सुन री, ज़िंदगी!
सुन री, ज़िंदगी!
हर बात पर, हर रोज़,
हर किसी से समझौता करूँ?
ये शर्तें मुझे मंजूर नहीं।
मैं वो दिआ हूँ जो बुझने से पहले
खुद ही जलना पसंद करता हूं,
जली बाती मानिंद किसी की हथेली पर
कभी नहीं बिखरूँगा, कतई नहीं !
रोज़-रोज़ तू मोल-भाव करती है,
मुस्कान के बदले आँसू भरती है
सपनों के बदले दिखाती है मृगतृष्णा,
अरमानों के बदले सुलगाती है लब्ज़
मैं इन सौदों में नहीं पड़ता,
क्योंकि मेरा वजूद बिकाऊ नहीं।
हर किसी की नज़र में
अपने आपको बौना कर लूं
नहीं ज़िंदगी,नहीं,, ये हो न पाएगा।
मैं अपनी हद में ही खड़ा रहूँगा।
चाहे तू मुझे तोड़ दे, मरोड़ दे,
पर झुकाऊँगा नहीं सर अपना
तू अक्सर कहती है “समझौता कर लो”,
मैं तुझसे कहता हूँ
“तुम अपना ज़मीर बेच दो
मैं दिल को बचाकर रख लूँगा।”
सुन , मतलब परस्त ज़िंदगी!
अब तेरी कटीली राह पर
रोज़ चलूँगा, चाहे पांव ज़ख्मी हों
चाहे अँधेरा घनघोर हो।
समझौता सिर्फ़ मौत से करूँगा,
उस दिन जब वो आएगी, चुपके से
तब कहूँगा “ले जा, मुझे
लेकिन मेरी शर्तों पर” क्योंकि
तेरी भी कोई शर्त मुझे मंजूर नहीं।
– राजेंद्र रंजन गायकवाड
बिलासपुर,10/07/2026