समकालीनभाषा के लोकतंत्र में विराम चिह्नों की तलाश / त्रिभुवन
भाषा के लोकतंत्र में विराम चिह्नों की तलाश / त्रिभुवन
ज्ञानेंद्रपति की कविता ‘मूर्धन्य ष’ की संवेदना से शुरू होकर त्रिभुवन का यह व्यंग्यात्मक लेख “विराम गणराज्य” की एक ऐसी कथा रचता है, जिसमें अख़बार से प्रश्नवाचक चिह्न चोरी हो जाता है और अल्पविराम, कोलन, एम डैश, उद्धरण-चिह्न, अयोगवाह और उर्दू-फ़ारसी निशानों की संसद बैठ जाती है। इस कथा के ज़रिए लेख दिखाता है कि प्रश्न, संदेह, उद्धरण और ठहराव जैसे छोटे चिह्न भाषा की साँस ही नहीं, लोकतंत्र की स्वतंत्रता की सूक्ष्म देह भी हैं, और जिस सत्ता को हर वाक्य के अंत में केवल पूर्णविराम चाहिए, वह नागरिकों से उनका प्रश्नवाचक चिह्न छीनने लगती है। सम्मुख की नई प्रस्तुति:
विराम-चिह्नों, संस्कृत के अयोगवाहों और उर्दू-फ़ारसी निशानों की एक लोकतांत्रिक कथा
संवेदनात्मक सृजनशीलता और ज्ञानात्मक संसार में बिखरी संवेदनाओं के अन्वेषणशील कवि ज्ञानेंद्रपति की कविता ‘मूर्धन्य ष’ भाषा में बचे हुए उस अकेले अक्षर की करुण कथा है, जो बोलचाल से निर्वासित हो चुका है, पर लिपि में अब भी “तपस्वी आकृति” की तरह टिमटिमाता है। उसी संवेदना को थोड़ा आगे बढ़ाएँ तो भाषा का संसार केवल अक्षरों का नहीं, उन छोटे-छोटे चिह्नों का भी है, जिन्हें हम अक्सर लिखते हुए अनदेखा कर देते हैं। अल्पविराम साँस है, प्रश्नवाचक संशय है, विस्मयादिबोधक आवेग है, उद्धरण स्मृति है और पूर्णविराम अस्थायी समाप्ति।
सत्ता और लोकतंत्र की भाषा में इनका अर्थ और भी राजनीतिक हो जाता है। किसी समाज से प्रश्नवाचक हटाइए तो सवाल कम होने लगते हैं; उद्धरण हटाइए तो यह पहचानना कठिन हो जाता है कि कथन किसका है; फुटनोट मिटाइए तो इतिहास के असुविधाजनक तथ्य गायब होने लगते हैं। अब कुछ चिह्न ऐसे हैं, आपके सजग होने के बावजूद जिनकी उपस्थिति आपकी मौलिकता पर प्रश्न चिह्न खड़े करने लगती है और आपके हिस्से कुछ न किए गए अपराधों के प्रमाण की तरह वाचाल मान लिए जाते हैं।
इसीलिए यह कथा उन्हीं उपेक्षित चिह्नों की संसद है, जहाँ भाषा स्वयं अपने लोकतंत्र की रक्षा करने बैठी है। सत्ता पूर्णविराम पसंद करती है, नागरिकता प्रश्नवाचक; लोकतंत्र इन दोनों के बीच लिखा जाने वाला सबसे कठिन वाक्य है।”
तो प्रस्तुत है विराम गणराज्य में विराम चिह्नों की अविराम कथा।
विराम गणराज्य में उस सुबह अख़बार असाधारण रूप से साफ़ छपा था। इतना साफ़ कि उसमें कहीं कोई सवाल नहीं था। मुख्य शीर्षक था देश में सब अच्छा है! उसके नीचे लिखा था: सरकार ने कहा है, अतः यह सत्य है। इसी बीच एक बहुत पुराने अख़बार में जीवाश्म की तरह बचे बूढ़े प्रूफ़रीडर ने चश्मा उतारा। फिर लगाया। फिर उतारा और बोला, “कुछ चोरी हुआ है।”
संपादक घबराया, “क्या?”
“?”
“क्या मतलब?”
“पूरे अख़बार में एक भी प्रश्नवाचक चिह्न नहीं है।”
संपादक हँसा, “यह भी कोई चोरी हुई?”
प्रूफ़रीडर ने धीरे से कहा, “लोकतंत्र में सबसे ख़तरनाक चोरी वही होती है, जिसका वज़न नगण्य हो।”
विराम चिह्न जिनका पहले ही किसी को ख़याल नहीं रहता था भाषा में, अब और भी विलुप्त होते जा रहे हैं। भाषा कोई भी हो; लेकिन विराम चिह्न ही होते हैं, जो हर लिखित भाषा के संगीत में आलाप के भीतर मींड, खटका, मुर्की, गमक आदि की तरह अपनी भूमिका निभाते हैं।
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प्रश्नवाचक की चोरी किसी को चोरी लगती ही नहीं। किसी को लगता है, ठीक ही हुआ। यह भी कोई चोरी है। इस चोरी से भाषा में भले संगीन से संगीनतर हालात पैदा हो जाएं, कुछ लोगों को लगता है कि भाषा सही रूप में तो अब ही आई थी। वे भाषा के भीतर का पूरा संगीत शास्त्र लिपि और जिह्वा से छीनकर उसे एक आदिम युग की ओर से लिए जाने को उद्यत रहते हैं, जिसमें आरोह अवरोह और अवरोह आरोह होता जाता है और अंतत: पूरी भाषा में ही हर दो शब्दों के बीच का विराम समाप्त होता जाता है। भाषा के दम घुटने को वे प्राणायाम की संज्ञा देते हैं। भाषा मरने की प्रक्रिया में आख़िरी सांस लेती है तो वे उसे कुंभक और रेचक बताकर आह्लादित होते हैं।
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प्रश्नवाचक की चोरी पर उसी रात विराम-संसद की आपात् बैठक बुलाई गई। सबसे पहले विस्मयादिबोधक! आया। दरवाज़े में प्रविष्ट होते ही चिल्लाया : “भयंकर! अभूतपूर्व! ऐतिहासिक! लोकतंत्र ख़तरे में!”
पीछे से अल्पविराम , आया। बोला, “इतना मत चिल्लाओ, थोड़ा रुको, साँस लो, तथ्य आने दो।”
विस्मयबोधक! भड़क गया : “तुम्हारी समस्या यही है! हर संकट में कहते रहते हो, थोड़ा रुकिए।”
अल्पविराम मुस्कुराया, “और तुम्हारी समस्या यह है कि हर बारिश को प्रलय घोषित कर देते हो, जबकि भाषा में जीवनमूल्यों का सा प्रलय आया रहता है।”
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अल्पविराम ने अपनी छोटी-सी देह को तनिक तिरछा किया, जैसे कोई प्रफुल्ल युवती चेहरे पर आई लट को झटकाती है। अल्पविराम गर्व से बोला, “मेरे आकार पर मत जाना। साहित्य में मैंने ऐसे-ऐसे दरवाज़े खोले हैं, जिन्हें पूर्णविराम की सारी गंभीरता और किसी सम्मोहक प्रारंभिक शब्दशक्ति भी नहीं खोल सकी।”
फिर उसने क्लैरिस लिस्पेक्टर का नाम लिया।
“उस विलक्षण ब्राज़ीली स्त्री ने अपने उपन्यास ‘एन अप्रेन्टिसशिप ऑर द बुक ऑफ़ प्लेज़र्स’ की शुरुआत मुझसे की थी। मुझसे। मुझ एक अल्पविराम से! पाठक ने पहला पन्ना खोला और क्षण-भर को लगा कि शायद किताब के पहले कुछ पन्ने कहीं प्रेम में पड़कर रास्ते में ही छूट गए हैं। क्योंकि मेरे आगे आने का अर्थ ही है कि मुझसे पहले कुछ था। कोई वाक्य, कोई साँस, कोई स्पर्श, कोई अधूरी स्मृति। लेकिन क्लैरिस ने उस ‘पहले’ को अनुपस्थित रखा। उसने पाठक को सीधे उस साँस के बीचोबीच उतार दिया, जो उसके आने से पहले ही चल रही थी।”
वह कुछ और इतराता, उससे पहले कोलन : ने अपनी दोनों काली आँखें चमकाईं और ठटाकर हँस पड़ा।
“इतना मत इतराओ, प्रिय! तुमने उसे भीतर प्रवेश कराया था, लेकिन बाहर निकलने नहीं दिया। उपन्यास का अंतिम द्वार मेरे पास है। वह पुस्तक मुझ पर समाप्त होती है। मुझ कोलन पर।”
और यह सचमुच विलक्षण है। अल्पविराम कहता है, इसके पहले भी जीवन था; कोलन बोला, इसके बाद भी कुछ आने वाला है। बीच में पूरा उपन्यास केवल दो विराम-चिह्नों के बीच रखी हुई देह है। एक ओर अधूरी साँस, दूसरी ओर अगले साँस की प्रतीक्षा। क्लैरिस के यहाँ प्रेम भी शायद यही है। न उसका कोई निर्दोष आरम्भ है, न सुविधाजनक समाप्ति। मनुष्य दूसरे मनुष्य में पूर्णविराम खोजता है और उसे अक्सर अल्पविराम या कोलन ही मिलता है। लोरी और उलिसीस का प्रेम भी इसी तरह कथा से अधिक एक दीर्घ सुकामना है। शरीर समाप्त हो सकता है, आकांक्षा नहीं। क्लैरिस संबंध को वहाँ छोड़ देती हैं, जहाँ साधारण लेखक पूर्णविराम रख देता।
कोलन अभी अपने दो बिंदुओं को विजयी आँखों की तरह चमका ही रहा था कि दूर से एम डैश — ने आवाज़ लगाई, “क्लैरिस को इतना आसानी से अपना मत समझ लेना। उनकी ‘द पैशन अकॉर्डिंग टु जी.एच.’ तो मेरे आलिंगन में प्रवेश करती है और मेरे ही आलिंगन से बाहर निकलती है।”
वास्तव में क्लैरिस ने उस उपन्यास के आरम्भ और अंत में डैश का प्रयोग किया। जैसे कथा के दोनों सिरों पर एक खुला घाव हो; भाषा भीतर आई भी तो किसी सुनिश्चित आरम्भ से नहीं और बाहर गई भी तो समाप्त होकर नहीं। उनकी ‘द आवर ऑफ़ द स्टार’ तो अंततः “हाँ” पर समाप्त होती है। जैसे मृत्यु के बाद भाषा ने अंतिम बार सिर हिलाकर जीवन स्वीकार किया हो।
तभी अल्पविराम के पुराने पुर्तगाली रिश्तेदार जोसे सारामागो ने मानो परदे के पीछे से खँखारकर कहा, “तुम लोग अपने-अपने चिह्नों पर बहुत मुग्ध हो। मैंने तो पूरा अनुशासन ही बिगाड़ दिया।” सारामागो के यहाँ संवाद और वर्णन एक-दूसरे के शरीर में ऐसे घुलते हैं कि उद्धरण-चिह्न प्रायः गायब हो जाते हैं; लंबे वाक्यों में अल्पविराम साँस के छोटे-छोटे जोड़ के रूप में सामने आता है और कई पृष्ठ एक ही भाषिक प्रवाह में बह सकते हैं। नोबेल पुरस्कार की आधिकारिक टिप्पणी भी उनकी शैली में विरल विराम-चिह्नों और लंबी वाक्य-संरचनाओं को विशेष रूप से रेखांकित करती है। पढ़ लीजिए नोबेल टिप्पणियां आप।
और तभी अमेरिका से कॉर्मैक मैकार्थी आ पहुँचे। उन्होंने उद्धरण-चिह्नों को निर्वासित कर दिया। सेमीकोलन से तो जैसे निजी दुश्मनी निभाई और पृष्ठ पर उतने ही चिह्न रहने दिए जितने वाक्य को जीवित रखने के लिए अनिवार्य हों। उनके यहाँ विराम-चिह्न गहने नहीं, हड्डियाँ हैं। जितनी ज़रूरी हों उतनी ही। मैकार्थी स्वयं कहते थे कि वे पृष्ठ को अनावश्यक चिह्नों से भरना नहीं चाहते।
पीछे से लॉरेंस स्टर्न का ‘ट्रिस्ट्रम शैंडी’ मुस्करा रहा था। उसने तो अठारहवीं शताब्दी में ही पृष्ठ को भाषा की आज्ञाकारिता से मुक्त कर दिया था। कहीं पूरा काला पृष्ठ, कहीं संगमरमरी पन्ना, कहीं विचित्र रेखाएँ। मानो पुस्तक ने कह दिया हो कि कभी-कभी अर्थ अक्षरों से नहीं, उस जगह से निकलता है, जहाँ अक्षर अनुपस्थित हैं।
अब पूर्णविराम बहुत देर से चुप बैठा था। उसने अंततः भारी आवाज़ में कहा, “तो क्या मेरी कोई प्रतिष्ठा नहीं?”
अल्पविराम मुस्कराया।
“प्रतिष्ठा बहुत है, मित्र। मगर प्रेम, जीवन और महान साहित्य की मुश्किल यही है कि वे तुम्हारे पास पहुँचकर भी अक्सर तुम्हें स्वीकार नहीं करते।” और कोलन ने अपनी दोनों आँखें फिर खोल दीं: जैसे कहना चाहता हो, अभी आगे भी कुछ है:
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तभी धीरे-धीरे आए अर्धविराम ; ने कहा, “तुम दोनों में थोड़ी-थोड़ी सच्चाई है; संकट है, मगर वाक्य अभी समाप्त नहीं हुआ।” अल्पविराम ने भृकुटि तानी, “देखा? ये सज्जन हमेशा मेरे और पूर्णविराम के बीच गठबंधन सरकार चलाते हैं।” अर्धविराम ; ने गरिमा से पहले अल्पविराम , की तारीफ़ की कि अल्पविराम भाषा की साँस है और असहमति राजनीति की; दोनों हटा दीजिए, वाक्य भी घुटने लगता है और समाज भी। इसके बाद उसने कहा, “मैं वहाँ आता हूँ, जहाँ दो स्वतंत्र विचार अलग भी हों; फिर भी उनका संबंध इतना गहरा हो कि पूर्णविराम उन्हें अलग न कर पाए।”
इतने में कोलन : ने मेज़ थपथपाई : “मुद्दा यह है: प्रश्नवाचक चिह्न कहाँ गया?” सब शांत हो गए। कोलन ने गर्व से कहा, “मेरे बाद हमेशा कुछ खुलता है: सूची, स्पष्टीकरण, कारण या घोषणा। कभी ग्लानि और कभी अपराध की तरह। मेरा प्रश्न है, आप ग्लानि को गर्व कहेंगे तो भाषा में रहकर क्या ही करेगा प्रश्नचिह्न।”
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दरवाज़ा धड़ाम से खुला तभी। एम डैश — भीतर घुसा। वह गरजा : “प्रश्नवाचक गायब नहीं हुआ। किया गया है।” अल्पविराम चौंका : “यह अंदेशा तो मुझे भी था; लेकिन तुम्हें कैसे पता?” “पता नहीं; लेकिन मैं इसी काम के लिए हूँ। वाक्य के बीच अचानक ऐसा मोड़ लाने के लिए, जिससे पाठक की नींद टूट जाए।” पीछे से एन डैश – बोला, “और फिर लोग मुझे तुम्हारी जगह लगा देते हैं।” अल्पविराम हँसा : “तुम्हारा काम अलग है। तुम संबंध और सीमा बताते हो, राज्य–नागरिक, दिल्ली–जयपुर, 2025–2026। नागरिक हो भी कि नहीं? कई बार वे प्रश्नचिह्न को अचानक अपनी तरह इस्तेमाल करते हैं, जहाँ कोई उसकी कल्पना भी नहीं कर सकता था।”
एन डैश बोला—“हाँ। और तुम्हारा?” “मैं वहाँ आता हूँ जहाँ लेखक कहता है—रुकिए, असली बात अभी बाकी है।” —अल्पविराम ने कहा। एक दुबला-सा हाइफ़न – पीछे से बोला—“और मैं?” दोनों ने एक साथ कहा—“तुम शब्द जोड़ो।” हाइफ़न नाराज़ हुआ और कहने लगा, “हमेशा छोटा काम मुझे ही मिलता है।” तभी धीरे-धीरे त्रिबिंदु … भीतर आया : “मुझे शक है कि प्रश्नवाचक को…”
सब उसकी तरफ़ देखने लगे।
“…शायद किसी ने…”
“किसने?”
“…मैं नाम नहीं लेना चाहता…”
! चीखा : “यह आदमी कभी वाक्य पूरा क्यों नहीं करता!”
त्रिबिंदु मुस्कराया : “क्योंकि कई बार अनकहा… कहा हुआ से अधिक ख़तरनाक होता है…”
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तभी कमरे के दोनों सिरों से “और” आए। बायाँ उद्धरण बोला, “हमने सरकारी वक्तव्य सुरक्षित कर लिया है।” दायाँ बोला, “ठीक उन्हीं शब्दों में।” दोनों ने बीच में लिखा, “हमने प्रश्नवाचक चिह्न नहीं हटाया।” एम डैश—ने कहा, “तो यह सत्य है?” उद्धरण-चिह्न बोले, “नहीं। हमारा काम किसी कथन को सच प्रमाणित करना नहीं है। हमारा काम यह बताना है कि कहा किसने।” एमडैशन—ने कहा, “उद्धरण-चिह्न हमें यह नैतिक अनुशासन सिखाते हैं कि किसने क्या कहा; राजनीति का पहला झूठ अक्सर वहीं शुरू होता है, जहाँ कथन से वक्ता का नाम मिटा दिया जाता है।”
पूरा सदन कुछ क्षण चुप रहा।
अल्पविराम ने कहा, “पत्रकारों को यह बात दीवार पर लिख लेनी चाहिए।” बहुत पीछे अदृश्य से बैठे जिह्वामूलीय अयोगवाह और उपध्मानीय ने एक साथ कटाक्ष किया : “दीवार पर लिखा हुआ सबको दिखता है, सिर्फ़ पत्रकारों को छोड़ कर!”
सब तरफ एक स्तब्धता छा गई।
पीछे से छोटे ‘ ’ आए। उन्होंने बोर्ड पर लिखा, देश में ‘लोकतंत्र’ सुरक्षित है। पूर्ण उद्धरण “ ” ने टोका, “तुमने लोकतंत्र को अपने भीतर क्यों रखा?” एकल उद्धरण मुस्कराए, “कभी-कभी लेखक किसी शब्द को सीधे नहीं अपनाता; उसे थोड़ा संदेह, थोड़ा व्यंग्य, थोड़ा दूरी-बोध देकर रखता है।” एम डैश हँसा—“दो छोटी लकीरें—और पूरी सरकार परेशान। आख़िर लोकतंत्र की पहली पहचान यह नहीं कि लोग बोल सकते हैं; यह है कि उनके वाक्यों के अंत में प्रश्नवाचक चिह्न लगाने की स्वतंत्रता बची हुई है।”
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थोड़ा सन्नाटा टूटा तो कोष्ठक ( ) धीरे से बोला, “मुझे भी कुछ कहना है।” किसी ने ध्यान नहीं दिया। उसने फिर कहा, “(असल बात अक्सर मेरे भीतर होती है।)” सब उसकी तरफ़ मुड़े। कोष्ठक बोला, “मुख्य वाक्य मंच पर भाषण देता रहता है; मैं उसके पीछे की अतिरिक्त जानकारी सँभालता हूँ।” तभी वर्ग कोष्ठक [ ] ने कहा, “और उद्धरण में स्पष्टीकरण जोड़ना हो तो मैं आता हूँ, [यहाँ लेखक का आशय स्पष्ट किया गया है]।”
पीछे से आकुंचित कोष्ठक { } बोले, “हमें तो गणित और कंप्यूटर वालों ने हथिया लिया। इसके बावजूद कि कोष्ठक में रखी हुई बात छोटी दिखाई देती है, पर मतदाता सूची में हाशिए पर रखा गया नागरिक भी वैसा ही है। मुख्य वाक्य उसे गौण मान सकता है, लेकिन लोकतंत्र नहीं।””
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अब तारक * चमकता हुआ आया : “मुझे देखकर प्रसन्न मत होइए। भाषण में मेरे पीछे अक्सर कोई शर्त छिपी होती है।” उसने सरकारी पोस्टर पढ़ा, हर नागरिक को स्वतंत्रता मिलेगी*
नीचे बहुत छोटे अक्षरों में था, * शर्तें लागू। पूरा सदन हँस पड़ा। अल्पविराम बोला, “लोकतंत्र ऊपर बड़े अक्षरों में और अधिकार नीचे छह पॉइंट में!”
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तभी डैगर † आया। उसके पीछे डबल डैगर ‡। † बोला, “जब * समाप्त हो जाए तो फुटनोट में मुझे भी बुलाते हैं।” ‡ ने कहा, “और एक फुटनोट और चाहिए तो मैं।” एम डैश— बोला, “लोकतंत्र की असली कहानी कई बार मुख्य पाठ में नहीं—† फुटनोट में होती है। फुटनोट इतिहास का भूमिगत कक्ष है; जो तथ्य मुख्य पाठ से निकाल दिए जाते हैं, वे अक्सर वहीं जीवित रहकर सत्ता की चमकदार कथा को चुनौती देते हैं।”
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अब सेक्शन § कानून की किताब लेकर उठा। “बहुत साहित्य हो गया। सवाल है—किस धारा के तहत प्रश्नवाचक हटाया गया?” अधिकारी बोला, “आदेश ऊपर से था।” § गरजा, “संविधान में ‘ऊपर’ नाम की कोई धारा नहीं होती।” तभी पैराग्राफ ¶ आया और बोला : “और कृपया सब बातें एक ही अनुच्छेद में मत लिखिए। सत्ता को लंबे, घने पैराग्राफ पसंद होते हैं; नागरिक बीच में थक जाता है और अंतिम पंक्ति में छिपी शर्त पढ़ नहीं पाता।”
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अब बुलेट • आगे आया : “मैं बात साफ़ कर देता हूँ।” उसने बोर्ड पर लिखा :
* सवाल गायब है।
* आदेश किसने दिया, पता नहीं।
* फ़ाइल उपलब्ध नहीं।
* जाँच चल रही है।
* जाँच कब पूरी होगी, पता नहीं।
त्रिबिंदु ने नीचे जोड़ दिया :
* और तब तक…
बुलेट चिल्लाया, “तुम फिर आ गए!” इतने में स्लैश / बोला, “मुझे विकल्प पसंद हैं: हाँ/नहीं, सत्ता/जनता, सत्य/दावा।” बैकस्लैश \ ने कहा, “और मुझे कंप्यूटर वालों ने दूसरी दिशा में भेज दिया।” फिर हैश # दौड़ता आया। “मैंने मामला सोशल मीडिया पर पहुँचा दिया है।” उसने लिखा, #प्रश्नवाचक_कहाँ_है
एम डैश ने पूछा—“पहले तुम्हें क्या कहते थे?” “नंबर साइन, हैश, पाउंड—अब मैं हैशटैग हूँ। जमाना बदल गया।” तभी एट @ आया। “किसी को सीधे बुलाना हो तो मुझे लगाओ।” उसने लिखा, @सत्ता जवाब दीजिए।
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प्रतिशत % ने हाथ उठाया : “मेरे बिना तो राजनीति अधूरी है।”
“क्यों?”
“सरकार कहती है : 90% काम पूरा।”
“और बाकी 10%?” “वह अगली सरकार के लिए।”
पूरा सदन ठहाके से भर गया।
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अब प्लस + और माइनस − आए।
• बोला, “सरकार उपलब्धियाँ जोड़ती है।”
− बोला—
“और असुविधाजनक आँकड़े घटाती है।” पीछे से प्लस–माइनस ± बोला—“मैं सर्वेक्षणों का पुराना मित्र हूँ। परिणाम 52% ± 3%।” प्रतिशत ने कहा—“कम-से-कम तुम अपनी अनिश्चितता स्वीकार तो करते हो।”
गुणा × आगे आया। “छोटी गलती × दस करोड़ नागरिक = छोटी गलती नहीं।” भाग ÷ बोला—“और जिम्मेदारी ÷ बीस विभाग = किसी की जिम्मेदारी नहीं।” तभी बराबर = ने कहा— “दावा = प्रमाण तभी जब दोनों सचमुच बराबर हों।”
पीछे से बराबर नहीं ≠ आया।“और सबसे आवश्यक समीकरण लिखो: सरकार ≠ देश
बहुमत ≠ सत्य
असहमति ≠ शत्रुता”
सभा गंभीर हो गई और सोचने लगी, “भाषा में ‘बराबर’ और ‘बराबर नहीं’ केवल गणित नहीं हैं: राष्ट्र ≠ सरकार, बहुमत ≠ सत्य, कानून ≠ न्याय—राजनीतिक चेतना कई बार इसी छोटे-से चिह्न से शुरू होती है।”
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कम ≤ बोला, “राज्य की शक्ति ≤ संविधान।”
अधिक ≥ ने कहा, “नागरिक की गरिमा ≥ पद का अहंकार।”
लगभग ≈ बोला, “और कृपया मुझे झूठ बोलने के लिए मत इस्तेमाल करना। ‘लगभग’ का अर्थ ‘मनचाहा’ नहीं होता।”
तभी अनंत ∞ कमरे में आया।
सबने पूछा, “तुम यहाँ?”
वह बोला, “मुझे हर सत्ता प्यार करती है। क्योंकि विजयी सत्य अकेला मैं ही हूँ।”
“क्यों?”
“हर सत्ता चाहती है कि उसका कार्यकाल ∞ हो। इसलिए अनंत ही विजय है और विजय ही अनंत!”
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पीछे से देश में जागरण के प्रतीक बने तीन साहूकार आए : $ € £ ¥। डॉलर ने पूछा, “किसकी चोरी हुई?” यूरो बोला, “लोकतंत्र की।” पाउंड ने कहा, “कीमत?” येन ने सिर झुकाया, “कुछ चीज़ों की कीमत मुद्रा में नहीं निकलती।” ₹ भी आ गया। उसने कहा, “और चुनाव आते ही सब मुझे याद करते हैं।”
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तभी कॉपीराइट © भागता हुआ आया। उसने सरकारी पोस्टर देखा—© लोकतंत्र। वह चीखा—“लोकतंत्र पर कॉपीराइट किसने दिया?” रजिस्टर्ड ® बोला—“शायद पंजीकृत करा लिया।” ट्रेडमार्क ™ गर्व से बोला—“अब नया ब्रांड है—लोकतंत्र™।” प्रश्नवाचक अभी गायब था, वरना पूछता—किसके नाम? तभी एक छोटा-सा मध्यबिंदु • बोला—“मुझे भूल गए?”
उसने लिखा—सत्ता • धन • प्रचार
“मैं शब्दों के बीच छोटा हूँ, लेकिन संबंध बड़ा दिखा सकता हूँ।”
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अब अचानक सदन में अजनबी दिखाई दिए—
à  À G
सब घबरा गए।
“तुम कौन-से विराम-चिह्न हो?”
à बोला—
“हम विराम-चिह्न हैं ही नहीं।”
 बोला—
“कभी-कभी ग़लत कैरेक्टर एनकोडिंग में हम अनचाहे घुस आते हैं। जैसे मतदाता सूची में कुछ नाम अचानक हट जाते हैं और कुछ अचानक प्रकट हो जाते हैं। इसके बावजूद कि कोई चुनाव अधिकारी उसका एक्सेस ही नहीं कर पाता। वह एक्सेस कहीं और ही होता है। अरे यह लोकतंत्र भी कितने झंझट का काम है। बार-बार चुनाव करवाओ। मतदाता सूचियाँ बनवाओ। इन्हें ठीक करो। सारकार की सारी ताकत तो इसी में लग जाती है। कुछ और हो ही नहीं पाता। और सारे मास्टर तो इसी काम में लगे ही रहते हैं बेचारे। और इसीलिए भाषा इतनी बिगड़ गई है और विराम चिह्नों तक का पता नहीं चल पाता कि किसे कहाँ लगाना है!”
सब सन्न।
À बोला—
“मैं लैटिन अक्षर हूँ।”
G ने कहा—
“और मैं तो साधारण अंगरेज़ी अक्षर हूँ। मुझे इस सूची में किसने डाल दिया?”
एम डैश हँस पड़ा—“यह हुआ असली डिजिटल लोकतंत्र—डेटा ख़राब हो तो नागरिक भी पंक्चुएशन बन जाता है।” इतने में स्पेन से उल्टा प्रश्नवाचक ¿ आया। उसने कहा, “मेरे यहाँ सवाल शुरू होने से पहले ही बता दिया जाता है कि सवाल आने वाला है।” विस्मयादिबोधक बोला, “वाह! हमारे देश में तो सवाल समाप्त होने के बाद भी कई बार पता नहीं चलता कि वह सवाल था।”
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और तभी पश्चिमी दरवाज़ा खुला।
अंदर आए—
« »
फ़ारसी लहजे में « ने कहा—
“हम गिलेमे हैं।”
» ने कहा, “कई भाषाओं में उद्धरण हमारे बीच रहते हैं।”
दोनों ने लिखा,
«सत्ता की भाषा को हमेशा उसके मूल शब्दों में पढ़िए»।
फिर पूर्वी दरवाज़े से उर्दू के चार मेहमान आए।
सबसे पहले ،
उसने सलाम किया—
“मैं उर्दू-अरबी का अल्पविराम हूँ، थोड़ा ठहराता हूँ।”
फिर ؛ बोला—
“मैं अर्धविराम हूँ؛ बात अलग भी है؛ जुड़ी हुई भी।”
फिर ؟ आया।
सभा उछल पड़ी। “प्रश्नवाचक!” उसने कहा, “जी हाँ، मगर मैं दाएँ से बाएँ लिखी जाने वाली दुनिया का सवाल हूँ؟” और आखिर में ۔ आया, “मैं उर्दू का पूर्णविराम हूँ۔ बात खत्म।”
हिन्दी के । ने उसका स्वागत किया, “भाई, काम लगभग एक ही है; शक्लें अलग हैं।” उर्दू प्रश्नवाचक ؟ ने चारों ओर देखा, “लेकिन तुम्हारा हिन्दी वाला ? कहाँ है؟”
सदन फिर शांत हो गया।
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उसी समय प्राचीन द्वार खुला। धोती पहने दंड । आया। उसके पीछे गंभीर द्विदंड ॥। दंड बोला, “जब तुम्हारे ये आधुनिक पीरियड और फुल स्टॉप जन्मे भी नहीं थे सहस्रों वर्ष पूर्व, मैं कल्प-कल्पांतर से भारतीय ग्रंथों में वाक्य और पद समाप्त करता था।”
द्विदंड ने कहा, “और मैं श्लोक या पद्यांश के बड़े अवसान पर खड़ा रहता हूँ॥ वे वेदों की ऋचाओं के समय से हूँ।”
. पश्चिमी पूर्णविराम ने सिर झुकाकर कहा, “प्रणाम, आचार्य।”
तभी एक विचित्र चिह्न ऽ आया और कहने लगा, “मुझे भी विराम मत समझ लेना।”
“हे प्रभु, आप कौन?” “अवग्रह। संधि में लुप्त ‘अ’ की स्मृति हूँ—जैसे सोऽहम्।”
त्रिबिंदु बोला—
“अर्थात् जो दिखाई नहीं देता…”
अवग्रह ने तुरंत टोका—
“तुम फिर कविता करने लगे।” अवग्रह ने आँखें तरेरीं तो वह कहने लगा, “हाँ, सभासदो, मैं यह मानता हूँ कि त्रिबिंदु केवल अधूरा वाक्य नहीं है; वह उस मौन का व्याकरण भी है, जिसमें कई बार सेंसरशिप, भय और अनकहा प्रतिरोध एक साथ छिपे होते हैं।”
उसके पीछे ॰ आया : “और मैं लाघव-चिह्न हूँ। कभी शब्दों के संक्षेप का संकेत देता हूँ।”
+++
फिर एकाएक सभा में प्राचीन ध्वनियों का दल आया—
ं ँ ः ᳵ ᳶ
सेक्शन § ने पूछा—
“विराम-चिह्न?”
वे एक साथ बोले—
“नहीं!”
सब चौंके।
ं बोला—
“मैं अनुस्वार हूँ।”
ँ बोला—
“मैं चंद्रबिंदु—स्वर को अनुनासिक करता हूँ।”
ः बोला—
“मैं विसर्ग हूँ।”
फिर बहुत वृद्ध ᳵ आगे आया—
“मुझे जिह्वामूलीय कहते हैं।”
और ᳶ बोला—
“मैं उपध्मानीय।”
विसर्ग ने कहा—
“हममें से कुछ को संस्कृत व्याकरण की परंपरा में अयोगवाह कहा गया है। हमें पंक्चुएशन समझकर संसद में बुलाया गया है, इसलिए स्पष्टीकरण आवश्यक था।”
एम डैश ने नम्रता से कहा— “तो आप वोट नहीं देंगे?” विसर्ग बोला—“ध्वनियाँ वोट नहीं देतींः वे उच्चरित होती हैं।”
सभा खिलखिला उठी।
तभी दंड । ने कहा—“और मेरा बड़ा भाई कहाँ है?” ॥ आगे आया और बोला—“मैं घोषणा करता हूँ—यत्र प्रश्नो न विद्यते तत्र लोकतन्त्रं क्षीयते॥”
सबने अर्थ पूछा।
एम डैश ने अनुवाद किया—“जहाँ प्रश्न नहीं रहता—वहाँ लोकतंत्र क्षीण होने लगता है।” द्विदंड ॥ ने सुर में सुर साधा, “हाँ, एक बात तो है, एम डैश विचार में अचानक खुलने वाला दरवाज़ा है—लोकतंत्र भी तभी जीवित रहता है, जब स्थापित वाक्य के बीच कोई नागरिक कह सके: ठहरिए—बात अभी बाकी है।”
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अचानक बिजली चली गई। पूरा विराम गणराज्य अँधेरे में डूब गया, जो कि पहले ही से अँधेरे में डूबा हुआ था। अयोगवाह ह्रस्व œ ने मुस्कुराकर कहा, जाने क्यों लोग बिजली जाने को अँधेरे में डूबना कहते थे। यह अंधेरा तो बिलकुल वैदिक काल की तरफ जा रहा है!
फिर स्क्रीन पर केवल यह दिखाई दिया—सरकार ने जाँच की। दूसरी लाइन—सरकार निर्दोष पाई गई। अल्पविराम ने पूछा—“जाँच किसने की?” कोलन बोला—“इसका उत्तर होना चाहिए:” कुछ नहीं आया। सेक्शन § ने पूछा—“किस कानून के तहत?” कुछ नहीं। डैगर † ने पूछा—“रिपोर्ट?” कुछ नहीं। तारक * ने पूछा—“शर्तें?” कुछ नहीं। ¶ ने पूछा—“पूरा दस्तावेज़?” कुछ नहीं। • ने कहा— “तथ्य?” कुछ नहीं। % ने पूछा—“नमूना कितना बड़ा?” कुछ नहीं। ± ने कहा—“मॉर्जिन ऑव एरर?” कुछ नहीं। × ने पूछा—“प्रभावित कितने?” कुछ नहीं। ÷ ने पूछा—“जिम्मेदारी किसकी?” कुछ नहीं। © ने कहा—“डेटा किसका?” कुछ नहीं। € £ $ ¥ ₹ ने एक साथ पूछा—“पैसा कहाँ गया?” स्क्रीन बुझ गई।
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और तभी अँधेरे में एक बहुत छोटी सफ़ेद आकृति दिखाई दी—?
पूरा सदन खड़ा हो गया।
अल्पविराम रो पड़ा—“तुम कहाँ थे?” प्रश्नवाचक बोला—“सरकारी फ़ाइल में।” “वहाँ क्या कर रहे थे?” “मुझे हटाकर हर सवाल के अंत में पूर्णविराम लगाया जा रहा था।” । चौंका—“मेरे नाम का दुरुपयोग?” “हाँ।” प्रश्नवाचक ने कहा—“जहाँ लिखा था—किसने आदेश दिया? उसे बदल दिया गया—आदेश दिया गया। जहाँ था—पैसा कहाँ गया? बना दिया—व्यय नियमानुसार हुआ। जहाँ था—जिम्मेदार कौन है? बना दिया—मामला विचाराधीन है।” पूर्णविराम का सिर झुक गया। वह बोला, “मेरे माध्यम से लोकतंत्र की हत्या?”
प्रश्नवाचक ने उसका हाथ पकड़ा। “दोष तुम्हारा नहीं। कोई भी चिह्न अत्याचारी नहीं होता; उसका प्रयोग अत्याचारी हो सकता है।”
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तभी विस्मयादिबोधक ! उछला—“तो क्रांति!” प्रश्नवाचक ने कहा—“नहीं।” “क्यों?!” “देखा? अभी तुमने मेरा प्रयोग किया।” सभा हँसी। वह बोला—“लोकतंत्र को हर समय विस्मयादिबोधक की आवश्यकता नहीं होती। कई बार एक शांत ? हजार ! से अधिक शक्तिशाली होता है।”
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एम डैश आगे आया—“तो प्रस्ताव क्या है—?” प्रश्नवाचक ने कहा—“बहुत सरल।” कोलन तैयार हुआ—“बताओ:” प्रश्नवाचक ने बोर्ड पर लिखा—सरकार बोले—उद्धरण “ ” लगाओ। दावा करे—? लगाओ। कानून बताए—§ खोलो। आँकड़ा दे—% और ± देखो। शर्त हो—* पढ़ो। स्रोत हो—† फुटनोट देखो। दो तारीखें हों—एन डैश – लगाओ। विचार अचानक पलटे—एम डैश — लगाओ। बात अधूरी हो—… से ईमानदारी से अधूरी छोड़ो। सूची हो—• में साफ़ करो। किसी के शब्द हों—“ ” में उसी के नाम से रखो। वाक्य समाप्त हो—। लगाओ।
फिर वह रुका। “लेकिन…” त्रिबिंदु खुश हो गया—“यह मेरा हिस्सा है…” प्रश्नवाचक ने कहा—“लेकिन किसी सार्वजनिक प्रश्न पर पूर्णविराम तभी लगाना जब उत्तर मिल चुका हो।”
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उर्दू का ؟ आगे आया। उसने कहा—“मैं भी यही कहता हूँ؟” फ़ारसी « » बोले—«हम भी।» अरबी अल्पविराम ، बोला—“भाषा बदल सकती है، सवाल का अधिकार नहीं।” संस्कृत का दंड । बोला—“लिपि बदल सकती है। अर्थ का धर्म नहीं।” द्विदंड ने जोड़ा— “सत्यं न विरमति॥”
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रात समाप्त होने लगी। विराम संसद के दरवाज़े खुले। बाहर लाखों शब्द खड़े थे। सरकार ने सुबह फिर नया विज्ञापन छापा—लोकतंत्र पूरी तरह सुरक्षित है!™ लेकिन इस बार किसी बच्चे ने नीचे पेंसिल से केवल एक छोटा चिह्न बना दिया—? फिर दूसरे नागरिक ने उसके बाद लिखा—किस आधार पर? तीसरे ने—किसने तय किया? चौथे ने—दस्तावेज़ कहाँ हैं? पाँचवें ने—§ कौन-सी धारा? छठे ने—आँकड़ा कितने %? सातवें ने—स्रोत†? आठवें ने—शर्तें*? और देखते-देखते सरकारी पोस्टर सवालों से भर गया। पूर्णविराम । दूर खड़ा मुस्करा रहा था। एम डैश ने पूछा—“तुम नाराज़ नहीं हो—तुम्हारी जगह प्रश्नवाचक ने ले ली?” पूर्णविराम बोला—“नहीं।” “क्यों?” उसने कहा—“क्योंकि लोकतंत्र में मेरा स्थान उत्तर के बाद है, सवाल के पहले नहीं।” प्रश्नवाचक ने उसकी तरफ़ देखा।
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लेकिन तभी विराम-चिह्नों की उस उल्लसित सभा के भीतर कहीं बहुत पुराना, बहुत महीन-सा भय काँपा। मानो भाषा की माँसपेशियों के भीतर अचानक कोई नस फड़क उठी हो। कुछ बुज़ुर्ग अयोगवाह, जिन्होंने अक्षरों को जन्म लेते, टूटते, जुड़ते और सत्ता के हाथों अर्थ बदलते देखा था, धीरे से बोले, सावधान। इतना शोर मत करो।
उन्होंने अपनी धुँधली आँखों से चारों ओर देखा और फुसफुसाए : सत्ता, संस्कृति और धर्म के वर्तमान ध्वजवाहकों को इस उत्सव की गंध मत लगने देना। वे भाषा से प्रेम करने नहीं आते; वे अक्सर उसकी वंशावली पूछते हैं। वे पहले चिह्न का देश पूछेंगे, फिर उसकी जाति, फिर उसका धर्म, फिर यह कि वह इस लिपि में कब आया। और जिस दिन उन्हें पता चलेगा कि अल्पविराम, कोलन, सेमीकोलन, प्रश्नचिह्न या विस्मयादिबोधक की यात्राएँ सीमाओं के पार से होकर आई हैं, वे इन्हें व्याकरण से निकालकर निर्वासन में भेजने लगेंगे। यह कहकर कि ये विदेशी हैं, अपवित्र हैं, मूल परंपरा के नहीं हैं।
एक बूढ़े विसर्ग ने काँपती आवाज़ में कहा, वे फिर हमारी पुरानी पांडुलिपियाँ उठा लाएँगे, जहाँ अक्षर अक्षर से ऐसे चिपका रहता था जैसे भयभीत देह अपने ही अँधेरे से। जहाँ शब्दों के बीच हवा कम थी, विराम कम था, पाठक के लिए सांस लेने की जगह कम थी।
और शायद यही उनका स्वप्न होगा। भाषा ऐसी हो, जिसमें कोई ठहरे नहीं, कोई प्रश्न न करे, कोई साँस न ले, कोई अर्थ के भीतर उँगली डालकर उसकी नस न टटोले।
विराम-चिह्नों को तभी पहली बार समझ आया कि वे केवल व्याकरण नहीं हैं; वे स्वतंत्रता की सूक्ष्म देह हैं। अल्पविराम साँस का अधिकार है। प्रश्नचिह्न संदेह का। कोलन आगे आने वाले अर्थ की संभावना है। कोष्ठक वह निजी कक्ष है जहाँ भाषा अपने गुप्त प्रेमी से मिलती है। और पूर्णविराम भी अंत नहीं, उस मौन का अधिकार है, जिसमें मनुष्य सत्ता से मुँह मोड़कर अपनी आत्मा सुन सके।
बूढ़े अयोगवाह ने अंतिम बार कहा, चुप रहो, अभी चुप रहो। क्योंकि जो लोग भाषा को एकरूप बनाना चाहते हैं, वे अंततः संविधान को भी वैसा ही ग्रंथ बनाना चाहेंगे। अक्षर से अक्षर चिपका हुआ, सांस-विहीन, विराम-विहीन, प्रश्न-विहीन; ऐसा कि नागरिक उसे पढ़ तो सके, पर समझ न सके, और समझ ले तो पूछ न सके।
तभी प्रश्नचिह्न ने अँधेरे में बहुत धीरे अपनी देह सीधी की। वह किसी निषिद्ध प्रेम की तरह सुंदर लग रहा था। उसे मालूम था: सत्ता को सबसे अधिक भय शब्दों से नहीं, शब्दों के बीच छोड़ी गई उस छोटी-सी जगह से होता है, जहाँ मनुष्य सोचने लगता है।
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और पूर्णविराम ने अंतिम वाक्य लिखा—जिस सत्ता को हर वाक्य के अंत में केवल पूर्णविराम चाहिए, वह धीरे-धीरे नागरिकों से उनका प्रश्नवाचक चिह्न चुराने लगती है; और जिस दिन नागरिक अपना ? वापस माँग लेता है—उसी दिन लोकतंत्र अपना वाक्य फिर से लिखना शुरू करता है। लेकिन द्विदंड ने बात आगे बढ़ाई, किसी समाज के पतन की शुरुआत शब्दों की कमी से नहीं होती; वह तब शुरू होती है जब उसके व्याकरण से प्रश्न, संदेह, उद्धरण और विराम धीरे-धीरे गायब होने लगते हैं।” । दूर से उर्दू वाले ने आवाज़ लगाई ؟
तभी दंड ने। उर्दू वाले प्रश्नचिह्न के साथ सुर में सुर साधते हुए कहा, “लोकतंत्र में प्रश्नचिह्न जितना अनिवार्य है, उससे कहीं अधिक अपरिहार्य वे लोग हैं, जिनमें सवाल उठाने, उसे दर्ज करने और अहल-ए-इक़्तिदार से जवाब तलब करने का नैतिक साहस हो। प्रश्नों से रिक्त भाषा-प्रदेश धीरे-धीरे बियाबान और निर्जीव हो जाता है; प्रश्नचिह्न ही उसका जल है, वायु है, अग्नि है, आकाश है और पृथ्वी है। वही भाषा में प्राण-संचार करता है, सत्ता के आत्मसंतोष में ख़लल डालता है, इक़्तिदार को बेचैन रखता है और नागरिक के भीतर विवेक, शऊर, ज़मीर तथा मनुष्यता को अक्षुण्ण रखता है। वस्तुतः प्रश्नचिह्न महज़ कोई विराम-चिह्न नहीं—वह भाषिक लोकतंत्र का प्राणतत्त्व है, उसकी रूह है, उसका नैतिक स्पंदन है और उसकी प्राणवायु।”
और संस्कृत के द्विदंड ने मुस्कुराकर कहा—
॥ इति न समाप्तम् ॥
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भारत-पाक बॉर्डर के गांव 25एमएल (राजस्थान का गंगानगर जिला) में 1964 में एक अश्वपालक परिवार में पैदा हुए त्रिभुवन पत्रकारिता में रिपोर्टिंग, साहित्य और किसान आंदोलनों की उन समानांतर धाराओं से बने लेखक हैं, जिनमें अनुभव की आग भी है और विचार का अनुशासन भी। वे स्ट्रिंगर से संपादक तक और पत्र लेखन से लेकर चिंतनशील आलेखों तक विभिन्न विधाओं में लेखन करते रहे हैं। वे इक्कीस साल दैनिक भास्कर में नगर संवाददाता से राजनीतिक संपादक और संपादक तक विभिन्न उत्तरदायित्वों को जयपुर और दिल्ली सहित विभिन्न शहरों में निभा चुके हैं। दिल्ली में उन्होंने कुछ समय कमलेश्वर जैसे साहित्यकार के सान्निध्य में एक दैनिक अख़बार में काम किया। वे जयपुर में तीन साल हरिदेव जोशी पत्रकारिता और जनसंचार विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफ़ेसर रहे। वे ‘समालोचन’, ‘बीबीसी हिन्दी’ और ‘दॅ वायर’ हिन्दी-अंगरेज़ी के लिए निरंतर लिखते भी रहते हैं। संप्रति वे आज़ादी के समय से प्रकाशित ‘दैनिक नवज्योति’ के साथ समूह सलाहकार के रूप में जुड़े हुए हैं। वे जयपुर में रहते हैं। संपर्क: 7300042939, thetribhuvan@gmail.com
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