सनातन परंपरा प्रथम भाग
प्रस्तावना
आधुनिकता आज की नई पीढ़ी में सामाजिक-मरीचिका जैसी भ्रामकता बनती जा रही है। जबकि सनातन शदियों से, भारतीय धर्म-चिंतन की, सामाजिक समरसता की वास्तविक आधारशिला रही है। इस ज्ञानबोध का अनुभव होना, सामाजिक समरसता और मानवता को बचाने के लिए, आज सनातन राष्ट्रधर्म के रूप में अपरिहार्य हो चुका है।
मैं प्रौद्योगिकी संस्थान, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय का स्वर्ण पदक प्राप्त इंजीनियर के रूप में अपने ,लगभग 40 वर्ष के कार्य-अनुभव के आधार पर यह विचार ब्यक्त कर रहा हूं। मैंने अपने इंजीनियरिंग अनुभव को भी अपनी पुस्तक “Refractory for Steel Making Vessels ” में लिखा है जिसका, Deptt of Ceramic Engg., IIT,BHU में 22 सितंबर’25 में लोकार्पण और 23 सितंबर 2025 को काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अजीत चतुर्वेदी जी द्वारा भी उनके कार्यालय में अवलोकन किया गया ।
मेरी मान्यता है, आज का विज्ञान, हमारे ऋषि मुनियों के चिंतन-अनुसंधान का एक भौतिकवादी विस्तार मात्र है।जो अंतरसामाजिकता, अंतरराष्ट्रीयता की प्रगति और सनातन की उद्दात्त भावना के प्रतिकूल बढ़ती जा रही है। यद्यपि अब, मन की शांति और पवित्रता के लिए, पाश्चात्य संस्कृति के अनुयायियों का भी क्रमशः सनातन धर्म के प्रति झुकाव बढ़ रहा है। यह एक सुखद प्रगति है। किंतु दुर्भाग्यवश, हमारी नयी वर्तमान पीढ़ी अपनी विरासत की गरिमा को भूलती जा रही हैं । इस धरा के पावन अंश आर्यावर्त भारत-भूमि, जो स्वर्ग और मोक्ष की कर्मभूमि रही है, जहां जन्म लेने के लिए मनुष्य ही नहीं, देवगण भी लालायित रहते हैं-
गायन्ति देवाः किल गीतकानि,धन्यास्तु ते भारतभूमिभागे।
स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते, भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात्।।-विष्णुपुराण(2.3.24)
किंतु आज इस धरा एवं संस्कृति के प्रति गर्व में प्रगतिशीलता वास्तविकता से दूर जा रही है। पुस्तक इस गरिमामय भावना को पुन: जागृत और बचाए रखने में का एक छोटा प्रयास है।
मैं अपने को सौभाग्यशाली मानता हूं कि मैं उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण सनातन परिवार और परिवेश में पैदा हुआ और वतौर एक इंजीनियर , भारतीय इस्पात (Steel Authority of India Limited ) के बोकारो ,भिलाई और एस.आर.यू .के भिलाई प्लांट में युनिट हेड तथा डालमिया भारत रिफ्रेक्टरी के माध्यम से संपूर्ण भारत के अनेक इस्पात संयंत्रों में कार्य और सेवा से विबिध अनुभव प्राप्त किया है। विदेशों में भी कई बार आना-जाना हुआ, किंतु इन सभी देशों में
मुझे अपने देशधर्म की समता, “वसुधैव कुटुम्बकम्” और “सर्वे भवन्तु सुखिन:” की भावना कहीं भी नहीं दिखी। अपितु यथार्थ में इसके विपरीत ही अनुभव रहा। यहीं से मन में एक भावना जागृत हुई कि मुझे भी अपनी संस्कृति के संरक्षण में योगदान देना उचित होगा। कारण, आज की पीढ़ी में सनातन के प्रति रुचि में लगातार कमी का अनुभव। इसी उद्देश्य से मैंने लगभग चार वर्ष के प्रयास से “ज्ञान- बोधिका” नामक पुस्तक संकलित किया है। अपनी वेद परंपरा जैसे “मुखौ श्रुतौ हस्तौ च ” अर्थात यथा संभव, कथा वाचकों को सुनकर (श्रुति ज्ञान), यथासंभव अपने ग्रंथों का अध्ययन कर, “ज्ञान बोधिका ” को तैयार किया है।
पुस्तक के माध्यम से मेरा उद्देश्य है कि यह अधिक से अधिक नयी पीढ़ी तक पहुंचे और उनमें सनातन ज्ञान बोध का बीज़ को अंकुरित कर सके। पुस्तक के संकलन में, “ऊं” अनादि ध्वनि, वेद, सनातन के ईश्वरीय अवतारों, विद्यार्थी जीवन, नीति श्र्लोक, सप्तपुरियां, नव रात्रि, शनि ग्रह और नवग्रह, ग्रहण-शूतक, भारत के विश्व गुरु होने के धर्म ग्रंथों में वर्णित नौ प्रमाण, कुछ धार्मिक अनुष्ठान वर्णन, गृहस्थ जीवन , यज्ञ, पूजन, व्रत और इक्कीसवीं सदी के सर्वोत्तम सनातन के कार्य जैसे महाकुंभ प्रयागराज 2025 की उदाहरणीय सफल आयोजन, श्रीराम मंदिर का पुनः स्थापना इत्यादि का संक्षिप्त वर्णन किया गया है। ताकि सामाजिक सौहार्द बना रहे और भारतीयो में भारतीयता जाग्रित हो सके।
पुस्तक में (यदि किसी को अपूर्णता लगे तो वह अन्य संदर्भ से प्राप्त कर सकते हैं।) अपूर्णता की संभावना हो सकती है। पाठक अपनी रुचि के अनुसार विषय-विशेष पर और संदर्भ पढ़ सकते हैं। यही मेरा प्रयास भी है की पाठकों में सनातन-संस्कृति के प्रति रुचि उत्पन्न की जा सके। विशेषतः भावी पीढ़ी में। मैं अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि, परिवेश और सनातन की विज्ञता में अपूर्णता को अपने उद्देश्य में बाधक नहीं स्वीकार कर सकता। सनातन की प्रेरणा भी कहती है –
मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना ,कुण्डे कुण्डे नवं पयः।जातौ जातौ नवाचारा:, नवा वाणी मुखे मुखे॥-वायु पुराण । गीता-ज्ञान भी कहता है- कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते ङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ -श्रीमद्भगवद्गीता 2.47.
अतः सभी पाठकों से क्षमा-अनुरोध है कि इस प्रयास को सनातन धर्म का प्रसार मात्र समझें और इस उद्देश्य पूर्ति में यथासंभव अपना सहयोग कर इस ज्ञानयज्ञ में भाग लें ।
विंध्य बासिनी चौबे (जयसुख)