“शक्कर के चक्कर”
आज देश के हालात देख के एक बात समझ मा नइ आवत हे—सरकार के नीति बनथे जनता बर, किसान बर या आंकड़ा अउ प्रचार बर? कभू किसान के आमदनी बढ़ाय के नाम ले गन्ना के चर्चा होथे, कभू गन्ना ले इथेनॉल बनाय के बात होथे, अउ कभू पेट्रोल मा 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाय के उपलब्धि गिनाय जाथे। भारत अपन पेट्रोल मा E20 के लक्ष्य हासिल कर चुके हवय, अउ सरकार एला ऊर्जा सुरक्षा, पेट्रोलियम आयात म कमी अउ किसान मन बर बाजार के विस्तार के रूप मा देखाथे। फेर अब कहानी के दूसर पन्ना खुलत दिखत हे—शक्कर महंगा होवत हे, घरेलू उत्पादन घटत हे अउ भारत ला करीब दस साल बाद दस लाख टन कच्ची चीनी आयात करे के जरूरत पड़ गे हवय।
तब सवाल उठथे—आखिर गन्ना के चक्कर मा शक्कर कहाँ चल दिस?
सरकार कहिथे कि शक्कर के दाम बढ़े के कारण सिरिफ एथनॉल नइ आय। कम उत्पादन, मौसम के मार, त्योहारी मांग, वैश्विक आपूर्ति के दबाव अउ कुछ हिस्सा म जमाखोरी जइसन कई कारण हवय। सरकार के बात सही हो सकथे, फेर जनता के सवाल घलो गलत नइ हे। जब देश म गन्ना पैदा होथे, चीनी मिल चलथे, किसान गन्ना उगाथे अउ एही गन्ना के एक हिस्सा इथेनॉल बनाय बर जाथे, त नीति बनावत बखत देश के पेट्रोल टंकी अउ रसोई—दूनों के जरूरत के संतुलन काबर नइ सोचय?
एक बखत कहे गिस—
“गन्ना किसान के आमदनी बढ़ाही।” फेर सवाल ये आमदनी के हवय कि किसान के आमदनी कतका बढ़िस? अउ एही बीच आम आदमी के रसोई म शक्कर कतका महंगा होगे?
पेट्रोल म इथेनॉल मिलाय ले अगर पेट्रोलियम आयात के निर्भरता घटथे, त ये निश्चित रूप ले सोचवाला नीति हो सकथे। इथेनॉल के उपयोग के पीछे ऊर्जा सुरक्षा अउ आयात घटाय के तर्क घलो हवय। फेर विकास के असली कसौटी ये नइ आय कि सरकार कतेक प्रतिशत इथेनॉल मिलाइस। असली कसौटी ये आय कि किसान के हाथ म कतेक पैसा पहुंचिस अउ आम आदमी के घर के बजट म कतेक राहत मिलिस। आज हालत अतेक बदल गे हे कि भारत, जेन ला दुनिया के बड़े चीनी निर्यातक देश मन म गिनाय जाथे, अब अपन घरेलू जरूरत पूरा करे बर विदेश ले चीनी मंगाय के फैसला करत हवय। यही बदलाव सबसे बड़ा सवाल खड़ा करथे। जेन देश चीनी बेचत रहिस, वो देश चीनी खरीदे के स्थिति म कइसे पहुंचिस? ए सवाल के जवाब सिरिफ किसान, मिल मालिक या मौसम म खोज के काम नइ चलही। नीति के पूरा सिलसिला देखना परही।
काबर कि एके गन्ना ले तीन किसिम के उम्मीद जोड़ दे गे—
किसान के आमदनी बढ़े,
देश के पेट्रोल आयात घटे,
अउ जनता ला सस्ता पेट्रोल मिले।
फेर अब चौथा सवाल सामने खड़े हे—
जनता के रसोई म शक्कर सस्ती कइसे रहिही?
यही तो हे “शक्कर के चक्कर”।
सरकार आज कहत हे कि चीनी के दाम बढ़े के कारण इथेनॉल नइ आय। ठीक हे, त फेर जनता ये जानना चाहिथे कि चीनी उत्पादन के अनुमान गलत काबर पड़िस? घरेलू भंडार के स्थिति के सही आकलन काबर नइ हो पाइस? अउ आयात के जरूरत ए स्थिति तक कइसे पहुंचिस? काबर कि अर्थव्यवस्था म सबसे महत्त्वपूर्ण चीज सिरिफ नीति बनाना नइ, नीति के परिणाम ला समय रहते पहचानना घलो होथे।
आज अगर चीनी के दाम बढ़थे, त गरीब अउ मध्यमवर्गीय परिवार के रसोई के बजट बिगड़थे। त्योहार के समय शक्कर, मिठाई अउ खाद्य सामग्री के लागत बढ़थे। सरकार के आंकड़ा चाहे जऊन कहानी सुनावय, जनता अपन थैला अउ रसोई ले असली कहानी पढ़ लेथे।
अउ किसान?
किसान के सामने घलो सवाल हे—
गन्ना बोवव त नीति बदले के डर,
चीनी बनावव त बाजार के डर,
इथेनॉल बनावव त खाद्य जरूरत के सवाल,
अउ फसल खराब हो जावय त मौसम के मार!
त किसान आखिर करे का?
जरूरत हे कि सरकार घोषणा आधारित राजनीति के बजाय दीर्घकालीन कृषि नीति बनावय। गन्ना, चीनी अउ इथेनॉल के बीच संतुलन होय। किसान ला सही दाम मिलय, चीनी के घरेलू जरूरत सुरक्षित रहय अउ ऊर्जा नीति घलो मजबूत होय। काबर कि देश के विकास म पेट्रोल टंकी अउ रसोई—दूनों जरूरी हवंय। टंकी खाली नइ होना चाही, फेर रसोई घलो खाली नइ होना चाही। आज के सबसे बड़ा सवाल यही हे कि विकास के आंकड़ा के बीच आम आदमी के थाली अउ किसान के जेब कतेक मजबूत होइस? नारा लगाय म विकास नइ होवय। नीति बनाय म घलो विकास नइ होवय। नीति के सही परिणाम जनता तक पहुंचय—तभे विकास के असली मतलब निकलथे।
नइ त आज इथेनॉल के नाम म गन्ना घूमत रइही,
गन्ना के नाम म किसान घूमत रइही,
चीनी के नाम म बाजार घूमत रइही,
अउ आखिर म— जनता अपन महंगाई के बिल ले सरकार के दफ्तर के चक्कर काटत रइही।
यही हे आज के “शक्कर के चक्कर”—
जिहां गन्ना किसान के खेत ले निकलके इथेनॉल के टंकी तक पहुंचथे, अउ फेर शक्कर के रूप म जनता के रसोई म महंगाई बनके लहुटथे।
डॉ. गणेश कौशिक
त्रिमूर्ति चौक, सुंदर नगर, रायपुर