May 19, 2026

आपत्ति : एक प्रसिद्ध कहानी, एक अप्रसिद्ध टिप्पणी

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हरि भटनागर जी की सर्वाधिक चर्चित कहानियों में से एक ‘आपत्ति’ को मैं पिछले दिनों पुनः पढ़ रहा था, जो उनके इसी नाम के कहानी-संग्रह में बहुत पहले प्रकाशित हुई थी।

हरि भटनागर ने सुअरिया को बोलने दिया। और सुअरिया ने जो कहा, वह सुनकर लगता है जैसे कोई पुराना, थका हुआ, गली का फर्श खुद बोल उठा हो।

आज के भारत में हम सब आपत्ति वाले हो गए हैं।

हमारे फ्लैट की बालकनी से नीचे जो कचरा गिरता है, उस पर नज़र रखने वाली सुअरिया अब समस्या बन जाती है। वह गर्भवती है, उसके बच्चे हैं, वह दूध नहीं दे पा रही, वह किकिया रही है – आपत्ति । कुत्ते भूखे हैं – आपत्ति । पड़ोसी की बेटी की पढ़ाई डिस्टर्ब हो रही है – आपत्ति । मालिक ताड़ी पीकर उसे लहूलुहान कर देता है – फिर भी आपत्ति उसी सुअरिया की।

सबसे बड़ी बात यह है कि कहानी में कोई खलनायक नहीं है। सब अपनी जगह सही हैं।

इंसान अपनी सुविधा में सही है, कुत्ता अपनी भूख में सही है, सुअरिया अपनी माँ होने में सही है, मालिक अपनी गरीबी और नशे में सही है। सब सही हैं, फिर भी सब एक-दूसरे के लिए आपत्ति बन गए हैं।

यह आज का भारत है न?

जहाँ हर कोई अपना हक़ माँग रहा है, लेकिन किसी के पास इतना नहीं कि दूसरे का हक़ दे सके। जहाँ मध्यम वर्ग का आदमी मतलब कहानी का नायक सबसे ज़्यादा फँसा हुआ है – न उसमें साहस है सुअरिया को भगाने का, न हिम्मत है उसे बचाने की। वह बीच में लटक गया है, ठीक वैसे जैसे हम सब लटके हुए हैं ! न तो पूरी क्रूरता कर पाते हैं, न पूरी करुणा।

सुअरिया की गीली आँखें, उसके थन जो ज़मीन को छू रहे हैं, उसके बच्चे जो दूध के लिए किकिया रहे हैं । ये बिम्ब आज भीतर तक चुभते हैं। क्योंकि हम जानते हैं कि यह सुअरिया कोई सुअर नहीं, यह वो आवाज़ है जो हमारे शहरों के हाशिए पर, हमारे मोहल्लों के पीछे, हमारे अंतरात्मा के कोने में रहती है । चाहे वह कोई गर्भवती औरत हो, कोई मजदूर हो, कोई बूढ़ा कुत्ता हो, या कोई दलित बच्चा।

हरि भटनागर जी ने बहुत शांति से, बिना चीखे, बिना नैतिकता का लेक्चर दिए, हमें आईना दिखा दिया है। आईना ऐसा कि उसमें हमारा चेहरा नहीं, हमारी असमंजस की सूरत दिखती है।

‘आपत्ति’ नाम बहुत गहरा है।

आपत्ति सिर्फ़ सुअरिया की नहीं। आपत्ति तो हमारे पूरे जीने की है, जहाँ हम इतने चालाक हो गए हैं कि हर दर्द को, हर भूख को, हर ज़रूरत को समस्या कहकर उसे किनारे कर देते हैं।

कहानी ख़त्म होने के बाद भी सुअरिया की किकियाहट कान में गूँजती रहती है।

और लगता है, शायद हम सब उसी ख़ाली प्लॉट में कहीं न कहीं डटे हुए हैं – न हट रहे हैं, न बच पा रहे हैं।

बहुत मौलिक, बहुत चुपके से दिल में घुस जाने वाली कहानी है।

पढ़ने के बाद मन में एक अजीब-सी ख़ामोशी और एक हल्क़ी-सी शर्म रह जाती है।

शुक्रिया हरि दादा, एक सुअर को बोलने देने के लिए।

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