मंथरा की दृष्टि में राम…
(एक काव्य-मंथन मेरी लेखनी की मथनी से)
कैकेयी के कक्ष में बैठी, मंथरा की क्रूर कहानी,
उसकी संशय भरी नजर ने, पढ़ी राम की कल्याणी।
वह तो बैठी थी महल में, विष के बीज बोने को,
पर राम की छवि ने चाहा, सारे जग को धोने को।
मंथरा की कुटिल नजर में, राम न कोई नायक थे,
वह समझी ये मर्यादाएं, उसके पथ की बाधक थे।
वह तो हर मुस्कान को उनकी, षड्यंत्र समझती आई,
उसके मन की अंधियारी में, राम से बड़ी तबाही छाई।
कहती थी वो रानी से ‘यह मोहिनी मूरत कैसी?
जो दिखता है चंदन जैसा, भीतर से है मूरत वैसी!’
उसकी टेढ़ी आँखों को, सीधा राम न भाता था,
हर आचरण अयोध्या का, उसको शूल चुभाता था।
त्याग देखकर राम का उसने, स्वार्थ का चश्मा पहना,
उसके छल-छिद्रों ने चाहा, राम का हर यश दहना।
पर मंथरा जान न पाई, राम थे ऐसी जल धारा,
जिसने जन-जन के जीवन का,तिमिर-मोह सब हरा।
दृष्टि उसकी थी उलझन की, राम थे सहज समंदर,
वह तो आग जलाती आई, राम बसे थे अंदर।
कौशल्या का जाया होकर, सबको गले लगाता था,
मंथरा के मन के उस कोने में, केवल भय छा जाता था।
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__::::::डॉ मंजु सैनी:::::__
गाजियाबाद