कवि आलोक धन्वा के पीछे तलवार लेकर क्यों पड़ी हैं महिलाएं
अरविंद शर्मा
फिदा हुसैन की अश्लील पेंटिंगों पर आह-वाह करने वाले लोग आज कवि आलोक धन्वा के पीछे तलवार लेकर खड़े हैं। हैरत यह भी है कि इनमें महिलाएं ज्यादा हैं। इनमें भी कई ऐसी हैं, जो कभी आलोक धन्वा का सानिध्य प्राप्त कर लहालोट होती रहती थीं। सोशल मीडिया पर उनके साथ अपनी तस्वीरें चिपका कर इतराती थी कि वह इस महान कवि की अत्यंत करीबी हैं। अफसोस है कि आज वैसे ही लोग उन्हें निरावरण करने में सबसे आगे दिखाई दे रहे हैं।
मैं 82 वर्षीय आलोक धन्वा के मोबाइल से किए जा रहे अनुचित संदेशों या सोशल मीडिया पर उल-जुलूल पोस्ट का पक्षधर नहीं हूं, लेकिन उन पटनियां लोगों की हरकतों से दुखी जरूर हूं जो दूर रहकर आलोक धन्वा की कीर्ति को कलंकित कर रहे हैं। दशकों से कवि के आसपास ही रहते हैं, लेकिन कीचड़ उछालने में सबसे आगे हैं। सवाल यह भी है कि क्या किसी व्यक्ति के खिलाफ शिकायतों का समाधान उसे सार्वजनिक रूप से गाली देने में ही है?
कवि को कलंकित करने का सबसे पहले बीड़ा उठाया सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक और प्रचंड क्रांतिकारी के रूप में विख्यात निवेदिता झा ने। मैं उनके बारे में बहुत नहीं जानता। मगर पटना में पत्रकारिता करते हुए इतना जरूर जानता हूं कि वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हैं। उनके पति डॉ. शकील खान जाने-माने चिकित्सक हैं। निवेदिता जी भी कभी आलोक धन्वा की घोर प्रशंसकों में रही हैं। मेरा मानना है कि अगर निवेदिता जी का हाल के दिनों में कवि से कोई व्यक्तिगत खुन्नस नहीं होती तो वह अपने डाक्टर पति को साथ लेकर जातीं और उस तथाकथित बीमार कवि का इलाज करवातीं। लेकिन नहीं। उन्हें तो ढोल पीटकर कवि को दुराचारी बताना है। इसके लिए अपनी टोली को भी प्रेरित करना है।
आलोक धन्वा अपनी उम्र के जिस पड़ाव पर हैं, उसमें उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति की कल्पना की जा सकती है। उनकी काया इतनी कमजोर हो चुकी है कि सपने में भी किसी महिला को याद (तंग) करने में कामयाब नहीं हो सकती है। मगर निवेदिता जी हल्ला कर रही हैं कि उनकी टोली की महिलाओं को आलोक धन्वा फोन करके अश्लील बातें कर रहे हैं। इस प्रचार का असर भी दिख रहा है। उनकी टोली की कई महिलाओं ने कवि को अमित्र करने की बात को फ्लैश किया है। हालांकि अभी तक किसी ने सामने आकर यह नहीं कहा है कि आलोक धन्वा ने उसे फोन करके परेशान किया है।
निवेदिता जी की उन महिला मित्रों से मेरा आग्रह है कि अगर आलोक धन्वा ने सचमुच में फोन करके किसी से अश्लील बातें की है या मैसेज भेजा है तो उसे सबूतों के साथ पुलिस के पास जाकर कंप्लेन करना चाहिए। शिकायतों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। आरोपों की गंभीरता और किसी व्यक्ति की गरिमा, दोनों का ध्यान रखा जाना चाहिए। बिना जांच के निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं है।
निवेदिता झा लेखिका, नाट्यकर्मी, पत्रकार और सामाजिक सरोकारों वाली महिला के रूप में जानी जाती हैं। मगर किसी को मनोरोगी बताकर उसके सार्वजनिक बहिष्कार की अपील करना एकतरफा न्याय है। विरोध और असहमति अपनी जगह हैं, लेकिन मानवीय गरिमा को धक्का देना भी कम लज्जाजनक नहीं है। आश्चर्य यह भी है कि बिहार के प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच जैसे साहित्यिक संगठनों ने इस मुद्दे पर अभी तक चुप्पी साध रखी है। क्या उनका दायित्व सिर्फ रचनाओं पर चर्चा करना भर रह गया है।
निवेदिता जी एवं उनके खेमे के साहित्यकारों और सुधिजनों को मेरी सलाह है कि आलोक धन्वा के अनुचित व्यवहार का विरोध जरूर कीजिए। महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और सम्मान से समझौता नहीं होना चाहिए, लेकिन किसी व्यक्ति के अशक्त होने पर उसके जीवन भर की कमाई पर नाली का पानी मत डालिए। आलोक धन्वा के साहित्यिक योगदान को ऐसी तोहमत से मिटाया नहीं जा सकता है। न्याय का रास्ता यही है कि उस कवि के प्रति मन में जो क्लेश है उसे पहले गुनगुने पानी से धो डालिए और फिर ठंडे दिमाग से अपने डाक्टर पति के साथ बैठकर सोचिए कि एक वयोवृद्ध कवि की बीमार मन:स्थिति और काया को कैसे ठीक किया जा सकता है। वह कवि जो स्वस्थ रहने पर आपका आदर्श हुआ करता था।
कुछ वर्ष पहले प्रकाशित पुस्तक ‘पटना डायरी’ में आलोक धन्वा की प्रतिभा और काव्य-व्यक्तित्व की जमकर प्रशंसा करने वाली निवेदिता झा जी से मेरा आग्रह है कि किसी को अपमानित करने या बिना सच जाने जज बनकर दोषी ठहराने से बचा जाए। आप भी कभी बूढ़ी होंगी और ईश्वर न करे कि आलोक धन्वा की तरह आप भी…।
सादर प्रणाम