जन्मदिन पर विशेष – लोकचेतना और मानवीय संवेदना के कवि भगवती लाल सेन
– डुमन लाल ध्रुव
23 मई छत्तीसगढ़ की साहित्यिक चेतना के लिए केवल एक जन्मतिथि नहीं बल्कि लोकसंवेदना, सामाजिक सरोकार और जनपक्षधर काव्यधारा के स्मरण का दिन है। यह दिन उस लोकधर्मी कवि की स्मृति को प्रणाम करने का अवसर है जिसने अपनी कविता में खेत-खार, श्रम, पीड़ा, गांव, किसान और मनुष्य की सहज संवेदनाओं को स्वर दिया। कवि भगवती लाल सेन उन विरल रचनाकारों में थे जिनकी कविता पुस्तकालयों की सीमाओं में नहीं जनजीवन की धड़कनों में बसती है। उनका साहित्य लोकजीवन का दस्तावेज भी है और मानवीय चेतना का घोष भी।
23 मई 1930 को धमतरी अंचल के देमार ग्राम में जन्मे भगवती लाल सेन ऐसे सामाजिक परिवेश में पले-बढ़े जहां अभाव, संघर्ष और श्रम जीवन की अनिवार्य सच्चाईयां थी। यही जीवनानुभव आगे चलकर उनकी काव्य चेतना की आधारभूमि बने। उनकी औपचारिक शिक्षा सीमित रही किन्तु अनुभवों का संसार अत्यंत व्यापक था। उन्होंने जीवन को पुस्तकों से कम और समाज की वास्तविक परिस्थितियों से अधिक पढ़ा। यही कारण है कि उनकी कविता में कृत्रिम बौद्धिकता नहीं जीवन की प्रत्यक्ष अनुभूति का ताप दिखाई देता है।
भगवती लाल सेन का व्यक्तित्व सरलता, आत्मीयता और लोकमंगल की भावना से निर्मित था। वे साहित्य को प्रतिष्ठा या प्रदर्शन का माध्यम नहीं मनुष्य और समाज के बीच संवाद का सशक्त साधन मानते थे। साहित्यिक मंचों पर उनकी उपस्थिति प्रभावशाली मानी जाती थी। वे केवल कविताएं पढ़ने वाले कवि नहीं थे अपने विचारों और भावों से श्रोताओं के साथ आत्मीय संबंध स्थापित कर लेते थे। अनेक कवि सम्मेलनों और साहित्यिक आयोजनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही जहां उन्होंने साहित्य को जनजीवन से जोड़ने का कार्य किया। उनकी रचनाधर्मिता का मूल स्रोत लोकजीवन और मानवीय संवेदना रही। किसान, मजदूर और सामान्य जन का संघर्ष उनकी कविता का केंद्रीय विषय बना। खेतों की हरियाली, श्रम से भीगे चेहरे, गांव की सहजता, सामाजिक असमानता और जीवन की कठोर परिस्थितियां उनकी रचनाओं में आत्मानुभूति के रुप में उपस्थित होती है। उनके लिए गांव केवल भौगोलिक इकाई नहीं था संस्कृति, संबंध और जीवन-मूल्यों का जीवंत संसार था।
भगवती लाल सेन की प्रकाशित कृतियां ‘देख रे आंखी सुन रे कान’ और ‘नदिया मरे पियास’ उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की अमूल्य धरोहर हैं। ये काव्य-संग्रह केवल साहित्यिक अभिव्यक्तियां नहीं समय और समाज के संवेदनशील दस्तावेज है। ‘देख रे आंखी सुन रे कान’ काव्य संग्रह अपने भीतर सजगता और जागरण का संदेश समेटे हुए हैं। यह कृति मानो समाज को सचेत करती है कि केवल देखना पर्याप्त नहीं, सुनना और समझना भी आवश्यक है। इस संग्रह में कवि ने सामाजिक विषमताओं, मानवीय संबंधों और लोकजीवन की अनुभूतियों को अत्यंत सहज किन्तु मार्मिक भाषा में व्यक्त किया है। उनकी भाषा अलंकारिक जटिलताओं से दूर और जीवन की सहज लय से संपृक्त है। इसी प्रकार ‘नदिया मरे पियास’ की कृति अपने आप में एक गहरा सामाजिक प्रतीक है। नदी सामान्यतः जीवन और तृप्ति की प्रतीक मानी जाती है किंतु जब वही नदी प्यास से मरने लगे तो यह समाज की विडंबना का मार्मिक संकेत बन जाता है। इस संग्रह में कवि ने संसाधनों के बीच अभाव, विकास के बीच असमानता और मनुष्य के भीतर बढ़ती संवेदनहीनता को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त किया है। यहां करुणा और प्रतिरोध साथ-साथ चलते हैं।
भगवती लाल सेन की काव्य भाषा उनकी सबसे बड़ी शक्ति है। उन्होंने लोकभाषा और बोलचाल के शब्दों को साहित्यिक गरिमा प्रदान की। उनकी कविता में छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति की आत्मीयता, ग्राम्य जीवन की लय और माटी की गंध सहज रुप से मिलती है। वे आधुनिकता के विरोधी नहीं थे किन्तु ऐसी प्रगति के पक्षधर भी नहीं थे जो मनुष्य को उसकी सांस्कृतिक जड़ों से काट दे। उनके लिए विकास का अर्थ लोकमूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे बढ़ना था। उनकी कविता में प्रतिरोध का स्वर भी है किंतु उसमें कटुता नहीं है। वे अन्याय, शोषण और असमानता के विरुद्ध आवाज उठाते हैं परंतु परिवर्तन का आधार मानवीयता को बनाते हैं। यही संतुलन उन्हें लोकमंगलकारी कवि के रुप में प्रतिष्ठित करता है।
8 अगस्त 1981 को रायपुर में उनका निधन हुआ। यह साहित्य जगत के लिए अपूरणीय क्षति थी किन्तु सच्चे साहित्यकार का जीवन उसकी सांसों तक सीमित नहीं होता। उसकी रचनाएं उसे समय के पार भी जीवित रखती है। भगवती लाल सेन आज भी अपनी कविताओं में जीवित हैं – लोकचेतना, सामाजिक संवेदना और मानवीय विश्वास के कवि के रुप में।
आज उनके जन्मदिवस पर स्मरण करते हुए यह अनुभव होता है कि साहित्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी मानवीयता और लोकमंगल की भावना में निहित होती है। जब समाज अनेक नई चुनौतियों और विघटनकारी प्रवृत्तियों से गुजर रहा है तब भगवती लाल सेन की कविता हमें मनुष्य और समाज के प्रति संवेदनशील बने रहने का संदेश देती है। “जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि” की उक्ति उनके जीवन और साहित्य पर पूर्णतः सार्थक प्रतीत होती है।
भगवती लाल सेन की कविता का संसार अत्यंत व्यापक है। उसमें प्रकृति का उल्लास भी है और समाज की पीड़ा भी ग्राम्य जीवन की आत्मीयता भी है और व्यवस्था के प्रति प्रतिरोध भी। उनकी कविताएं केवल शब्दों की रचना नहीं लोकजीवन की संवेदनशील अभिव्यक्ति हैं।
डोकरा जड़काला हा जवान बन के आगे ।
भुइयां के देह में परान बन के आगे ।
महमहाय महर-महर बाग अऊ बगीचा
सुघ्घर बसन्त हा मितान बन के आगे ।
मीठ लगे रतिहा अठ करन लगे घाम ।
झांझ में झोलागे तन, करियागे चाम ॥
लक-लक के आगी अस तिपे रथे धुर्रा
नदिया के कुधरी में फूटे लाई मुर्रा ।।
इस कविता में कवि ने बसंत ऋतु को नवजीवन और पुनरुत्थान के प्रतीक के रुप में चित्रित किया है। बूढ़ी धरती के युवा हो उठने, बाग-बगीचों के महमहाने और ऋतु के “मितान” बनकर आने का चित्र अत्यंत लोकधर्मी है। यहां बसंत केवल ऋतु नहीं जीवन में आशा और उल्लास के आगमन का प्रतीक बन जाता है। कवि प्रकृति और मनुष्य के संबंध को आत्मीयता से जोड़ते हैं।
मोरा, खुमरी, भिरे कछोरा
निंदे खेत ला दाई-माई ।
सुआ गीत अउ किस्सा कहानी
चले सुनावत खार में भाई
इस कविता में खेत, खार, सुआ गीत और श्रमशील जीवन का जीवंत चित्र उपस्थित है। कवि ग्रामीण समाज को उसकी सांस्कृतिक पहचान के साथ प्रस्तुत करते हैं। खेतों में काम करती मां-बहनों की छवि, श्रम के बीच गाए जाने वाले गीत और लोककथाओं का संसार गांव की सामूहिक संस्कृति को सामने लाता है। कविता यह बताती है कि लोकजीवन केवल श्रम नहीं संवेदना और सांस्कृतिक जीवंतता का संसार भी है।
सुआ-पांखी लूगरा के लाली किनारी चांदी के पहुंची
अउ खिनवा सोनारी हवे संवर गोरी लजकुरही
अड़चढ़ कमेलिन नइये घुर-घुर ही आंखी के बनावट
सांचा के ढारे टिकली के टिपका माथ में सारे
जतर-कतर हे मुड़ के चूंदी
बूता के मारे खियावत हे मूंदी
यह कविता ग्रामीण स्त्री-सौंदर्य का अत्यंत आत्मीय चित्र प्रस्तुत करती है। कवि बाहरी आडंबर की अपेक्षा सहज सौंदर्य और श्रमशील जीवन की गरिमा को महत्व देते हैं। टिकली, चूंदी और लुगरा के माध्यम से स्त्री की छवि केवल रूप-सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती लोकसंस्कृति और सामाजिक पहचान का प्रतीक बन जाती है। यहां भाषा और चित्रण दोनों में लोकजीवन की सोंधी गंध विद्यमान है।
मिर्चा अस महतारी चुरचुर
घरवाली हे सोंठ।
साग बघारे असन लागथे
दूनों झन के गोठ।
मन के खोधरा में
तोर सूरता के दिया बरे
तोर टिकली जिवरा में,
फाफा अस भटकत है
इस कविता में घरेलू जीवन और मानवीय संबंधों की मिठास तथा कटुता का सहज चित्रण है। मां और पत्नी के स्वभाव की तुलना लोकप्रतीकों से करते हुए कवि परिवार के भावात्मक संसार को सामने लाते हैं। यह हास्य और आत्मीयता से भरी कविता है जिसमें लोकजीवन की बोलचाल और संवेदनाएं जीवंत हो उठती हैं।
गरवा अस मनखे सब
चितवा कस नेता ।
चलनी में दूध दूहथे
बोहा जाथे धार
नहर बिगन सुक्खा हे
खेत अउ खार
जै हो सरकार
लाद दे करजा
गरीबी के मार
जनता बर मया नइये
नेता के मन में बसगे नंगई,
तभे तो हो जाथे खेत में गंगई
हर साल अकाल
ते बने करे गा
कका जवाहर लाल
लान दे सुराज
आज हो गे हमर काल
यह कविता भगवती लाल सेन के सामाजिक सरोकारों की सशक्त अभिव्यक्ति है। सूखे खेत, करजा, नहरों का अभाव और किसान की विवशता के माध्यम से कवि व्यवस्था की विफलताओं की ओर संकेत करते हैं। “जै हो सरकार” जैसी पंक्तियां व्यंग्य के माध्यम से सत्ता से प्रश्न करती है। यह कविता किसान की पीड़ा को लोकभाषा में स्वर देती है और जनपक्षधर चेतना को मुखर बनाती हैं।
आज शिकारी मन के
बंधवा हावे मितान,
दिल्ली अउ भोपाल के,
चांदमारी टिल्ला ले
लाल किल्ला ले
निसाना साध के मारथे
(काला ?) बोकरा ला
गांव के रहइया
किसान डोकरा ला
आज के कुरहा
रेंगथे हुरहा
रेंगा देथे मोटर ।
रेता जाथे मुरहा ।।
अओ, सुन तो ओ माई
हमरे असन अस्सी करोड़
लड़का मन के दाई
भुरिया झन ज्यादा
बता तें ह हमला
कब देबे खाई
इस कविता में व्यवस्था और शोषण के तंत्र पर तीखा प्रहार है। कवि दिल्ली और भोपाल जैसे सत्ता केंद्रों का उल्लेख करते हुए यह दिखाते हैं कि निर्णयों का बोझ अंततः गांव और किसान पर पड़ता है। “किसान डोकरा” का बिंब उपेक्षित ग्रामीण समाज की पीड़ा का प्रतीक बन जाता है। यहां कविता प्रतिरोध का स्वर ग्रहण करती है।
चुहकत हावे हमर लहू ला
ढेकुना अस बैपारी
भैया ढेकुना अस बैपारी
खातू, बैंक, तकाबी-करजा
मुड़ ऊपर सरकारी
झींका तानी में गा
परगे है जिनगानी
झींका तानी में गा
मंहगाई बाढ़े हर साल
बैपारी होवत हें लाल
नीछत हे गरीब के खाल
अफसर – सेठ उड़ावें माल
रोज बने जनता कंगाल
का गोठियाववं, सब जानत हो,
जै गंगान
अपन देस के अजब सुराज
भूखन लांघन कतको आज
मुसवा खातिर भरे अनाज
कटके नाक बेचागे लाज
कंगाली बाढ़हत हे आज
बइठांगुर बर खीर सोंहारी
खरतरिहा नइ पावै मान
जय गंगान –
यह कविता आर्थिक शोषण और महंगाई के विरुद्ध लोकचेतना की मुखर अभिव्यक्ति है। व्यापारी, करजा और सरकारी बोझ के बीच पिसते गरीब की स्थिति का मार्मिक चित्रण यहां मिलता है। कवि बताते हैं कि विकास के दावों के बावजूद गरीब की स्थिति बदतर होती जा रही है। यह कविता जनजीवन की विडंबनाओं का जीवंत दस्तावेज है।
मिलाय कोन हे उज्जर चांउर मा गोंटी
नंगाए कोन हे हमर बांटा के रोटी।
आगू रिहिस पिरकी होगिन अब फोरा,
हमरे छानी चढ़के भूंजत हे होरा
तीरत कोन हे हमर तन के लंगोटी ।
यह कविता सामाजिक अन्याय और संसाधनों के असमान वितरण पर प्रश्न उठाती है। रोटी, लंगोटी और भूख जैसे प्रतीक समाज की आर्थिक विषमता को रेखांकित करते हैं। कवि केवल शिकायत नहीं करते व्यवस्था से जवाब मांगते हैं। यही प्रश्नाकुलता उनकी कविता को सामाजिक दस्तावेज का स्वरूप प्रदान करती है।
नवा साल
देखत – देखत
साल परागे
घानी मुनी घोर
थारी के भात
मुंहू में चल दिस
हाथ सिरागे कोंरा
अब्बड़ गा हम
रद्दा नापेन
अउ अनीत ला तापेन
तभ्भो ले हम
नवा साल ला
परघावत हन
पहिरावत हन मौर
यह कविता संघर्षों से गुजरते समाज की आशा का गीत है। कठिनाइयों और अनीति के बीच भी नया साल स्वागत योग्य है क्योंकि मनुष्य आशा से ही जीवित रहता है। कवि निराशा के बीच भी उम्मीद का दीप जलाए रखते हैं। यह उनका सकारात्मक और जीवनोन्मुख पक्ष है।
सिखोय बर नइ लागय
गरू गाय ल
बैरी ल हुमले बर
बेरा आथे
भिड़ जाथे
अपन बानी बर
हमन तो
मनखे आन
बेरा आ गे हे
फेर हमन
काबर नइ सीखन
अनीत ल ढेले बर
यह कविता सेन जी की वैचारिक स्पष्टता को व्यक्त करती है। पशु अपने अस्तित्व की रक्षा करना जानते हैं तो मनुष्य अन्याय के विरुद्ध संगठित क्यों नहीं होता यह प्रश्न कविता का मूल स्वर है। यहां कवि प्रतिरोध को हिंसा नहीं न्याय और जागरुकता की चेतना के रुप में प्रस्तुत करते हैं।
लोकचेतना के अमर कवि भगवती लाल सेन का साहित्य यह प्रमाणित करता है कि सच्चा कवि वही है जो अपने समय की धड़कनों को सुन सके। उन्होंने लोकजीवन, श्रम, किसान, स्त्री, गरीबी, शोषण और मानवीय संबंधों को जिस संवेदनशीलता से अभिव्यक्ति दी वह उन्हें छत्तीसगढ़ की साहित्यिक परंपरा में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है। उनके जन्मदिवस पर उन्हें स्मरण करना केवल श्रद्धांजलि देना नहीं उस साहित्यिक चेतना को पुनः जीवित करना है जो मनुष्य और समाज के पक्ष में खड़ी होती है।
लेखक के रुप में मेरे लिए यह भी गौरव का विषय है कि “भगवती लाल सेन छत्तीसगढ़ी लोकभाषा राष्ट्रीय तथागत सम्मान-2025” से मुझे सम्मानित किया गया। दिल्ली की तथागत संस्था द्वारा आयोजित समारोह में छत्तीसगढ़ शासन के विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह के मुख्य आतिथ्य, छत्तीसगढ़ साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. शशांक शर्मा की अध्यक्षता, संरक्षक डॉ. एन.पी. सिंह तथा ट्रस्टी श्रीमती जिज्ञासा सिंह राणा एवं राजेश सिंह राणा, संयोजक डॉ. पीयूष कुमार, चयन समिति के डॉ.भूवाल सिंह ठाकुर, डॉ. भारती मंडावी, संकल्प यदु, डॉ. सियाराम साहू की गरिमामयी उपस्थिति में यह सम्मान प्राप्त करना मेरे साहित्यिक जीवन का महत्त्वपूर्ण क्षण रहा। छत्तीसगढ़ से इस तथागत सम्मान से सम्मानित होने वाला मैं प्रथम साहित्यकार हूं। यह गौरव वस्तुतः छत्तीसगढ़ी लोकभाषा और उसकी समृद्ध साहित्यिक परंपरा का सम्मान है। भगवती लाल सेन की साहित्यिक विरासत आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी और उनका नाम छत्तीसगढ़ की लोकचेतना में सदैव आदर के साथ स्मरण किया जाता रहेगा।
– डुमन लाल ध्रुव
मुजगहन, धमतरी (छ.ग.)
पिन – 493773
मोबाइल – 9424210208