August 9, 2026

श्रीनिवास विनायक कुलकर्णी (‘श्रीवि’) : मराठी के अत्यंत संवेदनशील ललित लेखक, कवि, कथाकार तथा संपादक के रूप में प्रतिष्ठित रहे

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श्रीनिवास विनायक कुलकर्णी (‘श्रीवि’) के निधन की खबर 6 अगस्त 2026 को सामने आई। वे 92 वर्ष के थे और मराठी के अत्यंत संवेदनशील ललित लेखक, कवि, कथाकार तथा संपादक के रूप में प्रतिष्ठित रहे।
श्रीनिवास कुलकर्णी का जन्म सांगली जिले के औदुंबर में हुआ था। प्राथमिक शिक्षा औदुंबर में और आगे की शिक्षा अंकलखोप तथा सांगली के ‘अनाथ विद्यार्थी आश्रम’ में हुई। उनके दादा और पिता दोनों चित्रकार थे। चित्रकला के इसी पारिवारिक संस्कार और औदुंबर के प्राकृतिक परिवेश ने उनके भीतर दृश्यात्मकता, प्रकृति-संवेदना और सूक्ष्म निरीक्षण की गहरी दृष्टि विकसित की।
शिक्षा के बाद उन्होंने कुछ समय साइनबोर्ड पेंटिंग का काम किया और ओगलेवाड़ी के काँच कारखाने में लेखा-विभाग में नौकरी की। बाद में वे प्रसिद्ध मराठी प्रकाशन-संस्था/नियतकालिक ‘मौज’ के संपादन विभाग से जुड़े। साहित्य-सृजन के साथ संपादन का यह अनुभव उनकी भाषा और अभिव्यक्ति को और अधिक निखारता गया।
उनकी साहित्यिक यात्रा बहुत कम उम्र में शुरू हो गई थी। चौथी कक्षा में उनकी पहली कविता प्रकाशित हुई और बाद में उनकी पहली कहानी भी बाल-साहित्यिक पत्रिका में छपी। 1960 में ‘मनातल्या उन्हात’ नामक ललित लेख ‘सत्यकथा’ में प्रकाशित हुआ। आगे चलकर ‘सत्यकथा’ और ‘मौज’ उनके अनेक महत्वपूर्ण लेखों के प्रमुख प्रकाशन मंच बने।
उनकी प्रमुख साहित्यिक कृतियों में—‘डोह’ — उनका अत्यंत चर्चित पहला ललित लेख-संग्रह और उनकी पहचान का प्रमुख आधार रहा।अन्य कृतियों में ‘सोन्याचा पिंपळ’,‘पाण्याचे पंख’,‘कोरडी भिक्षा’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
‘पाण्याचे पंख’ में उन्होंने घर-परिवार और आसपास की दुनिया में रहने वाले छोटे बच्चों के भावविश्व को अत्यंत आत्मीयता से उकेरा। उनके लेखन में प्रकृति, बालमन, ग्रामीण परिवेश, स्मृतियाँ, सामान्य मनुष्य और जीवन के छोटे-छोटे अनुभव असाधारण संवेदनात्मक गहराई प्राप्त करते हैं।
श्रीनिवास कुलकर्णी को केवल ‘ललित लेखक’ कहना उनके साहित्य की व्यापकता को थोड़ा सीमित करना होगा। उनकी भाषा में चित्रकार की आँख और कवि का हृदय था।उनके लेखन की प्रमुख विशेषताएँ थीं—चित्रमयता + प्रकृति-संवेदना + सूक्ष्म निरीक्षण + आत्मीयता + काव्यात्मक गद्य।चित्रकला के संस्कारों के कारण वे किसी दृश्य को केवल बताते नहीं थे, बल्कि शब्दों से उसका चित्र उपस्थित कर देते थे। प्रकृति के अत्यंत छोटे-छोटे संकेतों कोपकड़ना और उनसे मानवीय भावनाओं का संबंध जोड़ना उनके गद्य की खास पहचान थी।
प्रसिद्ध कवि मंगेश पाडगांवकर ने उनके लेखन को लगभग इस अर्थ में सराहा था कि यदि बालकवि ने कविता के बजाय गद्य लिखा होता, तो वह गद्य श्रीनिवास कुलकर्णी जैसा होता। यह टिप्पणी उनके गद्य की काव्यात्मकता को समझने की एक सुंदर कुंजी है।
कुलकर्णी का लेखन महाराष्ट्र तक सीमित नहीं रहा; उनकी रचनाओं की पहुँच धारवाड़ और कोलकाता जैसे साहित्यिक केंद्रों तक भी रही और उनके साहित्य का अंग्रेज़ी में अनुवाद भी हुआ।
वे कराड में आयोजित 76वें अखिल भारतीय मराठी साहित्यसम्मेलन के स्वागताध्यक्ष भी रहे। जीवन के अंतिम वर्षों में भी साहित्य-जगत में उनका सम्मान बना रहा।
श्रीनिवास कुलकर्णी का महत्त्व इस बात में है कि उन्होंने बड़े जीवन-दर्शन को छोटे अनुभवों में खोजा। उनके यहाँ प्रकृति केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि जीवन और मनुष्य को समझने का माध्यम है। उनका ललित गद्य मराठी साहित्य में उस परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें शब्द सूचना नहीं देते—वे दृश्य, गंध, स्मृति और संवेदना बन जाते हैं।उनका निधन मराठी के ‘तरल, चित्रमय और काव्यात्मक ललित गद्य’ की एक विशिष्ट आवाज़ का अवसान है। #विनम्र श्रद्धांजलि
किशोर दिवसे

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