तुलसीदास का स्वप्न और आधुनिक भारत की विडंबना

भारत वार्ता के फरवरी अंक में भी पढ़िए –
भक्ति आंदोलन की परवर्ती सगुण काव्यधारा की रामभक्ति शाखा के प्रतिनिधि कवि हैं गोस्वामी तुलसीदास। इनके संपूर्ण काव्य को लेकर हिन्दी आलोचना में बहुत कुछ लिखा-पढ़ा गया है। इनके काव्य के आलोचकों की प्रमुख रूप से तीन कोटियाँ हैं। पहली कोटि में वे आलोचक हैं जो इनके काव्य के वैशिष्ट्य को निरूपित करते हैं। इनके काव्य से ही अपनी आलोचना के प्रतिमान निर्मित करते हैं। इस कोटि के समस्त आलोचकों का प्रतिनिधित्व करते हैं आचार्य रामचंद्र शुक्ल। कुछ अंतर के साथ आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी भी इसी कोटि में शामिल किए जा सकते हैं। रामचंद्र शुक्ल काव्य में लोकमंगल की अवधारणा को सामने लाते हैं। तुलसी उनके आदर्श एवं प्रिय कवि हैं। वे तुलसी में उच्चकोटि की काव्यकला की बात तो करते ही हैं; बल्कि उनकी वैचारिकी एवं उनके स्वप्न जिसमें रामराज्य की यूटोपियाई अवधारणा शामिल है – सबके पक्ष में खड़े नज़र आते हैं। तुलसी के रामराज्य के स्वप्न में वर्णाश्रम भी शामिल है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल इस मुद्दे पर तुलसी के साथ हैं। तुलसी का लोकप्रिय महाकाव्य ‘रामचरितमानस’ न केवल एक महाकाव्य है; बल्कि वह उत्तरभारत के हिन्दू सनातन धर्मावलंबियों के लिए आस्था का ग्रंथ भी है।
इनके अलावा एक कोटि उन आलोचकों की है जिन्होंने तुलसी काव्य के प्रगतिशील और मानवीय पहलुओं को उभारने की कोशिश की है। ऐसे ही प्रगतिशील और मार्क्सवादी आलोचकों में डॉ.रामविलास शर्मा, डॉ.विश्वनाथ त्रिपाठी एवं रमेश कुंतल मेघ आदि के नाम लिए जा सकते हैं। इन आलोचकों के बरक्स रांगेय राघव, शिवदान सिंह चौहान और यशपाल आदि ने तुलसी काव्य के नकारात्मक पहलुओं को सामने लाने की कोशिश की है। वही हिन्दी कवि मुक्तिबोध ने भक्ति आंदोलन की निर्गुण काव्यधारा को क्रांतिकारी चेतना से संपन्न माना है तो सगुण काव्यधारा को रूढ़िवादी,परंपरावादी एवं पुरातनपंथी माना है। उनका मानना है कि सगुण भक्ति काव्य निर्गुण काव्य की क्रांतिकारी चेतना को दबाने और ढँकने का कार्य करता है। बहरहाल,एक कोटि उन आलोचकों की है जो तुलसी काव्य को उनके अंतर्विरोधों और समस्त अच्छे-बुरे पहलुओं के साथ सामने लाना चाहता है। मेरे गुरुवर आचार्य शिवकुमार मिश्र इसी कोटि के मार्क्सवादी आलोचक हैं। अब मैं मूल मुद्दे पर आता हूँ । इधर तुलसी काव्य की कुछ विसंगतियों एवं उनके अंतर्विरोधों को लेकर उत्तरभारत की राजनीति में घमासान मचा हुआ है। आप सब विज्ञजन हैं और उन विवादों से परिचित हैं। मैं उन बातों या काव्य की पंक्तियों को यहाँ दुहराना नहीं चाहता या उनके निर्वचन में फँसना भी मेरा अभीष्ट नहीं है। मैं केवल यहाँ यह बताना चाहता हूँ कि जहाँ भक्ति आंदोलन के सूत्रधार और ज्ञानमार्गी संत कबीर या बाद में रैदास और अन्य संतों ने जो आवाज़ पैदा की, वह मनुष्यता की आवाज़ है। कबीर और उनके परवर्ती संतों ने भी वर्ण और जाति के समूल उच्छेदन की बात की है और एक ऐसे समाज का स्वप्न देखा है जहाँ सब बराबर होंगे। कबीर ने अमरपुर का तो रैदास ने बेग़मपुर का स्वप्न देखा जहाँ न कोई ब्राह्मण होगा, न शूद्र;जहाँ न कोई ऊँच होगा न नीच;न कोई अमीर होगा न कोई ग़रीब ;जहाँ किसी को अन्न की कमी न होगी और सब प्रसन्न होंगे। तुलसी के रामराज्य के स्वप्न में वर्ण और जाति बने रहेंगे,मगर कबीर के अमरपुर या रैदास के बेग़मपुर में वर्ण या जाति या किसी तरह के सामाजिक भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं होगी। दरअसल यह भी जानना चाहिए कि हमारे समाज में इन दो धाराओं के बीच सदियों से टकराव पैदा होता रहा है। आज जब यह बहसतलब मुद्दा है तो हमें साफ़-साफ़ स्टैन्ड लेने की ज़रूरत है कि हम किस धारा के साथ खड़े हैं। यह मध्यकाल नहीं है,बल्कि आधुनिक काल है। हमें आज़ादी हासिल किए 78 साल हो रहे हैं। हमारे पास एक संविधान है जिसे आधुनिक विश्व के परिप्रेक्ष्य में बाबा साहब डॉ.भीमराव अंबेडकर ने तैयार किया था। आधुनिक समय में हम वर्ण और जाति की वक़ालत कदापि नहीं कर सकते हैं। कबीर और रैदास और उनके परवर्ती संतों ने अगर वर्ण-जाति और तमाम रूढ़ियों या पोंगापंथ के विरोध में आवाज़ बुलंद की है तो यह उनकी आधुनिक चेतना को ही सामने लाता है। अगर तुलसी ने वर्ण या जाति को बनाए रखने की बात की है तो वह कतई आज के समय में स्वीकार्य नहीं हो सकता है। यह दीगर बात है कि वे उच्चकोटि के विद्वान,भाषाविद् और कला की सूक्ष्मताओं से संपृक्त कवि हैं। उनके काव्य में ऐसी तमाम पंक्तियाँ मिल सकती हैं जो हमारी संवेदना का स्पर्श करें और हमें विवेकवान बनायें,मगर इस एक (वर्ण व जाति) मुद्दे पर वे आज के समय में वैचारिक रूप से कमज़ोर और पिछड़े प्रतीत होते हैं।
हमें उनके संपूर्ण काव्य का मूल्यांकन करते समय उनकी सीमाओं को ध्यान में रखने की ज़रूरत है। रही बात उनके महाकाव्य ‘रामचरित मानस’ को जलाने या नष्ट करने की तो यह विशुद्ध रूप से राजनीति और वोटबैंक का मामला है। आज उनके काव्यग्रंथ को संशोधित करने या प्रतिबंधित करने की माँग भी चुनावी राजनीति का हिस्सा भर है। जिस तरह सपा के महासचिव स्वामीप्रसाद मौर्य का तुलसीदास के काव्य को लेकर दिया गया बयान चुनावी राजनीति का हिस्सा है,उसी तरह बिहार के शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर का बयान भी चुनावी लाभ-हानि को ध्यान में रखकर दिया गया है। इधर आर.एस.एस.प्रमुख मोहन भागवत का बयान कि ‘पंडितों ने वर्ण और जाति का निर्माण किया ‘- कहीं से तार्किक या सुसंगत नहीं जान पड़ता है। यह बयान भी वोटबैंक को ध्यान में रखकर दिया गया है। हिन्दी कवि-कथाकार एवं नाटककार प्रसाद ने अपने नाटक ‘ध्रुवस्वामिनी’ में एक जगह बहुत ही सटीक लिखा है कि ‘सच है जब वीरता भागती है तो राजनीति के चरणों से छल-छंद की धूल उड़ती है।’ आज समकालीन भारतीय राजनीति नें सिर्फ़ छल का छंद बचा हुआ है। वीरत्व ग़ायब है। हमें पाठकों के विवेक पर छोड़ देना चाहिए कि वह
कबीर,रैदास,सूर,तुलसी,रहीम या अन्य मध्यकालीन कवियों के काव्य से क्या ग्रहण करता है और क्या त्याज्य समझता है। दूसरी बात कि किसी भी कवि को उसके युगीन संदर्भों या तत्कालीन समय से अलग कर नहीं देखा जा सकता है। बहस हो और ख़ूब हो,परंतु साहित्य में,विशेषकर आलोचना में गाली-गलौज़ के लिए कोई जगह नहीं हो सकती है। अगर तुलसीदास अपनी रामकथा में शंबूक वध और सीता की अग्निपरीक्षा को कोई जगह नहीं देते हैं तो यह निश्चय ही युगीन संदर्भों में उनके पूर्ववर्ती संत कवियों के आंदोलन का ही दबाव रहा होगा। तुलसी ने अपनी तरह से परिवर्तित समय को पहचानने की कोशिश ज़रूर की है। हर कवि की अपनी युगीन सीमाएँ और दृष्टि होती है। बहरहाल, इसी तरह के टकरावों से हमारा समय और समाज बदलता रहा है और कमज़ोर एवं पिछड़े विचार कालांतर में दब जाते रहे हैं।
🔘चंद्रेश्वर
सेवानिवृत्त प्रोफ़ेसर एवं विभागाध्यक्ष,हिन्दी
एम.एल.के.पी.जी.कॉलेज,बलरामपुर,उत्तर प्रदेश
मोबाइल नंबर –7355644658