा कोई पुरुष कभी और कहीं भी इसका प्रतिपादन नहीं कर सकता”
इसी अध्याय में आगे चलकर सनत्कुमार भी इसी से मिलता जुलता प्रश्न नंदिकेश्वर से करते हैं.
सनत्कुमार बोले – “भगवन ! शिव से भिन्न जो देवता हैं ,उन सब कि पूजा के लिए सर्वत्र प्रायः वेर (मूर्ति) –मात्र ही अधिक संख्या में देखा और सुना जाता है.केवल भगवान शिव की ही पूजा में लिंग और वेर दोंनों का उपयोग देखने में आता है.अतः कल्याणमय नंदिकेश्वर !इस विषय में जो तत्व की बात हो , उसे मुझे इस प्रकार बताईये जिससे अच्छी तरह समझ में आ जाये.
नंदिकेश्वर ने कहा –“निष्पाप ब्रह्मकुमार ! आपके इस प्रश्न का हम जैसे लोगों के द्वारा कोई उत्तर नहीं दिया जा सकता,क्यों कि यह गोपनीय विषय है और लिंग साक्षात् ब्रह्म का प्रतीक है तथापि आप शिवभक्त हैं.इसलिए इस विषय में भगवान शिव ने जो कुछ बताया है,उसे ही मैं आपके समक्ष कहता हूँ.भगवान शिव ब्रह्मस्वरूप और निष्कल (निराकार) हैं, इसलिए उन्हीं की पूजा में निष्कल लिंग का उपयोग होता है.सम्पूर्ण वेदों का यही मत है.”
हम सभी फिल्म परदे पर देखते हैं.जब परदे पर आग लगती है तो हम आग बुझाने पानी लेकर नहीं दौड़ते.क्यों कि हम सत्य और मिथ्या का अंतर जानते हैं.
अँधेरे में हम रस्सी को सांप समझ बैठते हैं परन्तु रोशनी के होते ही हम रस्सी को रस्सी के रूप में पहचान लेते हैं
“गाली” भी कहीं रस्सी तो नहीं हो गयी जिसे हम सांप समझ रहे हैं ?
(ऋण निर्देश – राम चरित मानस (गीता प्रेस), जानकी मंगल, पार्वती मंगल, तुकरामा ची गाथा, विश्वनाथ काशीनाथ राजवाड़े, आर. सी. ढेरे, डॉ देवांगना देसाई, डॉ आर.नाथ,श्री अश्विनी दत्तात्रेय मराठे, डॉ आसावरी बापट, स्वाती चांदोरकर, शिरीन मूसवी, राजेंद्र शंकर भट्ट,डॉ गुरबक्श कन्हैया)