एक नदी के दर्द की कहानी : उसी की जबानी
मैं आमनेर हूं
मैं आमनेर हूँ, मैकल पर्वतमाला की वनाच्छादित गोद में, खैरागढ़ रियासत के पुराने शिकारगाह लछना वनांचल के समीप जन्मी एक नदी। मेरा उद्गम लछनाटोला गाँव के आगे पहाड़ियों और घने सागौन-वन के बीच स्थित उन शांत जलस्रोतों से होता है जहाँ धरती भीतर ही भीतर जल को सँजोकर रखती है। वहीं पहाड़ियों की तलहटी में एक टीलेनुमा स्थान पर पत्थरों की दरार से मैं पहली बार फूटी थी—एक पतली, निर्मल और चंचल जलधारा बनकर।
उस समय मेरे चारों ओर आम के घने पेड़ थे। छत्तीसगढ़ी में आम को ‘आमा’ कहते हैं और नाले को ‘नरवा’। प्रारंभिक अवस्था में मैं पतले नाले जैसी ही थी, संभवतः इसी कारण लोगों ने मुझे ‘आमानरवा’ कहना शुरू किया होगा, जो कालांतर में अपभ्रंश होकर ‘आमनेर’ बन गया। शायद मेरे नामकरण की कहानी यही रही होगी। मैकल की पहाड़ियों ने मुझे अपनी बेटी की तरह पाला और मैं ढलानों से उतरती हुई धीरे-धीरे मैदानों की ओर बढ़ चली।
तब मैं बहुत प्रबल थी। वर्षा आते ही मेरा स्वर बदल जाता था। पहाड़ियों से उतरने वाली पतली धाराएं मेरे भीतर समा जातीं और मैं कल-कल करती हुई बहती थी। मेरे किनारे आदिवासी बस्तियाँ थीं जहां के निवासी मुझे केवल नदी नहीं, जीवित देवी मानते थे।
लछना के जंगलों से निकलकर मैं प्रधानपाट की ओर बढ़ती हूँ। यहाँ मेरे ऊपर एक बैराज बनाया गया है, ताकि मेरे जल से खेतों की प्यास बुझाई जा सके। कभी मैं बिना रोक-टोक बहती थी, पर अब मनुष्य ने मेरी धारा को बाँधकर उसे अपनी आवश्यकता के अनुसार मोड़ना सीख लिया है। फिर भी मुझे शिकायत नहीं, खेतों में जब धान की हरियाली लहलहाती है, तब लगता है मेरा जल व्यर्थ नहीं गया।
प्रधानपाट केवल एक स्थान नहीं, आस्था का धाम भी है। यहाँ प्रधानपाट देव विराजते हैं, जिन पर वनांचल के लोगों की गहरी श्रद्धा है। कितने ही ग्रामीण मेरे जल से हाथ धोकर देवस्थान में माथा टेकते हैं। तीन ओर से घने जंगलों से घिरा यह स्थल अब स्थानीय पर्यटन और पिकनिक का केंद्र बनता जा रहा है।
आगे चंगुर्दा ग्राम के पास कुकरापाट आता है। वहाँ भी एक छोटा-सा देवस्थान है, कुकरापाट देव का मंदिर। जो भी इस मार्ग से गुजरता है, श्रद्धा से सिर झुकाता है। बरसों से मैं उस छोटे-से मंदिर को देखती आई हूँ। कभी कोई चरवाहा वहाँ अगरबत्ती जला देता है, कभी कोई यात्री चुपचाप हाथ जोड़ लेता है। मेरे जल पर झुकती हुई वह श्रद्धा मुझे बड़ी प्रिय लगती है।
मेरे किनारों पर बसे गाँव मेरे साथ बड़े हुए हैं। इन गाँवों के बच्चों ने मेरी रेत में खेलना सीखा, किसानों ने मेरे जल से खेत सींचे और स्त्रियों ने मेरे घाटों पर गीत गाए। कितनी ही शामें मैंने महुए की गंध और लोकगीतों की धुन के बीच बिताई हैं।
पांडादाह पहुँचते-पहुँचते मेरी चाल धीमी और गंभीर हो जाती है। यहाँ भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा जी की नगरी मेरे तट पर विराजती है। मैं आज भी मंदिर के शिखर को नमन करती हुई आगे बढ़ती हूँ। संध्या की आरती जब मंदिर से उठती है तो उसकी ध्वनि मेरी लहरों पर उतर आती है। रथयात्रा के दिनों में मेरे घाटों पर श्रद्धा उमड़ पड़ती है। तब मुझे लगता है मानो स्वयं जगन्नाथ स्वामी मेरी धार को आशीर्वाद दे रहे हों।
मेरे बारे में एक पुरानी लोककथा कही जाती है। कहते हैं, एक बार भयंकर सूखा पड़ा। खेत फट गए, कुएँ सूख गए और लोग व्याकुल हो उठे। तब एक साधु ने मेरे तट पर बैठकर कई दिनों तक तप किया। उसने कहा, ‘जब तक आमनेर बहेगी, यह धरती जीवित रहेगी।’ उसी रात ऐसी वर्षा हुई कि सूखी धरती फिर हरियाली से भर उठी। तब से कई ग्रामीण मुझे मनौती पूरी करने वाली नदी मानते हैं। आज भी स्त्रियाँ कार्तिक मास में मेरी धारा में दीप बहाकर परिवार के सुख की कामना करती हैं।
खैरागढ़ पहुँचते-पहुँचते मैं नगर की जीवनरेखा बन जाती हूँ। मैंने यहाँ के राजसी वैभव को बहुत निकट से देखा है। राजमहल की ऊँची अटारियाँ, हाथियों की चिंघाड़, घोड़ों की टापें और सैनिकों की कतारें, सब मेरी स्मृतियों में आज भी जीवित हैं। हर दशहरे पर खैरागढ़ के राजा पूरे लाव-लश्कर के साथ मेरे तट पर रइनी मारने आया करते थे। दूर तक मशालें जलती थीं, नगाड़े बजते थे और राजसी शान मेरे जल में प्रतिबिंबित होती थी। मैं चुपचाप बहती रहती, मानो इतिहास को अपने भीतर संजो रही हूँ।
उमराव पुल से मैंने खैरागढ़ को अनगिनत बार निहारा है। सुबह की धुँध में लिपटा नगर, वर्षा की बाढ़ में काँपते घाट, दीपावली की रात जगमगाती रोशनियाँ, सब मेरी आँखों के सामने से गुजरे हैं। कितने ही युवाओं ने उस पुल पर खड़े होकर सपने देखे, कितने बूढ़ों ने बीते दिनों को याद किया और कितने बच्चों ने मेरी धारा में कंकड़ फेंककर लहरों का खेल देखा।
खैरागढ़ में आकर मुझे कभी अकेलापन महसूस नहीं होता। यहां मेरी दो छोटी बहनें मुस्का और पिपरिया मुझसे आ मिलती हैं। वे पहाड़ियों और गांवों से अपना छोटा-सा जीवन संगीत लेकर आती हैं और मेरे गले लगकर मेरे साथ आगे बढ़ती हैं। बरसात के दिनों में जब हम तीनों का जल एक साथ उमड़ता है तब हमारे तटों पर मानों प्रकृति का उत्सव उतर आता है। खैरागढ़ के लोग हमारे इस मिलन को त्रिवेणी संगम का नाम देते हैं। मुस्का की चंचलता और पिपरिया की शांत धारा मेरे भीतर समाकर मुझे और व्यापक बना देती हैं। फिर हम तीनों साथ-साथ खेतों, घाटों और गांवों की स्मृतियां अपने जल में संजोए शिवनाथ की ओर बढ़ चलती हैं।
लेकिन अब मैं पहले जैसी नहीं रही। एक समय था जब बारहों महीने मेरे भीतर जल बहता था। अब वर्षा बीतते ही मैं जगह-जगह सूखने लगती हूँ। मेरी धार सिकुड़ जाती है और कई स्थानों पर मैं केवल रेत बनकर रह जाती हूँ। मेरे किनारे बसे गाँवों में लोगों ने सैकड़ों नलकूप खोद डाले हैं। धरती के भीतर का जल निरंतर खींच लिया गया और मेरे स्रोत धीरे-धीरे सूखने लगे। जो छोटी-छोटी धाराएँ मुझे जीवन देती थीं, वे अब बरसात के बाद थम जाती हैं।
कभी मेरे तटों पर मत्स्य-प्रेमी गहरे जल में बंसी डालकर बैठे रहते थे, अब गर्मियों में वहीं लोग पैदल पार हो जाते हैं। जहाँ जल चमकता था, वहाँ अब रेत तपती है। मुझे दुःख होता है, पर मैं जानती हूँ कि मनुष्य ने यह सब अपनी जरूरतों के कारण किया है। फिर भी मैं हर वर्ष बादलों की बाट जोहती हूँ। पहली वर्षा होते ही मैं फिर जीवित हो उठती हूँ, मानो धरती ने मुझे नया प्राण दे दिया हो।
पर मेरी पीड़ा केवल सूखती धाराओं तक नहीं रही। खैरागढ़ नगर के किनारे से गुजरते हुए अब मुझे मनुष्य की लापरवाहियों का बोझ भी ढोना पड़ता है। शिव मंदिर रोड पर मुस्का नदी पर बने पुल के नीचे फेंके गए प्लास्टिक, पालिथीन और कूड़े के अंबार अंततः मेरी ही धारा में उतर आते हैं। इतवारी बाजार से निकलने वाला सारा अपशिष्ट, सड़ी-गली सब्जियों की दुर्गंध, नालियों का मैला जल और पिपरिया नदी पर धरमपुरा पुल के आसपास जमा सड़ांध मारता कूड़ा-करकट भी आखिरकार मेरी गोदी में ही आ गिरता है। कभी मेरी जिन धाराओं में खैरागढ़िया अपनापन बहता था, वहां अब सड़ांध और प्लास्टिक तैरते दिखाई देते हैं। बरसात में मैं विवश होकर इस समूचे नगर का मैल अपने साथ बहाती चली जाती हूं। फिर भी मेरे तटों पर श्रद्धा कम नहीं हुई। शायद इसलिए कि नदी केवल जल नहीं होती, वह स्मृतियों, संस्कृतियों और जीवन का प्रवाह होती है।
आगे बढ़ते हुए मैं सगनी घाट की ओर जाती हूँ। दुर्ग जिले के कौड़िया ग्राम पंचायत के पास मैं अंततः शिवनाथ नदी की विशाल बाँहों में समा जाती हूँ। लोग कहते हैं कि वहाँ मेरा विलय हो जाता है, पर मैं जानती हूँ कि नदियाँ कभी समाप्त नहीं होतीं। वे केवल अपना नाम बदलती हैं और किसी बड़ी धारा का हिस्सा बन जाती हैं।
मैं आज भी बह रही हूँ, पांडादाह के मंदिर की घंटियों में, खैरागढ़ की स्मृतियों में, उमराव पुल की छाया में और उन लोकगीतों में जिन्हें गाँव के लोग पर्वों और उत्सवों के समय गाते हैं।
विनय शरण सिंह
खैरागढ़