छत्तीसगढ़ी कविताओं में होली

वसन्त ऋतु की मस्ती और मादकता की पराकाष्ठा को ही मैं होली मानता हूँ। धार्मिक मान्यताओं के साथ ही प्रकृति का बहुरंगी स्वरूप है होली का पर्व। मानव के साथ ही वनस्पति और जीव-जन्तु भी होली के नशे में डूब जाते हैं। कवियों की कलम पिचकारी की तरह आल्हादित भावों के रंग बिखेरने लगती है। इस अवसर पर कविताएँ और गीत हृदय से जन्म लेते हैं इसी कारण हृदय को सहज ही छू लेते हैं। छत्तीसगढ़ के अनेक कवियों ने छत्तीसगढ़ी भाषा में होली के आनंद को अपनी-अपनी अनुभूतियों के रूप में शब्दांकित किया है। वैसे तो प्रायः प्रत्येक कवि की कलम से होली की कविताओं ने जन्म लिया है किंतु मैं यहाँ अपने संकलन में उपलब्ध कवियों की कविताओं की झलकियाँ मात्र प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूँ –
जनकवि कोदूराम दलित के इस गीत में प्रकृति चित्रण के साथ ही ग्रामीण अंचल में रिश्तों के जाल की मधुर बुनावट है –
होले तिहार बड़ निक लागे, सबके मन-मा उमंग जागे।
समधिन मारे पिचकारी, समधी ला बड़ सुख-सुख लागे।।
आमा मऊँरिन, परसा मन,पहिरिन केसरिया हार
जाड़-घाम दुन्नो चल देइन अपन-अपन ससुरार
का बस्ती, का वन-उपवन, कण-कण मा खुशिहाली छागे।।
मंगलू घर के नवा मंडलिन, घिव-मा बरा पकाय
जी छुट्टा मंगलू मंडल हर, चोरा-चोरा के खाय
जब मंडलिन गुरेरे आँखी, तब बारी कोती भागे।।
कवि, गीतकार और गायक लक्ष्मण मस्तुरिया का गीत
मन डोले रे माघ-फागुनवा, रस घोरे रे माघ-फागुनवा।
राजा बरोबर लगे मऊरे आमा, रानी साहीं परसा फुलवा।।
ठीक वैसे ही छत्तीसगढ़ी होली गीतों का प्रतिनिधि गीत बना हुआ है जैसे के हिन्दी फिल्मों के गीतों में फ़िल्म मदर इंडिया का गीत “होली आई रे कन्हाई”
कवि रघुवीर अग्रवाल “पथिक” ने अपनी कविता में “परी” का भी उल्लेख किया गया है। छत्तीसगढ़ के नाचा में पुरुष ही महिला पात्र बनते हैं, इन्हें ही परी कहा जाता है। होली की मस्ती में कुछ युवक भी परी का रूप धारण कर लेते हैं –
होली मा तो रंग-रंग के देखत रहौ नजारा।
कहुँचे नाचै परी झुमर के, घमकत हवै नगारा।
मन हरियागे होली आगे, लेके नवा कहानी।
गाँव सहर अउ गली गली ला, मिलगे नवा जवानी।
कवि अनिरूद्ध नीरव ने होली के सुकोमल भावों को दोहों के माध्यम से चित्रित किया है –
कांच कुंआरी मांग में, काबर भरे अबीर।
भेटों तो माया लगे, नइ भेटों बड़ पीर।।
गोर गदावत देह में, अइसन फबे गुलाल।
डबकत गोरस में हवे, परसा रंग घोराल।।
हास्य व्यंग्य के सशक्त हस्ताक्षर गीतकार रामेश्वर वैष्णव अपनी विशिष्ट शैली में कहते हैं –
अइसे मजा आगे संगी होली तिहार के
डोकरा ह ग डोकरी ल बलाइस सीटी पार के।।
कवि सुशील यदु फागुन महीने में होली की उमंग में झूमते हुए, शब्दों के रंगीन चित्र उकेर देते हैं –
छलके रंग चोरो-बोरो
लइकन खुसी होके मगन ठमके-ठमके
एसओ होरी तिहार माते झमाझम
रंगझांझर हो झमके-झमके।
गीतकार सीताराम साहू “श्याम” के गीत में उनके अवलोकन की सूक्ष्मता देखिए। वे आँखों में हिरणी की चंचलता भी देख रहे हैं –
मन झुम्मर-झुम्मर जाये, फागुन के आरो पा के
आँखी मिरगिन असन मेंछराये, फागुन के आरो पाके।।
गीतकार बद्रीविशाल परमानंद छोटी-छोटी पंक्तियों में सर्वहारा वर्ग की पीड़ा को होली के प्रतिमानों में व्यक्त कर देते हैं –
नून बासी ला सपेट / होरी खेलत हे बनिहार के पेट
लहू पछीना के रंग घोराये/ जाँगर के धुर्रा गुलाल उड़ाये
माई पिल्ला समेत / होरी खेलत हे बनिहार के पेट
कवि रामेश्वर शर्मा अपनी कविता में वृद्ध की उमंग को देखते हुए उसमें दूल्हे की उत्श्रृंखलता को महसूस कर रहे हैं –
फागुन के तिहार म डोकरा ल देख
कइसन दूल्हा लागे
श्रृंगार के सशक्त कवि केदार दुबे होली में सर्राना भला कैसे भूल सकते हैं ?
स र र र र र र र र रंग उड़ावय
धरे अबीरा धूम मचाये रे फगुनवा
रंगव रे रंग रसिया हो
आज होरी खेलव मिलके
वरिष्ठ पीढ़ी के कवियों से आशीर्वाद प्राप्त करते हुए वर्तमान पीढ़ी के कवि भी होली को अपनी कविताओं में उकेरना सीख गए हैं।
छंदकार रमेश चौहान अपने उद्गार रोला छन्द में व्यक्त करते हुए कहते हैं –
पिचकारी के रंग, मया ले गदगद लागे।
उड़े हवा म गुलाल, मया के बदरी छागे।।
रंग-रंग के रंग, देख मुँह लइका भागे।
मया म हे मदहोश, रंग के नशा म माते।।
इस आलेख के लेखक अरुण कुमार निगम ने अपने आल्हा छन्द गीत में बिरहन सैनिक-पत्नी की पीड़ा को शब्दांकित करते हुए लिखा है –
बइरी बनगे उँकर नौकरी, मन ला कइसे भावय रंग।
पारसिवाना पहरी सजना, जोहँय कब हो जाही जंग।।
सैनिक के घरवाला मन के, सुरता करथे कोन तियाग।
घुनही होगे हवय बँसुरिया,कइसे सुर मा निकलय राग।।
छंदकार सूर्यकान्त गुप्ता पुराने दिनों की याद करते हुए अपने छन्द में हास्य का पुट भी ले आते हैं –
कइसे बदलँव अपन आप ला, खोजत हँव दिन जुन्ना जी।
आये हे होली तिहार पर, लगत हवय घर सुन्ना जी।।
काकर सँग बोलँव बतियावँव भाव प्रेम के बिन उमड़े
गँउटनीन तिर होवत रहिथे दिनभर तुन्नक तुन्ना जी।।
छंदकार मिलन मलरिहा अपने दोहे में वर्तमान समय की विसंगति को देखते हुए कहते हैं –
नेता होली मा रमे, जनता पथरा खाय।
धधकत हे दिल्ली हमर, आगी कोन धराय।।
छंदकार चोवाराम “बादल” आध्यात्म के साथ ही सामाजिक समरसता का संदेश देते हैं –
कतको बड़े कुबेर, चले गिस हाथ हलाके।
बड़े बड़े बलवान, झरिन जस बोइर पाके।
डोरी कस झन अइँठ, टूटबे खाके झटका
गाल फुलाना छोंड़, सीख ले हँसी ठिठोली।
इरखा कचरा बार, मना ले सुग्घर होली।
छंदकार दिलीप कुमार वर्मा के रोला छन्द में रिश्तों का माधुर्य देखिए –
बुढ़वा दिखे मतंग, छेड़खानी मन भाये।
लइका होय जवान, उपद्रव अबड़ मचाये।
भइया भौजी संग, आज फगुवा हे गावत।
नोनी हे सरबोर, दिखय नइ तनिक लजाये।
छंदकार इंजी. गजानंद पात्रे “सत्यबोध” होली की शुभकामनाओं के साथ ही पर्यावरण को शुद्ध रखने का अनुरोध कर रहे हैं –
होरी के शुभकामना, देवत हवँव अशेष।
गाँव शहर पर्यावरण, शुद्ध रखव परिवेश।।
छंदकार कन्हैया साहू “अमित” दो पंक्तियों के दोहे में विश्व बंधुत्व का संदेश दे रहे हैं –
रंगव सब ला एक मा, का के अपन बिरान।
सतरंगी सुमता अमित, होरी के पहिचान।
छंदकार अजय अमृतांशु भी दोहे की दो पंक्तियों में विश्व शांति की कल्पना कर रहे हैं –
आँसों होरी मा सबो, धरव शांति के भेष।
मेल जोल जब बाढ़ही, मिट जाही सब द्वेष।।
छंदकार मनीराम साहू “मितान” नशा मुक्ति का संदेश दे रहे हैं –
होरी के तैं ओखी करके, झन पी बाबू दारू भांग।
मति मर जाथे नशा करे ले, हो जाथे गा ऊटपुटांग।
छंदकार जीतेन्द्र वर्मा “खैरझिटिया” मेरा-तेरा के भेद को मिटाकर अंतस खोलने का संदेश दे रहे हैं –
छोड़ तोर अउ मोर, तभे होली हे होली।
मिल अन्तस् ला खोल, बोल मधुरस कस बोली।
छंदकार सुखदेव सिंह ‘अहिलेश्वर’ वृक्ष न काटने का संकल्प लेती नयी पीढ़ी की बात कहते हैं –
नवा नवा लइका मन समझिन, धरती माँ के दुख ला।
चलव बढ़ाबो होले कहिके, अब नइ काटँय रुख ला।।
छंदकार बोधनराम निषादराज छन्द त्रिभंगी में होली का चित्र खींचते हुए कहते हैं –
होली के आवन,बड़ मन भावन,चारों कोती,शोर उड़ै।
मन मा खुशहाली,रंग गुलाली,गली मुहल्ला,खोर उड़ै।।
फागुन के मस्ती,छाए बस्ती,लइका बुढ़वा,खेल करै।
होली हुड़दंगा,मन रख चंगा,मनखे-मनखे,मेल करै।।
छंदकार द्वारिकाप्रसाद लहरे ईंधन की समस्या को रेखांकित करते हुए कहते हैं –
मिले नहीं जी लकड़ी छेना,खेत-खार अउ डोली मा।
कहाँ होलिका हा जर पाही,ए आँसों के होली मा।।
छंदकार ईश्वर लाल “आरुग” का मानना है कि प्रेम-रंग के लिए पिचकारी की आवश्यकता ही नहीं है –
कोन अपन हे कोन पराया, काखर का चिन्हारी।
रंग मया के डारे बर रे, नइ लागय पिचकारी।।
छंदकार विजेन्द्र वर्मा के सवैया की दो पंक्तियों में होली देखिए –
मया रंग लाली गुलाबी हवै जी लगावौ सबो ला दुबारा इहाँ।
समे आज काहै बनौ जी नशा छोड़ के तो सबो के सहारा इहाँ।
छंदकार राजकुमार चौधरी भी प्रेम प्रकट करते हुए कहते हैं –
फागुन के रंगबाज महुँ हर घोर देहूँ,
कहिके सराररा तोला मया मा चिभोर देहूँ
छंदकार कमलेश वर्मा का विश्वास है कि दया-मया का रंग डालने से बैर भाव स्वतः नष्ट हो जाता है –
बैर भाव बिसराय के, होली हरे तिहार।
दया मया के रंग ला, सबके उप्पर डार।।
छंदकार ओमप्रकाश साहू “अंकुर” छन्नपकैया छन्द में कहते हैं –
छन्न पकैया छन्न पकैया, रंग लगा के भागे ।
फाग गीत जुर मिल के गावे, फागुन महिना आगे ।।
छंदकार बृजलाल दावना के छन्द से ज्ञात होता है कि ग्रामीण परिवेश में छत्तीसगढ़ की परम्पराएँ आज भी अक्षुण्ण हैं –
नाचे डंडा नाच, बबा हा कुहकी पारे।
गाए फगुवा गीत, सबो के जाय दुवारे।।
परंपरा ला आज, बचाके रखे हवै गा।
फूहड़ता ले दूर, संस्कृति रचे हवै गा।।
छंदकार गुमान प्रसाद साहू अपनी चौपाई में ब्रज की होली के दर्शन करा रहे हैं –
खेलत हावै ब्रज मा होरी।श्याम संग मा राधा गोरी।।
संग बिसाखा ललिता हावै।रंग बिरंगी रंग लगावै।।
छंदकार राजेश कुमार निषाद होली के बहाने अपनी बोली के महत्व को बता रहे हैं कि गुरतुर बोली ही प्रेम भाव में बाँधे रखती है –
महिना फागुन गजब सुहाथे, आथे जब गा होली।
मया पिरित ला बाँधे रखथे,गुरतुर हमरो बोली।।
छंदकार मुकेश उइके “मयारू अपने भाव शक्ति छन्द में अभिव्यक्त कर रहे हैं –
मजा देख लेवत, हवैं फाग के।
जुड़े पोठ हमरो, मया ताग के।।
छंदकार अनुज छत्तीसगढ़िया क्षणभंगुर जीवन का आनंद उठाने के लिए अच्छी सलाह दे रहे हैं –
जिनगी हे दिन चार, गोठिया हँसी ठिठोली।
भर पिचकारी मार, खेल तँय मन भर होली।।
छंदकार हेमलाल सहारे कहते हैं –
चोरो-बोरो होहीं, बारा हाल।
जमके खेलन होरी, ऐसो साल।
छंदकार कमलेश प्रसाद शरमाबाबू रंगव से बदरंग हुए चेहरे में भी सौंदर्य देखते हैं –
दिखथें जी बदरंग वो, होली के दिन आज।
आथे येमा बड़ मजा, नइ लागय जी लाज।।
छंदकार भागवत प्रसाद सामाजिक समरसता का मूलमंत्र देते हुए कहते हैं –
जाति पाँति ला त्याग के, सुघ्घर परब मनाव।
बँधै प्रेम के डोर हा, अइसन रंग लगाव।।
छंदकार श्लेष चन्द्राकर होली के अलकरहा स्वरूप पर चिंता करते हुए कहते हैं –
अलकरहा होली परब, आज मनाथें लोग।
चिखला वार्निश पेंट के, करत हवय उपयोग।।
छंदकार सुरेश पैगवार नयी बहू और ननद के रिश्ते पर लिखते हैं –
नवा बहुरिया झेंपथे, खेले बर जी फाग।
ननद बइठथे तीर मा, तभ्भे बनथे राग।।
नवोदित छंदकार देव हीरा “लहरी” अपनी कविता में छत्तीसगढ़ की परम्परा को रेखांकित कर रहे हैं। अंचल में नव विवाहिताएँ पहली होली अपने मायके में मनाती हैं –
मयारू के पहिली होरी, काहय मोला घेरी बेरी
मइके जाय के तियारी, करत हवे मोर सुवारी
झन जा पारँव गोहार, आगे फागुन तिहार
होली के त्यौहार में महिलाएँ अब केवल रसोई में पकवान बनाने तक सीमित नहीं रह गई हैं, वे भी अपने उद्गार अपनी सशक्त लेखनी के माध्यम से प्रकट कर रही हैं –
छंदकार शकुन्तला शर्मा होरी को कुछ इस तरह से परिभाषित करती हैं –
होरी के तिहार सिखोथे समर्पण भाव के महिमा ल।
होरी शब्द के अर्थ विसर्जन समझव एकर गरिमा ल।।
कवयित्री सपना निगम
आबे आबे कान्हा तँय, मोर अंगना दुवारी
फागुन के महिना मा, होली खेली के दारी
छत्तीसगढ़िया मनखे हमन, यही हमर चिन्हारी
तोर संग होली खेले के, आज हमर हे बारी, रंग बगरे हे।
छंदकार आशा देशमुख भी अपनी कविता में बैर भाव को मिटाने का संदेश दे रही हैं –
फागुन के अँगना मा आये, मया रंग धर के होली।
बैर भाव ला लेसव बारव, पाटव इरखा के खाई।
छंदकार वसंती वर्मा प्रकृति के सौंदर्य के साथ ही सास और बहू को होली खेलते हुए देख रही हैं –
लाली लाली परसा फूले,आगे फागुन मास।
धर पिचकारी होरी खेलें,देख बहुरिया सास।।
छंदकार शशि साहू अपने उद्गार सवैया में प्रकट करते हुए लिखती हैं –
जाड़ जनाय न घाम जरोवय आय हवे ऋतुराज सुहावना।
अंग सरी पिंवराय दिखे जइसे दुलही भँवरावत आँगना।।
छंदकार गीता विश्वकर्मा पावन रिश्तों की गरिमा को रेखांकित कर रही हैं –
देवर ह भौजी ल रंग में फेर बोरही
भइया अपन सारी बर चटक रंग घोरही
छंदकार मीता अग्रवाल नशा के दुष्प्रभावों को बताते हुए कहती हैं –
नसा करव झन, खेलव होरी, होय रंग मा भंग।
मार काट मा मति नष्ट हो, अइसन का हुड़दंग।।
छंदकार केवरा मीरा यदु की कविता वृन्दावन के दृश्य को उकेर देती है –
बृंदाबन के कुंज गलिन में,उड़गे लाल गुलाल।
होली के हुड़दंग मचे हे,नाचत दे दे ताल। जोगीरा सरारा
इसी क्रम में छंदकार चित्रा श्रीवास की पंक्तियाँ –
होली फागुन लाय हे,खेलव संगी संग।
चारो कोती छाय हे,देखव आज उमंग।।
छंदकार शुचि “भवि” भांग का विकल्प बता रही हैं –
छन्न पकैया छन्न पकैया, कइसे मिलही माफ़ी
होली मा जब भांग छोड़के, पीहू सब झन काफ़ी।।
छंदकार द्रोपती साहू “सरसिज” की पंक्तियों में प्रेम की पराकाष्ठा देखिए –
रंग लगाबे ये फागुन मा, जीयत भर जे झन छूटय।
मया डोर ला बाँधे रखबे, टोरे ककरो झन टूटय।।
छंदकार चमेली नेताम “सुवासिता होली में मर्यादा का पालन करने का संदेश दे रही हैं –
होली मा हर लोग मन, रहिथें जी आजाद।
पीके दारू भांग पर, भुलिहव झन मरजाद।।
छंदकार सुमित्रा शिशिर होली की मुख्य शर्त को रेखांकित करते हुए कहती हैं –
जेकर अँगना सुख के बरसा, ओकर होथे होली।
चारो कोती अँजोर बगरे, हाँसय बोलँय बोली।।
इस प्रकार हम देखते हैं कि होली के पावन पर्व पर पुराने से लेकर नए कवियों तक होली के गीत जनमानस को एकता में रंग में रंग रहे हैं। कविताओं में निहित संदेश ही किसी भी देश में सुख-शांति ला सकता है। होली के गीत न केवल मनोरंजक होते हैं, बल्कि समाज सुधार के लिए भी सशक्त माध्यम होते हैं।
अरुण कुमार निगम
दुर्ग, छत्तीसगढ़