युगीन सच्चाई और सतर्कता की उद्घोषणा है ‘ठग अउ जग’

डॉ. मृणालिका ओझा
लोक साहित्य को किसी भी अंचल की भाषा या सीमा में समेट कर नहीं रखा जा सकता। “लोक” शब्द संपूर्ण मानव संस्कृति को समेट कर अपने विराट रूप में पृथ्वी के कण – कण को सार्थक कर लेता है। श्री वीरेंद्र सरल जी ने जिन महत्वपूर्ण लोककथाओं को “ठग अउ जग” शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत किया है ,उसे उन्होंने अपनी विभिन्न कथाओं के माध्यम से निश्चित रूप से एक अलग पहचान दी है और क्योंकि लगभग ये सभी कथाएं हास्यमय दृश्य उत्पन्न करती हैं अतः ये कथाएं हास्य रस प्रधान या हास्य – व्यंग्य की कथाओं की प्रस्तुति हैं ।
‘लोक’ शब्द समाज ,जाति ,धर्म बोली, भाषा और क्षेत्र के आधार पर ज़रूर सीमित हो जाता है किंतु वह अपने आप में पूर्णता प्राप्त है और इस पूरे विश्व के निहितार्थ को लेकर प्रस्तुत होता है ।
“अतो sस्मी लोके वेदे च प्रथित: पुरूषोत्तम:।” निश्चित रूप से वर्तमान समय में क्षेत्रीय बोलियों की शब्द -संपदा और संस्कृति , दोनों का ही विघटन बड़ी रफ्तार के साथ हो रहा है। इन परिस्थितियों में जहां व्यक्ति बेहद व्यस्त जीवन में और अपनेपन की सिकुड़न के बीच संबंधों के दायरे को विस्तार देने की कोशिशों में लगातार सक्रिय हो रहा है , वहां आज यह पुस्तक वर्तमान युग के छल-प्रपंच के प्रति भी हमें सतर्क करती है।
वीरेंद्र जी की पुस्तक “ठग अउ जग” की उपादेयता को सीमित नहीं माना जा सकता। सच तो यह भी है कि आपने इस संग्रह में कुछ इस तरह की कथाएं भी प्रस्तुत की हैं जो इस धूर्तता भरे संसार में भी हमें सत्संग की महिमा समझाती हैं, और सत्संग की ओर प्रेरित भी करती हैं और यह इस संग्रह की एक उपलब्धि भी मानी जा सकती है। तो लीजिए कुछ कथाओं पर बात करते हैं।
“जे पाय आंच ते खाय पांच” कहानी भूख, स्वार्थ और लालच के बावजूद भी आत्म- संतुलन और आत्म संयम को रेखांकित करने वाली हास्य कथा है। “दसोमती रानी” जैसी कुछ कहानियां ‘स्त्री- विमर्श’ पर केंद्रित हैं। “कुकरी के लइका” नारी- सुलभ ईर्ष्या का प्रकटन है और “मनखे के भाई सांप” आधुनिक युग के स्वार्थी संबंधों को इंगित करती हैं। “कुशियार बरछा” में सूक्ष्म सत्य को उकेरा गया है। लोक की पवित्र अवधारणा जो कि अक्षरशः आज भी सत्य है और भविष्य में भी रहेगी और अनंत काल तक सत्य होगी वह है “उहिच जबान ह ‘आ’ कहिथे , अउ उहिच जबान ह “जा”। ऐसे तथ्य- परख सार्वभौमिक सत्य को भी इन्होंने लोककथाओं में प्रस्तुत किया है। “करम के नांगर ल भूत जोंतय” इस कहानी में शब्द- सौंदर्य तो है ही, साथ ही छत्तीसगढ़ी गालियों की झलक भी मिलती है। छत्तीसगढ़ी बोली की मिठास का अनुभव लगभग हर कथा में होता है। यद्यपि ये कथा सीधे तथ्य से संबद्ध नहीं है तथापि अधिकांश कथाओं में छत्तीसगढ़ी मुहावरों और कहावतों का सुंदर प्रयोग हुआ है। “मंत्री मन के घमंड” जैसी कथाएं वर्तमान राजनीति के परिप्रेक्ष्य में एक ठोस सीख है कि सिर्फ प्रजा ही राजा को सम्मानित करें यह ज़रूरी नहीं, अपितु राजा को भी अपनी प्रजा का सम्मान करना ज़रूरी है। कुछ कथाओं में ईमानदारी का सुखद परिणाम भी दृश्यांकित होता है, जो सद्भावना और सच्चाई की ओर प्रेरित करता है। “बसंत अउ बसंती” /”दसोमती रानी”/ “ठग अउ जग”/ “बनकैना रानी”/ “फुलबासन” / “राजा वीर देव” जैसी कुछ कथाएं सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक पक्षों को उजागर करती हैं। कुछ कथाएं “स्त्री- विमर्श” को भी प्रस्तुत करती हैं। “कुकरी के लइका”, “बसंत अउ बसंती” कहानी में राजकुमार को ‘देश- निष्कासन’ की सजा एक आदर्श राजनीति को प्रस्तुत करती है। यह कथा हर राजनीतिज्ञ को पढ़ना,सुनना और जानना चाहिए क्योंकि यह वर्तमान राजनीति को आईना दिखाती है। इसमें बहुत से रीति-रिवाज की विस्तृत जानकारी भी मिलती है। इसी तरह बुझौवल के लिए “बिस्कुटक” शब्द का सुंदर प्रयोग किया गया है। “ऑंजत ऑंजत कानी” इस कथा में भी सूक्ष्म मनोविज्ञान को प्रस्तुत किया गया है। “मनखे के भाई सांप” कथा पर्यावरण- संचेतना के साथ ही युगीन सत्य को भी प्रस्तुत करती है। कमर छठ की 6 लोककथाओं का संकलन बहुत ही महत्वपूर्ण है। “सूरजभान” एक लंबी लोककथा है किंतु इसमें अनेक लोककथाओं की श्रृंखला है। अंत में “हाथी अउ कोलिहा” जैसी कहानी में सियार की धूर्तता का चरम पर पहुंचना जैसे पूरी पुस्तक के शीर्षक को सार्थक कर देता है । संसार में किसी का भरोसा अब करना मुश्किल है। स्वार्थ पीड़ित मनुष्य अपनों को भी ठग लेता है । इस तरह यह पुस्तक एक प्रकार से सत्यापित करती है कि व्यक्ति आज अधिकतर स्वार्थ -निष्ठ हो रहा है।
पुस्तक को पढ़ने के बाद मैंने सोचा कि इन लोककथाओं की इस सुंदर उपलब्धि को दिमाग़ी ख़ज़ाने में छुपाना असंभव है। अतः आज मेरी लेखनी चल पड़ी। लेखक ने “हिरदे के गोठ” में पूर्णतः सच्चाई को उकेरा है ।
वस्तुतः कुछ सांस्कृतिक लोकाचार होते हैं जो देश भूमि के आधार पर परिवर्तित हो सकते हैं पर मानवीय मनोभूमि के दृष्टिकोण से उनमें लगभग समान मूल तत्वों की अभिव्यंजना ही होती है जो प्रायः हमारे विशुद्ध मानवीय रूप को प्रकाशित करती है। प्रकारांतर में यह कहा जा सकता है कि मौखिक- सांस्कृतिक परंपरा का यह एक दस्तावेजीकरण भी है। निश्चय ही मानव समाज की यह एक अमूल्य निधि है। सबसे महत्वपूर्ण बात तो यह है कि ये कथाएं निरंतर यात्रा करती हैं और इसीलिए इनका मूल स्वरूप एक होते हुए भी इनकी बाह्य संरचना क्षेत्र और भाषा के आधार पर परिवर्तित होती रहती है। उपसंहार इनके संग्रह का, यूं कहें कि लोककथा – यात्रा का एक आकर्षक हिस्सा है। लेखक के शब्दों में “‘फेर आज सुरता करथंव तब लगथे, ये कहानी भर नोहे, भलुक ज्ञान के खजाना आय। बस इहीच मन ओ समें शिक्षा, सूचना अउ मनोरंजन के माध्यम रिहिन होहीं।” (पेज 14) लोककथाओं की आत्मा को उद्भासित करती हुई ये बातें पूर्णतः सत्य हैं ।
यद्यपि लोककथाएं लोक भाषा (बोली) में ही है तथापि वे वाचिक परंपरा में अलंकृत होती हैं और इस तरह का प्रयोग इस संग्रह में बहुत सुंदर किया गया है। जैसे –
“न चिरई – चींव करे न कौआ कांव।” (पृ 15)। अनेक कथाओं में भारतीय सामाजिक धारणाओं का स्पष्ट उल्लेख भी मिलता है जैसे संज्ञान बेटी रहिथे दाई दादा ला संसो होबेच करथे।
इस तरह एक कहानी ‘भुगतो रे नर करम बिहारा’ में जैसा को तैसा संदेश निहित है। “मंत्री मन के घमंड” कहानी में राजा द्वारा प्रजा को बुद्धिमान समझा जाना एक तरह से प्रजा का सम्मान करना ही है। “चोर के ईमानदारी” भी उन वरिष्ठ जन को किसी सीमा तक सीख देती है जो अपनी ही संतान में भेदभाव करते हैं। “बसन्त अउ बसन्ती” कथा में पक्षी- प्रेम का आदर्श है जो कि हमें किसी हद तक ‘जायसी’ के “पद्मावत” की याद दिलाता है ,जिसमें तोते ने नायिका के पक्ष में अपनी सकारात्मक उपस्थिति का प्रमाण दिया था। लोककथा में अंततः अभिशप्त नागराज कुमारी का पुनः राजकुमार के रूप में आ जाना एक सकारात्मक संदेश है। यह लोककथा ग्रामीण परिवेश और विशेष कर ‘द्युत- क्रीडा’ प्रेमी मनुष्यों के लिए बहुत बड़ा संदेश देती है। द्युत क्रीडा किस प्रकार से मनुष्य को मनुष्यता से पतित कर सकती है ,यह इस लोक कथा में परिलक्षित होता है। यह महाभारत के मूल कथा को चुनौती देती है। “मनखे के भाई सांप” में ग्रामीण – धार्मिक, सामाजिक- राजनीतिक रीति- रिवाज का भी वर्णन है और अंत में इस युगीन सत्य का सत्यापन है कि मनुष्य को परोपकारी होना चाहिए इसी से विश्व का कल्याण संभव है। “भाटा ऊपर कांटा” कथा भी वरिष्ठ जन के लिए सीख है और इस प्रकार हम देखते हैं कि यह पूरी पुस्तक अनेक तरह से सकारात्मक संभावनाओं से युक्त उद्धरण लोककथाओं के माध्यम से प्रस्तुत करती है, जिसमे पर्यावरण , सामाजिकता, विश्व- कल्याण जैसे अनेक आदर्श प्रस्तुत किए गए हैं ।यह पुस्तक निश्चित रूप से समाज और शोधार्थियों के लिए बहुत ही उपयोगी और संग्रहणीय है ।
वीरेंद्र जी की अगली पुस्तक की प्रतीक्षा उनके पाठकों को बनी रहेगी।
डॉ. मृणालिका ओझा
16 मार्च 2025
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डॉ. मृणालिका ओझा
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