कहानी संग्रह : भँवर में …
लेखक – हरियश राय
प्रकाशन संस्थान ( २०२४ – प्रथम संस्करण )
ऋषि गजपाल
“ सतत परिवर्तन – परिदृश्य की परिघटना है हरियश राय की कहानियाँ | “
प्रख्यात कथाकार संजीव ने लेखक हरियश राय के कहानी संग्रह ‘ भँवर में — ‘ के फ्लेप में कहते हैं और बताते हैं कि उनकी कहानियों के दो प्रमुख आघात बिंदु हैं | प्रथम – आप जहाँ पाँव रखते हैं , हैरान रह जाते हैं कि यह जमीन तो कब की खिसक चुकी है | दूसरा – अंध-श्रद्धा | श्रम , विवेक और आत्मसम्मान खोकर पढ़े-लिखे नौजवान तक अब इस रोग की चपेट में आ रहे हैं | पंद्रह कहानियों के इस संग्रह में ये दो ख़ास तथ्य तो हैं ही जिसमें अब हेय दृष्टि से देखे जाने वाले कौम के करीम खान , अंसार , नासिर , जाहिर , असिया , अमृता ( जो एक मुसलमान युवक से विवाह करने पर तिरस्कृत हुई थी ), फातिमा बी , जोहरा जैसे कितने ही किरदार पाठकों के स्मृति-पटल में अंकित हो जाते हैं | सभी कहानियाँ किसी न किसी पत्रिका में समय-समय पर छपी है और लोग प्रभावित भी हुए हैं | आज के अत्यंत जहरीले होते जा रहे वातावरण में भाईचारा और भरोसा सबसे अधिक प्रभावित हुई है और लोग अप्रत्याशित रूप से असंवेदनशील होते चले गए और सिर्फ अपने तक ही सिमट कर रह जाने को मजबूर हुए |
संग्रह की शीर्षक कहानी ‘ भँवर में ‘ कहानी में जहीर नामक शख्स , जो हिन्दुओं के लिए टेराकोटा ( विशेष प्रकार की मिटटी ) से भगवान की मूर्तियाँ बनाकर बेचने का काम करता है और परिवार चलाता है , मंदी आ जाने की खबर से बेचैन है | किसी हितैषी की सलाह पर अब उन्ही हिन्दुओं के घर में रखने वाली सजावटी मंदिर बनाने का काम हाथ में लेता है जिसके लिए उसने स्कूल जा रहे अपने बच्चे तक को छुट्टी लेने पर मजबूर कर दिया ताकि समय रहते काठ के पचास मंदिर बना कर दे सके | ‘ आमची मुंबई ‘ कहानी में एक अंसार नामक मुसलमान दलाल की पीड़ा है जो कमीशन लेकर मुंबई में जरूरतमंद लोगों को फ्लेट दिलाने का काम करता है | अभी अभी मुम्बई आये एक आदमी ने उससे एक सहूलियत वाली ठीक-ठाक फ्लेट का सौदा कर लिया है लेकिन आफिस के एक हिन्दू सहकर्मी को जब यह खबर लगती है तो उसके सीने में सांप लोट जाता है क्योकि वह भी इस काम में दलाली का काम करता है | अपना नुकसान देखकर वह उसे मुसलमान कौम के भीतर का झूठा सच बताकर डरा देता है | आगंतुक यह जानकर हिल जाता है कि जिस सोसायटी में उसने फ्लेट का सौदा किया है वहाँ खतरनाक मानी जाने वाली कौम के लोग ही ज्यादातर रहते हैं | सौदा रद्द करने वह अंसार के पास जाता है तब वह उस जरुरतमन्द को आँख खोल देने वाली सच्चाई दिखाकर हैरान कर देता है | ‘ महफ़िल ‘ कहानी तो इतनी भावुक कर देने वाली कहानी है कि निश्चित रूप से देश में हो रहे तथाकथित विकास पर दुःख होने लगता है | एक कार्पोरेट संस्थान के एक बड़े अधिकारी के आगमन में फाइव स्टार होटल में भव्य कार्यक्रम रखा जाता है जिसमें स्थानीय कलाकारों को आमंत्रित कर एक सांस्कृतिक कार्यक्रम की योजना बनती है | आयोजन की तैयारी में लगे सभी अधिकारियों को कलाकार करीम खान की प्रस्तुति बेहतर लगी जिसमें उसका जवान बेटा और एक अन्य कलाकार मंचस्थ थे | उसके जैसा लांग गायन इलाके में कोई नही कर सकता ये कई लोगों का दावा था | विशिष्ठ मेहमान चेयरमेन को भी उसकी प्रस्तुति अच्छी लगी लेकिन जैसे ही उस कलाकार का नाम उजागर हुआ , गायन को बीच में रोककर कलाकार को दुत्कार दिया गया | यहाँ तक कि बतौर पारिश्रमिक उसकी एक छोटी सी इच्छा कभी ध्यान नहीं रखा जाता जिसमें उसने मेहमानों के लिए परोसी जाने वाली उस होटल की बेहतरीन बटर चिकन का स्वाद चखने की इच्छा जाहिर की थी जिसे वह घर ले जाकर खा सकता था | उसने बाहर गेट पर देर इंतजार किया होगा फिर मायूस होकर खाली हाथ लौट गया होगा | ‘ असिया नूरी गुमसुम है ‘ कहानी में कार्यरत प्रतिबद्ध अधिकारी असिया अपने को संदेह के घेरे में पाती है | उसे डर है कि तथाकथित शिकायत की साजिश करके उसे बदनाम किया जायेगा और सजा दी जायेगी | उससे सवाल जवाब किया जाता है लेकिन अंत में उसे बहुत ख़ुशी होती है जब एक हिन्दू अधिकारी जाँच में उसे निर्दोष पाता है | लेकिन घर जाकर ख़ुशी तब नदारद हो जाती है जब बेटी के स्कूल टीचर ने कापी में दूसरे दिन फेंसी ड्रेस की तैयारी में बुरका पहनकर आने का आदेश दिया था | जिस संस्कृति और सोच को वे दम्पत्ति सिरे से नकारते रहे हैं अंततः उससे ही सामना होता है | कहानी ‘ रहगुजर ‘ दो बहनों की आपबीती है जो बरसों पहले छोटी बहन अमृता के एक मुसलमान युवक से शादी कर लेने के बाद उपजी अविश्वास की कहानी है | बड़ी बहन माया को जब पता चलता है कि छोटी बहन अमृता दुबई से भारत आ रही है और उसके घर में थोड़ी देर के लिए ही सही , मिलने आएगी तो वह सशंकित हो जाती है कि धर्म बदलकर विदेश में रहने वाली विधवा हो चुकी बहन इतने दिनों बाद जरुर सम्पत्ति के बंटवारे के लालच में होगी | लेकिन वास्तव में यह झूठ साबित होता है | ‘ चिराग ‘ भी एक ऐसे दुकानदार की कहानी है जिसने उजाले में भी ज्ञान का चिराग सतत फ़ैलाते रहने की जिद ठान ली है लेकिन आसपास के प्रतिस्पर्धी दुकानदारों को यह पसंद नहीं | इस संग्रह में मेरी पसंद की सबसे बेहतरीन कहानी ‘ आमंत्रण ‘ है | एक नास्तिक सा पारिवारिक आदमी बेटी के ससुराल में एक धार्मिक आयोजन में सपरिवार आमंत्रित है | परिवार वालों की जिद के कारण न चाह कर भी उसे जाना पड़ता है कुछ देर के लिए ही सही | लेकिन कुछ देर में ही उस माहौल से मन उब जाता है और वो गली में निकल जाता है | गली के एक कोने में पेड़ के नीचे एक मुसलमान कलाकार नासिर बाँसुरी बजा रहा है और अनेकों धुन से ऐसा मस्त कर दे रहा है कि गुजरने वाले कुछ देर ठिठक कर सुनने को मजबूर हो जाते हैं | उसने न सिर्फ सूफी गानों को बाँसुरी में बजाया बल्कि हिन्दुओं में भी गाये जाने वाले आमिर खुसरो , सूरदास , कबीर की पदावलियों की भी शानदार धुनें बाँसुरी के माध्यम से सुनाई | धार्मिक आयोजन में पति को अनुपस्थित देख उनकी पत्नी भी खोजती हुई इस जगह पहुँचती है और वह भी मोहित हो जाती है | वे चकित हैं कि वह गरीब कलाकर प्रशंसा में दिए गये रुपयों का इनाम लेने से इंकार करता है | तब पत्नी का सुझाव पति को आल्हादित करता है कि उनके चाचा की तेरहवीं में इस कलाकार को आमंत्रित किया जाय किसी धर्मिक आयोजन की बजाय | कलाकर को और क्या चाहिए – सम्मान के दो बोल | छोटी सी कहानी ‘ पेड़ ‘ भी गजब की कहानी है | एक घर की सीमा दीवार से लगा एक पुराना पीपल का विशाल पेड़ है जो अब आसपास के धार्मिक लोगों की जबर्दस्त आस्था का केंद्र बन चुका है लेकिन लोगों के नियमित धार्मिक कर्मकांडों से घर मालिक की निजता का लगातार हनन हो रहा है | उसने नगर निगम में उस पेड़ को हटाने का आवेदन दिया था जो नकार दिया गया | तब घर मालकिन की एक सहेली के आईएएस पति की मदद ली जाती है | दूसरे दिन वो अधिकारी दल-बल लेकर हाजिर होते हैं पीपल को जड़ अहित उखाड़ने के लिए | लेकिन घर मालिक-मालिकिन की आखें तब आश्चर्य से खुली रह जाती है जब वह आईएएस अधिकारी खुद उस पीपल की परिक्रमा करते हुए मंत्रोच्चार पूजा करने लगता है और उस पेड़ का एक पत्ता तोड़कर जेब में रख लेता है | ‘ राहत ‘ कहानी में फातिमा बी अपनी छोटी बहन से मिलने बरसों बाद ट्रेन के एसी सेंकंड क्लास में अकेली सफर कर रही है | बेटा छोड़ने आया था ट्रेन में | कूपे में बाकी बची सीटों पर भी मुसाफिर आते गए जो हिन्दू थे | बातचीत का सिलसिला चल निकला और इस तरह चला कि फातिमाबी डर गई | बल्कि उसे वितृष्णा हो गई और उसने टिकट चेकर से अनुनय किया कि हो सके तो सीट बदल दें | बड़ी मुश्किल से सामान्य सेंकड क्लास में सीट मिलती है जिसके लिए वह सहर्ष तैयार हो जाती हैं | कूपे के अन्य सदस्य हैरान हैं कि आरामदायक वातानुकूलित सीट छोड़कर सामान्य सेकंड दर्जे के कूपे में वह क्यों चली गई लेकिन फातिमाबी ही जानती थी कि उसे कितनी राहत मिली थी सीट बदलकर | ‘ गुमसुम होती हवाएं “ कहानी में एक आदमी अपने पुराने मित्र ओमप्रकाश को टीवी पर चल रहे समाचार में देखके हैरान हुआ | हैरान इसलिए कि वह ओमप्रकाश अपने एक और मित्र के साथ एक अल्प समुदाय के युवा को बेदम होते तक पीटते रहा है | उसे विश्वास नहीं होता लेकिन बाद में वह सच निकलता है | कुछ दिनों बाद ओमप्रकाश ने मुलाकात में बताया कि मोबाइल फोन बेचने की दुकान न चलने से परिवार की उलाहना सुन-सुन कर वह थक गया था इसलिए माथे पर तिलक और कलाई में कलेवा बांधकर नया चोला बदलकर अब राजनीतिक पार्टी से जुड़कर नेतागिरी में हाथ आजमा रहा है और उसे मजा आ रहा है | मित्र उसका यह जवाब सुनकर दंग है | बंगला देश से भारत में कमाने खाने आई दो बहनो की कहानी है ‘ पत्थर की आँख ‘ | जोहरा नाम की बंगला मुस्लिम महिला नाम बदलकर पिंकी हो गई है और काम की तलाश में हैं | उसकी बचपन से फूट चुकी एक आँख पत्थर की है जिससे चेहरा डरावना लगता है | घर के एक बुजुर्ग को बेटा-बहू के ड्यूटी में चले जाने के बाद घर में छूटे दो वर्ष के पोते की रखवाली के लिए एक नौकरनी चाहिए | उसे काम दिया जाता है लेकिन कुछ दिन बाद असल नाम उजागर हो जाने से वह निराश होकर जाने लगती है | तब घर मालिक उसे आश्वस्त करता है कि नाम में क्या रखा है ? कुरूप चेहरा होकर भी वह आवाज और मन से कितनी मीठी और सुरीली है कि दो बरस का बच्चा भी उससे खूब हिल-मिल गया है | कहानी ‘ यू-टार्न ‘ एक ऐसे आधुनिक जमाने के बेटे की कहानी है जिसके वैज्ञानिक पिता का देहांत हुआ है और जिसका बेटा विदेश से नौकरी से छुट्टी लेकर चार दिन बाद घर आता है | तब तक फ्रीजर में उसके पिता की देह रखी होती है जिसे उसका बेटा पूरे धार्मिक कर्मकांड के साथ संपन्न करता है | तेरहवीं में उसके पिता का एक मित्र भी मन पहुँचता है जहाँ यह देखकर दुखी होता है कि जिस वैज्ञानिक ने जिन्दगी भर कुरीतियों और अन्धविश्वास की परम्परा को तोड़ने में विश्वास किया था , आज के जमाने का इंजीनियर बेटा उन्ही कर्मकांडों से पिता को श्रद्धांजलि देने पर तुला हुआ है | ‘ पाठ ‘ कहानी में आजकल के स्कूलों में सत्ता द्वारा किये जा रहे पाठ्क्रम में बदलाव को रेखांकित किया गया है जिससे कई जागरूक नागरिक परेशान हैं | कुछ तो क्षुब्ध होकर बच्चों को वहाँ से निकालकर किसी ऐसे स्कूल में दाखिल करवाना चाहते हैं जहाँ इस तरह के विद्वेषपूर्ण पाठ्यक्रम नहीं चलाये जाते हों | ‘ देखना ‘ कहानी एक अख़बार के काले तंत्र को उजागर करता हुआ है जिसमें अख़बार का मालिक आज के हिसाब से स्टोरियाँ तैयार करने के लिए संवाद-दाताओं को मजबूर करता है | एकाध सच्चे संवाददाता उनके आदेश की अवहेलना कर सच्ची रिपोर्टिंग करने का साहस कर लेते हैं तब उन्हें खारी-खोटी सुननी पड़ती है | संग्रह की अंतिम कहानी ‘ इससे बेहतर हो ‘ के माध्यम से लेखक एक ऐसे सोसायटी की अंदरूनी बातें उजागर करते हैं जहाँ आज की धार्मिक मानसिकता में ढले लोग दिखावटी धरम-करम का ढोल पिटते नजर आते हैं और केम्पस में मन्दिर बनाने का एकतरफा फैसला लेते हैं चाहे कोई पसंद करे या न करे |
भूमिका में लेखक हरियश राय कहते हैं कि उपनिवेशवाद ने जहाँ हमें आधुनिकता का पाठ पढ़ाया , वहीँ हमारे मन में पहले से मौजूद साम्प्रदायिकता के स्रोतों को और भी गहरा किया | यहाँ कभी गंगा-जमुनी संस्कृति की धारा बहती थी जो आज पूरी तरह नष्ट होती दिख रही है | आवाज कहाँ उठायें औए कैसे उठायें ये सोचने वाली बात है ? हरियश राय जी की कहानियों का मुख्य आकर्षण एक विशेष समुदाय पर केंद्रित होते हुए भी उनका विविधवर्णी कथा तत्व है जिसे पूरी तरह विश्वसनीय बनाते हुए अपने ढंग से असरदार तरीके से कहने की कला है |