August 23, 2026

रुपहले परदे का रौशन राजकुमार – किशोर साहू

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पंकज शुक्ला
क्या आपको उस फ़िल्म के निर्देशक का नाम याद है, जिसमें मीना कुमारी और राज कुमार की जोड़ी थी? वही फ़िल्म, जिसमें शैलेंद्र के लिखे गीत “अजीब दास्ताँ है ये” को लता मंगेशकर की आवाज़ ने अमर कर दिया और जिसका संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था। फ़िल्म का नाम, ‘दिल अपना और प्रीत पराई’। अब बिना गूगल किए बताइए, इसके निर्देशक कौन थे?

अब दूसरा सवाल..! क्या आपको उस फ़िल्म का नाम और निर्देशक याद है, जिसमें दिलीप कुमार और कामिनी कौशल थे और जिसने हिंदी सिनेमा के पर्दे पर छत्तीसगढ़ के गाँव, नदी, खेत-खलिहान, ग्रामीण जीवन और वहाँ के लोक नृत्य व संगीत को उस दौर में जगह दी, जब फ़िल्मों का बड़ा हिस्सा स्टूडियो की चारदीवारी में रचा जाता था?

ये फ़िल्म थी ‘नदिया के पार’ और निर्देशक फिर वही, किशोर साहू! आज का ‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ इन्हीं किशोर साहू और उनके सिनेमा को समर्पित है।

किशोर साहू उस पीढ़ी के फ़िल्मकार थे, जब अभिनेता, लेखक, निर्देशक और निर्माता के बीच की सीमाएँ अलग-अलग नहीं थीं। किशोर साहू की विशेषता यह थी कि उन्होंने इन भूमिकाओं को अपनी रचनात्मक महत्वाकांक्षा के साथ अपनाया।

22 नवंबर 1915 को राजनांदगाँव (अब छत्तीसगढ़ में) में जन्मे किशोर साहू का बचपन मध्य भारत की रियासती और प्रशासनिक संरचना के बीच खिला। परिवार शिक्षित और प्रभावशाली था। पिता कन्हैयालाल साहू राजनांदगाँव के राजा के प्रधानमंत्री थे। लेकिन, किशोर साहू की अपनी दुनिया किताबों के साथ-साथ रंगमंच में बन रही थी। नागपुर में पढ़ाई के दौरान उनका झुकाव नाटक लिखने और अभिनय करने की ओर हुआ। यानी कि जब वह बंबई (अब मुंबई) पहुँचे तो उनके भीतर अभिनेता बनने की इच्छा के साथ कहानी कहने की बेचैनी भी पहले से मौजूद थी।

1937 में बतौर अभिनेता उनका डेब्यू बॉम्बे टॉकीज़ की फ़िल्म ‘जीवन प्रभात’ से हुआ, जिसमें उनके सामने थीं देविका रानी। बॉम्बे टॉकीज़ उस समय सिर्फ़ एक फ़िल्म स्टूडियो नहीं था, बल्कि भारतीय फ़िल्म निर्माण की एक व्यवस्थित संस्था थी। हिमांशु राय और देविका रानी के नेतृत्व में यहाँ अभिनय से लेकर तकनीक तक काम करने की एक पेशेवर व्यवस्था विकसित हो रही थी। किशोर साहू जैसे पढ़े-लिखे और रंगमंच से आए युवक के लिए यह सिनेमा की एक बड़ी पाठशाला थी।

लेकिन अभिनेता बन जाना उन्हें पर्याप्त नहीं लगा। यह किशोर साहू के स्वभाव की शायद सबसे महत्वपूर्ण विशेषता थी कि उन्हें पर्दे पर दिखाई देने से अधिक पर्दे पर क्या दिखाई देगा, इसकी चिंता थी।

उन्होंने निर्माण की दिशा में कदम बढ़ाया। ‘बहूरानी’ जैसी फ़िल्मों में अभिनय के साथ निर्माण से जुड़े और फिर 1942 में ‘कुँवारा बाप’ का निर्देशन किया। कहानी और अभिनय से लेकर निर्देशन तक कई स्तरों पर उनकी भागीदारी थी। इसके बाद ‘राजा’ और ‘वीर कुणाल’ जैसी फ़िल्मों ने उनके निर्देशक वाले रूप को और स्पष्ट किया।

आज का ‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ लिखन से पहले जब मैंने किशोर साहू के बारे में इधर-उधर खंगाला तो मुझे बाबूराव पटेल की उनकी अपनी फ़िल्म पत्रिका ‘फ़िल्मइंडिया’ की तमाम समकालीन तमाम टिप्पणियाँ मिलीं, जिनमें किशोर साहू के निर्देशन की बहुत प्रशंसा की गई है।

किशोर साहू के सफ़र का असली सिनेमाई मोड़ आता है ‘नदिया के पार’ में।

1948 की यह फ़िल्म दिलीप कुमार और कामिनी कौशल को लेकर बनी थी। लेकिन इसे केवल एक प्रेम-कहानी या दिलीप कुमार की शुरुआती फ़िल्मों में से एक मानकर आगे बढ़ जाना इसके महत्व को छोटा करना होगा। किशोर साहू ने कहानी और निर्देशन के स्तर पर जिस दुनिया को पर्दे पर रखा, उसमें नदी, गाँव, नाव, खेत, लोकजीवन और ग्रामीण रिश्ते कहानी के बाहर की चीज़ें नहीं थे। वे कहानी के भीतर थे। छत्तीसगढ़ का लोक संगीत और लोक नृत्य इस फ़िल्म में निखर कर पर्दे पर आया।

यह बात उस समय ख़ास तौर पर महत्वपूर्ण थी जब हिंदी फ़िल्म निर्माण अभी भी स्टूडियो व्यवस्था पर बहुत निर्भर था। गाँव की कहानी को स्टूडियो में सेट लगाकर दोबारा बनाया जा सकता था, लेकिन गाँव की अपनी भौगोलिक लय को पर्दे पर पकड़ना अलग चुनौती थी। ‘नदिया के पार’ में ग्रामीण भारत केवल सजावट नहीं बनता। पात्र जिस सामाजिक और भौगोलिक दुनिया में रहते हैं, वही उनके रिश्तों और व्यवहार को आकार देती है।

इसे हिंदी सिनेमा में ग्रामीण भारत का पहला चित्रण कहना इतिहास को अनावश्यक रूप से सरल करना होगा। इससे पहले भी गाँव और ग्रामीण जीवन फ़िल्मों में मौजूद थे। लेकिन ‘नदिया के पार’ को उस शुरुआती दौर की महत्वपूर्ण फ़िल्मों में रखना उचित है, जहाँ ग्रामीण संसार को केवल कहानी की पृष्ठभूमि न मानकर फ़िल्म के जीवित वातावरण की तरह देखा गया।

और, यह बात किशोर साहू के अपने जीवन से भी जुड़ती है। राजनांदगाँव में जन्मा यह फ़िल्मकार बंबई की स्टूडियो संस्कृति में आया था, लेकिन उसके भीतर भारत केवल महानगर नहीं था। शायद इसी कारण उसके कैमरे को बार-बार अलग-अलग भूगोल अपनी ओर खींचते रहे।

1949 में ‘सावन आया रे’ आई और इस बार कहानी का वातावरण नैनीताल की पहाड़ियों से जुड़ा था। पहाड़, बारिश और मौसम फ़िल्म के संसार का हिस्सा बने। आज के उत्तराखंड से किशोर साहू का एक निजी रिश्ता भी था। उनकी दूसरी पत्नी प्रीति पांडे कुमाऊँनी ब्राह्मण परिवार से थीं। इसलिए राजनांदगाँव में जन्मे इस फ़िल्मकार की निजी और सिनेमाई यात्रा में कुमाऊँ का एक सुंदर धागा दिखाई देता है।

ये उन दिनों का बात है, जब किशोर साहू का कैमरा केवल भारत के अलग-अलग हिस्सों में घूमना नहीं चाहता था। उसकी नज़र अब भारत से बाहर भी उठ रही थी।

‘हैमलेट’ के ज़रिए उन्होंने शेक्सपियर को हिंदी फ़िल्म के संसार में लाने की महत्वाकांक्षी कोशिश की। 1954 में ‘मयूरपंख’ ने इस महत्वाकांक्षा को एक और आयाम दिया। फ़िल्म का आधिकारिक चयन 1954 के कान फ़िल्म समारोह के प्रतियोगिता खंड में हुआ था। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है कि किशोर साहू की अंतरराष्ट्रीय आकांक्षा अचानक पैदा नहीं हुई थी। उनके पहले के काम में भी विदेशों तक पहुँचने की इच्छा दिखाई देती है।

एक तरफ़ ‘नदिया के पार’ का गाँव और नदी, दूसरी तरफ़ ‘सावन आया रे’ का नैनीताल, फिर ‘हैमलेट’ का शेक्सपियर और ‘मयूरपंख’ का अंतरराष्ट्रीय मंच; किशोर साहू की यात्रा किसी एक साँचे में बंद होने से लगातार इनकार करती रही।

और फिर आई फ़िल्म ‘दिल अपना और प्रीत पराई’। साल 1960 में रिलीज़ हुई इस फ़िल्म ने किशोर साहू को एक बिल्कुल अलग तरह के लोकप्रिय सिनेमा के बीच खड़ा किया। मीना कुमारी, राज कुमार और नादिरा के बीच बुनी प्रेम, विवाह, सामाजिक मर्यादा और त्याग की कहानी में शंकर-जयकिशन का संगीत था, शैलेंद्र और हसरत जयपुरी के गीत थे और लता मंगेशकर की आवाज़ में “अजीब दास्ताँ है ये” जैसा गीत, जो फ़िल्म से बाहर निकलकर अपनी स्वतंत्र ज़िंदगी जीने लगा। दूरदर्शन पर जब बहुत बाद में चित्रहार नामक कार्यक्रम शुरू हुआ तो उसमें ये सबसे ज़्यादा दिखाया जाने वाला गीत भी बना।

किशोर साहू के लिए यह उस सिनेमा से अलग नहीं था जिसे उन्होंने पहले बनाया था, बल्कि उनके लंबे सफ़र का एक और पड़ाव था। ‘नदिया के पार’ में उन्होंने बाहरी संसार को कहानी का हिस्सा बनाया था; यहाँ वह पात्रों के भीतर के संसार पर ज़्यादा ध्यान दे रहे थे। मीना कुमारी के चेहरे पर ठहरता कैमरा, राज कुमार की नियंत्रित उपस्थिति और नादिरा की अलग सामाजिक ऊर्जा मिलकर उस भावनात्मक त्रिकोण को बनाती है, जिसमें प्रेम केवल निजी इच्छा नहीं रह जाता, वह सामाजिक व्यवस्था से टकराता है।

‘दिल अपना और प्रीत पराई’ के बाद किशोर साहू की एक और यात्रा शुरू होती है, हीरो से चरित्र अभिनेता तक की। यह बदलाव उनके लिए शायद इसलिए भी स्वाभाविक था कि उनका चेहरा और व्यक्तित्व पारंपरिक रोमांटिक नायक की सीमाओं से कहीं अधिक उपयोगी था। उम्र के साथ उनकी आवाज़ में अधिकार आया, चेहरे पर अनुभव दिखाई देने लगा और कैमरे के सामने दशकों का अभ्यास जुड़ गया। जिस अभिनेता को कभी नायक के रूप में लेकर बहस हो सकती थी, वही अभिनेता चरित्र भूमिकाओं में अधिक प्रभावशाली साबित होने लगा।

विजय आनंद की ‘गाइड’ में उन्होंने वहीदा रहमान के पति मार्को की भूमिका निभाई। मार्को को केवल खलनायक की तरह निभाना आसान था, लेकिन किशोर साहू ने उसे अधिकारवादी, आत्मविश्वासी और भीतर से जटिल व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। वह अपनी पत्नी को समझने में असफल है, लेकिन स्वयं को ग़लत मानने के लिए तैयार भी नहीं। यहाँ अभिनय शोर नहीं है; उसका असर पात्र की सामाजिक स्थिति और उसकी चुप्पियों से आता है।

बाद के वर्षों में ‘काला पानी’, ‘गुमनाम’, ‘काला बाज़ार’, ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ जैसी फ़िल्मों में उनकी मौजूदगी बताती है कि हिंदी सिनेमा ने उनके लिए एक नया स्थान बना दिया था। अब वह फ़िल्म के नायक नहीं थे, लेकिन किसी दृश्य में उनका आ जाना फ़िल्म को एक सामाजिक और पेशेवर विश्वसनीयता देता था।

यही किशोर साहू की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है। उन्होंने बदलते हुए सिनेमा में अपनी जगह बदलने से परहेज़ नहीं किया। बॉम्बे टॉकीज़ के दौर का नायक बाद में दिलीप कुमार का निर्देशक बना। वही आदमी मीना कुमारी और राज कुमार की फ़िल्म बनाता है। फिर देव आनंद और वहीदा रहमान की फ़िल्म में चरित्र अभिनेता बनकर आता है। सिनेमा की पीढ़ियाँ बदलती रहीं और किशोर साहू हर पीढ़ी के बीच किसी न किसी रूप में मौजूद रहे।

फिर भी आज उनका नाम अधिकतर लोगों को क्यों याद नहीं है? शायद इसलिए कि वह किसी एक पहचान में समाए ही नहीं।

वह केवल अभिनेता होते तो उनकी कुछ लोकप्रिय भूमिकाएँ उन्हें लोकप्रिय बनाए रखतीं। केवल निर्देशक होते तो उनकी फ़िल्मोग्राफ़ी उनके नाम को स्थायी बना देती। केवल निर्माता होते तो उनका संस्थागत इतिहास लिखा जाता। लेकिन उन्होंने सब कुछ किया और इतिहास के लिए उन्हें किसी एक खाने में रखकर याद करना आसान नहीं पाया।

किशोर साहू की बेचैनी थी भारतीय सिनेमा को थोड़ा और बड़ा देखने की। उन्होंने गाँव देखा, नदी देखी, पहाड़ देखा, प्रेम देखा, शेक्सपियर देखा, अंतरराष्ट्रीय मंच देखा और अंत में बदलते हुए हिंदी सिनेमा में अपने लिए एक चरित्र अभिनेता की जगह बना ली।

22 अगस्त 1980 को किशोर साहू का निधन थाइलैंड की राजधानी बैंकॉक में हुआ। तब तक हिंदी सिनेमा एक बिल्कुल नए दौर में प्रवेश कर चुका था। जिस स्टूडियो व्यवस्था से उन्होंने शुरुआत की थी, वह बदल चुकी थी। नई पीढ़ी के सितारे और नए तरह के निर्देशक सामने थे। लेकिन किशोर साहू की फ़िल्मी यात्रा अपने पीछे हिंदी सिनेमा के कई महत्वपूर्ण संक्रमण छोड़ चुकी थी।

आज भी ‘अजीब दास्ताँ है ये’ बजता है तो ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ याद आती है। ‘गाइड’ देखी जाती है तो मार्को का चेहरा सामने आता है। पुराने हिंदी सिनेमा की ग्रामीण दुनिया की चर्चा होती है तो ‘नदिया के पार’ का नाम आता है। भारतीय फ़िल्मों की शुरुआती अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का इतिहास खोजा जाता है तो ‘मयूरपंख’ सामने आती है।

बस, इन सबके बीच उस आदमी का नाम अक्सर पीछे छूट जाता है जिसने इन फ़िल्मों को संभव बनाया। इसलिए किशोर साहू को याद करना केवल एक भूले हुए अभिनेता-निर्देशक को याद करना नहीं है। यह उस दौर को याद करना है जब हिंदी सिनेमा अपने लिए भाषा तलाश रहा था; जब स्टूडियो की चारदीवारी से बाहर निकलकर भारत को देखने की इच्छा पैदा हो रही थी; जब एक अभिनेता कैमरे के पीछे जाकर अपनी कहानी कह सकता था; और जब एक भारतीय फ़िल्मकार दुनिया के सिनेमा से संवाद करने का सपना देख सकता था।

किशोर साहू की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है कि उसमें हिंदी सिनेमा की कई कहानियाँ एक साथ चलती हैं। राजनांदगाँव से बंबई तक, अभिनेता से निर्देशक तक, स्टूडियो से गाँव तक, गाँव से पहाड़ तक, बंबई से कान तक और फिर नायक से चरित्र अभिनेता तक।

अब वही सवाल फिर से, जिससे हमने आज का ‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ शुरू किया था। क्या ‘दिल अपना और प्रीत पराई’ के निर्देशक का नाम याद था आपको? अगर नहीं था, तो कोई बात नहीं।

‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ का काम ही यही है, हाशिये पर चले गए उन नामों को फिर से रोशनी में लाना, जिनकी वजह से भारतीय सिनेमा की तस्वीर आज इतनी बड़ी दिखाई देती है। किशोर साहू को एक बार फिर से नमन और श्रद्धाँजलि, जो एक अभिनेता थे, एक लेखक थे, एक निर्देशक थे, एक निर्माता थे और सबसे बढ़कर एक ऐसे फ़िल्मकार, जिन्हें हिंदी सिनेमा ने अपने समय में देखा बहुत था, लेकिन याद बहुत कम रखा। जै जै..!

आज के ‘ताकि सनद रहे विद पंकज शुक्ल’ में इतना ही। जल्दी ही फिर मिलेंगे किसी और शख़्सीयत के दिलचस्प क़िस्सों के साथ। सिलसिला जारी है। जै जै..!

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