October 22, 2026

अंततः देख ही लिया माउंट फूजी

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डॉ सच्चिदानंद जोशी

पिछले वर्ष ओसाका एक्सपो के सिलसिले में तीन बार जापान जाना हुआ और लगभग हर बार ये विचार मन में था कि समय निकाल कर माउंट फूजी देखकर आयेंगे। ओसाका से टोकियो जाते समय किसी ने शिनकानसेन से माउंट फूजी दिखाया भी था। लेकिन जब तक नजर टिक पाती हम बहुत आगे निकल गए थे। लगभग हर यात्रा में माउंट फूजी का पानी पीकर ही संतोष करना पड़ा क्योंकि होटल में माउंट फूजी लिखी बोतलों का ही सप्लाई था।
माउंट फूजी एक अनोखा पर्वत है। यह जापान का सबसे ऊंचा और तीन पवित्र पर्वतों में से एक पर्वत है जिसकी 3776 मीटर है ।यह एक ज्वालामुखी पर्वत है और अंतिम बार यह 1707 में फटा था।कहा ये जाता है कि यह ज्वालामुखी आने वाले कुछ सालों में यह फिर फटेगा। यह टोकियो से लगभग 100 किलोमीटर दूरी पर है और यामानाशी और शीजओका प्रांतों की सीमा पर है। इसका आकार ऐसा है मानो किसी चित्रकार ने इसे अपनी सधी हुई कूची से उकेरा हो और इस पर बर्फ ऐसे जमी रहती है मानो किसी ने बड़ी सफाई से इसे हिम आच्छादित किया हो। इसे आदर से जापान में फूजी सान भी कहते हैं।यह जून 2022 यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित हुआ था ।
अप्रैल के महीने में इसका सौंदर्य निखरा रहता है। और भी कई सारी बातें थी जो इस पर्वत के बारे में पढ़ रखी थी तो जाने की उत्कंठा तो थी।
इस बार जापान यात्रा में तय था कि निर्धारित एक दो जगह न जा पाए तो चलेगा लेकिन माउंट फूजी तो अवश्य जाना है। तय हमने किया था लेकिन फिर भी फूजी का हमे दर्शन हो ही जाए ये जरूरी नहीं था। इससे पहले भी कुछ मित्र बारिश और बादल के कारण फूजी देखे बिना ही लौट आए थे। यह कहा भी जाता है कि वहां मौसम इतना अप्रत्याशित है कि केवल 10 से 15 प्रतिशत लोग ही उसे देख पाते हैं।
मौसम का अनुमान देखकर हमने उसी दिन की बस बुक करवाई जिस दिन पूर्वानुमान ब्राइट एंड सनी दिखा रहा था।उसके दो दिन पहले भी बारिश थी और दो दिन बाद भी ।मौसम विभाग के अनुमान पर भरोसा करते हुए हमने टिकट खरीदे और फूजी तथा हकोने की यात्रा पर निकले। दिल में फिर भी धुक धुकी थी कि कहीं सूरज देवता धोखा न दे जाए, कही बादल न आ जाएं , कहीं पानी न बरस जाए ।लेकिन जब टोकियो से निकलकर लगभग डेढ़ घंटा हो जाने के बाद चलती बस से फूजी सान दिखने लगे तो आशा बंधी।लगभग ढाई घंटे बाद होकोने पहुंचे। हकोने से पायरेट क्रूज़ से पोर्ट टोंगेदाई पहुंचे जहां से हमने रोपवे का सहारा लिया ऊपर के स्टॉप तक जाने के लिए । एक तरफ जहां क्रूज़ में हम ठंड से ठिठुर रहे थे वहीं रोपवे से ऊपर जाते समय आसपास जीवित ज्वालामुखी होने के कारण गर्मी महसूस हो रही थी।
अंततः जब 1044 मीटर ऊपर ओवकुंदनी पहुंचे तो एक तरफ ज्वालामुखी का नजारा था और दूसरी तरफ था माउंट फूजी का नजारा जो अपने पूरे वैभव के साथ अपनी गरिमामयी उपस्थिति दर्ज करा रहा था।
पहले जीवित ज्वालामुखी के भरपूर दर्शन किए। तीन सौ वर्षों से इसी तरह धधक रहे ज्वालामुखी को देखना अलग अनुभूति दे रहा था।
उस पठार के दूसरी तरफ से फूजी सान के दर्शन हो रहे थे। भव्य , शांत और धवल। जब आप कोई ऐसा दृश्य देखते हैं जो आपकी कल्पना से परे हो तो आप दुविधा में रहते हैं इन्हें नैनो में बसाऊं या कैमरे में कैद करूं। मोबाइल में कैमरे आने से ये दुविधा बढ़ गई है, और इस रील युग में तो दीवानगी की हद तक पहुंच गई है। लोग फोटो खींचने में , रील बनाने में ऐसे बावले हुए जा रहे थे ( जिनमें हम भी शामिल थे ) कि उस दृश्य को आंखों से देखना भूले ही जा रहे थे। जब हमारी कल्पना में हिम शिखर शब्द आता है, या जब हम पर्वत के जीवित रूप की कल्पना करते हैं तो जो छवि मन में उभरती है वही छवि सामने साकार थी। हम जापान के सबसे ऊंचे और विश्व के सातवें सबसे ऊंचे पर्वत शिखर को देख रहे थे। जैसा सम्मान हमारे यहां पर्वत राज हिमालय को है वैसा ही सम्मान जापान में फूजी सान को है। हम लोग अपनी खुशी गाकर या चिल्ला कर व्यक्त कर रहे थे और जापानी लोग शांत भाव से सामने खड़े होकर अपना श्रद्धा भाव प्रकट कर रहे थे। सिर पर कड़क धूप थी और आसपास कोई छाया का स्थान नहीं था , फिर भी ऐसा लग रहा था कि उस शिखर को निहारते ही रहें। लोग तरह तरह से फोटो खींचने को उत्सुक थे। हम भी फोटो खींचने में ,रील बनाने में लगे थे। तभी वहां लिखी एक सूचना पर नजर पड़ी कि यहां काले अंडे मिलते हैं। कहा जाता है कि एक अंडा खाने से आपकी उम्र सात साल बढ़ जाती है। हमने सोचा क्यों न हम भी कुदरत के इस ऑफर का लाभ उठाएं और एक एक अंडा चेप लें।
अंडा लेने के लिए जितनी अपेक्षा थी , लाइन उससे कम थी जो कि आश्चर्य था। मन में शैतानी भरा विचार आया कि क्या लोगों को अपनी उमर बढ़वाने में रुचि नहीं रही । खैर अपनी उमर सात साल बढ़वा कर जब हम लौट रहे थे तो ईश्वर को बार बार धन्यवाद दे रहे थे कि हम माउंट फूजी ब्राइट एंड सनी मौसम में देख पाए।
लौटते समय कुछ देर पवित्र ओशिन झरने पर और यामानाका तालाब पर भी रुकने का अवसर मिला। ओशिन झरना भी अपने सौंदर्य और साफ पानी के कारण यूनेस्को विश्व धरोहर में शामिल है। इसमें कई औषधीय गुण हैं। इसका पानी लेने के लिए लोगों का मेला लगा रहता है। श्रद्धालुओं ने इसमें इतने सिक्के डाले हैं कि तलहटी में सिर्फ सिक्के ही सिक्के नजर आते हैं। वहां प्रशासन को सिक्के न डालने की सूचना लगानी पड़ी।
यामानाका तालाब हंसों के लिए जाना जाता है। नीर क्षीर विवेक करने वाले हंसों को दाना खिलाना भी आनंददायक अनुभव है और आपको महसूस कराता है कि भोजन की प्रत्याशा में यह सुंदर दिखने वाला प्राणी भी कितना आक्रामक हो सकता है।
जब लौट रहे तब भी जहां से संभव हो फूजी सान को देखने का प्रयास कर रहे थे।और जब उसे हर कोण से अपने कैमरे में उतारने की कोशिश कर रहे थे तो यह भी देख कर आश्चर्य कर रहे कि हमारी बस में ही कुछ लोग कैसे इस सारे दृश्य से विरक्त होकर शानदार खर्राटे लेकर सो सकते हैं।
इस पूरे आख्यान का एंटी क्लाइमैक्स ये है कि दूसरे दिन टोकियो से क्योटो जाते समय शिनकानसेन से फूजी सान दिखाई दिए और ऐसे दिखाई दिए जो हमने पहले दिन की यात्रा में नहीं देखे थे।
माउंट फूजी का ये आख्यान अभी इस भावना के साथ साझा है कि कम से कम ये पढ़कर तो इस भीषण गर्मी से राहत मिल सके ।

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