एक नई ग़ज़ल
वफा का बोझ अब ढोना नहीं है
किसी का भी हमें होना नहीं है
समझ में आ गई तासीर तेरी
चमकता है मगर सोना नहीं है
ये माना है तेरी बातों में जादू
मगर हम पर असर होना नहीं है
महल में कितनी दौलत की खनक है
सुकूं का इक मगर कोना नहीं है
वो दुश्मन है मगर राहों में उसकी
हमें कांटा कभी बोना नहीं है
तेरे पीछे मेरा मरना तो तय है
तेरे आगे मगर रोना नहीं है
शिखा अवधेश