हिंदी साहित्य के सूर्य मुंशी प्रेमचंद
31 जुलाई को भारतीय साहित्य के इतिहास में एक विशेष स्थान प्राप्त है। आज ही के दिन ‘उपन्यास सम्राट’ और ‘कहानी सम्राट’ प्रेमचंद की जयंती है। प्रेमचंद जी का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी (उत्तर प्रदेश) के पास स्थित लमही गाँव में हुआ था। उनका वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।
प्रेमचंद सिर्फ एक लेखक नहीं, बल्कि भारतीय समाज के उस दर्पण की तरह थे जिसने तत्कालीन समाज की विषमताओं, संघर्षों और मानवीय संवेदनाओं को पूरी ईमानदारी के साथ उजागर किया।
उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत ‘नवाब राय’ के नाम से उर्दू में की थी। उनका पहला कहानी संग्रह उर्दू में ‘सोज़े वतन’ जब ब्रिटिश हुकूमत द्वारा ज़ब्त कर लिया गया, तब वे नाम बदलकर ‘प्रेमचंद’ के नाम से हिंदी में लिखने लगे।
प्रेमचंद जी ने लगभग 300 से अधिक कहानियाँ, 15 से अधिक उपन्यास और कई निबंध लिखे। उनकी कहानियों का संग्रह ‘मानसरोवर’ (आठ भागों में) हिंदी साहित्य की अनमोल धरोहर है।
गोदान, गबन, सेवासदन, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि, प्रेमाश्रम आदि उपन्यास उन्होंने लिखे। ईदगाह, पूस की रात, बूढ़ी काकी, दो बैलों की कथा, कफन, पंच परमेश्वर, बड़े घर की बेटी, नमक का दारोगा आदि कहानियों ने भारतीय जनमानस में हमेशा के लिए अपना स्थान बना लिया। 1925 में प्रकाशित उपन्यास रंगभूमि की 5000 प्रतियां प्रकाशक ने छापी। यह उनकी लोकप्रियता बताता है। आज 100 साल बाद भी रंगभूमि की प्रासंगिकता बनी हुई है। रंहभूमि का सूरदास आज भी अपने संघर्ष की मशाल से राह दिखा रहा है।
‘प्रेमचंद का साहित्य यथार्थवाद और आम जन की आवाज़ है।’
प्रेमचंद की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने अपने साहित्य के केंद्र में ‘आम आदमी’ को रखा।
‘गोदान’ के ‘होरी’ के माध्यम से उन्होंने भारतीय किसान की लाचारी, कर्ज के बोझ और उसके जीवट को अमर कर दिया।
‘निर्मला’ में अनमेल विवाह और दहेज प्रथा की विभीषिका तो ‘सेवासदन’ में वेश्यावृत्ति और सामाजिक पाखंड पर करारा प्रहार किया गया। ये उपन्यास महिला विमर्श और सशक्तिकरण की शुरुआती आवाज़ बने।
‘ईदगाह’ का छोटा बालक ‘हामिद’ और उसकी दादी अमीना के प्रति प्रेम आज भी हर पाठक की आँखें नम कर देता है। बाल मनोविज्ञान को चित्रित करती यह कहानी बेजोड़ है।
प्रेमचंद का मानना था कि “साहित्यकार का काम केवल मनोरंजन करना नहीं, बल्कि समाज की चेतना को जगाना और सत्य के पथ पर ले जाना है।”
समय बदल गया है, तकनीक बदल गई है, लेकिन प्रेमचंद की रचनाओं में उठाए गए सवाल—गरीबी, सामाजिक असमानता, किसानों की समस्याएँ, और मानवीय मूल्यों का ह्रास—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं।
उन्होंने सिखाया कि साहित्य केवल कल्पना की उड़ान नहीं, बल्कि ज़मीन की सच्चाई का दस्तावेज़ होना चाहिए।
प्रेमचंद आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी कालजयी रचनाएँ और उनके द्वारा गढ़े गए पात्र (हामिद, होरी, घीसू, माधव, अलगु चौधरी आदि) अमर हैं। प्रेमचंद जयंती पर उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उनकी रचनाओं को पढ़ें, उनके विचारों को समझें और एक संवेदनशील समाज के निर्माण में अपना योगदान दें।
हिंदी साहित्य के सूर्य प्रेमचंद की जयंती पर उनका सादर स्मरण, उन्हें नमन।
-केशव भट्टड़