मन की किताब में
सुरक्षित रहे पल…..!!
परम आदरणीय स्नेही कैलाश चंद्र जी पंत दादा को याद करते हुए नमन
आज अचानक भोपाल से श्री नरेंद्र दीपक जी का फोन आया और ज्ञात हुआ कि आदरणीय दादा पंत जी अब हमारे बीच में नहीं रहे ….!! सुनकर अतीत की मजबूत दीवार जिस पर कई घटनाएं अंकित थी भरभरा कर गिर गई ओह …….
यद्यपि यह अकाट्य सत्य है मृत्यु जीवन का दूसरा पहलू है, फिर भी उन यादों का क्या करें जो बहुत गहराई से अंकित हो जाती है।
जब भी समय के पृष्ठ पलटोगे, गहरी लिखावट में लिखी पंक्तियां आंखों के सामने स्वयं को दोहरा देती है ।पंक्तियां क्या,अनुभव की ताजी लहरें….!!
पंत जी से परिचय और भोपाल….
बात उन दिनों की है जब भोपाल के भूगोल में उतरने का पहली बार काम पड़ा था। यूं तो उज्जैन से छत्तीसगढ़ आने में हर बार भोपाल रेलवे स्टेशन आता ही था मगर भोपाल से बस इतनी ही मुलाकात थी। अपरिचित आंखों से भोपाल को देखते हुए पार हो जाती थी।
पहली बार भोपाल….!!
हुआ यूं कि, हैदराबाद के एक बड़े कवि(नाम भूल रही हूं) जो अक्सर मेरी रचनाओं को पढ़ते थे। उन्होंने मुझे भोपाल में कैलाश चंद जी पंत से मिलने को कहा सुयोग बना, तब भैया पटवा सरकार में संसदीय सचिव थे। किसी काम से उन्हीं के यहां जाना पड़ा। तब मैं पंत जी से मिलने पहुंची । मैं निर्मल जी (हैदराबाद)का जिक्र करते हुए उनसे मिली।
बहुत ही तवज्जो से मिले पंत जी समझदार और गहरा व्यक्तित्व । उन्होंने मुझसे मेरे लेखन के बार में चर्चा की… फिर कहा शाम को रविंद्र भवन में एक बड़ा आयोजन है आप उसमें आ सकती है तो जरूर आईए।
मैं अपनी सहेली निरुपमा चंद्राकर के साथ शाम को जब पहुंची पंत जी का प्रभाव देखकर आश्चर्य चकित रह गई। उन्होंने भोपाल के बड़े नामी साहित्यकारों से परिचय करवाया। मुझे उनके व्यक्तित्व जो “दादा” संबोधन से सुसज्जित था बहुत अच्छा लगा। दादा यानी दादा भाई सा।
मैं जो सुबह तक भोपाल में अजनबी थी, ऐसा लगा शाम तक सारे भोपाल से परिचित हो गई हूं।
इसके बाद पंत जी के स्नेहपूर्ण सानिध्य ने हमेशा ही मेरा साहित्यिक मार्गदर्शन किया। उस समय अक्षरा पत्रिका में संपादक “प्रभाकर जी श्रोत्रिय” थे। उनसे मिलकर भी बहुत अच्छा लगा, बहुत ही सुलझा हुआ दिव्य व्यक्तित्व।
अक्षरा पत्रिका में मेरी रचनाओं को जगह मिली और स्थाई हो गई। कभी अक्षरा से कोई रचना लौट कर नहीं आई। उसके पश्चात साक्षात्कार, वागर्थ और समकालीन भारतीय साहित्य जैसी स्थापित पत्रिकाओं में मेरी रचनाएं निरापद प्रकाशित होती रही।
दादा के स्नेह के कारण ही, मेरी प्रथम कृति काव्य संग्रह”और कितनी दूर ” का विमोचन हिंदी भवन के नवनिर्मित हाल में, ” श्री विद्या निवास जी मिश्र” के हाथों संपन्न हुआ। नगर की सभी विभूतियां उस कार्यक्रम में उपस्थित हुई थी। संग्रह पर बहुत सशक्त चर्चा हुई। मंच पर विद्यमान श्री विद्यानिवास जी मिश्र, श्री विनय मोहन जी, लक्ष्मी नारायण जी शर्मा, आदरणीय दादा जैसी हस्तियों के साथ मुझे मंच पर बैठने का अवसर मिला, जिसका श्रेय मैं दादा के स्नेह को ही दूंगी। पुस्तक विमोचन के बाद ही मुझे आकाशवाणी भोपाल एवं दूरदर्शन भोपाल में भी प्रतिभागी होने का अवसर मिला।
“पावस व्याख्यान माला”, जो श्री कैलाश चंद्र जी पंत जी की उपस्थिति का पर्याय था ।और हिंदी भवन को एक पहचान बनाता हुआ कार्यक्रम था पावस व्याख्यान माला.। कई बार मुझे कार्यक्रम में प्रतिभागी होने का अवसर मिला।
दादा की सोच, सहयोग, वैचारिक दृष्टि, और दूरदर्शिता उनके व्यक्तित्व का बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा था। कुछ सिद्धांत भी उन्होंने बहुत मजबूती से स्वयं से जोड़ रखे थे । जैसे समय की पाबंदी की प्रतिबद्धता,(जो मेरे लिए एक नसीहत के रूप में समय पर पाबंद रहने की सीख बन गई)
हिंदी नागरी लिपि के व्यावहारिक रूप के प्रति बहुत कटिबंध थे। मैंने देखा अंग्रेजी में आए हुए निमंत्रण पत्र पर वह कभी नहीं गए ।
हमेशा कार्यशील रहो आगे बढ़ो…. उनसे जब भी मिली, मैंने यही पाया
मेरे द्वारा संपादित पत्रिका “अंत्योदय” के प्रकाशन में भी उन्होंने मुझे बहुत मनोयोग से साथ दिया था ।
कितनी कितनी यादें ,….!! कितने अवसर और उनका सहयोग…!! कितना याद करूं और दोहराऊं….!!
मिलनसार किंतु गंभीर और दूरदर्शी स्वभाव के कारण समूचा भोपाल दादा से एक परिवार की तरह जुड़ा था। बड़ी से बड़ी हस्ती आपको दादा के कार्यालय में मिल सकती थी।
मेरी तरह सैकड़ो ऐसे कलम व कला से जुड़े व्यक्ति, आज भी उनके स्नेह और सहयोग के आभार से जुड़े, उनकी यादों को अपने जीवन में संजोए मिलेंगे ।
“राष्ट्रभाषा प्रचार कार्यक्रम ” एक मिशन की तरह उनके जीवन का महत्वपूर्ण उद्देश्य और कार्य था। हिंदी भवन और मंत्री संचालक पद उन्हें सदियों याद रखेंगे ।
उन्हें मिली हुई पद्मश्री की उपाधि सचमुच सम्मानित हुई।
आदरणीय कैलाशचद्र जी पंत दादा भाई को स्नेह स्मरण सहित नमन….
विनम्र श्रद्धांजलि
विद्या गुप्ता दुर्ग