July 25, 2026

मड़वा महल अभिलेख का संक्षिप्त अनुवाद : 1867 की एक पाण्डुलिपी

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भोरमदेव के इतिहास को समझने मे मड़वा महल अभिलेख संवत 1406(1349 ई.) का महत्व सर्वाधिक है।इस अभिलेख मे फणिनागवंशियों की उत्पत्ति कथा तथा वंशावली दी हुई है। वंशावली के अतिरिक्त कुछ राजाओं के बारे मे अतिरिक्त जानकारी भी मिलती है, खासकर रामचंद्रदेव, गोपालदेव, यशोराज, भुवनैकमल्ल आदि के बारे मे। अभिलेख काफ़ी बड़ा है जिसमे 37 पंक्ति और 96छंद है। यह अभिलेख मड़वा महल मंदिर परिसर मे रखा हुआ था। जिसे 1963 ई. मे श्री बालचंद्र जैन ने रायपुर के महंत घासीदास संग्रहालय ने स्थानांतरित किया था और वर्तमान मे वहीं है।फणिनागवंशियों के पतन(लगभग 14वी शताब्दी) के बाद और कवर्धा रियासत के स्थापित होने (1751 ई.) के बाद के दौर मे मड़वा महल अभिलेख को पढ़ने के प्रयास किए गए। इस सम्बन्ध मे दो –तीन पाण्डुलिपियाँ ज्ञात हैं। मगर ये सभी 1850 ई. के बाद की प्रतीत होती हैं। इनमे से एक पाण्डुलिपि स्वर्गीय बी. एल. बख्शी के पास थी जिसे उन्होंने शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय कवर्धा की वार्षिक पत्रिका ‘अंकुर’ के 1979-80 ई. के अंक मे प्रकाशित करवाया था और जिसे श्री सीताराम शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘भोरामदेव क्षेत्र: पश्चिम दक्षिण कोसल की कला’ में प्रकाशित किया है।
एक और पांडुलिपि 1898 ई. की है। इसमें भी अनुवादक का नाम नहीं है। यह पांडुलिपि स्वर्गीय श्री नरेंद्र सिंह परिहार के पास थी। उनको यह कहां से प्राप्त हुई थी इसकी जानकारी हमे नहीं है। इसकी एक फोटो कापी उन्होंने स्वर्गीय श्री शरद हलवाई को दी थी। मुझे इसकी कापी शरद जी के भतीजे और मेरे मित्र श्री राजाराम हलवाई से प्राप्त हुई है। श्री सीताराम शर्मा ने अपने उल्लेखित पुस्तक में नरेंद्र परिहार जी के पास एक पांडुलिपि होने की बात लिखी है,और जिसे उन्होंने देखा था। संभवतः सीताराम जी ने इसी पांडुलिपि की बात की है। श्री शरद हलवाई ने अपने भोरमदेव संबंधी आलेख(1988 से1992 के बीच का) में लिखा है “इस शिलालेख का दूसरा अनुवाद तैयार किया कवर्धा राजपुरोहित पंडित रामचंद्र जी ने लगभग आज से नब्बे वर्ष पहले जो संभवत: कवर्धा राजपरिवार के पास सुरक्षित हो।”
प्रस्तुत पाण्डुलिपि संवत 1924(1867 ई.) की है जिसकी कॉपी हमें कवर्धा के राष्ट्रपति पुरस्कार से पुरस्कृत शिक्षक श्री आदित्य श्रीवास्तव से प्राप्त हुई है। यह पाण्डुलिपि उन्हें श्री सी. एन. झा के संग्रह से 2004 में पाण्डुलिपि सर्वेक्षण के दौरान प्राप्त हुई थी। इस पाण्डुलिपि में भी मड़वा महल अभिलेख का संक्षिप्त अनुवाद है। मुख्यतः वंशावली है मगर संक्षिप्त में उनका परिचय भी है। महत्वपूर्ण यह है कि इसमें चतुरापूरी किले तथा शिव मंदिर निर्माता शासक भुवनैकमल्ल का उचित चित्रण है जो बालचंद्र जैन के पाठ के अनुकूल है।वंशावली भी लगभग बालचंद्र जी के पाठ के अनुरूप है, ख़ासकर परवर्ती शासकों का क्रम ठीक है, जिसमे अमूमन चूक होती है।इससे स्पष्ट है कि इस पाठ को तैयार करने वाले ने अभिलेख का ठीक पाठ किया है। मगर इस पाठ में एक त्रुटि यह है कि इसमें भी अन्य पाण्डुलिपियों की तरह भोरमदेव मंदिर दक्षिणी प्रवेश दीवार अभिलेख संवत 1608 (1551 ई.) को संवत 160 पढ़ा गया है और इसे मंदिर का निर्माण काल माना गया है। साथ ही मड़वा महल अभिलेख में उल्लेखित संवत 1406 का भी जिक्र नहीं है।
पाण्डुलिपि से स्पष्ट है कि कवर्धा रियासत के ज़मींदार (शासक ) उजियार सिंह (1801- 1849 ई.) के कार्यकाल में पंडितों द्वारा अभिलेख का अनुवाद (तर्जुमा) करवाया गया था। यह पाण्डुलिपि उसी अनुवाद पर आधारित है।
इस पाण्डुलिपि में तीन कॉलम बनाये गए हैं – (1) नंबर (2) नाम (3) कैफियत [विवरण ]
पाण्डुलिपि का पाठ –
वादफिरस्तयों के ज़मींदारी परगने कमर्द्धा देवस्थान पुराना जोके हाल पर भोरमदेव जाहर है उंहा पर पहिले पुराना वक्त मै णागवंशी [नागवंशी] राजौ हुवे औ देवस्थान वा तलाब बनवाया मै कैफियत वंशावली उन राजौ की लिखे नीचे के अन्वाद वीजक मडवा महल जोके मौजे छपरी से दक्षि[ण]बाजू मौ चौरा के पास है उहा पर पंडित लोगो ने संस्कृत श्लोक बनाया है वह श्लोक ठाकुर उजियार सिंह ज़मींदा[र ] परगने कमर्द्धा ने अपने वक्त मे पंडित लोगो से तर्जुमा कागज मै कराये थे उसी का हाल मु:फस्सिल इस लिखा पर से खुलासा लिखा जाता है फकत मिती कार्तिक सुद १३सम्वत १९२४ [1867 ई.]
नंबर नाम कैफियत
१ जातुकर्न मुनि नर्मदा जी के दक्षिण भाग मे पर्णपुटी नाम के आश्रम मे वास करते रहे
२ लडकीमुनि मुनि की कन्या मिथिला नाम की बाप
मजकूर की व मा के मरने बाद वह आश्रम मे
मिथिला नाम रहती थी
३ शेषनारायण खामिद शेषनारायण महाराज के दूत लोक [खाविंद?] लडकी मजकूर वह कन्या को देखा और उसकी
सौंदय् र्य देखकर अपने मालिक से
जाहर किया तो शेषनाग ने ब्राह्मण
वेस बनाकर उसके पास आये और
कन्या को राजी कर गांधर्वी विवाह
किया बाद कुछ दिन के उस लडकी
से लडका पैदा हुवा नाम उसका
अहिराज देव बाप उसका शेषनाग
ने कहा य लड़का
४ अहिराजदेव राजा अपने बाहुबल से ———-
बेटा शेषनारायण का
५ —— -देव
६ ——–देव
७ सर्ववंदन देव ————-
८ गोपालदेव [ बा]हुबल से राज किया
९ नलदेव राज्य किया
१० भुवनपाल प्रजा की पालना अछे तरह किया
११ कीर्तिपाल जिसकी कीर्ति मुलक मे जहर रही
१२ जैत्रपाल वह प्रतापी हुवा दुष्ट लोगो [के जो] किया
१३ महीपाल देव शत्रु लोगो जीता
१४ विषमपाल नीतिशास्त्र मे कुशल हुवा
१५ [ क]न्हन देव नीतिशास्त्र मे निपुण हुवा
१६ जनपाल प्रजापालन किया
१७ जसोराज जसोराज जिसकी कीर्ति तमाम मुलक मे जाहिर
१८ खड्गदेव चंदनदेव
१९ भुवनैकमल्ल विज्जन देव [जो भुवनैकमल्ल ने ]अपना
भुजबिल व शस्त्र बल से वैरी
जीता और भोरमदेव जो हाल
पर जाहर है उहां एक मंदिर
बनवाया के जिसमे महादेव का
स्थापन किया और एक तलाब
बनवाया उसका साल संवत
उस मंदिर के दक्षिण द्वार…..
लिखा है संवत १६०का साल
++++
दुर्गावलीपूरी बनवाया उहां पर
हाटकेश्वर महादेव है और उहां
पर सकरी नदी है
२० अर्जुन देव मेलुगि देव
२१ भीम देव लक्ष्मण देव
२२ भोजदेव.. [स ] पुत्र रामचंद राजा…… अर्जुन देव
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★पाण्डुलिपि मे भुवनैकमल्ल के कार्यों का चित्रण मड़वा महल पाठ के अनुकूल है। मड़वा महल अभिलेख मे उल्लेखित है –
“श्रीखड्गदेवाद्भुर्वं नकमल्लस्तनूभवोभूद्भुजवीर्यशाली
आसाद्य राज्यं फरिणवंशकेतोः शशास पृथ्वीं चतुरर्णावान्तां ॥४७॥
जित्वा वैरिबलानि खड़गमुह्रदा दोषणा स पूष्णा समस्तेजस्वी चतुरः पुरीमरचदद्दूर्गावलीं दुर्गमां ।यस्या दक्षिणतः स्वयं सुरनदी बाहोदरी शङ्करी,यत्तीरे हटकेश्वरे फणिकुले–स्वयं निर्गतः ॥४८॥आराधिता तेन राज्ञा ब्रह्माणी देवता स्वयं ।आरक्षको कृता यस्याःखड्गस्येवाधि देवता ॥४९॥तामुत्तरेण नगरों तरुणेन्दुमौलेरभ्र लिहो विरचितो निलयः शिवस्य ।सिन्धो सपन्न इव तत्र तरंगलेखाभूभंग भीषणतरश्च महांस्तडागः ॥५०॥”
श्लोक से स्पष्ट कहा गया है कि भुवनैककमल्ल ने क़िलाबन्द चतुरापुरी (चौरागढ़) नगर बनाया जिसके दक्षिण में शंकरी नदी बहती है.इस नदी के किनारे हटकेश्वर मन्दिर खड़ा है,जहां राजा ब्राम्हणी देवी की पूजा करने जाता है।उसने नगर के उत्तर में विशाल शिव मंदिर बनवाया और वृहत तालाब खुदवाया।यह मंदिर वर्तमान भोरमदेव मंदिर को ही इंगित करता प्रतीत होता है क्योंकि यह चतुरापूरी किले के उत्तर मे है और इसके किनारे बड़ा तलाब भी है। श्लोक के अनुसार हाटकेश्वर माहदेव मंदिर सकरी नदी के किनारे रहा होगा जो अब ध्वस्त हो गया है। वर्तमान मे हरधोना तालाब के पास सकरी नदी के किनारे मंदिरो के अवशेष मिलते हैं। सम्भवतः वहीं पर यह मंदिर रहा होगा।
★ इस पाण्डुलिपि की एक खासियत यह भी है कि इसमें भुवनैकमल्ल का सही पाठ किया गया है, अन्यथा अन्य पाण्डुलिपियों मे इसका अशुद्ध पाठ भुवनपाल/भवनपाल किया जाता रहा है जिससे मंदिर निर्माता के रूप मे भुवनैकमल्ल की जगह भुवनपाल को समझ लिया जाता था।
★पाण्डुलिपि की भाषा तत्कालीन राजकीय/प्रशासनिक भाषा अनुरूप उर्दू -फ़ारसी शब्दावली की बाहलता लिए हुए है।
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संदर्भ -मड़वा महल अभिलेख के सम्पूर्ण पाठ के लिए देखें
पुस्तक ‘भोरमदेव : भोरमदेव पचराही के फणिनाग वंशियों
का इतिहास’ -लेखक अजय चंद्रवंशी ‘
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★अजय चंद्रवंशी, कवर्धा (छत्तीसगढ़)
मो. 9893728320

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