May 3, 2026
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समीक्षक : ऋषि गजपाल
पाठ – इक्कीस
“ किधर जाऊं “
लेखक – किशन लाल
सर्वप्रिय प्रकाशन – २०१७ ( प्रथम संस्करण )
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‘ चार कोस में बानी अउ आठ कोस में पानी ‘ कहावत हर भू-भाग में लागू होती थी लेकिन नई सदी में घर-घर नल से क्लोरीनयुक्त एक-स्वाद पानी और मोबाईल फोन की कट्टर यारी से एकरस होती जा रही बानी ने सब झुठला दिया है | हालाँकि धुर ग्रामीण भू-भागों में अभी भी यह तासीर कहीं-कहीं महसूस की जा सकती है | छत्तीसगढ़ में दलित चेतना का उभार उस तरह नहीं हो पाया जिस तरह महाराष्ट्र या कर्नाटक या उड़ीसा-बिहार में देखा जाता है इसलिए वहां के दलित साहित्य अन्य राज्यों की अपेक्षा ज्यादा प्रभावकारी ढंग से विपुल मात्र में उपलब्ध हुए | गिरती शैक्षणिक स्थिति के कारण सामाजिक सजगता और राजनैतिक प्रतिबद्धता भी असरकारक नहीं रही | अंचल के योग्य और जुझारू पत्रकार किशन लाल ने दस साल पहले अपना पहला उपन्यास “ किधर जाऊं “ दलित समाज को केंद्र में रखकर लिखा तो इसे प्रकाशन स्थल लखनऊ ने प्रमुखता से छापा और प्रथम लोकोदय सम्मान से सम्मानित भी किया | एक तिरस्कृत मोची जाति के परिवार को केंद्र में रखकर लिखे बेहद संवेदनशील कृति को हालाँकि अपेक्षित बेहतर प्रतिसाद नहीं मिल पाया |
यह लेखक की द्वितीय कृति थी इसके पहले “ जहाँ कवि होगा “ कविता संग्रह किताब शक्ल में आ चुकी थी | इस उपन्यास को सर्वप्रथम दिल्ली से निकलने वाली पत्रिका “ बया “ ने इसमें निहित संभावनाओं को देखते हुए सम्पूर्ण छापा लेकिन शायद प्रकाशक-लेखक का तालमेल उस तरह से नहीं बैठ पाया होगा जिससे यह उनके ही अंतिका प्रकाशन से छप सकने की गुंजाइश नहीं बनी | बहरहाल डेढ़ सौ पेज के इस उपन्यास को आप महज छः घंटे में पढ़ सकते हैं क्योंकि एक बार इसे पढ़ना शुरू करने के बाद शायद और कोई दूसरा काम न कर पायें ऐसा मेरा अनुभव रहा है | इतना सान्द्र , इतना करूण , इतना बेबाक उपन्यास कैसे लिखा जा सकता है बिना निजी अनुभव-प्रमाण के | दलित साहित्य की अधिकतर कृति संस्मरण या जीवनी ही लगती है भले ही उसे उपन्यास या कहानी के खांचे में फीट कर दिया जाय | प्रसिद्ध व्यंग्यकार विनोद साव सही कहते हैं कि दलित साहित्य में केन्द्रीय विधा ‘ आत्मकथा ‘ हो गई है और गद्य लिखने वाले अधिकांश लेखक आत्मकथाओं से ही अपना लेखन आरम्भ करते हैं | इस यथार्थ-बोध में परिवेश की जीवन्तता की पूरी गुंजाइश तभी हो सकती है जब लेखक अपने दलित समाज का प्रतिनिधि व्यक्ति होगा | निश्चित ही उसने उस घोर यन्त्रणा को जन्म से लेकर अंत तक देखा भोगा होता होता है और तथाकथित सभी समाज में परिवार को तिल तिल मरते खपते देखा होता है |
महाराष्ट्र के यशस्वी साहित्यकार शरण कुमार लिम्बाले की चार दशक पहले प्रकाशित “ अक्करमाशी “ इस मामले में एक आदर्श रचना और आँख खोल देने वाली रचना थी जिसने दलित साहित्य को विशेषकर गद्य को जनमानस के केंद्र में मुखरता से लाने का काम किया | वहाँ स्थिति यह है कि कोई कृति पहले मूल रूप से मराठी में छप कर आती है और पाठकों की मांग पर बाद में हिंदी में आती है | यहाँ स्थिति इसके उलट है | मुझे लगता है यह कृति भी अनुवाद के रूप में छत्तीसगढ़ी में अगर आएगी तो तहलका मचाएगी और समग्रता में नये सिरे से सोचने को मजबूर करेगी | दरअसल राजनैतिक चेतना ही वह मुख्य बिन्दू है जो समाज में आमूलचूल परिवर्तन लाने का काम कर सकती है | आजादी के बाद राजनीतिक स्तर पर जिस समाज ने स्थिति को बेहतर समझा उसे ही अपने हक और समझ का वाजिब अवसर मिल सका |
उपन्यास में अंचल के एक पिछड़े गाँव के मोची परिवार में जन्मे पले बढ़े युवक सूरज की यह संघर्षमयी दास्तान जितनी करुणामय है उतनी ही भयावह और चिंतनीय भी | हर गाँव में अति पिछड़ी जाति के दो चार परिवार होते ही हैं जिनकी व्यवस्था के तहत अंतिम छोर पर अछूत की तरह रहने की व्यवस्था कर दी जाती है और उसी जातिगत व्यवस्था के तहत ग्रामीण स्तर पर जातिगत रोजगार की व्यवस्था भी कराई जाती है | लेकिन अति निम्न स्तर तक की जीवन शैली जीते हुए कई स्तरों पर उन्हें अपमान और उपेक्षा झेलनी होती है रोजीना | यह अनुभव की बात है और जिसने ही इसे देखा या भोगा होता है वही इस भयानक पीड़ा के दंश को भीतर तक महसूस कर सकता है | उपन्यास का नायक अपनी माँ की उत्कट जिजीविषा और अपनी लगन से ग्रेजुएट स्तर की शिक्षा ग्रहण कर पाता है और रोजगार की तलाश में गाँव कस्बे से होकर शहर का रुख करते हुए भिन्न किस्म के दोयम दर्जे के व्यवहार से सामना करता है और फिर वह अंततः कपटी व्यवस्था में निराश और उत्तेजित होता है | भूख के अलावा असुरक्षा और अपमान की पीड़ा ने उसे दोराहे नहीं बल्कि चौराहे पर खड़ा कर दिया है | अंततः सारी दिशाएं जब धुंधली दिखने लगती हैं तो एक मात्र विद्रोह का रास्ता ही बचता है जिसे न सरकार पसंद करती है और न समाज लेकिन व्यस्कता की दहलीज पर पहुंचा नायक यकबयक तय नहीं कर पाया कि किधर जाए |
छत्तीसगढ़ के दलित साहित्य में इस उपन्यास को मुख्य रूप से रेखांकित किये जाने की आवश्यकता है | किशन की अपनी एक पत्रकारिता वाली भाषा है जिसे स्थानीय बोली और मुहावरों कहावतों के साथ प्रस्तुत करते हुए अपनी रचना को रोचक और पठनीय बना दिया है | रोंगटे खड़े कर देने वाले वर्णन और ब्योरे इस उपन्यास की जान है जैसे – मरे जानवर से खाल काट कर लाना फिर उसे अंतिम रूप से बाजार उत्पाद के लिए तैयार करना , उस खल नुकले जानवर का माँस भोजन के निमित्त घर लाना , ब्राम्हण जवान युवती का एक दलित मासूम बालक पर दीवानगी की हद तक आसक्त हो जाना और जातिगत विवशताओं के चलते आत्महत्या कर लेना या एक सफल वकील की इच्छा के मुताबिक दिवंगत पत्नी की डायरी को नायक सूरज द्वारा रोजगार के रूप में स्वीकार करने की मजबूरी | यह सब इतना रोचक और पठनीय है कि शुरू से अंत तक उपन्यास अपने को पढ़ा ले जाने में सक्षम है | उस विधवा माँ का अपने पुत्र से शहर में अध्ययन कर रहे और छात्रावास में रह रहे पुत्र से सप्ताह में मिलने जाने वाले दृश्य आखें नम कर देटी हैं | गाँव में पनप रहे असंतोष और बुराइयों के दलदल में फंस जाने की भयावहता को ध्यान में रखते हुए एक जवान विधवा माँ की अपने संतान के माध्यम से भविष्य को सहेजने की जद्दोजहद बेहद प्रभावकारी है | विद्वान् कुमेश्वर कुमार कहते हैं मोची समाज की दिनचर्या , काम-काज , लोक परम्परा , रीतिरिवाजों के साथ ही दलित समाज के सामाजिक-राजनैतिक संघर्षों का एक अलग ही सच इस उपन्यास में उजागर होता है |
दलित साहित्य अब केंद्र में है और इसे अच्छा प्रतिसाद भी मिल रहा है बल्कि कहना न होगा कि सरकार का ध्यान भी इस दिशा में कारगर कदम उठाने की तरफ है बशर्तें उन तक सही तरीके से बात पहुँचाय जाय और सरकार भी उसी सापेक्षता के साथ संवेदनशील और सार्थक कदम उठाये | यह सिर्फ भूख और सुविधा प्राप्त करने भर का मामला नहीं है बल्कि स्वाभिमान की रक्षा के साथ अस्तित्व को बचाए रखने का भी मुद्दा है | लोकतान्त्रिक व्यवस्था में बेहतरी की सरकारी उम्मीद करने में कोई बुराई नहीं है लेकिन साहित्य और पत्रकारिता जैसे सशक्त माध्यम को इस तरह की सार्थक रचनाओं से समृद्ध करते रहने की आवश्यकता भी है | असीम संभावनाओं से भरे किशन लाल का लिखा यह उपन्यास ‘ किधर जाऊं ‘ एक जरुरी पाठ हो सकता है व्यवस्था के लिए |

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