“मामा, उसकी तो फट गई।”
नमस्कार। मैं संजय सिन्हा। ssfbNews में आज आपसे एक सवाल-
बहुत पहले की बात है। मेरी भांजी तब स्कूल में पढ़ती थी। किसी बात पर उसने मुझसे कहा, “मामा, उसकी तो फट गई।”
मैं हैरान रह गया। सोचा, यह क्या बोल रही है? इसे इस शब्द का अर्थ भी पता है या बस कहीं सुना और इस्तेमाल कर दिया?
बाद में पता चला, अर्थ नहीं पता था। उसने कहीं सुना था। उसे लगा होगा कि कुछ नया सीखा है। कुछ ऐसा बोल दिया जाए कि सामने वाला समझे कि बच्ची बड़ी स्मार्ट हो गई है।
खैर, आज कहानी भांजी की नहीं है।
कहानी उन लोगों की है जो मेरी कहानियां पढ़कर ठीक इसी तरह शब्द उछालते हैं। बिना समझे। बिना उसका अर्थ जाने।
मैं किसी कहानी में सरकार से सवाल पूछ दूं तो तुरंत कमेंट आता है, “संजय सिन्हा वामी हो गए।”
मैं बेरोजगारी पर सवाल कर दूं तो वामी। महंगाई पर सवाल कर दूं तो वामी। मीडिया पर सवाल कर दूं तो लिब्रांडू। न्यायपालिका पर सवाल कर दूं तो अर्बन नक्सल।
किसी उद्योगपति की बढ़ती संपत्ति पर सवाल कर दूं तो खांग्रेसी।
और अगर सरकार से पूछ दूं कि भाई साहब, यह कैसे हुआ, तो देशद्रोही बनने में भी देर नहीं लगती।
आज मैं आपसे एक बहुत छोटा सा सवाल पूछना चाहता हूं।
क्या आपको वामपंथ का अर्थ भी पता है?
या फिर यह भी उसी तरह का शब्द है जिसे आपने कहीं सुना, अच्छा लगा और जहां तर्क खत्म हुआ वहां चिपका दिया?
बहस में सामने वाले के सवाल का जवाब देना मुश्किल हो तो एक लेबल लगा दीजिए।
वामी। लिब्रांडू। अर्बन नक्सल। खांग्रेसी।
बस। बहस खत्म।
आपको उत्तर देने की जरूरत नहीं। आपको अपने तर्क खोजने की जरूरत नहीं। आपको इतिहास पढ़ने की जरूरत नहीं।
एक शब्द बोलिए और अपने मन में समझ लीजिए कि आपने सामने वाले को हरा दिया।
लेकिन असली समस्या यह है कि आपने किसी को हराया नहीं है। आपने सिर्फ अपनी अज्ञानता का प्रदर्शन किया है।
इसलिए आज सोचा कि आपका एक वहम दूर कर ही दूं।
संजय सिन्हा वामपंथी नहीं हैं। दक्षिणपंथी भी नहीं हैं। खांग्रेसी होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। और हां, मैं किसी नेता का भक्त भी नहीं हूं।
मेरे लिए विचारधारा से पहले इंसान है। सत्ता से पहले समाज है। और किसी पार्टी से पहले देश है।
अब जरा वामपंथ को समझिए।
आप रोज सुबह उठते हैं। दफ्तर जाते हैं। आठ या नौ घंटे काम करते हैं। महीने की तय तारीख पर वेतन पाते हैं। सप्ताह में छुट्टी मिलती है। ओवरटाइम करते हैं तो उसके लिए अलग भुगतान का अधिकार है।
आपने कभी सोचा है कि ये सब व्यवस्था अपने आप आसमान से टपकी थी?
आपका दस साल का बच्चा आज किसी कारखाने में बारह या चौदह घंटे मशीन के सामने खड़ा नहीं है। वह स्कूल जाता है। किताब पढ़ता है। खेलता है। भविष्य का सपना देखता है।
आपने कभी पूछा कि ऐसा कब से होने लगा?
इतिहास पढ़िए।
एक समय यूरोप के कारखानों में बच्चे तक मजदूरी करते थे। लंबे समय तक काम करते थे। सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं थी। छुट्टी का अधिकार नहीं था। काम के घंटे की सीमा नहीं थी। मजदूर के पास मालिक के सामने अपनी शर्त रखने की ताकत नहीं थी।
फिर सवाल उठे। श्रमिक आंदोलन हुए। ट्रेड यूनियन बनीं। समाज सुधारकों ने आवाज उठाई। समाजवादियों ने सवाल किए। वामपंथी आंदोलनों ने पूंजी और श्रम के रिश्ते पर बहस खड़ी की।
कार्ल मार्क्स भी इसी इतिहास का एक बड़ा नाम हैं। आप मार्क्स से असहमत हो सकते हैं। मैं भी उनकी हर बात से सहमत नहीं हूं। और इतिहास को ईमानदारी से पढ़ेंगे तो यह भी देखना होगा कि मार्क्स के नाम पर बनी कई व्यवस्थाएं आगे चलकर दमन और तानाशाही में बदल गईं। सोवियत संघ में दमन हुआ। माओ के चीन में भयावह त्रासदियां हुईं। कंबोडिया में नरसंहार हुआ।
यह सब भी इतिहास है। लेकिन इतिहास का दूसरा हिस्सा भी इतिहास ही है।
श्रमिक अधिकारों की लड़ाई हुई। आठ घंटे के कार्यदिवस की मांग उठी। बाल श्रम के खिलाफ कानून बने। न्यूनतम मजदूरी की अवधारणा मजबूत हुई। सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था बनी। काम की जगह पर सुरक्षा और सम्मान की बात हुई।
इन संघर्षों में ट्रेड यूनियनों, समाजवादी आंदोलनों और अनेक वामपंथी संगठनों की भूमिका रही। इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया में जो कुछ अच्छा हुआ वह वामपंथ की वजह से हुआ। और इसका मतलब यह भी नहीं कि वामपंथ ने जो किया सब अच्छा था।
इतिहास इतना मूर्ख नहीं होता कि उसे एक रंग में रंग दिया जाए। इतिहास में उजाला भी होता है और अंधेरा भी।
समझदार आदमी दोनों देखता है। मूर्ख आदमी सिर्फ वही देखता है जो उसकी विचारधारा को अच्छा लगे।
और उससे भी आगे की अवस्था है। इतिहास पढ़े बिना इतिहास पर फैसला सुनाना।
अब आइए वापस संजय सिन्हा पर। मुझे शिकायत वामपंथ से नहीं है। मुझे शिकायत उस मानसिकता से है जो हर सवाल का जवाब लेबल से देती है।
मैं बेरोजगारी पर लिखता हूं। युवा नौकरी क्यों नहीं पा रहे, इस पर लिखता हूं। महंगाई पर लिखता हूं।
मीडिया पर लिखता हूं। न्यायपालिका पर लिखता हूं। भ्रष्टाचार पर लिखता हूं। शिक्षा पर लिखता हूं। स्वास्थ्य व्यवस्था पर लिखता हूं, तो कुछ लोगों को अचानक मिर्ची लग जाती है?
“बाप रे बाप, संजय सिन्हा तो सरकार से सवाल पूछ रहे हैं।”
“ये तो बड़ा वामी है।”
अरे भाई! सवाल पूछना कब से वामपंथ हो गया?
क्या सरकार से सवाल पूछने के लिए किसी पार्टी की सदस्यता लेनी पड़ती है? क्या महंगाई पर सवाल करने से पहले लाल झंडा लेकर फोटो खिंचवानी पड़ेगी? क्या बेरोजगारी पर सवाल पूछने से पहले मार्क्स की किताब दिखानी पड़ेगी?
क्या पत्रकार अगर सत्ता से सवाल पूछे तो वह विपक्ष का आदमी हो गया?
फिर तो लोकतंत्र का मतलब ही बदल गया।
मैंने सत्ता से सवाल 2014 के पहले भी पूछे हैं। तब भी पूछता था। उससे पहले भी पूछता था। तब सवाल पूछना पत्रकारिता, अब वही सवाल पूछना वामपंथ?
अगर मैं पूछूं कि देश में छोटे दुकानदार और छोटे कारोबारी किन मुश्किलों से गुजर रहे हैं, तो क्या मैं वामी हो गया?
अगर मैं पूछूं कि बड़े कॉरपोरेट समूह लगातार और बड़े क्यों होते जा रहे हैं और दूसरी तरफ करोड़ों लोग आर्थिक असुरक्षा की शिकायत क्यों कर रहे हैं, तो क्या यह सवाल पूछना अपराध हो गया?
मैं फैसला नहीं सुना रहा। मैं किसी को दोषी नहीं ठहरा रहा। मैं सिर्फ सवाल पूछ रहा हूं।
और शायद यही बात आप में से कुछ लोगों को सबसे ज्यादा परेशान करती है। क्योंकि सवाल का जवाब देना पड़ता है।
लेबल लगाने में जवाब नहीं देना पड़ता।
यही फर्क है तर्क और नारे में।
मैंने बत्तीस साल पत्रकारिता में यही सीखा है।
जब इंडियन एक्सप्रेस और जनसत्ता में काम करते हुए हम सत्ता से सवाल पूछते थे, तब पत्रकारिता का मतलब यही था।
सत्ता किसी की भी हो, पत्रकार का धर्म नहीं बदलता। पत्रकार सत्ता का प्रवक्ता नहीं है। पत्रकार विपक्ष का प्रवक्ता भी नहीं है।
पत्रकार जनता का प्रतिनिधि है। उसका काम ताली बजाना नहीं है। उसका काम सवाल पूछना है। सरकार अच्छी हो तो भी सवाल। सरकार खराब हो तो भी सवाल। सत्ता आपकी पसंद की हो तो भी सवाल। सत्ता आपकी नापसंद की हो तो भी सवाल।
लोकतंत्र में सरकार भगवान नहीं होती। सरकार जनता की बनाई हुई व्यवस्था है। और पत्रकार उसका दरबारी नहीं होता।
अब अगली बार मेरी कोई कहानी पढ़कर आपका मन करे कि कमेंट में लिखें, संजय सिन्हा वामी हो गए, तो लिखने से पहले सिर्फ एक काम कर लीजिएगा। पहले यह पता कर लीजिए कि वामपंथ होता क्या है?
और अगर किसी सवाल का जवाब आपके पास नहीं है तो कोई बात नहीं।
चुप रहना भी कभी-कभी बुद्धिमानी होती है।
लेकिन , सवाल के जवाब में किसी को वामी, लिब्रांडू, अर्बन नक्सल या खांग्रेसी बना देना बुद्धिमानी नहीं है।
वह ठीक वैसा ही है जैसे मेरी स्कूल में पढ़ने वाली भांजी ने कभी एक शब्द सुना था और बिना अर्थ जाने इस्तेमाल कर लिया था।
फर्क सिर्फ इतना है कि वह बच्ची थी। आप बड़े हैं। इसलिए आपसे उम्मीद थोड़ी ज्यादा है।
सवाल से डरिए मत। सवाल का जवाब दीजिए। क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछने वाला दुश्मन नहीं होता।
कभी-कभी वह आपका सबसे जरूरी दोस्त होता है।
#SanjaySinha