ग़ज़ल: दस्तूर-ए-वफ़ा
आपके ख़त को हम ख़बर बताए बैठे हैं,
आपके साये को भी हम घर बताए बैठे हैं।
कब मिले थे पिछली बार कुछ याद नहीं,
हम कब से दर-बदर को दर बताए बैठे हैं।
वो मिलना कोई मिलना था भला सोचिए,
कि मिलके भी हमें बेख़बर बताए बैठे हैं।
आपके नाम की ख़ुशबू जो है हवाओं में,
उसे ही इत्र-ए-शब-ओ-सहर बताए बैठे हैं।
कोई तो उम्मीद राह तकती है अब तक,
कि आप ही को हम मुक़द्दर बताए बैठे हैं।
वक़्त गुज़रा तो रौशनदान बदलते गए,
पर हम आप ही को मिहवर बताए बैठे हैं।
दिल ने छोड़ा न दस्तूर-ए-वफ़ा अब तक,
और हम आप ही को यावर बताए बैठे हैं।
कह देते मुलाक़ातें मयस्सर नहीं ‘निवी’,
क्यों हम आप ही को रहबर बताए बैठे हैं।
डॉ निवेदिता बाँदिल
07/08/2026
(सर्वाधिकार सुरक्षित)