कोई भी लक्ष्य मनुष्य से बड़ा नहीं है
डॉ सच्चिदानंद जोशी
प्रसिद्ध कवि कुंवर नारायण की पंक्तियां जब भी आप निराश होते हैं हताश होते हैं तो आपको मजबूती देती हैं, हौसला देती हैं;
” कोई भी लक्ष्य मनुष्य से बड़ा नहीं है
हारा वही है जो जीवन में लड़ा नहीं है”
अपने जीवन में कई बार इन पंक्तियों से जीवन का नया मार्ग खोजने में सहायता मिली है ।लेकिन एक व्यापक रूप में इन पंक्तियों को साकार होते देखने का अवसर आया हिरोशिमा में।
इस साल जब जापान घूमने जाने का कार्यक्रम बनाया तो टोक्यो और क्योटो के बाद जापान का तीसरा आकर्षण था हिरोशिमा जाना। कई लोगों का मत था कि हमें हिरोशिमा पहले जाना चाहिए था और बाद में क्योटो या टॉक्यो लेकिन लगा जो किया ठीक किया कि हम अपनी यात्रा के अंतिम पड़ाव पर हिरोशिमा गए।
6 अगस्त 1945 की सुबह 8 बजकर पंद्रह मिनट पर विश्व की पहली आण्विक हथियार त्रासदी ने जन्म लिया और जापान के हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर आण्विक हथियारों का प्रयोग किया गया। कहा जाता है कि जिस दिन बम गिराए गए उसी दिन हिरोशिमा में लगभग 70000 और नागासाकी में 20000 लोग मारे गये। इन अस्त्रों का प्रभाव इतना मारक और दूरगामी था कि इनसे जनित बीमारियों से आने वाले दिनों में और भी लोग मरते रहे । अनुमान है कि हिरोशिमा में यह आंकड़ा 140000 और नागासाकी में यह आंकड़ा 80000 तक पहुंचा। दोनों शहर पूरी तरह तबाह हो गए और बेहिसाब संपत्ति का नुकसान हुआ। न जाने कितने घर तबाह हुए , कितने परिवार बिखर गए।न जाने कितने दिनों तक कई सारे लोग उन हथियारों के प्रयोग के कारण होने वाली अलग अलग बीमारियों के शिकार रहे।
इन सारी बातों की पृष्ठभूमि में आप हिरोशिमा जाते हैं तो सबसे पहले आपके सामने कई सारे काल्पनिक दृश्य उभरते हैं। वहाँ जायेंगे तो क्या क्या देखने को मिलेगा , कैसा होगा वो दृश्य , किस तरह देख पाएंगे वो सब। यह भी सवाल कहीं पीछे से आता है कि और क्या देख सकते हैं वहां।
लेकिन जब आप शिनकानसेन ट्रेन से स्टेशन पर उतरते हैं तो एक अलग ही दृश्य आपका स्वागत करता है, एक बहुत सुंदर साफ सुथरे शहर का। वैसे जापान के सभी शहर सुंदर और साफ सुथरे ही हैं लेकिन हिरोशिमा एक दम नए शहर सा लगता है।
हम लोग इन सब बातों की तरफ ध्यान दिए बगैर सीधे होलोकास्ट मेमोरियल की तरफ गए। होलोकास्ट मेमोरियल एक यूनेस्को धरोहर स्मारक है। यह दरअसल कमर्शियल एग्जिबिशन हॉल था जो बम विध्वंस में तहस नहस हो गया था। इसे जेनबाकू डोम कहा जाता है और यह हिरोशिमा प्रीफेक्चर की एक प्रमुख इमारत थी।
आण्विक हथियार की त्रासदी के बाद जापान में पुनर्निर्माण की लहर आई और दोनों शहर पूरी तरह नए रूप में बसे । तब इस बात की चर्चा हुई कि हमें उस त्रासदी का कोई अवशेष रखना चाहिए या नहीं। अधिकांश लोग इस पक्ष में थे सारे अवशेष मिटा देने चाहिए ताकि उसकी तमाम बुरी यादों को भुलाया जा सके। लेकिन अंततः इस बात पर सहमति हुई कि इस वैश्विक त्रासदी की स्मृति के रूप सिर्फ इस डोम को संरक्षित करके रखा जाये और 1996 में इसे विश्व धरोहर के रूप में मान्यता मिली। वहाँ एक पट्टिका ऐसी भी जहाँ दर्ज है कि कब कब इस डोम को इसी अवस्था में रखने के लिए संरक्षण का कार्य किया गया।
जब आप इस स्मारक के आसपास घूमते हैं तो आपको ऐसे कई वॉलेंटियर मिल जाते हैं , जिनमें अधिकांश वृद्ध होते हैं ,जो आपको प्रेरित करते हैं कि आप आण्विक हथियारों के प्रयोग को रोकने की अपील पर हस्ताक्षर करें। ऐसे भी लोग मिलते हैं जो आपको वो दास्तान बताने के लिए स्वेच्छा से बिना किसी पारिश्रमिक की प्रत्याशा में खड़े हैं। एक सज्जन तो पिछले उन्नीस वर्ष से रोज वहां आकर त्रासदी के बारे में आपकी जिज्ञासा शांत करते नज़र आते हैं। कुछ लोग आपको उस डोम का स्केच बना कर देने को उत्सुक रहते हैं। लेकिन इन सब में कोई आपको कुछ भी बेचता या किसी भी प्रकार का आर्थिक लेनदेन करता दिखाई नहीं देता। सबके चेहरे पर संजीदगी तो होती है लेकिन दीनता दिखाई नहीं देती।
मुझे एक सज्जन मिले जो एक प्रपत्र लेकर आण्विक हथियारों के विरोध में हस्ताक्षर करवा रहे थे। मुझे देख कर बोले ” इंडियन” मैने कहा ” यस” तो गर्म जोशी से गले मिल कर बोले ” आय लव इंडिया” । इससे पहले कि मैं उनका यह वाक्य सुनकर खुश हो पाता उन्होंने कहा ” इंडिया इज़ पीस लविंग कंट्री। देन व्हाई दे कीप न्यूक्लियर वेपन।” बात उन्होंने हंसते हंसते कही लेकिन बात गहरी थी। मेरे पास इसका कोई उत्तर नहीं था।
इसी मेमोरियल से कुछ दूरी पर होलोकास्ट म्यूजियम है। जीवन में काफी म्यूजियम देखने का अवसर आया। आम तौर म्यूजियम में जाने वाले लोगों में बहुत थोड़े होते हैं जो पूरी शिद्दत से म्यूजियम देखते हैं। अधिकांश जल्दबाजी में औपचारिकता निभाते हैं। यह पहला ऐसा म्यूजियम देखा जो स्वतः ही आगंतुक को सारी चीजें देखने को बाध्य करता है। पहली दो गैलरी तक तो बात चीत की आवाज सुनाई देती है लेकिन धीरे धीरे लोग स्वतः ही शांत होते चले जाते हैं और त्रासदी का एक एक अंश उनके अंदर समाता चला जाता है। किसी बच्चे का स्कूल यूनिफॉर्म का फटा शर्ट या उसके पिता का एक क्षतविक्षत जूता देख कर आपके रोंगटे खड़े हो जाते हैं । किसी मां का आधबुना स्वेटर और टेढ़ी हो गई सलाइयों को देख कर बरबस आपकी आँखे नम हो जाती हैं। जब आप इस म्यूजियम की दीर्घाओं को पार कर बाहर निकल रहे होते हैं तो आप अपने आप में ही इतने खो जाते हैं कि आपको अपने संगी साथियों का तक भान नहीं रहता । आप इस म्यूजियम में घुसते तो है 2026 में लेकिन बाहर निकलते हैं 6 अगस्त 1945 को। बिना किसी अतिरिक्त तकनीक का प्रयोग किए यह म्यूजियम सिर्फ अपनी कहानी के प्रस्तुतीकरण से ही आपको उस त्रासदी का एक हिस्सा बना देता है।
अगर आप उस बेहद संजीदा वातावरण से उबर जाएं तो आप हिरोशिमा कैसल जैसे कुछ और स्थान घूम सकते हैं। हम भाग्यशाली थे कि हमें एक विवाह समारोह की कुछ झलकियां भी देखने को मिली और कुछ बेहद रोचक लोगों से मुलाकात भी हुई।
हिरोशिमा शहर देखकर अहसास हो गया कि अगर मन में ठान लें तो बंजर को भी स्वर्ग बनाया जा सकता है। साथ में ये भी एक बार फिर सिद्ध हो गया कि बिगाड़ने वाले से बनाने वाला ज्यादा बड़ा होता है। हिरोशिमा हमें इस बात का भी सबक देता दिखाई देता है कि त्रासदी से सबक अवश्य लें लेकिन उससे उबर कर नवनिर्माण में भी जुटें।
अटल जी की एक कविता बचपन में काव्य गान प्रतियोगिता में सुनाते थे उसकी कुछ पंक्तियां बरबस ही याद आ गई हिरोशिमा को देखकर
” धू धू धधक धधक कर धधकी
क्रुद्ध चिताएं बल खाती थीं
धधक रहा सारा यौवन था
धधक रही मेरी छाती थी
मुट्ठी भर अवशिष्ट भस्म पर
आजीवन अभिमान किया है
किया नहीं विध्वंस विश्व का
जीवन भर निर्माण किया है
जीवन भर निर्माण किया है। ”
प्रणाम है उन बेकसूरों को जिन्होंने इस त्रासदी में अपनी जान गंवाई और प्रणाम है उन्हें जिन्होंने ने हिरोशिमा के नवनिर्माण में अपनी भूमिका निभाई।