भाई -बहिनी डोंगरी : भोरमदेव क्षेत्र
सामान्यत: भौगोलिक आकृतियों/संरचनाओं का नामकरण जनमानस में उनके ‘दिखने'(looking) के हिसाब से भी हो जाया करता है। ग्राम नामकरण का भी यह एक आधार रहा है। पहाड़ों के नामकरण भी इस आधार पर बहुधा देखने को मिलते हैं।
भोरमदेव में मंदिर क्षेत्र से दक्षिण -पश्चिम में पाँच-छ:किलोमीटर की दूरी पर स्थित पहाड़ के एक हिस्से को भाई -बहिनी डोंगरी कहा जाता है। प्रथम दृष्टया देखने से पहाड़ दो हिस्सों में बटा दिखता है जिसने लोकमानस को आकर्षित किया होगा। इस ‘जुड़वा’ संरचना के नामकरण के लिए भोरमदेव क्षेत्र में प्रचलित एक जनश्रुति सहायक हुआ। इस जनश्रुति का मूल स्रोत मड़वा महल अभिलेख संवत 1406 (1349 ई.) है जिसके अनुसार भोरमदेव के फणि नागवंश की शुरुआत जतुकर्ण ऋषि की पुत्री मिथिला के शेषनाग से प्रेमसंबंध और विवाह से उत्पन्न पुत्र अहिराज से हुई थी। मिथिला के दो भाई देवशर्मा और सुशर्मा थे। पहले उन्हें मिथिला और शेषनाग के संबंध की जानकारी नहीं थी जिससे भ्रम की स्थिति थी। बाद में मिथिला ने उन्हें शेषनाग के बारे में जानकारी दी।
शिलालेख में अंकित मिथक कथा क्षेत्र के जनमानस में परिवर्तित रूप में घर करती गई, जिसका एक रूप इस तरह है –
“अउ, भोरम राजा हर न भरमा -भूत मे बने हे। देव मन , दू भाई अउ एक बहिनी रहय। त देव के बहिनी गरभती म रह गय त कइसे गरभती म भगवान। गांव म गोठा न अदमी, त अदमी हमर देव-देव के पहर हे। बड़े ते हा सोचय रोज कन त एके म खाना पीना होकर रात बसे बर बहिनी के कुटिया मड़वा महल अतका रहय, दूनो भाई के कुटी छेरकी महल अतका रहय। त तैं ह न रात म परसों लेकर देखबे कहके छोटे देव अक्कल बताइस बड़े ल । त परसो लिस अपन बहिनी के त छै महिना म बेरा उगिस त देव पूछथे कस ओ नोनी, हमर देवता-देवता के पहर हे तोर कुटिया म बम्हन-रसपूत लईका देखेव। का बात हे भई त हमर देव पहर हे कइके, पचमुखी सेसनाग हे भईया। दिनमान सेसनाग बनथे, रात म राजकुमार होथे बम्हन- रासपूत लड़का बदल जाथे , अइसे कहिस, अरे ठीक! बात बताइस मोर छोटे भाई ह कहिके न भाई न कहितिस त भाई ल बहिनी ऊपर सक करे रहिस त भोरमदेव न भरमाभूत म बनाए हे। तेखर सेती भोरमदेव कथे।
सुने अउ भोरमदेव ल बना के मड़वा महल सुरू करिस त देव के बहिनी फेर कहिथे – कइसे भईया अउ भउजी सब मंदिरे मूरति बनाथव । महूं जाहूं मड़वा महल बनाय बर भईया अइसे कहिके त तोर जाय के नोहे नोनी अनेक परकार के चीज बनाबो हमन मड़वा महल म। ते झन आबे। आबे त घंटी के आवाज करके आबे। अइसे कहे रहिस। त तै झन आबे कहे रिहिस मड़वा म त देव के बहिनी, परिजय हरा (?) मड़वा महल पहुँच जाय त देव मन अपन जांवर-जोड़ी मूरति बनाय, बिना ओड़ना कपड़ा के। त ओखर बहिनी बनात खानी चल दिस त लजा के भाग गय।त झन भाग भाई, झन भाग भाई, मोर से गलती होगे, तैं घंटी बजाय ल कहेस तभो नइ बजाएंव। मत आबे कहे त आ परेंव। लहूट भईया लहूट कहिस त नई लहुटिस। त भाई के कनिहा ला बहिनी पकड़े, भाई-बहिनी जंगल भाग गे। दूनो भाई-बहिनी पथरा लहुट गे, ओला भाई बहिनी डोंगरी कथे।
अउ भाई बहिनी के बाजार लगय कथे चारोटा भीतर डोंगरी म।
अउ देवता के मोर मुकुट पर्रा बिजना ओकर संग भागे हे भाई बहिनी डोंगरी म। अउ मंगरोहन रिहिस सहसपुर ले…….”
[कथा स्रोत -दिवंगत लीला बाई यादव भोरमदेव ]
इस कथा के आधार पर पहाड़ का नामकरण और रोचक हो गया है।
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★अजय चंद्रवंशी, कवर्धा (छत्तीसगढ़)
मो. 9893728320