June 1, 2026

मेरा ही ज़िक्र उसके लबों पर सदा रहे

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मेरा ही ज़िक्र उसके लबों पर सदा रहे
जो शख़्स मेरा हो वो फ़क़त बस मेरा रहे

सातों वचन में तोड़ के कर दूँ उसे रिहा
गर बन के भी मेरा वो किसी और का रहे

उसको मैं दिल के बुत-कदे में क्यों मक़ाम दूँ
जिसकी नज़र के घर में कोई दूसरा रहे

पत्थर से जिस बशर को मैंने रब बना दिया
इल्ज़ाम संग-दिली का वो मुझ पर लगा रहे

मैं जिसके इश्क़ में लिखूँ सौ-सौ ग़ज़ल ‘धरा’
उसका भी क़लम मेरे लिए बा-वफ़ा रहे

– त्रिशिका धरा

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