July 25, 2026

छत्तीसगढ़ी कहानी : चिरई

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बसंत राघव

जेठ के घाम अउ उमस मा सक्ती इसटेसन के प्लेटफारम नंबर ‘एक’ मा सब्बो मनखे मन बहुतेच हलाकान हो गे रहिन, फेर अभी बिहनिया के ग्यारह ही बाजे रहिस। तभे लाउडस्पीकर मा अनाउंस होइस, “यात्रीमन धियान देवहू… बिलासपुर-रायगढ़ पैसेंजर कुछेक बेरा मा प्लेटफारम नंबर एक मा आवत हे।” ए खबर ला सुनके यात्री मन ला थोरिक राहत मिलिस, काबर कि रेलगाड़ी अढ़ाई घंटा लेट हो गे रहिस।

रेलगाड़ी जइसने रुकिस, तइसने पहिली सांत दिखइया प्लेटफारम, मेला जइसन हल्ला-गुल्ला मा बदल गइस। खिरकी के लोहा के ग्रिल ला धर के झांकत उत्सुक चेहरामन अउ पायदान मा गोड़ टिकाए मनखेमन… चारो कोति शोर-गुल होए लागिस।
“गरम चाय… चना-चुरमुर!”
“गरम-गरम समोसा ले लो!”
“ठंडा पानी, बोतल!”

हवा मं तैरत ये अवाज़ मन सोझ बोगी के भितरी तक जावत रिहिस।

प्लेटफारम के एक कोनहा में बइठे गाँव के सियनिनमन बाँस के बड़का- बड़का टुकना म हरियर मिरचा, भिंडी, परवर, तुमा, ककड़ी, खीरा, लाल पताल अउ कतकोन किसम के ताजा साग-भाजी सजा के धरे रिहिन। गाड़ी रुकते च कतकोन सियनिनमन लपक के खिरकी डहर बढ़िन अउ अवाज लगाय बर धरिन – “ले ले बाबू! एकदम बाड़ी के ताजा तोड़े साग हे!”

मोल-भाव के हरबड़ी अउ रेलगाड़ी छूटे के डर… अउ फेर, ये ढकेली-ढकेला, हल्ला-गुल्ला के बीचों-बीच… मन्तोरा सब्जी के बोरा ल मुड़ म लादे, रेलगाड़ी के डिब्बा तक पहुंचे बर भीड़ ले जूझत रहीस।”

रेलगाड़ी के मुँहारे म खड़े दू-चार आवारा लइकामन प्लेटफ़ारम म आवत- जावत नोनीमन ला गंदा नजर ले निहारत रहिन। तभे ओमन के नजर मंतोरा म परिस – एकदम सोझ-साझ गाँव के अल्हड़ मंतोरा… उमस भरे गरमी म ओखर मुड़ म सब्जी के दू ठन भारी बोरा रहिस। ओ टूरामन मया-मयारू भुला के ओखर ले मसखरी करे लागिन अउ खुलखुल हाँसे लागिन।

सीटी बाजिस अउ गाड़ी रेंगना सुरू करे ही रहिस कि अचानक एक ठन डरावना चिचियई पूरा डिब्बा म गरज गिस। ओ आवाज एतका डरडरावन रहिस कि एक पल बर इंजन के घड़-घड़ घलो ओकर सोर म दब गिस। जइसने अपन खोंधरा कोति बढ़त साँप ला देख के कोनो चिरई ह डर के मारे चिचियाथे, वइसने ओ आवाज रहिस।

“का होगे? का होगे?”
पूछत-पूछत दस-बारा झन मनखे एक संग अपन सीट ले उठ के दुवारी कोति दउड़िन। ओहाँ के नजारा ला देख के सब्बो झन के होस उड़ गे। एही बीच म मन्तोरा के मूँड़ ले बोरा ह खिसके लागिस, जेकर ले ओकर संतुलन बिगड़ गे अउ रेलगाड़ी के मुहारी म लगे स्टील के हत्था ले ओकर हाथ ह छूट गे। ओहा बोरा ला ही चपके रहिगे अउ ओकर आधा देह ह हवा म लटक गे। खाल्हे म लोहा के करिया पटरीमन सरसरावत तेजी ले पाछू छूटत जावत रहिन। एक छिन के घलो देरी होतिस, त ओहा आँखी ले ओझल हो जातिस। तभे दू झन जवान लइकामन फुर्ती ले झपट के मन्तोरा ला ओकर बोरा समेत बोगी के भीतरी खींच लीन। ओहा धड़ाम ले मुहारी के आघू मुड़भसरा फरस म गिर परीस अउ ओकर साँस ह जोर-जोर ले चले लागिस। डरे-घबराए मन्तोरा ह एती-ओती देखे लागिस। अपन गोड़ कना सब्जी के बोरामन ला सुरक्षित देख के ओकर आँखी म चमक लहुट आईस। ओहा अपन मुँह म बिखरे चूँदीमन ला समेट के कान के पाछू करिस। अचानक मिले मदद ले मन्तोरा के जान म जान आईस; बोरा के भार हटतेच ओहा खालहे गिरे ले बच गे।

मुहारी के सोझा कुती सीट म बइठे एक झन डोकरा बबा ले यहू सब देख के रहे नई गइस। ओहर चिंता भरे सुर म कहिस, “अरे नोनी! अभीच खाल्हे गिर जाते त? अपन जान ले हाथ धो बइठते! अउ फेर ये बोरा के का कीमत रह जातिस?” मन्तोरा ह सकपका के अपन मुड़ ला खाल्हे नवा लिस। एती रेलगाड़ी ह फेर अपन पहिली कस रफ्तार अउ अवाज म आ गे रहीस, जनो कुछू होय च नई रहीस। घड़-घड़ करत गाड़ी ह अपन पूरा ताकत ले दउड़त जात रहीस।

करिबन बीस मिनट बाद ओकर रफ्तार थोरकुन कम होइस अउ झारीडीह इस्टेसन आ गइस। मंत्री जी के जुलूस ले लहुटत जवान लइकामन म रेलगाड़ी ले उतरे के होड़ मच गइस। ओमन डिब्बा म ठाढ़े मनखेमन ला धकियावत बाहिर निकले बर धर लीन। ककरो मुड़ फूटय चाहे गोड़ कुचल जावय, एकर चिंता कोनो ला नई रहीस। अइसन माहौल म गारी-गुप्ता के परवाह कउन करय! लोकल रेलगाड़ी म न तो ककरो रोके-टोके के डर रहीस अउ न ही पकड़े जाय के भुसभुस।

इस्टेसन म कुछ लोगमन उतरिन, लेकिन ओकर ले कतको जादा लोगमन डिब्बा के भीतर आ गइन। मन्तोरा के मन अभी घलो असांत रहीस। जइसनेच अगला इस्टेसन आइस, ओला डर लागे लागिस कि भीड़-भाड़ म कहुं कोनो ओकर बोरा म गोड़ झन रख दे। तभे अचानक ओकर गोड़ एक झन डोकरी दाई ले टकरा गइस अउ ओ डोकरी ह ओला गारी-गुप्ता के संगे संग अंडसंड बके लगिस। खीझ के ओहा डोकरी ला कोहनी ले पाछू धकेल दिस। फिर का रहीस, बात ‘तोर-मोर’ तक आ पहुंचिस। देखत-देखत “राँड़ी-दूखाई”, “तोर चूरी कुच्चौं” अउ “तोर पानी नहावौं” जइसन गारीमन के दौर शुरु हो गइस। एतका बेर ले, जे मनखेमन ओकर डहर मया-दया के नजर ले देखत रहिन, ओमन अभिच्चे रेफरी कस कमेंट कर कर के पदोय लगिन अउ दूनों ला आपस म लड़ाए के बुता करे लगिन।

पास म बइठे दुई झन बाबू-पिला जब बीच-बचाव करिन, तब कहीं जाके डोकरी दाई ह सांत होइस। झगरा थाम्हिस, त ओ दूनों बाबू-पिला घलो हाँफत-हाँफत जइसने-तइसने अपन सीट म बइठ गे। थोरकुन जगह खुलिस अउ हवा के एक झोंका भीतर आइस, तब जाके मन्तोरा के परान म परान आइस। तभे मन्तोरा के चेत अपन साग-भाजी के बोरा कोति गइस। ओहा बोरा ला टटोलिस,हिलाइस-डुलाइस अउ ओकर ढीला होत गाँठ ला कँसके बाँध दिस। फेर वोहा पूरा जोर लगा के बोरा ला खींच के सीट के खाल्हे लुकाए के कोसिस करिस। एतका करे के बाद घलो बोरा के एक कोना ह बाहिर झाँकत रिहिस। टीटी के आए के डर ओकर मन म बइठे रिहिस, एही पाय के ओहा बोरा के ठीक आगू म अइसन तनके ठाढ़ हो गइस कि आवइया के नजर ओमा परबे झन सकय।

जइसे-जइसे गाड़ी ह रफ़्तार धरिस, झरोखा ले छनके आवत घाम ह मन्तोरा के रूप-रंग ला कउनो खिले फूल असन चमकाए लगिस। गाड़ी म बइठे जतके मनखे रहिन, ओमन के आँखी अब ओकरे ऊपर टिक गे राहय। ओकर फटे ब्लाउज ले दिखत देह के सुघराई ह ओमन के मन म गुदगुदी जगावत राहय।

खरसिया टेसन म अगाध भीड़ रहिस अउ रेलगाड़ी के ओ डब्बा ह सवारी मन ले खचाखच भरे रहिस। उमस अउ भयंकर घाम के मारे मन्तोरा के गला ह पियास म सुखावत रहिस। कण्ठ ला थोरकुन तर करे बर ओ ह खिड़की ले हाथ ला बाहिर निकालिस अउ एक कुल्हड़ चहा बिसाईस, अउ धीरे-धीरे ओकर गरमा-गरम चुस्की लेवे लगिस। चहा के हर घूँट के संग अभी ओकर जी म जी आवत रहिस कि तभे गाड़ी ह मंद गति ले इस्टेसन ला छोड़ दिस। ओही बखत रेलवे पुलिस के दू झन जवान ओ डब्बा के भितरी परवेस करिन। लंबा-चौड़ा, रोबीला अउ सजीला जवान रहिन। मन्तोरा के छाती म एक संग कतको हथौड़ा चले लगिस। कण्ठ ह सूख गे अउ साँस ह जइसन गला म ही अटक के रह गे। बोगी म ठाढ़े खाकी वर्दी ला देखत खने, तीन महीना पहिली के ओ भयंकर किस्सा हर ओकर आँखी के आगू म तईर गे।

ओहा इहें खरसिया इस्टेसन के प्लेटफारम रहिस। थोरकुन पइसा बर जिद्दी टिकट बाबू के ओ रूखा अउ बिना मया-दया के चेहरा आज घलो मन्तोरा के करेजा म छूरी कस गड़थे। ओहा गोड़ ला धर ले रहिस, आँसू बहाइस, गिड़गिड़ाइस- ‘साहब, गरीब लोगन हन… लइका- बच्चामन भूखे मर जाहीं…’ पर ओ वरदी वालेमन के मन म रत्ती भर दया नई अइस।

जइसने-जइसने गाड़ी चले बर धरीस, घेक्खर टिकट बाबू के इसारा पाके तीर म ठाढ़े रेलवे पुलिस ह मन्तोरा के दिनभर के खून-पसीना के, भाजी-पाला ले भरे बोरा मन ला चलत रैलगाड़ी ले खाल्हे प्लेटफारम म फेंक दीस। बोरा म भरे हरियर भाजी-पाला ह प्लेटफारम म अइसन बिखर गे रहिस, जइसन मन्तोरा के करम के कतको टुकड़ा होगे होय। ओहू घलो डिब्बा के फरस म उखरू बइठ गइस अउ ओकर आँखी ले आँसू ह डबडबा गे गिरे ल धर लीस।

रैलगाड़ी रफ्तार धर ले रहिस अउ मन्तोरा ह खिरकी तीर ले पाछू छूटत, प्लेटफारम म बगरे भाजी-पाला ला बेबसी ले ओझल होत देखत रहिस। जब ओहा खाली हाथ घर लवटीस, त भूख ले बिलखत लइकामन के मुरझाय चेहरामन ले आँखी मिलाय घलोक के हिम्मत नई रहिस। ओहा अपन आप म पछतावा अउ लाचारी ले भरगे रहिस।

आज फिर ओही खाकी वर्दी वाले मन के आहट पाके ओकर जी धक ले करिस। डर के मारे ओहा खिड़की के छेंव कोती सरक गइस अउ अपन-आप ला अइसन सिकोड़ लिस, मानूं ओहा ओही रेलगाड़ी के कोनो बेजान टुकडा बन जाय बर चाहत होय। ओइसने, जइसन कोनो घायल चिरई ह सिकारी ला आघू म देख के सूखा पाना मन के पाछू अपन सांस ला रोक के दुबक जाथे।

निचट गोठ आय, खाकी के तेज नजर ले भला कउनो लुक-छुप सकत हे? जैसे कोनो सिकारी कुकुर के सुंघे ले सिकार ह नइ बाच सकय, वइसने ओ पुलिसवाला के बारीक नजर ह सोझ मन्तोरा के गोड़ के पाछू रखे ओ दूनो बोरा मन ऊपर जाके टिक गइस।

“येहा काकर बोरा आय रे?”
एकझन सिपाही ह खर्रा आवाज म पूछिस। पूरा डिब्बा मं अचानक सन्नाटा छा गिस। मन्तोरा के करेजा कांप गिस। ओह कुछू कहि पातिस, ओकर पहिली च दूसर सिपाही ह गरज के बोलिस, “सोझ-सोझ बतावा, येहा काकर बोरा आय! नइतो डिब्बा ले बाहिर फेंक देहूं!”

सिपाही के अइसन डरावना रूप ला देख के मन्तोरा ल भसभस होय लागिस। ओह डर के मारे थरथरावत कहिस, “साहब… येहा… येहा मोर च आय। साहब, हमन तो रोज इही रद्दा ले आथन-जाथन। हमर महीना बंधाय हे ना…।”

एला सुनके पहिली सिपाही ह गरजत कहिस, “का कहे? महीना बंधाय हे? हमन कुछु नइ जानन! आघू के स्टेशन म उतर जाबे, समझ गे?”

तभी दूसर सिपाही ह बीच म टोकिस अउ मया देखावत पूछिस, “का तैं रोज इही रेलगाड़ी म आथस-जाथस जी?”

मन्तोरा ह डर के मारे कांप गे अउ बोलिस, “नइ साहब… आज पहिली बार जात हंव।” पहिली सिपाही ह फेर गुस्साइस, “झूठी कहीं की! अभी तो कहत रहस कि रोज आथंव।” अब मन्तोरा के हाथ-पैर कांपे लगिस, ओह रोवांसी हो गे अउ सच ला उगलिस, “हां साहब… आथंव, फेर रोज नइ, इतवार-इतवार के। हफ्ता म एक बार ए बोरा म साग-भाजी भरके रायगढ़ के इतवारी बजार म बेंचे बर आथंव।” अतका कहिके ओह अपन अंचरा के गांठ ला छोरिस अउ ओमा ले पांच-पांच रुपिया के दू ठन नोट निकालके सिपाही कोति बढ़ा दिस। सिपाही ह तिरछा नजर ले देखिस अउ खीस निकालके हंसत कहिस, “तो तेंहा पहिली काबर नइ बताये ओ?”

“टिकट कहाँ हे?” सिपाही ह आँखी देखावत पूछिस। सवाल ला सुन के मन्तोरा ह अपन आँचल ले एक ठन मुड़ाय-तुड़ाय टिकट ला निकाल के देखाय लगिस। “हमन कुछु नइ जानन! चलान कटही!” पहिली जिद्दिहा सिपाही ह कड़क के फेर धमकाइस। मन्तोरा ह समझ गे रिहिस कि ये मन बिना अउ पैसा लियें नइ मानंय। छापे बर न छींचे बर, बाँटा लेहे बर खोखसा! ओकर आँखी ले आँसू टपक गे। बेचारी लाचार हो गे अउ अपन आँचल के छोर ले पाँच रुपिया के एक ठन अउ नोट निकालिस अउ ओकर हाथ म रख दिस। पैसा ला जेब मं ठूंसिन अउ दूनों सिपाही मन छाती ला तान के अँइठत, आघू के डब्बा कोती रेंग दिन।

रॉबर्टसन इस्टेसन में जब एक सवारी हर उतरीस, तब कभू जाके मन्तोरा ला बइठे बर थोकन जगा मिलिस। सीट म बइठ के ओहा अभी सुस्ताए के सोचत रिहिस कि अचानक सुरता आईस, ‘अरे! अब तो रायगढ़ अवइया हे।’ ओहा हड़बड़ा के उठिस अउ सीट के खाल्हे में राखे अपन बोरा ला बाहिर खींचे बर धरिस। धड़धड़ावत ट्रेन ह भूपदेवपुर इस्टेसन म आके रुक गिस। डिब्बा के माहौल अब थोरिक हरुका हो गे रिहिस, काबर कि कुछ अउ संगवारीमन उतर चुके रिहिन। ओ डोकरी दाई घलो कोन जने कतका बेर के उतर के चले गे रिहिस।

मन्तोरा के मन होईस कि ओहा गोड़ ला पसार के थोरकुन सुस्ता लेतीस, काबर कि कतको बेर ले ठाढ़े-ठाढ़े ओकर गोड़ पीरात रहिस। पर रस्ता के अतका तीर म आके रुकना अउ सवारी मन के उतरना-चढ़ना के ए सिलसिला के बीच म, सुस्ताना ओकर बर अभी घलो एक अधूरा साध बनके रह गे रहिस।

थकान के मारे मंतोरा के आँखी ह मुंदाय बर धरत रहिस कि किरोड़ीमल टेसन निकल गे रहिस। तेकर संगे-संग एक झटका के साथ रेलगाड़ी ह रायगढ़ टेसन म रुक गिस। तभे एक अधेड़ मनखे ह ओकर खांध ला हला के ओला जगाइस। खांध म कोनो अनचिन्हार मनखे के छुवाय के अहसास होवत ओहा हड़बड़ा के उठ के ठाढ़ हो गिस। आँखी ला मलत-मलत ओहा अपन दूनों बोरा ला धरिस अउ रेलगाड़ी ले उतर गिस। ओकर पूरा बदन पसीना ले भीग गे रहिस।

प्लेटफारम म रेंगत-रेंगत मंतोरा ह हिसाब लगाय बर धरिस कि पुलिसवाला ला पाँच-पाँच के दू ठन नोट अउ फेर पाँच रुपिया, मतलब कुल मिला के पंदरा रुपिया दे बर परिस। अच्छा होइस आज टीटी नइ मिलिस, नइ तो ओ हू लगेज के नाम म पच्चीस-तीस रुपिया ऐंठ लेतिस। गाड़ी के भाड़ा अलग ले अठारह रुपिया लागिस, जेकर ले कुल तेतीस रुपिया खरचा हो गइस। स्टेशन ले बाहिर निकल के ओ ह एक झन रिक्शावाला ले थोरकुन मोल-भाव करिस। भाड़ा तय होय के बाद बोरा मन ला रिक्शा म लाद के ओ ह अपन डहर आघू बढ़ गइस।

पाछू म गाड़ी ह सीटी बजावत आघू निकल गे रिहिस। डिब्बा म फेर ओही गोठ-बात अउ ओही हाँसी-ठट्टा गूँजे बर धरिस।

पाछू छूट गे रिहिस रैलगाड़ी के ओ ‘घड़-घड़’ के अवाज, जे ह कोनो चिरई के आखिरी चिचियई कस रिहिस…
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बसन्त राघव
पंचवटी नगर, मकान नं. 30
कृषि फार्म रोड, बोईरदादर, रायगढ़,
छत्तीसगढ़, basantsao52@gmail.com मो.नं. 8319939396

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