अन्ना पो की सोन ….
नवा जमाने की बहुरिया अऊ नवा धान के बीजा एकै समझो ।
नखरा भरपूर – झौआ भर की दवा दारू – सेवा चिरौरी ऊपर से , अऊ कब बिगर जाही तेखर भरोसा नहीं ।
दुबराज – लुचई – गुरमटिया जैसे पुरखौती बीज की तासीर छत्तीसगढ़िया रही , अषाढ़ के भीगे खेत में धान सींच दो – सही समय निंदाई गुड़ाई बियासी कर दी – दो चार झौआ यूरिया मिल गया तो सींच दिया नहीं तो भगवान भरोसे की बरसात में ही – साल भर का खाए पुरती हो जाता रहा ।
खेती किसानी के लिये बरसात को अगोरना – छत्तीसगढ़ में अब बुढ़ौती जमाने की बात हो गयी ।
जहां देखो बिकास , कहे तो तरक्की की बातै बात होती रहती है ऊपर से गुरूजी अपना ज्ञान सोज्झे पेले रहते हैं कि अपने वतन में तरक्क़ी परदेसियों के पीछे पीछे आती है , पुराना रिवाज है ।
सामंती लुटेरे आए पीछे इस्लाम आया
अंग्रेजन के पीछे रेल और पुतली घर आये
ऐसा ही समझो कि , छत्तीसगढ़ में परदेसिया बैंक आये पीछे पीछे सरकारी नियम कायदे आ घुसरे ।
नया स्टाइल की धान खेती की लागत कारखाने बैठाने जितनी हो गयी । पाताल तोड़ कुंआ नये धान की खेती की पहली जरूरत बन गया ।
कोटवार कहता रहा , बोरिंग वाले कुंआ का कर्जा उसी को मिलेगा जिसके नाम से पांच एकड़ ज़मीन का मालिकाना हक़ हो और उसका जवान होना ज़रूरी है ।
पूछो तो वो काहे – अरे भाई , बुढ़ऊ निकल लिये तो बैंक का करजा उतारेगा कौन।
खेत गिरवी रख कर मिली बड़ी रकम के पीछे दलाल आये और दलालों के पीछे , ‘ बोर वेल ‘ वाली भारी भरकम रिग मशीन लदी , ‘ले लैंड की लंबी ट्रकें ‘ आने लगीं ।
आठ – दस घंटों में सौ मीटर खोद कर , पाइप केसिंग से पानी की चार अंगुल नाप की मोटी पानी की धार बाहर निकलती दिखा दी , अपने हिसाब का रूपिया पैसा लिया दलाल का कमीशन अलग से और आगे बढ़ लिये ।
हज़ारों मील आन देस से आये , अपने अपन आपस में बात करते , अटपटी भाषा के गाने फुल साउंड में बजाते
भात को इमली के झोर मे खूब सान कर खाते फिर वहीं ट्रक के नीचे सो जाते रहे – गैंग मदरासी ।
इनके साथ आया था – लेबर की तरह काम करता एक लड़का .
पेट में पानी हो गया , पतले दस्त होने लगे तो लड़़के को गाड़ी से उतार दिया । पंचर जोड़ने वाले बिहरिया यासीन की सड़क किनारे की टपरी पर आसरा मिल गया ।
देसी डाक्टर ने इलाज किया – ‘ तीन सुई ‘ से तबीयत सुधर गयी ।
यासीन की सोहबत और गांव की आब ओ हवा में मन ऐसा रमा कि मदरासी लड़का यहीं का हो कर बस गया .
अटपटी भाषा बोलता रहा तो नाम मिला – अन्ना पो .
W C L ( वेस्टर्न कोल फील्ड .) की रिहायसी कालोनी बसंत विहार तब बन रही थी , बाउंड्री की दीवार खड़ी हो चुकी थी ।
पहले बना बड़ा सा लोहे का मेन गेट और उस पर तैनातगी हुई गार्ड बिहरिया मांझी की ,
गांव वालों के बीच रूतबा मिला बड़ा गेट वाला साहेब ….
बिहरिया यासीन ने बिहरिया मांझी से अन्ना पो की सिफ़ारिश की और मेन गेट के सामने सड़क के इस पार अन्ना पो ने नीम झाड़ के नीचे रचा लिया छैः ईंटों वाला कच्चा चूल्हा और चढ़ने लगी चाय की केतली ।
बिहरिया मांझी रहा गांजे का तलबी ।
अन्ना पो की टपरी की आड़ में चिलम भराती – चढ़ती और फिर कड़ी मीठी चाय के साथ गार्ड की भोजपुरिया के साथ अन्ना पो की गिड़बिड़ी में कहासुनी का छोटा सा दौर , कभी तू तू – मैं मैं भी हो जाती ….
वो पुलिस क्या जो गांजा को मील भर दूर से सूंघ न ले ।
पांड़े मुंशी जी की दबिश हुई , रंगे हाथों थम गया अन्ना पो । बिहरिया गार्ड मांझी ने बात संभाल ली , हप्ते का दो सौ रूपिया , चाय पानी फ्री का तय हुआ ।
पांड़े का जोर मिला – अन्ना पो प्यादे से वजीर बन गया ।
कालोनी में बन रहे मकानों में मजदूरी – रोजी की आस में गांव के लड़के लड़कियां कालोनी गेट के सामने नीम तले सुबह से जमने लगते ।
छपरी चाय नाश्ते की जगह बन गयी और अन्ना पो बना लेबर सप्लायर दलाल ।
अन्ना पो के इशारे के बाद बिहरिया मांझी गिनती के लेबर अंदर जाने देता , कमीशन मिलता एक रूपिया – एक दिन का ।
अपनी दाई के साथ आती रही सोन ।
सोलह की होगी कि नहीं , दाई ने कभी गिना नहीं ।
अठारह से कम को रोजी पर नहीं रखना है – नियम बोलता है , यहां मांझी की भी नहीं चलती ।
दाई कहती मां – बेटी मिल के पूरा दिन के बूता करबो भले रोजी एक झन के मिलै ।
जवान लड़की को किसके भरोसे छोड़ देती बस्ती घर में । दूनो साथ मं बूता जाबो नहीं तो दूनो वापस अपन घर जाबो । दाई खरे सुभाव वाली थी , मिन्नत चिरौरी नहीं करती , काम मिलही तभो ठीक नईं मिलही तभो ठीक ।
सोन सब को अच्छी लगती रही , अन्ना को भा गयी .
तांबई देही वाली सोन अन्ना को अपने देस की लगती रही , मदरासिन जैसी ।
अन्ना की बात बिहरिया ने कुछ इस तरह सैट की ।
दाई रोज मजूरी करेगी फुल पेमेंट के साथ गेट के भीतर की और सोन अन्ना की चाय दूकान में काम करेगी – आधी मजूरी में ।
बर्तन मांजना धोना झाड़ू करेगी , दिन ढले के पहले छुट्टी , महीना तीन सौ रूपिया तय हुआ .
यानी दाई को पूरा महीना की फुल मजूरी और सोन को हाफ मजूरी ….
ईंट से बने चूल्हे की जगह लकड़ी की आंच वाली भट्टी रच गयी , सोन की कही से दूकान चलने लगी और अन्ना की लेबर दलाली की रकम से बरक्कत दिखने लगी ।
अन्ना पो ने दाई को मना लिया , सोन हुई अन्ना की , हमेशा के लिये …..
चार टेबल – बेंच सज गये नीम के नीचे ।
साहब – ठेकेदार – जमीन दलाल की बैठकों के लिये जगह बन गयी । भजिया दोसा इडली और चाय दिन भर मिलती और शाम ढले भट्टी की पीली धुंधुवाती उजारी में देशी दारू के साथ उबले काले चने का बना तेज मसालेदार ‘ चखना ‘ – चल निकला ।
नाम मिला ‘ सोन का चना ‘ ……
खड़ी लाल मिर्च – फर धनिया – अदरक लहसुन को पीस कर सरसों तेल में , परसा झाड़ की लकड़ी की धीमी आंच में भूंजती रही मसाला , सोन के हाथ में बैठी थी स्वाद की देवी ।
सोन रही सीधी सादी छत्तिसगढ़हिन और अन्ना रहा बिन बिरादरी का छुट्टा बैल , फुल गंजेड़ी , झमझम नशे में ‘ सोन का चना ‘ के मसालों के साथ लगी परसा लकड़ी की आंच और धुंवे के सोंधे स्वाद का राज़ बंगालन मैडम को ढील दिया ।
मैडम – सिविल ठेकेदार के आफ़िस में नयी नयी आयी रही ।
किसी बात पर गार्ड बिहरिया मांझी को हड़का दी थी सो बिहरिया चुरमुटाए बैठा था ।
अन्ना पो लहट लहट के मैडम से हंस हंस के बात करता , और मैडम अन्ना से सटी जाती कि इडली के साथ सांभर चटनी डबल दे देता रहा , आफिस निपटा के शाम ढलते घर लौटते समय बंगालन साथ ले जाती , कभी कभी सोन का चना भी पैक करवाती रही ।
बिहरिया मांझी फुसफुसाता, रंगीन है साली ……
सटर डे – संडे ये भी दो पैग ढुलकाती होगी – पक्का ।
अन्ना पो का बंगालन से लहटना और डबल सांभर पैकिंग वाली बात बिहरिया ने सोन को चिपका दी ।
सोन बिफर गयी
अन्ना सोन का रहा , सोन अन्ना की रही
काहे नहीं गरियाती , जम के गरियाई ……
यूं ही कोई किसी को गरियाता है , बिफरना भी मुहब्बत की अदा होती है ।
अन्ना सिर गड़ाये सुनता रहा , पलट कर बोला कुछ नहीं , सोन का हाथ पकड़ लिया …
का करती वो भी , औरत की जात , फुस्स से रो दी – पल्लू से आंख रगड़ ली और प्याज छीलने बैठ गयी ।
लेबर दलाली का कमीशन गरीब की आह लेकर आता है । गांजा शराब तिस पर अपने करम की मार , अन्ना पो की छिन छिन गलती देह एक दिन आया कि माटी में मिल गयी .
बसंत विहार धीरे धीरे बसने लगा ……
बड़े छोटे साहबों के परिवार रहने आ गये .
गेट के सामने का नीम और फैल गया , डगालें सड़क के ऊपर छितराई झूलने लगीं ।
आजू बाजू में नंबरी – निजी जमीनों पर आलीशान इमारतें तन गयीं .
‘ फूफा जी बीकानेर वाले ‘ की मिठाइयों की बड़ी सी नयी दूकान बसंत विहार के बाजू में खुल गयी । ताम झाम , ए.सी. का इंतेजाम , टिमटिम रौशनी में कालेज के लड़के लड़कियों के बैठने वास्ते केबिन , यानी सब कुछ झकास …..
स्वाद ने सोन का हाथ और साथ नहीं छोड़ा .
सुबह के गरम नाश्ता के लिये लोग होटल सोन के सामने इंतज़ार करते रहते .
खड़े खड़े खाते , गाडियों में बैठ कर खाते
धूप बरसात हर मौसम में होटल सोन पर रौनक बनी रहती ।
बाजार का धरम है और धंधे का उसूल है , कमजोर को पछाड़ो और ऊपर चढ़ बैठो ।
बुढ़ाती सोन को नोटिस मिल गया , होटल सरकारी जमीन पर बेजा कब्जा में बना है .
भौंचक अकेली बूढ़ी सोन कहां कहां नहीं दौड़ी .
बरसों से रोजना के ग्राहक साहबों की औकात और नीयत सामने आगयी और होटल टूटने की तारीख भी .
होटल की टपरी क्या टूटी
ऐसा सदमा लगा – सोन फिर उठ न सकी …..
जो खटिया पकड़ी तो फिर छूटी नहीं ।
दो कमरे के अंधेरे घर में अकेली पड़ी , अध जागी – अध चेती आंखों में पिछला गुजरा सब घूमने लगा , डबडब आंसू भरी आंख थिरने लगीं …
अन्ना पो सिरहाने आकर बैठ गया , कपाल पर हाथ की छुअन पहचान गयी ।
कहने लगा – बहुत दूर के रहैया का , दूसरे देश से चल कर आये का ‘अपना क्या ‘ …..
जीवन भर रहे बाद भी परदेस कब अपना देश हुआ है , किस किस का हुआ है जो मेरा होगा ….
तू ने हाथ पकड़ा तो चार दिन यहां की हवा माटी में ठहर के बस गया , अब चल मेरे साथ
‘ बेजा कब्जे ‘ में कब तक अकेली रहेगी – चल सोन – चल ….
शादी बिहाव के बाद लड़कियां अपनी घर गृहस्थी में उलझ जाती हैं , दिन दिन मायका धुंधलाता जाता है ।
अम्मा की तेरहवीं निपटा कर ससुराल लौटती
सोन की बेटी
बसंत विहार गेट के सामने सड़क के इस पार ठहर गयी ….
यहीं कहीं तो था वो नीम का पेड़
यहां पे रहा अम्मा का चूल्हा
वहां रहा मील का पत्थर , बिलासपुर 5 कि. मी. वाला , मेरा टिकटिक घोड़ा ।
सबके सब कहां गये ……
नीम की जगह पर , ऊंचाई पर झमकते बड़े होर्डिंग्स ।
बीकानेरी सोनपापड़ी .
कोयला है काला हीरा …
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नवल गोविंद .