गांधी से सवाल, यानी हमारे समय से सवाल…
असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान! (भाग 2)
प्रमुख इतिहासकार, विचारक और लेखक रामचंद्र गुहा से पूछा गया कि क्या गांधी और आंबेडकर केवल विरोधी थे?
एक प्रश्न यह भी था कि गांधी के विरोधियों की चर्चा करते समय डॉ. बी. आर. आंबेडकर को क्यों नहीं रखा गया?
गुहा का उत्तर था कि गांधी-आंबेडकर संबंध को केवल विरोध के रूप में देखना अधूरा है। दोनों के बीच गंभीर मतभेद थे, लेकिन वह एक उत्पादक वैचारिक संवाद भी था। उनके अनुसार इस संवाद में दोनों बदले, हालांकि गांधी पर आंबेडकर का प्रभाव अधिक पड़ा। जाति और अस्पृश्यता के प्रश्न पर आंबेडकर की समझ गांधी से कहीं अधिक गहरी और मूलगामी थी।
28वें डॉ. असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान में रामचंद्र गुहा के “Gandhi’s Faith, and Ours” विषयक वक्तव्य और पुरुषोत्तम अग्रवाल की अध्यक्षीय टिप्पणियों के बाद हुआ प्रश्नोत्तर सत्र शायद कार्यक्रम का सबसे जीवंत हिस्सा था। सवाल केवल गांधी की आस्था तक सीमित नहीं रहे। गांधी-आंबेडकर संबंध, जाति और धर्मांतरण, गांधी की अपनी सीमाएँ, विभाजन, हिंदुत्व का उभार, बहुसंख्यक असुरक्षा, पटेल की विरासत और आज गांधी-नेहरू की प्रासंगिकता तक चर्चा फैलती गई।
इस संवाद की एक अच्छी बात यह थी कि गांधी को महिमामंडित करने के बजाय उनसे असुविधाजनक प्रश्न भी पूछे गए और गुहा ने कई जगह उनकी सीमाओं को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया।
गुहा ने इसी संदर्भ में एक और महत्त्वपूर्ण बात कही। गांधी को प्रत्येक प्रश्न का अंतिम प्राधिकारी मानना इतिहाससम्मत नहीं है। जाति को आंबेडकर गांधी से बेहतर समझते थे और लैंगिक असमानता को कमलादेवी चट्टोपाध्याय जैसे व्यक्तित्व गांधी से अधिक गहराई से समझते थे।
गांधी की कमजोरियाँ क्या थीं? यह एक प्रश्न गांधी के कथन और कर्म के अंतर्विरोधों पर था। गुहा ने गांधी का बचाव करने के लिए उनकी कमजोरियों को छिपाया नहीं। उन्होंने कहा कि गांधी पारिवारिक जीवन में कठिन पिता थे, पति के रूप में उनमें पितृसत्तात्मक प्रवृत्तियाँ थीं और ब्रह्मचर्य को लेकर उनके कुछ आग्रह ऐसे थे जिनका वे स्वयं समर्थन नहीं करते।
महिलाओं और यौन हिंसा के संदर्भ में गांधी के कुछ अत्यंत विवादास्पद कथनों पर भी प्रश्न उठा। गुहा ने ऐसे एक कथन को बचाने की कोशिश नहीं की और उसे आवेगपूर्ण तथा असमर्थनीय माना। यह स्वीकारोक्ति महत्त्वपूर्ण थी। किसी ऐतिहासिक व्यक्तित्व की प्रासंगिकता सिद्ध करने के लिए उसे त्रुटिहीन बनाना आवश्यक नहीं है।
क्या गांधी बदलते भी थे? इसी से जुड़ा प्रश्न था कि गांधी के विचार समय के साथ कैसे विकसित हुए। गुहा ने एक उपयोगी अंतर किया। उनके अनुसार अहिंसा और हिंदू-मुस्लिम सद्भाव दो ऐसी प्रतिबद्धताएँ थीं जिन्हें गांधी ने अपेक्षाकृत कम उम्र में अपना लिया और जीवन भर उनसे जुड़े रहे। लेकिन जाति, नस्ल और लैंगिक समानता पर उनकी समझ क्रमशः विकसित हुई।
दक्षिण अफ्रीका के शुरुआती गांधी और जीवन के अंतिम दशकों के गांधी को एक ही वैचारिक स्थिति में रखकर नहीं पढ़ा जा सकता। नस्ल, जाति और स्त्री के प्रश्नों पर वे अपने अनुभवों, आलोचकों और सहयोगियों से सीखते रहे। वे पूर्ण नारीवादी नहीं बने और जाति की उनकी आलोचना आंबेडकर जितनी मूलगामी नहीं हुई, फिर भी उनमें अपने विचारों की पुनर्समीक्षा करने की क्षमता थी।
इतिहास में गांधी को समझने की शायद यही अधिक उपयोगी पद्धति है: किसी एक उद्धरण से नहीं, उनके विचारों की पूरी कालानुक्रमिक यात्रा से।
गांधी धर्मांतरण के विरोधी और आंबेडकर धर्मांतरित क्यों? एक युवा श्रोता ने बहुत महत्त्वपूर्ण प्रश्न किया। क्या गांधी का धर्मांतरण-विरोध इस तथ्य से जुड़ा था कि वे स्वयं जाति-व्यवस्था में अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त समुदाय से आते थे, जबकि आंबेडकर ने उसी व्यवस्था के उत्पीड़न को स्वयं झेला था?
गुहा ने इसे गांधी और आंबेडकर के बीच वास्तविक तथा गहरे मतभेद के रूप में स्वीकार किया, लेकिन गांधी की स्थिति को केवल उनकी जातिगत पृष्ठभूमि का परिणाम मानने से असहमति जताई। उनके अनुसार गांधी का विश्वास था कि व्यक्ति अपनी धार्मिक परंपरा के भीतर रहकर उसकी बुराइयों को दूर करे। उनका लक्ष्य हिंदू धर्म को छोड़ना नहीं, अस्पृश्यता को समाप्त करके उसे भीतर से सुधारना था।
आंबेडकर अपने जीवन-अनुभव से दूसरे निष्कर्ष पर पहुँचे। उन्हें अंततः विश्वास नहीं रहा कि दलितों को हिंदू सामाजिक व्यवस्था के भीतर वास्तविक मुक्ति मिल सकती है। 1935 में उन्होंने हिंदू के रूप में न मरने की घोषणा की और लंबी वैचारिक यात्रा के बाद 1956 में बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इस मतभेद को इस तरह भी समझा जा सकता है: गांधी के लिए रास्ता था आत्मशुद्धि और भीतर से सुधार, आंबेडकर के लिए आत्मसम्मान, अधिकार और अंततः व्यवस्था से बाहर निकलना।
प्रश्नोत्तर का एक स्वाभाविक लेकिन कठिन प्रश्न था: देश के विभाजन के लिए कौन जिम्मेदार था? गुहा ने किसी एक व्यक्ति को दोषी ठहराने से स्पष्ट इनकार किया। उनके अनुसार न जिन्ना, न नेहरू, न गांधी और न कोई एक संगठन अकेले विभाजन के लिए जिम्मेदार था। विभाजन को 1906 से विकसित हो रही पृथक राजनीतिक प्रतिनिधित्व की व्यवस्था, कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बदलते संबंधों, 1937 के बाद की प्रांतीय राजनीति, द्वितीय विश्वयुद्ध, 1940 के दशक के राजनीतिक ध्रुवीकरण और 1946 की निर्णायक परिस्थितियों की लंबी प्रक्रिया में समझना चाहिए।
उनका मूल आग्रह था कि इतिहास बहुकारकीय प्रक्रियाओं को किसी एक व्यक्ति की इच्छा में बदल देने से समझ में नहीं आता। लेकिन उन्होंने इसके बाद एक दूसरा प्रश्न उठाया: विभाजन हो जाने और हिंसा फैलने के बाद भारत में रह गए मुसलमानों की सुरक्षा के लिए सबसे दृढ़ता से कौन खड़ा हुआ? उनके उत्तर में गांधी और नेहरू की भूमिका निर्णायक थी।
क्या गांधी और नेहरू को हर समस्या का दोषी बना दिया गया? इसी चर्चा में गांधी और नेहरू की लगातार होने वाली अतिरंजित आलोचना का प्रश्न उठा। क्या आज की हिंदुत्व राजनीति के उभार में इसका भी योगदान है?
गुहा ने कहा कि जटिल राष्ट्रीय समस्याओं के लिए गांधी और नेहरू को जिम्मेदार ठहराना एक सुविधाजनक बलि का बकरा खोजने जैसा हो सकता है। भारत चीन जैसा क्यों नहीं बना, कोई राजनीतिक समस्या क्यों पैदा हुई, विभाजन क्यों हुआ, कश्मीर क्यों उलझा, इन सबके लिए दो व्यक्तियों को जिम्मेदार ठहरा देना इतिहास की जटिलता से बच निकलने का आसान रास्ता है।
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भी इसी प्रवृत्ति पर व्यंग्य करते हुए कहा कि भगत सिंह की फाँसी से लेकर विभाजन और कश्मीर तक हर प्रश्न को अंततः “गांधी और नेहरू ने इसे क्यों नहीं रोक दिया?” में बदल देना इतिहास समझने की पद्धति नहीं हो सकती।
एक और दिलचस्प प्रश्न था कि हिंदुत्ववादी राजनीति सरदार पटेल जैसे नेताओं की विरासत को अपने आख्यान में अपेक्षाकृत आसानी से शामिल कर पाई, लेकिन गांधी को पूरी तरह आत्मसात क्यों नहीं कर सकी?
गुहा ने माना कि कांग्रेस ने लंबे समय तक पटेल की विरासत को पर्याप्त स्थान नहीं दिया और इस रिक्तता का राजनीतिक लाभ दूसरे पक्ष ने उठाया। लेकिन गांधी की स्थिति अलग है।
गांधी को औपचारिक श्रद्धांजलि दी जा सकती है, उनकी तस्वीर लगाई जा सकती है, स्वच्छता जैसे किसी एक कार्यक्रम से उनका नाम जोड़ा जा सकता है, लेकिन उनके मूल विचारों को ग्रहण करना कहीं कठिन है। धार्मिक बहुलता, मुसलमानों और ईसाइयों की समान नागरिकता तथा अहिंसा उनके चिंतन के ऐसे आधार हैं जिन्हें उनसे अलग करके गांधी को समझना संभव नहीं। यही शायद गांधी को पूर्ण राजनीतिक विनियोग से बचाता है।
‘हिंदू असुरक्षा’ के प्रश्न को कौन संबोधित करेगा? एक श्रोता ने यह एक असुविधाजनक लेकिन विचारणीय प्रश्न उठाया। सार्वजनिक विमर्श में मुस्लिम असुरक्षा की चर्चा होती है, लेकिन हिंदुओं के एक हिस्से में मौजूद असुरक्षा और चिंता की बात कौन करेगा? क्या इसी खाली जगह को आरएसएस भरता है?
गुहा ने इस प्रश्न को गंभीर माना। उन्होंने श्रीलंकाई मानवविज्ञानी स्टैनली जे. तम्बैया की अवधारणा का उल्लेख किया: “majority with a minority complex”, अर्थात संख्या और शक्ति में बहुसंख्यक होने के बावजूद स्वयं को निरंतर संकटग्रस्त समझने वाला समुदाय।
श्रीलंका के अनुभव को सामने रखते हुए उनका व्यापक तर्क था कि बहुसंख्यकवाद अंततः केवल अल्पसंख्यकों को नुकसान नहीं पहुँचाता। वह पूरे देश की संस्थाओं, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, सामाजिक विश्वास और भविष्य को प्रभावित कर सकता है। इसलिए धार्मिक बहुलता की रक्षा किसी अल्पसंख्यक समुदाय पर उपकार नहीं, बल्कि बहुसंख्यक सहित पूरे समाज के हित का प्रश्न है। गांधी और नेहरू आज फिर साथ क्यों जरूरी हैं? पूरे प्रश्नोत्तर से गुहा बार-बार एक निष्कर्ष की ओर लौटे–
वर्तमान भारत को समझने के लिए गांधी और नेहरू को एक-दूसरे के विरुद्ध खड़ा करना उपयोगी नहीं है।
गांधी हमें समाज के स्तर पर बताते हैं कि अलग-अलग धर्मों के लोग मित्र, पड़ोसी और बराबर मनुष्य की तरह कैसे रह सकते हैं। नेहरू हमें राज्य के स्तर पर याद दिलाते हैं कि कानून, प्रशासन और पुलिस को नागरिक की धार्मिक पहचान से निरपेक्ष होना चाहिए। एक का प्रश्न है सामाजिक बहुलता, दूसरे का संस्थागत समानता। दोनों के बिना संविधान का धर्मनिरपेक्ष वादा अधूरा रहता है।
चर्चा में एक और दिलचस्प सूत्र आया। गांधी, नेहरू, आंबेडकर और भगत सिंह के बीच वास्तविक और कभी-कभी बहुत गंभीर मतभेद थे। उन्हें मिटाना इतिहास के साथ अन्याय होगा। लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उन मतभेदों को इस हद तक बढ़ा देना भी उचित नहीं कि स्वतंत्रता, समान नागरिकता, सामाजिक न्याय और बहुलतावाद के उनके साझा धरातल ही दिखाई देना बंद हो जाएँ।
पुरुषोत्तम अग्रवाल ने कार्यक्रम के अंत में इसे इतिहास से आगे भविष्य के प्रश्न के रूप में रखा। उनकी चिंता थी कि हमारी पीढ़ी ने जिस लोकतांत्रिक भारत को स्वाभाविक मान लिया था, उसकी कुछ बुनियादी मान्यताएँ आज फिर बहस के केंद्र में हैं।
इस पूरे प्रश्नोत्तर से मेरे लिए एक बात बहुत स्पष्ट होकर निकली है– गांधी को प्रासंगिक बनाने के लिए उन्हें निर्दोष सिद्ध करना आवश्यक नहीं। आंबेडकर को महत्त्वपूर्ण बनाने के लिए गांधी को निरर्थक सिद्ध करना भी आवश्यक नहीं।
नेहरू की ऐतिहासिक भूमिका स्वीकार करने के लिए उनकी नीतियों की आलोचना छोड़नी नहीं पड़ती। इतिहास का काम अपने नायकों को देवता और विरोधियों को खलनायक बनाना नहीं है। उसका काम यह समझना है कि वे कहाँ सही थे, कहाँ सीमित थे, कहाँ बदले, कहाँ असफल हुए और आज उनकी बहसों से हम क्या सीख सकते हैं।
शायद 28वें डॉ. असगर अली इंजीनियर स्मृति व्याख्यान के प्रश्नोत्तर सत्र की सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी कि उसने गांधी को श्रद्धा की मूर्ति बनाकर सामने नहीं रखा, बल्कि सवालों के बीच रखा। और इतिहास में किसी बड़े व्यक्तित्व को जीवित रखने का इससे बेहतर तरीका शायद ही कोई हो।
कृष्ण कल्पित