September 6, 2026

…लेकिन नीम करौली बाबा की कहानी कुछ अलग है

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भारत में संतों की कमी कभी नहीं रही। कोई जंगल चला गया, कोई हिमालय में बैठ गया, किसी ने शास्त्र लिखे और किसी ने मठ बनाए। लेकिन नीम करौली बाबा की कहानी कुछ अलग है।

उनके पास न कोई चमकदार मंच था, न बड़े-बड़े प्रवचन, न अपने नाम का कोई साम्राज्य। वो अक्सर कंबल ओढ़े दिखाई देते थे। उनके आसपास बैठे लोग उन्हें महाराजजी कहते थे। और उनके बारे में जितनी कहानियां कही गईं, उनमें कुछ इतनी असाधारण थीं कि उन्हें सुनकर विश्वास और संशय के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है।

उनका असली नाम लक्ष्मण नारायण शर्मा बताया जाता है। पैदाइश उत्तर प्रदेश के अकबरपुर गांव की है, करीब 1900 के आसपास। आज ये इलाका फिरोजाबाद जिले में है। शादी कम उम्र में ही हो गई, जैसा कि उस जमाने में चलन था। बाद में घर छोड़कर साधु बन गए। लेकिन उन साधुओं जैसा नहीं, जो हमेशा के लिए घर-परिवार से कट गए।

जीवन के एक दौर में वो वापस घर लौटे। गृहस्थ जीवन भी जिया। उनके दो बेटे और एक बेटी हुए। यही चीज उनकी शख्सियत को और दिलचस्प बनाती है। उनका जीवन उत्तर भारत के गांवों, कस्बों और धार्मिक स्थलों के बीच घूमते हुए बीता। लोग उन्हें अलग-अलग नामों से जानते थे। कहीं लक्ष्मण दास, कहीं नीब करौरी बाबा, कहीं महाराजजी। बाद में ‘नीम करौली बाबा’ नाम इतना मशहूर हुआ कि वही उनकी पहचान बन गया।

नीम करौली नाम कैसे पड़ा? भक्त परंपरा के मुताबिक, एक बार बाबा ट्रेन से यात्रा कर रहे थे। टिकट नहीं था। रेलवे कर्मचारी ने उन्हें उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद इलाके में स्थित नीब करौरी के पास ट्रेन से उतार दिया। बाबा नीचे उतरकर एक जगह बैठ गए। इसके बाद ट्रेन को चलाने की कोशिश हुई, मगर वो आगे नहीं बढ़ी।

कहानी यहीं से चमत्कार का रूप लेती है। बताया जाता है कि रेलवे अधिकारियों को जब पता चला कि बाबा को उतारने के बाद ही ट्रेन रुक गई है, तो वे उनके पास पहुंचे और दोबारा ट्रेन में बैठने का आग्रह किया। बाबा वापस ट्रेन में बैठे और परंपरा के मुताबिक ट्रेन चल पड़ी। अब असल बात जो भी रही हो, मगर नीम करौली बाबा नाम ही उनकी पहचान बना।

लेकिन इस शख्स को समझने के लिए उसके नाम से ज्यादा महत्वपूर्ण है उसका तरीका।

नीम करौली बाबा ने अपने लिए कोई जटिल दर्शन नहीं बनाया। उनके आसपास की परंपरा में तीन बातें बार-बार सामने आती हैं… प्रेम, सेवा और भक्ति। खासकर हनुमान भक्ति। उनके आश्रमों में हनुमान की उपासना केंद्रीय रही। लेकिन उनका जोर केवल पूजा पर नहीं था। उनके अनुयायी उनके संदेश को इस विचार से जोड़ते हैं कि अगर भगवान को हर जगह देखना है तो मनुष्य की सेवा भी उसी भावना से करनी होगी।

उनके पास आने वाला आदमी चाहे गरीब हो या अमीर, भारतीय हो या विदेशी, पढ़ा-लिखा हो या बिल्कुल साधारण… उनकी परंपरा में सबके लिए जगह थी। यह बात सुनने में साधारण लगती है। लेकिन 1960 और 1970 के दशक में पश्चिम से भारत आने वाले उन युवाओं के लिए, जो अपने समाज की भौतिक समृद्धि के बावजूद भीतर से खालीपन महसूस कर रहे थे, यह तजुर्बा बहुत बड़ा था।

और फिर एक दिन अमेरिका से एक आदमी भारत आया… रिचर्ड अलपर्ट।

अलपर्ट कोई आम सैलानी न था। वो हार्वर्ड विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान पढ़ा चुका था। साथी प्रोफेसर टिमोथी लैरी के साथ कुछ खास नशीले पदार्थों पर प्रयोग किया कि उनका दिमाग पर क्या असर होता। उनका सवाल था कि इन चीजों को लेने के बाद इंसान के दिमाग, सोचने के तरीके और आसपास की दुनिया को देखने के अनुभव में क्या बदलाव आता है। लेकिन, फिर प्रयोग विवादित होने लगे। दोनों को हार्वर्ड से निकाल दिया गया।

हार्वर्ड से अलपर्ट का रिश्ता खत्म हुआ। वो उस दौर की आध्यात्मिक बेचैनी के बीच भारत की ओर निकल पड़ा। 1967 में वह भारत पहुंचा। वो यहां किसी एक बाबा की तलाश में नहीं आया था। वह अपने भीतर किसी ऐसी चीज की तलाश में था जिसे पश्चिमी शिक्षा और मनोविज्ञान उसे पूरी तरह नहीं दे पा रहे थे। भारत हमेशा पश्चिम में विज्ञान से ज्यादा अपने अध्यात्म और दर्शन के लिए मशहूर रहा है।

यात्रा के दौरान अलपर्ट की मुलाकात नीम करौली बाबा से हुई। फिर अलपर्ट वो शख्स नहीं रहा, जो भारत आया था। बाबा ने उसे ‘राम दास’ नाम दिया यानी भगवान का सेवक। यहीं से कहानी भारत की पहाड़ियों से निकलकर अमेरिका की चेतना में प्रवेश करती है।

राम दास बाद में लिखा कि वो अपने गुरु यानी बाबा नीम करौली के साथ बहुत लंबा समय नहीं रहे। उनकी अपनी वेबसाइट के मुताबिक, नवंबर 1967 से मार्च 1968 के बीच उन्होंने महाराजजी के आसपास समय बिताया। कुल मिलाकर शायद कुछ घंटे ही सीधे उनके साथ रहे। लेकिन उन कुछ घंटों का असर इतना गहरा था कि उससे एक किताब पैदा हुई… ‘Be Here Now’.

ये किताब 1971 में छपी। और पश्चिमी दुनिया में एक तरह से आध्यात्मिक सनसनी बन गई।

उस समय अमेरिका में एक पूरी पीढ़ी उलझन भरी जिंदगी जी रही थी। युद्ध का विरोध था। नशीली दवाओं के प्रयोग थे। पूंजीवाद और पारंपरिक सामाजिक मूल्यों पर सवाल थे। लोग धर्म से दूर जा रहे थे। मगर अर्थ की तलाश खत्म नहीं हुई थी। ऐसे समय में भारत का योग, ध्यान, भक्ति और आध्यात्मिकता पश्चिम के लिए किसी दूसरी दुनिया की खिड़की जैसी बन गई। ‘Be Here Now’ उसी खिड़की से लाखों लोगों को भीतर झांकने का मौका देती थी।

लेकिन किताब के पीछे जिस आदमी की छाया थी, वो खुद किताब लिखने वाला आदमी नहीं था। वो नीम करौली बाबा थे।

उनकी खासियत यह थी कि उन्होंने राम दास को कोई नया ‘पंथ’ बेचने की कोशिश नहीं की। उनके संदेश में प्रेम और सेवा बार-बार लौटते हैं। राम दास की आगे की यात्रा में भी यही चीज दिखाई देती है। उन्होंने ध्यान और योग के साथ ‘सेवा’ को आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया।

बाबा के करीबी भक्तों में प्रोफेसर दादा मुखर्जी का नाम खास है। वह इलाहाबाद यूनिवर्सिटीज में अर्थशास्त्र पढ़ाते थे। बाबा उनके घर आते-जाते थे। मुखर्जी ने बाद में अपने संस्मरणों में उनके साथ बिताए वक्त को लिखा। इन यादों में बाबा किसी गंभीर, दूर बैठे संत की तरह नहीं दिखते। वह हंसते थे, मजाक करते थे, लोगों को डांटते थे और कभी बिल्कुल घर के बुजुर्ग की तरह पेश आते थे।

बाबा की खासियत शायद यही थी कि वह सामने वाले को उसके पैसे, पद या पहचान से नहीं देखते थे। उनके लिए किसी भूखे को खाना खिलाना भी सेवा थी। दादा मुखर्जी के घर के संस्मरणों में बार-बार खाना खिलाने की बात आती है। बाबा का जोर था कि जो सामने आया है, उसे खाली पेट वापस मत जाने दो।

बाबा का एक कथन इस सोच को बहुत सीधे तरीके से सामने रखता है, सिर्फ बीमार लोग ही डॉक्टर के पास आते हैं। उनके आसपास हर तरह के लोग थे क्योंकि उनके हिसाब से संत का काम केवल अच्छे और धार्मिक लोगों के बीच बैठना नहीं था। जो उलझा हुआ है, जो गलतियां कर रहा है, जो भीतर से टूटा हुआ है, उसे भी जगह मिलनी चाहिए।

उनके पास आने वालों में भी कोई एक तरह के लोग नहीं थे। अमीर थे तो गरीब भी थे। हिंदू थे तो मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और सिख भी थे। ऐसे लोग भी आते थे जो खुद को धार्मिक नहीं मानते थे। एक पुराने भक्त की याद में तो यहां तक आता है कि एक ही कमरे में बड़े लोगों के साथ डाकू तक बैठे दिखाई देते थे। बाबा ने उनके लिए कोई अलग कतार नहीं बनाई थी।

और फिर एक ऐसा नाम उनकी कहानी से जुड़ा जिसे आधुनिक दुनिया शायद सबसे ज्यादा पहचानती है… स्टीव जॉब्स, टेक दिग्गज एप्पल के फाउंडर। जॉब्स 1974 में भारत आए। वो आध्यात्मिक खोज में थे। और नीम करौली बाबा से मिलना चाहते थे। मगर जब वो भारत पहुंचे, तब तक बाबा 1973 में शरीर छोड़ चुके थे। जॉब्स की उनसे भेंट न हो सकी।

हालांकि, यहां पर कई दंतकथाएं जुड़ गईं। जैसे कि बाबा ने ही जॉब्स को कटा सेब दिया था खाने को, जिससे एप्पल का लोगो बना। ऐसी भी बातें होती हैं कि बाबा ने ही जॉब्स को एप्पल कंपनी बनाने का तरीका सिखाया। क्योंकि जॉब्स ने भारत से लौटने के दो साल बाद ही एप्पल की शुरुआत की थी, दो अन्य लोगों के साथ मिलकर। लेकिन, ये सब अतिश्योक्तियां हैं।

फेसबुक, इंस्टाग्राम और वॉट्सऐप के मालिक मार्क जकरबर्ग की कहानी में भी नीम करौली बाबा का नाम इसी तरह आता है। जकरबर्ग ने बाद में बताया कि जॉब्स के मशविरे पर उन्होंने नीम करौली बाबा के कैंची धाम की यात्रा की थी। ये वो दौर था, जब फेसबुक मुश्किलों से गुजर रहा था। जकरबर्ग ने भी इसे अपनी जिंदगी का अहम पड़ाव माना।

नैनीताल के पास पहाड़ियों में बसा कैंची धाम धीरे-धीरे नीम करौली बाबा की पहचान बन गया। 1964 में यहां हनुमान मंदिर और आश्रम की स्थापना हुई। यही वो जगह बनी जहां भारत और विदेश से आने वाले भक्तों की संख्या बढ़ती गई।

यहीं से नीम करौली बाबा की कहानी का सबसे दिलचस्प विरोधाभास सामने आता है।

एक तरफ वो ऐसे शख्स थे, जो कंबल ओढ़कर पहाड़ों में बैठते थे। दूसरी तरफ उसकी चर्चा उन लोगों के बीच थी, जो आधुनिक तकनीक, अरबों डॉलर की कंपनियां खड़ी कर रहे थे। उस संत के पास कंप्यूटर न था। लेकिन उसकी सीख उन लोगों तक पहुंच गई जिन्होंने दुनिया के कंप्यूटर बदल दिए।

शायद यही वजह है कि नीम करौली बाबा को सिर्फ चमत्कारों की कहानियों से समझना उनके साथ न्याय नहीं होगा। उनके बारे में कई लोकप्रिय किस्से हैं। जैसे कि ट्रेन रोक देना। कहीं भी अचानक पहुंच जाना। किसी व्यक्ति के मन की बात जान लेना। संतों के बारे में अक्सर ऐसे दावे होने लगते हैं, जिनका उनसे कोई वास्ता नहीं होता।

असल में नीम करौली बाबा की असली विरासत कहीं ज्यादा ठोस है। किसी संत की असली परीक्षा मृत्यु के बाद होती है। क्या उसके जाने के बाद उसकी बात बचती है?

नीम करौली बाबा के मामले में जवाब हां है।

उनके जाने के दशकों बाद भी कैंची धाम में भीड़ आती है। विदेशों में राम दास की किताबें पढ़ी जाती हैं। उनके नाम से जुड़े सेवा कार्य चलते हैं। और हर साल हजारों लोग उस पहाड़ी रास्ते की ओर जाते हैं जहां कभी एक साधारण कंबल ओढ़े आदमी बैठा करता था। शायद नीम करौली बाबा की सबसे बड़ी कहानी यही है।

उन्होंने लोगों को दुनिया छोड़ने के लिए नहीं कहा। उन्होंने दुनिया को थोड़ा अलग नजर से देखने की बात की। प्रेम को केवल भावना नहीं, व्यवहार बनाने की बात की। सेवा को केवल दान नहीं, साधना मानने की बात की।

बाकी दुनिया ने उनके बारे में चमत्कारों की कहानियां सुनाईं। लेकिन उनकी सबसे बड़ी ‘सिद्धि’ शायद यह थी कि उन्होंने कुछ ऐसे लोगों की दिशा बदल दी जो पहले से ही बहुत कुछ पा चुके थे। लेकिन फिर भी भीतर से किसी ऐसी चीज की तलाश में थे जिसे पैसा, प्रतिष्ठा और विश्वविद्यालय की डिग्री नहीं दे पा रही थी।

एक तरफ अमेरिका की चमचमाती सिलिकॉन वैली थी। दूसरी तरफ कैंची की पहाड़ी। और इन दोनों के बीच पुल बना था… एक ऐसे आदमी के नाम से, जिसके पास न कोई कंपनी थी, न कोई डिग्री, न कोई पद। सिर्फ एक कंबल था, हनुमान की भक्ति थी और लोगों से प्रेम करने की बात थी।
इतिहास की बात फेसबुक पेज से

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