May 19, 2026

मउर : गाँव की मिट्टी की गंध, लोककला की चमक और परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ी होती…

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अनिल कुमार शर्मा

एक समय था, जब गाँव में बिहाव केवल एक सामाजिक आयोजन नहीं होता था, वह लोककला, परंपरा और आत्मीयता का जीवित उत्सव हुआ करता था। उस समय दूल्हे राजा बाजार के चमचमाते मुकुट नहीं पहनते थे। वे “मउर” पहनकर बिहाव में जाते थे। यही मउर उनके लिए राजमुकुट होता था। उसमें केवल सजावट नहीं होती थी, उसमें गाँव की मिट्टी की गंध, लोककला की चमक और परिवार की प्रतिष्ठा जुड़ी होती थी।
हमारे गाँव में ऐसे मउर बनाने का काम गोलोकवासी छेदू पटेल किया करते थे। आज भी उनका नाम आते ही आँखों के सामने एक दुबला-पतला, शांत स्वभाव का लोक कलाकार खड़ा हो जाता है, जिसके हाथों में साधारण चीजें भी कला बन जाया करती थीं। वे केवल मउर नहीं बनाते थे, वे दूल्हे के सपनों को आकार देते थे।
संस्कृत का शब्द “मौलि” मूलतः मूर्धा अर्थात् सिर, शिखर या मस्तक पर धारण की जाने वाली वस्तु के अर्थ में प्रयुक्त होता है। “मौलि” का एक प्रमुख अर्थ मुकुट, किरीट, शिरोभूषण अथवा सिर पर बाँधा जाने वाला अलंकार भी है। इसी “मौलि” शब्द से प्राकृत और अपभ्रंश की ध्वन्यात्मक यात्रा के माध्यम से लोकभाषाओं में “मउर” तथा “मउरी” जैसे शब्द विकसित हुए प्रतीत होते हैं।
व्युत्पत्ति की दृष्टि से संस्कृत का “मौलि” प्राकृत में आते-आते “मोउलि/मउलि” रूप ग्रहण करता है। तत्पश्चात् अपभ्रंश एवं लोकभाषाओं में ध्वनि-संकोच और सरलीकरण के कारण “मउलि” से “मउर” तथा स्त्रीलिंग रूप में “मउरी” का विकास हुआ। छत्तीसगढ़ी, भोजपुरी, अवधी आदि लोकभाषाओं में “मउर” का अर्थ वर-वधू के सिर पर बाँधा जाने वाला मुकुट या विवाह-मुकुट होता है, जबकि “मउरी” उसका लघु अथवा स्त्रीलिंग रूप माना जाता है।
इस प्रकार “मौलि → मउलि → मउर/मउरी” की यह यात्रा केवल ध्वनि-परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्कृत से लोकभाषाओं तक भारतीय सांस्कृतिक परम्परा के प्रवाह का भी सुंदर उदाहरण है।
छीन के पत्तों से यह बनाया जाता था। पहले से लोग चाउर दार देकर मउर बनाने को कह देते थे। इसका कोई मूल्य नहीं होता था। लोग इच्छानुसार जो भी मेहनताना देते वे रख लेते थे।
उस समय मउर बाजार से खरीदकर नहीं लाया जाता था। उसके लिए पहले से “बात” लगाई जाती थी। छेदू पटेल बड़े जतन से उसे तैयार करते। बाँस, कागज, रंगीन पन्नी, गोटा और चिकमिकी पना से ऐसा मउर बनाते कि दूल्हा सचमुच राजा लगने लगता। मांग के अनुसार वे उसमें चिकमिकी पना भी लगा देते थे। कुछ मउरों में छोटे-छोटे ऐना के टुकड़े जड़ दिए जाते थे। जब दूल्हा धूप या लालटेन की रोशनी में चलता, तब वे ऐना चमक उठते। लगता मानो पूरा गाँव रोशनी से झिलमिला रहा हो।
गाँव के बच्चे मउर बनते देखने के लिए उनके घर के आसपास मंडराते रहते थे। कोई पूछता – “कका, मोर बिहाव म घलो अइसने मउर बनाबे ना?” तब छेदू पटेल मुस्कुराकर कहते – “बिहाव होही त राजा कस बनाके पहिराहूँ।” उस समय कला में व्यापार कम, अपनापन अधिक होता था।
आज समय बदल गया है। अब तैयार मुकुट शहरों से आने लगे हैं। प्लास्टिक और चमकीले कपड़ों ने उस पुराने मउर की जगह ले ली है। लेकिन उनमें वह आत्मा कहाँ, जो छेदू पटेल के हाथों से बने मउर में होती थी? अब दूल्हे के सिर पर मुकुट तो दिखता है, पर उसमें गाँव की पहचान कम दिखती है।
वस्तुतः मउर केवल दूल्हे का श्रृंगार नहीं था, वह छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति का गौरव था। उसमें गाँव के कारीगरों का सम्मान था, लोककला की सादगी थी और उस युग की आत्मीयता थी। वह हमें यह भी बताता है कि हमारे गाँवों में कितनी अद्भुत कलाएँ जीवित थीं, जिन्हें किसी बड़े मंच की आवश्यकता नहीं थी। वे लोगों के जीवन में ही रची-बसी थीं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी लोककलाओं और लोक कलाकारों को केवल स्मृतियों में ही न छोड़ दिया जाए। आने वाली पीढ़ियों को भी बताया जाए कि कभी छत्तीसगढ़ के दूल्हे “मउर” पहनकर सचमुच राजा दिखाई देते थे, और उन्हें राजा बनाने वाले कोई बड़े डिजाइनर नहीं, बल्कि गाँव के अपने छेदू पटेल जैसे लोक कलाकार होते थे।

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