इट हैपंस इन इंडिया: जीवन की नश्वरता का खेल
– सच्चिदानंद जोशी
जब भी वाराणसी जाना होता है, फिर चाहे वो एक दिन के लिए ही क्यों न हो “सुबह ए बनारस” के लिए अस्सी घाट पर जाने का प्रयास जरूर होता। बनारस की सुबह तो वैसे ही मशहूर है , फिर संगीत का आनंद और कई सारे मित्रों से यूं ही मुलाकात । ये सब एक साथ एक ही जगह पर मिल जाता है। वहीं किसी चाय वाले भैया से गर्मागर्म चाय लेकर मित्रों से बनारस के ताज़ा हाल सुनिये और वापिस लौट जाइए अपने ठिए पर।
इस बार वाराणसी गए तो हर बार की तरह अस्सी घाट पर जाना हुआ। अपना तय शुदा कार्यक्रम पूरा करके निकलने को हुए तो हमारे सहयोगी अभिजीत जी ने प्रस्ताव रखा ” सर घाट घाट चलें दशाश्वमेध घाट तक । बहुत अच्छा लगेगा , अभी धूप भी ज्यादा नहीं है। घाट घाट जायेंगे तो करीब तीन किलोमीटर का फासला है। गाड़ी वहीं बुलवा लेते हैं। ”
जून का महीना था और सुबह के साढ़े छः बज चुके थे। सूरज की तपन महसूस होना शुरू हो गई थी लेकिन प्रस्ताव इतना आकर्षक था कि मना नहीं करते बना।
बनारस के घाटों पर जब पहले कुछ लिखा था तब घाट घाट घूमे थे शाम के समय। सुबह के समय हर घाट की अपनी अलग रंगत , अलग तासीर देखना उत्सुकता जगा रहा था। उस पर अभिजीत जी का साथ भी था , जिन्होंने वाराणसी को बहुत अच्छी तरह से आत्मसात कर लिया है और वे हर घाट के बारे में उनके अपने अनुभव सुनने को उत्सुक रहते हैं । वैसे ये जानना भी उपयोगी होगा कि वाराणसी में कुछ बहुत अच्छे कलाकार हैं जो आपको घाटों का हेरिटेज वॉक करवाते हैं और हर घाट की विशेषता और कहानी सुनाते हैं।
एक एक कुल्हड़ चाय और पीकर हमने हमारा घाट भ्रमण प्रारंभ किया। गंगा महल घाट , तुलसी घाट , निरंजनी घाट, चैत सिंह घाट , एक एक घाट का वर्णन सुनते और उसकी आभा देखते हरिश्चंद्र घाट कब पहुंच गए पता ही नहीं चला। जब सूरज के ताप के साथ साथ कुछ अतिरिक्त ताप महसूस होने लगा तब अहसास हुआ कि हरिश्चंद्र घाट आ गया है और आसपास जलते शव अपना ताप महसूस करवा रहे हैं।
अयोध्या के सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र के नाम से ये घाट जाना जाता है और कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र को अपना सब कुछ दान देने के बाद यहीं उन्होंने चाण्डाल के रूप में काम किया। बाद में उनके अपने पुत्र रोहिताश्व की मृत्यु होने पर जब उनकी पत्नी तारामती उसका शव लेकर दहन के लिए आयी थी तब भी उन्होंने चाण्डाल के रूप में अपना कर्तव्य निभाते हुए शव दाह के लिए कर मांगा था। ब्रह्मवैवर्त पुराण में इसका उल्लेख है। वाराणसी को महाश्मशान कहा जाता है और कहा जाता है कि यहां के हरिश्चंद्र घाट और मणिकर्णिका घाट पर चिताएं अनवरत जलती रहती हैं। मान्यता ये भी है कि यदि किसी समय चिताएं जलना बंद हो जाए तो वो अकाल का चिन्ह होता है। हरिश्चंद्र घाट को आदि मणिकर्णिका घाट भी कहा जाता है। श्मशान के आसपास से गुजरते मन थोड़ा भारी हो ही जाता है। जीवन की नश्वरता का अहसास होने लगता है।घाट से गुजरते हुए हमारे और अभिजीत जी के बीच संवाद कुछ क्षण के लिए थम गया और हम शायद अपने अपने स्तर पर उस घाट को देखते हुए अनुभव करने का प्रयास करने लगे। आस पास दो चार चिताएं , कुछ अभी हाल की और कुछ जरा पहले की जलती नज़र आ रही थीं । उनका ताप हमें झुलसा रहा था और सूरज की गर्मी भी परवान चढ़ रही थी।
ऐसे में हम कुछ कदम चले ही थे कि कोई सख्त चीज पैर से टकराई। मैं चौका। इससे पहले कि कुछ समझ पाता आवाज़ आयी ” अरे वाह गुड शॉट । चौका।” आवाज की दिशा में देखा तो एक दस बारह साल का लड़का दौड़ता आता दिखा। उसने मेरे पैर के पास पड़ी बाल उठाई और वापिस उस दिशा में फेंक दी जहां से वो आयी थी।
हमारी नज़रे उधर गई तो देखा श्मशान उन चबूतरों से जहां शव दाह किए जाते हैं, कुछ दूरी पर बाकायदा क्रिकेट मैच चल रहा था। दस से बीस साल की आयु के बच्चे खेल का आनंद ले रहे थे। स्टंप और अन्य सामग्री शव दाह के दौरान बची सामग्री में से उठा कर या आसपास अन्य फेंकी गई सामग्री को उपयोग में लाकर बनाई गई थी। उन्हें शायद इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था कि उनकी कवर बाउंड्री पर एक शव जल रहा था और दूसरा लांग ऑफ पर । उन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था कि जो कपड़ा उनके स्टार बॉलर ने हेड बैंड के रूप में लगाया था वो वही कहीं से उठाया गया था। बांस से अपने स्टंप बना कर अपना क्रिकेट खेल रहे थे। वो बच्चे अपने खेल में व्यस्त थे और उधर से गुजरने वाले लोग अपने अपने दैनंदिन काम में मशगूल थे। उनका स्टार बैट्समैन अपनी शानदार बल्लेबाजी से चौके छक्के लगा रहा था और उसकी टीम के सदस्य तालियां बजा कर , तरह तरह की आवाजें निकाल कर उसका उत्साह वर्धन कर रहे थे। इस बीच एक और शव यात्रा पीछे से आती दिखाई दे रही थी।
मैं थोड़ी देर तक भौंचक खड़ा वो सारा दृश्य देख रहा था। मुझे नहीं मालूम था कि क्या आने वाले शव की दहन प्रक्रिया तक इनका मैच रुकेगा या नहीं। मुझे नहीं पता था इनमें से कोई उस दहन प्रक्रिया में सहायक की भूमिका में भी हो सकता है। वह सारा दृश्य इतनी मिश्रित भावनाओं से भरा था कि मेरी जीवन के सत्य को समझने की कोशिश व्यर्थ होती दिखाई दे रही थी। मन इस बात को लेकर थोड़ा खिन्न था कि जो सत्य समझने में हमें कई कई साल लग जाते हैं, और इसके बावजूद भी हममें से कइयों को वो सत्य समझ में नहीं आता वह सत्य इन बच्चों ने कितनी आसानी से समझ लिया है। तभी तो उनके लिए ये महाश्मशान उनके लिए खेल का सहज मैदान बन पाया था। हम सब जीवन के जिस शाश्वत सत्य को जानते हुए भी उससे हमेशा दूर जाने की कोशिश में लगे रहते हैं उस सत्य को इन बच्चों ने कितनी सहजता से गले लगा लिया था।
शायद हम और काफी देर वहीं खड़े रह जाते ,अगर उस मैच अंपायर की आवाज न आती” अरे अंकल बाउंड्री से थोड़ा दूर खड़े हो जाइए नहीं तो बॉल लग जाएगी आपको। ”